Davinder Singh Rana
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आई लव शेयरचैट
*सूर्यदेव को लाल चंदन और कनेर के पुष्प अत्यंत प्रिय क्यों हैं...?* 🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞 हिन्दू धर्म की पंचदेवोपासना में प्रथम स्थान सूर्योपासना का है। यह समस्त चराचर संसार भगवान सूर्य का ऋणी है क्योंकि संसार के समस्त जड़ और चेतन जगत् को जीवन-शक्ति और प्राण-शक्ति सूर्य के द्वारा ही प्राप्त होती है; इसीलिए सूर्य को प्राणियों का ‘प्राण’ कहा गया है । सूर्योपासना से मनुष्य को अद्भुत सुख-शान्ति की अनुभूति होती है । भगवान सूर्य की आराधना यदि भक्ति-भाव व विभिन्न सामग्रियों से कर ली जाए तो वे इन्द्र से भी अधिक वैभव, दीर्घायु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धन, मित्र, आठ प्रकार के भोग, विभिन्न प्रकार की उन्नति के लिए व्यापक क्षेत्र, स्वर्ग और अपवर्ग सब कुछ प्रदान करते हैं। भगवान सूर्य को अत्यंत प्रिय वस्तुएं 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ कनेर (करवीर) के पुष्प, रक्त चंदन, गुग्गुल का धूप, ताम्र पात्र, घी का दीपक, फल, घी के बने पुए, मोदक का नैवेद्य पुराण-ग्रंथ (इतिहास-पुराणों के वाचक की जो पूजा की जाती है उसे सूर्य देव की पूजा ही माना जाता है) ये सब वस्तुएं भगवान सूर्य को अत्यन्त प्रिय हैं, लेकिन इन सबसे ऊपर है शुद्ध और निर्मल मन। भगवान सूर्य की आराधना करने वाले मनुष्य को राग-द्वेष, झूठ और हिंसा से दूर रहना चाहिए। कलुषित हृदय और अप्रसन्न मन से मनुष्य भगवान सूर्य को सब-कुछ अर्पित कर दे तो भी भगवान आदित्य उस पर प्रसन्न नहीं होते। लेकिन यदि शुद्ध हृदय से मात्र जल अर्पण करने पर सूर्य पूजा के दुर्लभ फल की प्राप्ति हो जाती है। क्यों हैं सूर्य को लाल (रक्त) चंदन और कनेर (करवीर) के पुष्प अत्यंत प्रिय ? 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ देवताओं के शिल्पी (बढ़ई) विश्वकर्मा (त्वष्टा) की पुत्री संज्ञा बड़ी ही रूपवती थी। उसके अन्य नाम हैं—राज्ञी, द्यौ, त्वष्ट्री, प्रभा तथा सुरेणु। संज्ञा का विवाह भगवान सूर्य के साथ हुआ। संज्ञा बड़ी पतिव्रता थी, किन्तु सूर्य देव मानव रूप में उसके समीप नहीं जाते थे। सूर्य के अत्यधिक तेज के कारण संज्ञा की आंखें मूंद जाती थीं जिससे वह सूर्य का सुन्दर स्वरूप नहीं देख पाती थी। अत: संज्ञा को अच्छा नहीं लगता था। वह व्याकुल होकर सोचने लगी—मेरा सुवर्ण सा रंग व कमनीय शरीर इनके तेज से दग्ध होकर श्याम वर्ण का हो गया है। इनके साथ मेरा निर्वाह होना बहुत कठिन है तपस्या करने से मुझमें वह शक्ति आ सकती है, जिससे मैं उनके सुन्दर रूप को अच्छी तरह से देख सकूं। उसी स्थिति में संज्ञा से सूर्य की तीन संतानें—वैवस्वत मनु, यम, व यमी (यमुना) हुईं; किन्तु सूर्य के तेज को न सह सकने के कारण अपने ही रूप-आकृति तथा वर्ण वाली अपनी ‘छाया’ को पति-सेवा में नियुक्त कर वह अपने पिता के घर चली गयी। जब पिता ने उसे पति-गृह जाने के लिए कहा तो वह ‘उत्तरकुरु’ (हरियाणा) देश चली गयी। अपने सतीत्व की रक्षा के लिए उसने वडवा (मन के समान गति वाली घोड़ी, अश्विनी) का रूप धारण कर लिया और अपनी शक्ति वृद्धि के लिए कठोर तपस्या करने लगी। सूर्य के समीप संज्ञा के रूप में उसकी छाया निवास करती थी। छाया का दूसरा नाम विक्षुभा है। उसके सभी अंग, बोल-चाल, आकृति संज्ञा जैसे ही थे; इसलिए सूर्य देव को यह रहस्य ज्ञात नहीं हो पाया। सूर्य ने भी छाया को ही अपनी पत्नी समझा और उससे उन्हें चार संतानें—सावर्णि मनु, शनि, तपती तथा विष्टि (भद्रा) हुईं ! छाया अपनी संतानों को अधिक प्यार करती थी और वैवस्वत मनु, यम तथा यमी का निरन्तर तिरस्कार करती रहती थी। पर विधाता का विधान तो देखें, छाया के विषमतापूर्ण व्यवहार का भंडाफोड़ हो गया। कुपित सूर्य छाया के पास पहुंचे और उसके केश पकड़ कर पूछा—‘सच-सच बता, तू कौन है ? कोई भी माता अपने बच्चों के साथ ऐसा निम्न कोटि का व्यवहार नहीं कर सकती ।’ यह सुन कर भयभीत छाया ने सूर्य के सामने सारा रहस्य प्रकट कर दिया। शीघ्र ही सूर्य संज्ञा को खोजते हुए उसके पिता विश्वकर्मा के घर पहुंचे। विश्वकर्मा ने सूर्य को संज्ञा के उनका तेज न सहन करने और उत्तरकुरु नामक स्थान पर तपस्या करने की बात बताई। साथ ही कहा कि यदि आप चाहें तो आपके प्रकाश को तराश कर कम किया जा सकता है। भगवान सूर्य अपनी पत्नी की प्रसन्नता के लिए कष्ट सहने को तैयार हो गए। भगवान सूर्य ने विश्वकर्मा से अपना सुन्दर रूप प्रकाशित करने को कहा। विश्वकर्मा ने सूर्य की इच्छा पर अपने तक्षण-कर्म से उनके तेज को व्रज की सान पर खरादना आरम्भ किया। अंगों को तराशने के कारण सूर्य को अत्यंत पीड़ा हो रही थी और बार-बार मूर्च्छा हो रही थी; इसलिए विश्वकर्मा ने सब अंग तो ठीक कर दिए, पर पैरों की अंगुलियों को छोड़ दिया। तब सूर्य देव ने कहा—‘आपने तो अपना कार्य पूर्ण कर लिया, परन्तु हम पीड़ा से व्याकुल हो रहे हैं, इसका कोई उपाय बताइए।’ विश्वकर्मा ने कहा—‘आप रक्त चंदन और कनेर के पुष्पों का संपूर्ण शरीर में लेप करें, इससे तत्काल यह पीड़ा शांत हो जाएगी ।’ भगवान सूर्य ने विश्वकर्मा के कथनानुसार अपने सारे शरीर में इनका लेप किया, जिससे उनकी सारी वेदना मिट गयी । उसी दिन से लाल चंदन और कनेर (करवीर) के पुष्प भगवान सूर्य को अत्यंत प्रिय हो गए और उनकी पूजा में प्रयुक्त होने लगे। सुर्यदेवाय नमो नमः राणा जी खेड़ांवाली🚩 #🕉️सनातन धर्म🚩 #श्री हरि #🌻 ॐ सुर्य आदित्य नारायण नमः #🌻
*शिव पुराण में एक कथा आती है, जब स्वयं माता सती भगवान् विष्णु की माया को देख भ्रमित हो गयीं तथा भगवान् महेश्वर की कही बात पर भी अविश्वास कर स्वयं भगवान् विष्णु की माया-लीला में प्रवेश कर गयीं।।* 🧿🧿🧿🧿🧿🧿🧿🧿🧿🧿🧿 एक समय की बात है, तीनों लोकों में विचरने वाले भगवान् रुद्र सती के साथ बैल पर आरूढ़ हो इस भूतल पर भ्रमण कर रहे थे। घूमते-घूमते वे दण्डकारण्य में आये। वहाँ उन्होंने लक्ष्मण सहित भगवान् श्रीराम को देखा, जो रावण द्वारा छलपूर्वक हर कर ले गयी अपनी प्यारी पत्नी सीता की खोज कर रहे थे। वे 'हा सीते !' ऐसा उच्चस्वर से पुकारते, जहाँ-तहाँ देखते और बारंबार रोते थे। उनके मन में विरह का आवेश छा गया था। सूर्यवंश में उत्पन्न, दशरथनन्दन, भरताग्रज श्रीराम आनन्द रहित हो लक्ष्मण के साथ वन में भ्रमण कर रहे थे और उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी। उस समय भगवान् शंकर ने बडी प्रसन्नता के साथ उन्हें प्रणाम किया, किन्तु भगवान् शंकर ने उस वन में श्रीराम के सामने अपने को प्रकट नहीं किया, और जय जयकार करके वे दूसरी ओर चल दिये। शिव की मोह में डालने वाली ऐसी लीला देख सती को बड़ा विस्मय हुआ। वे उनकी माया से मोहित हो उनसे इस प्रकार बोलीं, 'नाथ! ये दोनों पुरुष कौन हैं; इनकी आकृति विरहव्यथा से व्याकुल दिखायी दे रही है। इनमें जो ज्येष्ठ है, उसकी अंगकान्ति नीलकमल के समान श्याम है। उसे देखकर किस कारण से आप आनन्दविभोर हो उठे थे? आपका चित्त क्यों अत्यन्त प्रसन्न हो गया था ? आप इस समय भक्त के समान विनम्र क्यों हो गये थे ? सती की यह बात सुनकर भगवान् शंकर ने कहा, 'प्रिये ! ये दोनों भाई वीरों द्वारा सम्मानित हैं। इनके नाम हैं-श्रीराम और लक्ष्मण। इनका प्राकट्य सूर्यवंश में हुआ है। ये दोनों राजा दशरथ के विद्वान् पुत्र हैं। इनमें जो गोरे रंग के छोटे बन्धु हैं, वे साक्षात् शेष के अंश हैं। उनका नाम लक्ष्मण है। इनके बड़े भैया का नाम श्रीराम है। इनके रूप में भगवान् विष्णु ही अपने सम्पूर्ण अंश से प्रकट हुए हैं। ये साधुपुरुषों की रक्षा और लोगों के कल्याण के लिये इस पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए हैं।' भगवान् शिव की बात सुनकर भी सती के मन को इस पर विश्वास नहीं हुआ। और हो भी कैसे ?, भगवान् विष्णु की माया बड़ी प्रबल है, वह सम्पूर्ण लोकों को मोह में डाल देने वाली है। सती के मन में संशय देख भगवान् शिव बोले, 'देवि! मेरी बात सुनो। यदि तुम्हारे मन में मेरे कथन पर विश्वास नहीं है तो तुम वहाँ जाकर अपनी ही बुद्धि से श्रीराम की परीक्षा कर लो। प्रिये! जिस प्रकार तुम्हारा मोह या भ्रम नष्ट हो जाय, वह करो। तुम वहाँ जाकर परीक्षा करो। तब तक मैं इस बरगद के नीचे खड़ा हूँ।' भगवान् शिव की आज्ञा से सती वहाँ गयीं और मन-ही-मन यह सोचने लगीं कि 'मैं वनचारी राम की कैसे परीक्षा करूँ ? विचार आया, मैं सीता का रूप धारण करके राम के पास चलूँ। यदि राम साक्षात् विष्णु हैं, तब तो सब कुछ जान लेंगे; अन्यथा वे मुझे नहीं पहचानेंगे। ऐसा विचार सती सीता बनकर श्रीराम के समीप उनकी परीक्षा लेने के लिये गयीं। सती को सीता के रूप में सामने आयी देख शिव-शिव का जप करते हुए रघुकुलनन्दन श्रीराम सब कुछ जान गये और हँसते हुए उन्हें नमस्कार करके बोले, 'सतीजी! आपको नमस्कार है। भगवान् शम्भु कहाँ गये हैं ? आप पति के बिना अकेली ही इस वन में क्योंकर आयीं? देवि! आपने अपना रूप त्यागकर किसलिये यह नूतन रूप धारण किया है? मुझ पर कृपा करके इसका कारण बताइये ?' श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर सती उस समय आश्चर्यचकित हो गयीं। वे शिवजी की कही हुई बात का स्मरण करके और उसे यथार्थ समझकर बहुत लज्जित हुईं। श्रीराम को साक्षात् विष्णु जान अपने रूप को प्रकट करके मन-ही-मन भगवान् शिव के चरणारविन्दों का चिन्तन कर प्रसन्नचित्त हुई सती उनसे इस तरह बोलीं- 'रघुनन्दन! स्वतन्त्र परमेश्वर भगवान् शिव मेरे तथा अपने पार्षदों के साथ पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए इस वन में आ गये थे। यहाँ उन्होंने सीता की खोज में लगे हुए लक्ष्मण सहित आपको देखा। उस समय सीता के लिये आपके मन में बड़ा क्लेश था और आप विरहशोक से पीड़ित दिखायी देते थे। उस अवस्था में आपको प्रणाम करके वे चले गये, और उस वटवृक्ष के नीचे अभी खड़े ही हैं। भगवान् शिव बड़े आनन्द के साथ आपके वैष्णवरूप की उत्कृष्ट महिमा का गान कर रहे थे। यद्यपि उन्होंने आपको चतुर्भुज विष्णु के रूप में नहीं देखा तो भी आपका दर्शन करते ही वे आनन्दविभोर हो गये। इस निर्मल रूप की ओर देखते हुए उन्हें बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ। मेरे पूछने पर भगवान् शम्भु ने जो आपका परिचय बताया उसे सुनकर मेरे मन में भ्रम उत्पन्न हो गया। अत: राघवेन्द्र ! मैंने उनकी आज्ञा लेकर आपकी परीक्षा की है। श्रीराम! अब मुझे ज्ञात हो गया कि आप साक्षात् विष्णु हो। अब मेरा संशय दूर हो गया फिर भी महामते ! आप भगवान् शिव के वन्दनीय कैसे हो गये ? मेरे मन में यह एक संदेह है। इसे निकाल दो और शीघ्र ही मुझे पूर्ण शान्ति प्रदान करो।' सती का यह वचन सुनकर श्रीराम के नेत्र प्रफुल्ल कमल के समान खिल उठे। उन्होंने मन-ही-मन अपने प्रभु भगवान् शिव का स्मरण किया, किन्तुआज्ञा न होने के कारण वे सती के साथ भगवान् शिव के निकट नहीं गये। सती का प्रश्न सुनकर श्रीराम बोले, 'देवि! प्राचीन काल में एक समय भगवान् शम्भु ने अपने परात्पर धाम में विश्वकर्मा को बुलाकर उनके द्वारा अपनी गोशाला में एक रमणीय भवन बनवाया, जो बहुत ही विस्तृत था। उसमें एक श्रेष्ठ सिंहासन का भी निर्माण कराया। उस सिंहासन पर भगवान् शंकर ने विश्वकर्मा द्वारा एक छत्र बनवाया, जो बहुत ही दिव्य, सदा के लिये अद्भुत और परम उत्तम था। तत्पश्चात् उन्होंने सब ओर से इन्द्र आदि देवगणों, सिद्धों, गन्धर्वो, नागादिकों तथा सम्पूर्ण उपदेवों को भी शीघ्र वहाँ बुलवाया। समस्त वेदों और आगमों को, पुत्रों सहित ब्रह्माजी को, मुनियों को तथा अप्सराओं सहित समस्त देवियों को, जो नाना प्रकार की वस्तुओं से सम्पन्न थीं, आमन्त्रित किया। इनके सिवा देवताओं, ऋषियों, सिद्धों और नागों की सोलह-सोलह कन्याओं को भी बुलवाया, जिनके हाथों में मांगलिक वस्तुएँ थीं। वीणा, मृदंग आदि नाना प्रकार के वाद्यों को बजवाकर सुन्दर गीतों द्वारा महान् उत्सव रचाया। सम्पूर्ण ओषधियों के साथ राज्याभिषेक के योग्य द्रव्य एकत्र किये गये प्रत्यक्ष तीर्थों के जलों से भरे हुए पाँच कलश भी मँगवाये गये। इनके सिवा और भी बहुत-सी दिव्य सामग्रियों को भगवान् शंकर ने अपने पार्षदों द्वारा मँगवाया और वहाँ उच्चस्वर से वेदमन्त्रों का घोष करवाया। देवि! भगवान् विष्णु की पूर्ण भक्ति से महेश्वरदेव सदा प्रसन्न रहते थे इसलिये उन्होंने प्रीतियुक्त हृदय से श्रीहरि को वैकुण्ठ से बुलवाया और शुभ मुहूर्त में श्रीहरि को उस श्रेष्ठ सिंहासन पर बिठाकर महादेवजी ने स्वयं ही प्रेमपूर्वक उन्हें सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित किया। उनके मस्तक पर मनोहर मुकुट बाँधा गया और उनसे मंगल-कौतुक कराये गये। यह सब हो जाने के बाद महेश्वर ने स्वयं ब्रह्माण्ड मण्डप में श्रीहरि का अभिषेक किया और उन्हें अपना वह सारा ऐश्वर्य प्रदान किया, जो दूसरों के पास नहीं था। तदनन्तर शम्भु ने श्रीहरि का स्तवन किया और बोले, 'आज से विष्णु हरि स्वयं मेरे वन्दनीय हो गये। तुम सम्पूर्ण देवता श्रीहरि को प्रणाम करो और ये वेद मेरी ही तरह इन श्रीहरि का वर्णन करें। रुद्रदेव ने उपर्युक्त बात कहकर स्वयं ही श्रीगरुडध्वज को प्रणाम किया। तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवताओं, मुनियों और सिद्ध आदि ने भी उस समय श्रीहरि की वन्दना की। इसके बाद देवताओं के समक्ष महेश्वर ने श्रीहरि को इस तरह बड़े-बड़े वर प्रदान किये, 'हरे! तुम मेरी आज्ञा से सम्पूर्ण लोकों के कर्ता, पालक और संहारक होओ। धर्म, अर्थ और काम के दाता तथा दुर्नीति अथवा अन्याय करने वाले दुष्टों को दण्ड देने वाले होओ; महान् बल-पराक्रम से सम्पन्न, जगत्पूज्य जगदीश्वर बने रहो। समरांगण में तुम कहीं भी जीते नहीं जा सकोगे। मुझसे भी तुम कभी पराजित नहीं होओगे। तुम मुझसे मेरी दी हुई तीन प्रकार की शक्तियाँ ग्रहण करो। एक तो इच्छा आदि की सिद्धि दूसरी नाना प्रकार की लीलाओं को प्रकट करने की शक्ति और तीसरी तीनों लोकों में नित्य स्वतन्त्रता। हरे! जो तुमसे द्वेष करने वाले हैं, वे निश्चय ही मेरे द्वारा प्रयत्न पर्वक दण्डनीय होंगे। विष्णो ! मैं तुम्हारे भक्तों को उत्तम मोक्ष प्रदान करूँगा। तुम इस माया को भी ग्रहण करो जिसका निवारण करना देवता आदि के लिये भी कठिन है तथा जिससे मोहित होने पर यह विश्व जडरूप हो जायगा। हरे! तुम मेरी बायीं भुजा हो और विधाता दाहिनी भुजा हैं। तुम इन विधाता के भी उत्पादक और पालक होओगे। तुम यहाँ रहकर विशेष रूप से सम्पूर्ण जगत् का पालन करो। नाना प्रकार की लीलाएँ करने वाले विभिन्न अवतारों द्वारा सदा सबकी रक्षा करते रहो। मेरे चिन्मय धाम में तुम्हारा जो यह परम वैभवशाली और अत्यन्त उज्ज्वल स्थान है, वह गोलोक नाम से विख्यात होगा। हरे! भूतल पर जो तुम्हारे अवतार होंगे, वे सबके रक्षक और मेरे भक्त होंगे। मैं उनका अवश्य दर्शन करूँगा। वे मेरे वर से सदा प्रसन्न रहेंगे। इस प्रकार श्रीहरि को अपना अखण्ड ऐश्वर्य सौंपकर भगवान् शिव स्वयं कैलास पर्वत पर रहते हुए अपने पार्षदों के साथ स्वच्छन्द क्रीडा करते हैं। तभी से भगवान् लक्ष्मीपति वहाँ गोपवेष धारण करके आये और गोप-गोपी तथा गौओं के अधिपति होकर बड़ी प्रसन्नता के साथ रहने लगे। वे श्रीविष्णु प्रसन्नचित्त हो समस्त जगत् की रक्षा करने लगे। वे शिव की आज्ञा से नाना प्रकार के अवतार ग्रहण करके जगत् का पालन करते हैं। इस समय वे ही श्रीहरि भगवान् शंकर की आज्ञा से चार भाइयों के रूप में अवतीर्ण हैं। उन चार भाइयों में सबसे बड़ा मैं राम हूँ, दूसरे भरत हैं, तीसरे लक्ष्मण हैं और चौथे भाई शत्रुघ्न हैं। देवि ! मैं पिता की आज्ञा से सीता और लक्ष्मण के साथ वन में आया था। यहाँ किसी निशाचर ने मेरी पत्नी सीता को हर लिया है और मैं विरही होकर भाई के साथ इस वन में अपनी प्रिया का अन्वेषण करता हूँ। जब आपका दर्शन प्राप्त हो गया, तब सर्वथा मेरा कुशल-मंगल ही होगा। माँ सती ! आपकी कृपा से ऐसा होने में कोई संदेह नहीं है। देवि ! निश्चय ही आपकी ओर से मुझे सीता की प्राप्ति विषयक वर प्राप्त होगा। आपके अनुग्रह से उस दुःख देने वाले पापी राक्षस को मारकर मैं सीता को अवश्य प्राप्त करूँगा। आज मेरा महान् सौभाग्य है जो आप दोनों ने मुझ पर कृपा की। जिस पर आप दोनों दयालु हो जायें, वह पुरुष धन्य और श्रेष्ठ है। इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर कल्याणमयी सती देवी को प्रणाम करके रघुकुलशिरोमणि श्रीराम उनकी आज्ञा से उस वन में विचरने लगे। पवित्र हृदय वाले श्रीराम की यह बात सुनकर सती मन-ही-मन शिवभक्ति परायण रघुनाथजी की प्रशंसा करती हुई बहुत प्रसन्न हुईं। पर अपने कर्म को याद करके उनके मन में बड़ा शोक हुआ। उनकी अंगकान्ति फीकी पड़ गयी। वे उदास होकर शिवजी के पास लौटीं। “जय श्री राम” "राणा जी खेड़ांवाली" #🕉️सनातन धर्म🚩 #🎶जय श्री राम🚩 #श्री हरि #हर हर महादेव
*दशमहाविद्या_६* *भगवती_त्रिपुरभैरवी* 🚩🔱🚩🔱🚩🔱🚩🔱🚩🔱🚩 क्षीयमान विश्वके अधिष्ठान दक्षिणामूर्ति कालभैरव हैं उनकी शक्ति ही त्रिपुरभैरवी है । ये ललिता या महात्रिपुरसुन्दरीकी रथवाहिनी हैं । ब्रह्माण्डपुराणमें इन्हें गुप्त योगिनियोंकी अधिष्ठात्री देवीके रूपमें चित्रित किया गया है । मत्स्यपुराणमें इनके त्रिपुरभैरवी, कोलेशभैरवी, रूद्रभैरवी, चैतन्यभैरवी तथा नित्याभैरवी आदि रूपोंका वर्णन प्राप्त होता है । इन्द्रियोंपर विजय और सर्वत्र उत्कर्षकी प्राप्तिहेतु त्रिपुरभैरवीकी उपासनाका वर्णन शास्त्रोंमें मिलता है । महाविद्याओंमें इनका छठा स्थान है । त्रिपुरभैरवीका मुख्य उपयोग घोर कर्ममें होता है । इनके ध्यानका उल्लेख दुर्गासप्तशतीके तीसरे अध्यायमें महिषासुर-वधके प्रसंगमें हुआ है । इनका रंग लाल है । ये लाल वस्त्र पहनती हैं, गलेमें मुण्डमाला धारण करती हैं और स्तनोंपर रक्त चन्दनका लेप करती हैं, ये अपने हाथोंमें जपमाला, पुस्तक, तथा वर और अभय मुद्रा धारण करती हैं । ये कमलासन पर विराजमान हैं । भगवती त्रिपुरभैरवीने ही मधुपान करके महिषका हृदय विदीर्ण किया था । रुद्रयामल एवं भैरवीकुलसर्वस्वमें इनकी उपासना तथा कवचका उल्लेख मिलता है । संकटोंसे मुक्तिके लिये भी इनकी उपासना करनेका विधान है । घोर कर्मके लिये कालकी विशेष अवस्थाजनित मानोंको शान्त कर देनेवाली शक्तिको ही त्रिपुरभैरवी कहा जाता है । इनका अरुण वर्ण विमर्शका प्रतीक है । इनके गलेमें सुशोभित मुण्डमाला ही वर्णमाला है । देवीके रक्तलिप्त पयोधर रजोगुणसम्पन्न सृष्टि-प्रक्रियाके प्रतीक हैं । अक्षजपमाला वर्णसमाम्नायकी प्रतीक है । पुस्तक ब्रम्हविद्या है, त्रिनेत्र वेदत्रयी हैं तथा स्मिति हास करुणा है । आगम ग्रन्थोंके अनुसार त्रिपुरभैरवी एकाक्षररूप ( प्रणव ) हैं । इनसे सम्पूर्ण भुवन प्रकाशित हो रहे हैं तथा अन्तमें इन्हींमें लय हो जायँगे । ' अ ' से लेकर विसर्गतक सोलह वर्ण भैरव कहलाते हैं तथा क से क्ष तकके वर्ण योनि अथवा भैरवी कहे जाते हैं । स्वच्छन्दोद्योतके प्रथम पटलमें इस पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है । यहांपर त्रिपुरभैरवीको योगेश्वरीरूपमें बतलाया गया है । इन्होंने भगवान् शंकरको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये कठोर तपस्या करनेका दृढ़ निर्णय लिया था । बड़े-बड़े ऋषि-मुनि इनकी तपस्याको देखकर दंग रह गये । इससे सिद्ध होता है कि भगवान् शंकरकी उपासनामें निरत उमाका दृढ़निश्चयी स्वरूप ही त्रिपुरभैरवी का परिचायक है । त्रिपुरभैरवीकी स्तुतिमें कहा गया है कि भैरवी सूक्ष्म वाक् तथा जगत् के मूल कारणकी अधिष्ठात्री है । त्रिपुरभैरवीके अनेक भेद हैं; जैसे सिद्धिभैरवी, चैतन्यभैरवी, भुनेश्वरीभैरवी, कमलेश्वरीभैरवी, कामेश्वरीभैरवी, षट्कूटाभैरवी, नित्याभैरवी, कोलेशीभैरवी, रुद्रभैरवी आदि । सिद्धिभैरवी उत्तराम्नाय पीठकी देवी हैं । नित्याभैरवी पश्चिमाम्नाय पीठकी देवी हैं, इनके उपासक स्वयं भगवान् शिव हैं । रुद्रभैरवी दक्षिणाम्नाय पीठकी देवी हैं । इनके उपासक भगवान् विष्णु हैं । त्रिपुरभैरवीके भैरव वटुक हैं । मुण्डमालातन्त्रानुसार त्रिपुरभैरवीको भगवान् नृसिंहकी अभिन्न शक्ति बताया गया है । सृष्टिमें परिवर्तन होता रहता है । इसका मूल कारण आकर्षण-विकर्षण है । इस सृष्टिके परिवर्तनमें क्षण-क्षणमें होनेवाली भावी क्रियाकी अधिष्ठातृशक्ति ही वैदिक दृष्टिसे त्रिपुरभैरवी कही जाती हैं । त्रिपुरभैरवीकी रात्रिका नाम कालरात्रि तथा भैरवका नाम कालभैरव है । जय_जय_माँ राणा जी खेड़ांवाली🚩 #🕉️सनातन धर्म🚩 #जय माता की
*श्रीकृष्ण_२४* *रासलीला* 🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴 चारों तरफ शरत्पूर्णिमाकी चाँदनी छिटकी हुई थी। भगवान्‌की प्रेयसी गोपिकाएँ एक-दूसरेकी बाँह-में-बाँह डाले खड़ी थीं। शीतल मन्द सुगन्धित वायु चल रही थी। सर्वत्र आनन्द-मङ्गलका ही साम्राज्य था। यमुनाजीने स्वयं अपनी लहरोंसे बालुकाका रंगमंच बना दिया था। सहस्त्र-सहस्त्र गोपियोंसे पूजित होकर भगवान् श्रीकृष्ण शोभायमान हो रहे थे। भगवान् श्रीकृष्णने कहा— 'मेरी प्यारी गोपियो ! तुमलोगोंने मेरे लिये घर-गृहस्थीकी उन बेड़ियोंको तोड़ डाला है, जिन्हें बड़े-बड़े योगी-यति भी नहीं तोड़ पाते हैं। मुझसे तुम्हारा यह मिलन सर्वथा निर्मल और निर्दोष है। यदि मैं अनन्त कालतक तुम्हारे प्रेम, सेवा और त्यागका बदला चुकाना चाहूँ तो भी नहीं चुका सकता।' ऐसा कहकर, भगवान् श्रीकृष्णने उन गोपियोंके साथ यमुनाजीके तटपर अपनी रसमयी रासलीला प्रारम्भ की। सम्पूर्ण गोपोंके स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण अपने अनेकों रूप बनाकर दो-दो गोपियोंके बीचमें प्रकट हो गये। सभी गोपियाँ ऐसा अनुभव करती थीं कि हमारे प्यारे मोहन तो हमारे ही पास हैं। इस प्रकार सहस्त्रों गोपियोंसे शोभायमान भगवान् श्रीकृष्णका दिव्य रासोत्सव प्रारम्भ हुआ। सभी देवता अपनी-अपनी पत्नियोंके साथ आकाशमें आ पहुँचे। रासोत्सवके दर्शनकी लालसासे उनका मन उनके वशमें नहीं था। स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बज उठीं। पुष्पोंकी वर्षा होने लगी। गन्धर्व अपनी पत्नियोंके साथ भगवान्‌के निर्मल यशका गान करने लगे। रासमण्डलमें सभी गोपियाँ अपने-अपने प्रियतम श्यामसुन्दरके साथ नृत्य करने लगीं। उनकी कलाइयोंमें कंगन, पावोंके पायजेब और कमरकी करधनीमें छोटे-छोटे घुँघरू एक साथ बज उठे। यमुनाजीके तटपर व्रजसुन्दरियोंके बीचमें भगवान् श्रीकृष्णकी बड़ी अनोखी शोभा हो रही थी। नृत्यके समय गोपियाँ नाना प्रकारके भावोंका प्रदर्शन करती जाती थीं। उनके कानोंके कुण्डल हिल-हिलकर कपोलोंपर आ जाते थे। नाचनेके परिश्रमसे उनके मुँहपर पसीनेकी बूँदें झलकने लगी थीं। उनकी चोटियाँ कुछ ढीली पड़ गयी थीं। उस समय ऐसा लगता था, मानो श्रीकृष्ण साँवले-साँवले मेघ हैं और गोपियाँ बिजली हैं। भगवान् श्रीकृष्णका अंग-संग प्राप्त कर गोपियाँ आनन्दसे खिल उठीं। उनके केश बिखर गये। उनके फूलोंके हार टूट गये और गहने अस्त-व्यस्त हो गये। यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण आत्माराम हैं — उन्हें अपने अतिरिक्त किसीकी आवश्यकता नहीं है। फिर भी उन्होंने जितनी गोपियाँ थीं, उतने रूप धारण किये और उनके साथ नृत्य किया। जब बहुत देरतक नृत्य करनेके बाद गोपियाँ थक गयीं, तब भगवान् श्रीकृष्णने बड़े ही प्रेमसे उनके मुख पोंछे। भगवान् जीवोंपर दया करनेके लिये ही मनुष्यरूपमें प्रकट होते हैं और ऐसी-ऐसी लीलाएँ करते हैं, जिन्हें देख-सुनकर जीव भगवत्परायण हो जायँ। इस प्रकार शरत्की वह दिव्य रात्रि बीत गयी। भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे सभी गोपियाँ अपने-अपने घर चली गयीं। जय श्री कृष्ण राणा जी खेड़ांवाली🚩 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇
*माघ मास महात्म्य* *अध्याय-20* 🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴 वेदनिधि कहने लगे कि हे महर्षि! धर्म को जल्दी ही कहिए क्योंकि श्राप की अग्नि बड़ी दुखकारक होती है. लोमश ऋषि कहने लगे कि यह सब मेरे साथ नियमपूर्वक माघ स्नान करें. अंत में यह श्राप से छूट जाएंगे. मेरा यह निश्चय है शुभ तीर्थ में माघ स्नान करने से शाप का फल नष्ट हो जाता है. सात जन्मों के पाप तथा इस जन्म के पाप माघ में तीर्थ स्थान पर स्नान करने से नष्ट हो जाते हैं. इस अच्छोद में स्नान करने से अवश्य ही मोक्ष की प्राप्ति होती है. राजसूय और अश्वमेघ यज्ञ से भी अधिक फल माघ मास स्नान से होता है. अतएव सम्पूर्ण पापों का सहज में ही नाश करने वाला माघ स्नान क्यों न किया जाए। क्रमशः हरि ॐ नमो नारायण राणा जी खेड़ांवाली🚩 #🕉️सनातन धर्म🚩 #श्री हरि
*द्वादशी तिथि का आध्यात्म एवं ज्योतिष में महत्त्व* 🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱 हिंदू पंचाग की बाहरवीं तिथि द्वादशी कहलाती है। इस तिथि का नाम यशोबला भी है, क्योंकि इस दिन पूजन करने से यश और बल की प्राप्ति होती है। इसे हिंदी में बारस भी कहा जाता है। यह तिथि चंद्रमा की बारहवीं कला है, इस कला में अमृत का पान पितृगण करते हैं। द्वादशी तिथि का निर्माण शुक्ल पक्ष में तब होता है जब सूर्य और चंद्रमा का अंतर 133 डिग्री से 144 डिग्री अंश तक होता है। वहीं कृष्ण पक्ष में द्वादशी तिथि का निर्माण सूर्य और चंद्रमा का अंतर 313 से 324 डिग्री अंश तक होता है। द्वादशी तिथि के स्वामी भगवान विष्णु को माना गया है। इस तिथि में जन्मे जातकों को श्रीहरि की पूजा अवश्य करनी चाहिए। इस तिथि के दिन भगवान विष्णु के भक्त बुध ग्रह का भी जन्म हुआ था। द्वादशी तिथि का ज्योतिष में महत्त्व 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ यदि द्वादशी तिथि सोमवार और शुक्रवार को पड़ती है तो मृत्युदा योग बनाती है। इस योग में शुभ कार्य करना वर्जित है। इसके अलावा द्वादशी तिथि बुधवार को होती है तो सिद्धा कहलाती है। ऐसे समय कार्य सिद्धि की प्राप्ति होती है। यदि किसी भी पक्ष में द्वादशी रविवार के दिन पड़ती है तो क्रकच योग बनाती है, जो अशुभ होता है, जिसमें शुभ कार्य निषिद्ध होते हैं। बता दें कि द्वादशी तिथि भद्रा तिथियों की श्रेणी में आती है। वहीं किसी भी पक्ष की द्वादशी तिथि पर भगवान शिव की पूजा करना शुभ माना जाता है। द्वादशी तिथि में जन्मे जातकों को मन बहुत चंचल होता है। ये लोग घुमक्कड़ी होते हैं। इनको निर्णय लेने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ये जातक काफी भावुक स्वभाव के होते हैं। ये जातक मेहनती और परिश्रम करने वाले होते हैं। इन्हें संतान सुख और समाज में मान-सम्मान की प्राप्ति भी मिलती है। ये लोग खाने-पीने के शौकीन होते हैं। द्वादशी के शुभ कार्य 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ द्वादशी तिथि में यात्रा छोड़कर अन्य सभी कार्य करने शुभ होते हैं। इस तिथि में विवाह, घर निर्माण और गृहप्रवेश करना भी लाभप्रद रहता है। इसके अलावा किसी भी पक्ष की द्वादशी तिथि में मसूर की दाल खाना वर्जित है। द्वादशी तिथि के प्रमुख हिन्दू त्यौहार एवं व्रत व उपवास 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ तिल द्वादशी / भीष्म द्वादशी / गोविंद द्वादशी 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ माघ माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भीष्म द्वादशी या तिल द्वादशी कहते हैं। इस तिथि पर भीष्म पितामह ने अपने प्राण त्याग दिए थे। इस तिथि पर पूर्वजों का तर्पण करने का विधान है। इस दिन तिल से भगवान विष्णु की पूजा किया जाती है। गोवत्स द्वादशी 〰️〰️〰️〰️〰️ भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को गोवत्स द्वादशी का पर्व मनाया जाता है। इस तिथि पर गाय और बछड़ो की पूजा की जाती है। इस तिथि पर संतान की उन्नति, सुरक्षा और सुख-शांति के लिए माताएं व्रत रखती हैं। वामन द्वादशी 〰️〰️〰️〰️ चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को वामन द्वादशी का पर्व मनाया जाता है। इस तिथि पर भगवान विष्णु के पांचवें अवतार वामनदेव धरती पर अवतरित हुए थे। इस दिन भगवान विष्णु के पूजन और ब्राह्मणों को दान करने का विधान है। अखण्ड द्वादशी 〰️〰️〰️〰️〰️ मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को अखण्ड द्वादशी कहा जाता है। इस तिथि पर श्रीहरि की पूजा की जाती है। इस दिन व्रत रखने से सभी पापों का नाश हो जाता है और संतान सुख की प्राप्ति होती है। पद्मनाभ द्वादशी 〰️〰️〰️〰️〰️ आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को पद्मनाभ द्वादशी का व्रत किया जाता है। इस तिथि पर भगवान विष्णु के अनंत पद्मनाभ स्वरूप की पूजा की जाती है। इस दिन व्रत करने से धन-धान्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है। रुक्मिणी द्वादशी 〰️〰️〰️〰️〰️ वैसाख माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को रूक्मिणी द्वादशी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान कृष्ण ने रूक्मिणी का हरण करके विवाह किया था। इस दिन रूक्मिणी देवी का पूजन किया जाता है। इस तिथि पर व्रत करने से अविवाहति कन्याओं को श्रीकृष्ण जैसे पति यानि योग्य वर की प्राप्ति जल्द हो जाती है। हरि ॐ नमो नारायण राणा जी खेड़ांवाली🚩 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🎶जय श्री राम🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #श्री हरि
*आनन्दरामायणम्* *श्रीसीतापतये नमः* *श्रीवाल्मीकि महामुनि कृत शतकोटि रामचरितान्तर्गतं ('ज्योत्स्ना' हृया भाषा टीकयाऽटीकितम्)* *(यात्राकाण्डम्)पंचम सर्गः* 🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍 *(कुम्भोदोपाख्यान)...(दिन 144)* 🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹 श्रीरामदासजी ने कहा- बाद में जानकी पूजा का सब सामान लेकर कौसल्या आदि सासुओं तथा अन्य बहुओ के साथ शीघ्रता से पुष्पक विमानपर जा बैठी ॥ १ ॥ क्षण भर में विदेहराज की पुत्री सीता उस पुराने सङ्गम पर जा पहुंची, जहाँ पर कि सरयू पवित्र गङ्गा नदी से मिली हैं ।॥ २ ।। पत्नी को पति के विना आगे की सीमा नहीं लाँघनी चाहिये। यह दोष यहाँ सीता को नहीं लग सकता। क्योंकि सीता का गमन आकाशमार्ग से हुआ था ।। ३ ।। वहाँ पहुँचने पर सीता विमान से नीचे उतरीं और सङ्गम को नमस्कार किया। पश्चात् पुरोहित-के कथनानुसार सीता ने वायन (ऐपन) सहित नारियल भागीरथी को समर्पण करके उसमें विधिवत् स्तान किया। फिर सुरा मांस-पकवान आदिकी वलि से, दुपट्टा आदि सुन्दर वस्त्रों से, दिव्य आभूषणो से, मुक्ता के हार से, चन्दन से तथा बायन आदि की पूजा के उपकरणों से विधिवत् तथा विस्तारपूर्वक सीता ने संगम का पूजन किया । तदनन्तर पतिपुत्रवती सोहागिन स्त्रियों की पूजा करके सीता ने अरुन्धती का पूजन किया ।। ४-७ ।। तब उनको तथा वसिष्ठ आदि सव ब्राह्मणों को भोजन कराके सुवासिनी स्त्रियों को दुपट्टों, घोतियों तथा दिव्य आभूषणो से सीता ने संतुष्ट किया। स्वयं निराहार रहकर सीता ने राम के कल्याणार्थ उपवास किया ॥८॥९॥ तदनन्तर विमान पर सवार होकर आनन्द से शीघ्रतापूर्वक रघुनन्दन राम के पास आ गयीं। राम ने भी सीता को, गुरु वसिष्ठ को तथा मित्रो को साथ लेकर सीता की की हुई पूजा से सौगुने धूम-धाम तथा विधि से गङ्गा-सरयू के सङ्गम की पूजा की ॥ १० ॥ ११ ॥ वहाँ उन्होने बड़े आदरभाव से हजारों विप्रों को भोजन कराया। अनेक गायें, हाथी, घोड़े तथा रथ उन्हें दान में दिये ।। १२ ।। क्रमशः... जय सिया राम राणा जी खेड़ांवाली🚩 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🎶जय श्री राम🚩 #🙏श्री राम भक्त हनुमान🚩 #🙏रामायण🕉
*श्रीमद्भागवतमहापुराणम्* *प्रथमः स्कन्धः* *अथ प्रथमोऽध्यायः (अध्याय एक)* 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 श्रीसूतजीसे शौनकादि ऋषियों का प्रश्न जिससे इस जगत्‌की सृष्टि, स्थिति और प्रलय होते हैं — क्योंकि वह सभी सद्रूप पदार्थों में अनुगत है और असत् पदार्थों से पृथक् है; जड नहीं, चेतन है; परतन्त्र नहीं, स्वयं प्रकाश है; जो ब्रह्मा अथवा हिरण्यगर्भ नहीं, प्रत्युत उन्हें अपने संकल्पसे ही जिसने उस वेद-ज्ञान का दान किया है; जिसके सम्बन्ध में बड़े-बड़े विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं; जैसे तेजोमय सूर्यरश्मियोंमें जलका, जलमें स्थलका और स्थलमें जलका भ्रम होता है, वैसे ही जिसमें यह त्रिगुणमयी जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्तिरूपा सृष्टि मिथ्या होनेपर भी अधिष्ठान-सत्तासे सत्यवत् प्रतीत हो रही है, उस अपनी स्वयंप्रकाश ज्योतिसे सर्वदा और सर्वथा माया और मायाकार्यसे पूर्णतः मुक्त रहनेवाले परम सत्यरूप परमात्माका हम ध्यान करते हैं ⁠।⁠। ⁠1 ⁠।⁠। महामुनि व्यासदेव के द्वारा निर्मित इस श्रीमद्भागवतमहापुराण में मोक्षपर्यन्त फलकी कामना से रहित परम धर्मका निरूपण हुआ है⁠। इसमें शुद्धान्तःकरण सत्पुरुषों के जानने योग्य उस वास्तविक वस्तु परमात्मा का निरूपण हुआ है, जो तीनों तापोंका जड़से नाश करनेवाली और परम कल्याण देनेवाली है⁠। अब और किसी साधन या शास्त्र से क्या प्रयोजन⁠। जिस समय भी सुकृती पुरुष इसके श्रवण की इच्छा करते हैं, ईश्वर उसी समय अविलम्ब उनके हृदयमें आकर बन्दी बन जाता है ⁠।⁠।⁠ 2 ।⁠। शेष्ट अगली पोस्ट में .. भागवत महापुराण गीता प्रेस राणा जी खेड़ांवाली🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🕉️सनातन धर्म🚩
*श्रीमद्भागवत महापुराण* *प्रथम स्कंध - अध्याय एक* *श्रीसूतजीसे शौनकादि ऋषियों का प्रश्न* 🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳 रसके मर्मज्ञ भक्तजन! यह श्रीमद्भागवत वेदरूप कल्पवृक्षका पका हुआ फल है⁠। श्रीशुकदेवरूप तोतेके* मुखका सम्बन्ध हो जानेसे यह परमानन्दमयी सुधासे परिपूर्ण हो गया है⁠। इस फलमें छिलका, गुठली आदि त्याज्य अंश तनिक भी नहीं है⁠। यह मूर्तिमान् रस है⁠। जबतक शरीरमें चेतना रहे, तबतक इस दिव्य भगवद्रसका निरन्तर बार-बार पान करते रहो⁠। यह पृथ्वी पर ही सुलभ है ⁠।⁠।⁠ 3 ⁠।⁠। एक बार भगवान् विष्णु एवं देवताओं के परम पुण्यमय क्षेत्र नैमिषारण्यमें शौनकादि ऋषियों ने भगवत्प्राप्ति की इच्छासे सहस्र वर्षों में पूरे होनेवाले एक महान् यज्ञका अनुष्ठान किया ⁠।⁠। 4 ⁠।⁠। एक दिन उन लोगोंने प्रातःकाल अग्निहोत्र आदि नित्यकृत्योंसे निवृत्त होकर सूतजीका पूजन किया और उन्हें ऊँचे आसन पर बैठाकर बड़े आदरसे यह प्रश्न किया ⁠।⁠।⁠ 5 ⁠।⁠। * यह प्रसिद्ध है कि तोतेका काटा हुआ फल अधिक मीठा होता है⁠। शेष्ट अगली पोस्ट में .. भागवत महापुराण गीता प्रेस राणा जी खेड़ांवाली🚩62 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇
. *भक्त और भगवान्* *“भक्त मीर माधव”* ☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️ काफी समय पहले की बात हैं, मुल्तान (पंजाब) का रहने वाला एक ब्राह्मण उत्तर भारत में आकर बस गया। जिस घर में वह रहता था, उसकी ऊपरी मंजिल में कोई मुग़ल-दरबारी रहता था। प्रातः नित्य ऐसा संयोग बन जाता कि, जिस समय ब्राह्मण नीचे गीतगोविन्द के पद गाया करता। उसी समय मुग़ल ऊपर से उतरकर दरबार को जाया करता था। ब्राह्मण के मधुर स्वर तथा गीतगोविन्द की ललित आभा से आकृष्ट होकर वह सीढ़ियों में ही कुछ देर रुककर सुना करता था। जब ब्राह्मण को इस बात का पता चला तो उसने उस मुग़ल से पूछा–‘सरकार ! आप इन पदों को सुनते हैं पर कुछ समझ में भी आता है ?’ मुग़ल बोला–‘समझ में तो एक लफ्ज(अक्षर) भी नही आता, पर न जाने क्यों उन्हें सुनकर मेरा दिल गिरफ्त(कैद) हो जाता है। तबियत होती है की खड़े खड़े इन्हें ही सुनता रहूँ। आखिर किस किताब में से आप इन्हें गाया करते हैं ?’ ब्राह्मण बोला–‘गीतगोविन्द ! के पद हैं ये, यदि आप पढ़ना चाहे तो मैं आपको पढ़ा दूँगा।’ इस प्रस्ताब को मुग़ल ने स्वीकार कर लिया और कुछ ही दिन में उन्हें सीखकर स्वयं उन्हें गाने लग गया। एक दिन ब्राह्मण ने उन्हें कहा–‘आप गाते तो है लेकिन हर किसी जगह इन पदों को नही गाना चाहिये। आप इन अद्भुत अष्टापदियो के रहस्य को नही जानते क्योकि जहाँ कहीं ये गाये जाते है। भगवान श्रीकृष्ण वहाँ स्वयं उपस्थित रहते है। इसलिए आप एक काम करिये। जब कभी भी आप इन्हें गाया करें तो श्याम सुन्दर के लिए एक अलग आसान बिछा दिया करें।’ मुग़ल ने कहा–‘वह तो बहुत मुश्किल है, बात ये है की हम लोग दूसरे के नौकर हैं, और अक्सर ऐसा होता है की दरबार से वक्त वेवक्त बुलावा आ जाता है, और हमको जाना पड़ता है।’ ब्राह्मण–‘तो ऐसा करिये जब आपका सरकारी काम ख़त्म हो जाया करे, तब आप इन्हें एकांत में गाया करिये।’ मुग़ल–‘यह भी नही हो सकता आदत जो पड़ गयी है और रही घर बैठकर गाने की बात सो कभी तो ऐसा होता है। दो दो-तीन तीन दिन और रात भी हमे घोड़े की पीठ पर बैठकर गुजारनी पड़ती है।’ ब्राह्मण–‘अच्छा तो फिर ऐसा किया जा सकता हैं कि घोड़े की जीन के आगे एक बिछौना श्यामसुन्दर के विराजने के लिए बिछा लिया करें। यह भावना मन में रख ले की आपके पद सुनने के लिए श्यामसुन्दर वहाँ आकर बैठे हुए है।’ मुग़ल ने स्वीकार कर यहीं नियम बना लिया और घर पर न रहने की हालात में घोड़े पर चलता हुआ ही गीतगोविन्द के पद गुनगुनाया करता। एक दिन अपने अफसर के हुकुम से उसे जैसा खड़ा था, उसी हालात में घोड़े पर सवार होकर कहीं जाना पड़ा। वह घोड़े की जीन के आगे बिछाने के लिए बिछौना भी साथ नही ले जा सका। रास्ते में चलते-चलते वह आदत के अनुसार पदों का गायन करने लगा। गायन करते-करते अचानक उसे लगा की घोड़े के पीछे-पीछे घुंघरुओं (नूपुर) की झनकार आ रही है। पहले तो वह समझा की वहम हुआ है, लेकिन जब उस झंकार में लय का आभास हुआ तो घोडा रोक लिया और उतर कर देखने लगा। तत्क्षण श्यामसुन्दर ने प्रकट होकर पूछा–‘सरदार ! आप घोड़े से क्यों उतर पड़े ? और आपने इतना सुन्दर गायन बीच में ही क्यों बन्द कर दिया ?’ मुग़ल तो हक्का -बक्का होकर सामने खड़ा देखता ही रह गया। भगवान की रूपमाधुरी को देखकर वह इतना विह्वल हो गया की मुँह से आवाज ही नही निकलती थी। आखिर बोला–‘आप संसार के मालिक होकर भी मुझ मुग़ल के घोड़े के पीछे-पीछे क्यों भाग रहे थे ?’ भगवान् ने मुस्कुराते हुए कहा–‘भाग नही रहा। मैं तो आपके पीछे पीछे नाचता हुआ आ रहा हूँ। क्या तुम जानते नही हो की जिन पदों को तुम गा रहे थे वो कोई साधारण काव्य नही है। तुम आज मेरे लिए घोड़े पे गद्दी बिछाना भूल गए तो क्या मैं भी नाचना भूल जाऊँ ?’ मुग़ल को अब मालूम हुआ की मुझसे अब कितना भारी अपराध बन गया है। यह सब इसलिए हुआ की वह पराधीन था। दूसरे दिन प्रातः ही उसने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और वैराग्य लेकर श्यामसुन्दर के भजन में लग गया। सही है एक बार उन ठाकुर जी की रूप माधुरी को देख लेने के बाद संसार में और क्या शेष रह जाता है। यहीं मुग़ल भक्त बाद में प्रभु कृपा से "मीर माधव" नाम से विख्यात हुए। हरि ॐ नमो नारायण राणा जी खेड़ांवाली🚩 #श्री हरि #🕉️सनातन धर्म🚩