sn vyas
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1 days ago
#जय सियाराम #🙏🙏जय सियाराम 🙏🙏 ।।जय श्री राम।। नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियं हरषि न दीना।। श्री राम जी सबरी माता को अपनी नौवीं भक्ति का वर्णन करके सुनाते हैं। भगवान कहते हैं शबरी माता यह नौवें प्रकार की भक्ति का आशयहै सरल होना।और सरल की पहचान यही है कि सब छलों से रहित हो।किसी से कोई भेद नहीं कपट नहीं भगवान को ऐसे भक्त प्रिय हैं क्योंकि भगवान स्वयं भी ऐसे ही हैं। भगवान छल कपट करते ही नहीं है। अपने गुरुदेव से भी कोई बात नहीं छुपाते हैं। जिन बातों को कहने में संकोच होता है भगवान तो वह बात भी कह देते हैं। जनकपुर में पुष्प वाटिका से श्री राम जी जब पुष्प लेकर आए और आकर गुरु विश्वामित्र जी के चरणों में दोनों भाइयों ने प्रणाम किया। गुरु जी ने कहा राम तुम सुमन तो ले आए पर (स्व मन ) कहां दे आए?। तुम्हारा मन तुम्हारे पास नहीं है।राम जी की जगह और कोई होता तो बहाने बनाता। पर श्री राम जी ने श्री सीता जी और श्री राम जी के बीच पुष्प वाटिका में जो कुछ भी घटा उसे स्पष्ट रूपसे गुरुजी से कह दिया कुछ भी छल कपट नहीं किया। राम कहा सब कौशिक पाहीं। सरल स्वभाव छुआ छल नाहीं।। श्री राम जी स्वयं छल रहित हैं इसलिए उन्हें छल कपट सुहाता नहीं है।विभीषण जी श्री राम जी की शरण में आए तो छल रहित होकर आए।श्री रामजी से यही कहा प्रभु मैं दशानन का भाई हूं मेरा जन्म राक्षस कुल में हुआ है मेरा शरीर तामसी है ।स्वभाव से ही मुझे पाप प्रिय है। नाथ दशानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।। विभीषण जी ने सब छल कपट त्याग कर अपने बारे में सही सही बता दिया कुछ भी छल कपट नहीं रखा। इसीलिए भगवान ने भी विभीषण जी को हृदय से लगाने में विलम्ब नहीं किया।उनके दीनता भरे वचन सुनकर विभीषण जी जैसे ही रामजी के चरणों में गिरे तो भगवान तुरंत उठे और विभीषण जी को हृदय से लगा लिया। दीन वचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदय लगावा।। बड़ी अद्भुत महिमा है भगवान की।श्री राम जी से विभीषण जी पहली बार मिले तो श्री राम जी ने तुरंत उन्हें उठाकर अपने हृदय से लगाया। जबकि पहली बार तो हनुमान जी भी राम जी से मिले थे पर श्री राम जी ने हनुमान जी को तुरंत अपने हृदय से नहीं लगाया। जबकि हनुमान जी तो राम जी के परम प्रिय सेवक हैं। यह भी बड़ा आश्चर्य है श्री राम जी ने हनुमान जी को तुरंत अपने हृदय से क्यों नहीं लगाया? जबकि राम जी कहते हैं कि हनुमान तो मेरा परम प्रिय सेवक है। जब हनुमान जी आपके परम प्रिय सेवक हैं तो जब पहली बार हनुमान जी आपसे मिले तो आपने उन्हें तुरंत अपने हृदय से क्यों नहीं लगाया?। विभीषण जी को तो आपने तुरंत अपना हृदय से लगा लिया? हनुमान जी तो आपसे विनती ही करते रहे कि प्रभु मैं तो मन्द हूं मोह के वश हूं कुटिल और अग्यानी हूं आप तो दीनबंधु हो भगवान हो फिर भी मुझे भुला दिया।आपने हनुमान जी को हृदय से लगाने में इतना विलंब क्यों किया? एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान।। भगवान ने कहा यह बिल्कुल सही है कि मैंने हनुमानजी को विलम्ब से अपने हृदय से लगाया।पर हनुमान जी प्रार्थना करते रहे तब तक रुप ब्राह्मणका बनाकर रखा।वह चतुराई से मेरा भेद जानने आए थे। और मेरा तो स्वभाव है कि चालाकी चतुराई छल कपट मुझे सुहाता नहीं है। श्री राम जी कहते हैं हनुमान जी चरणों में तो गिरे पर तब तक रुप ब्राह्मण का ही बना कर रखा ।पर जब उन्होंने अपना असली वानर रूप प्रकट किया वह जैसे हैं वैसे बने तो फिर मैंने उन्हें अपना हृदय से लगाने में विलंब नहीं किया। अस कहि परेउ चरन अकुलाई। निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई।। तब रघुपति उठाइ उर लावा। निज लोचन जल सींचि जुड़ावा।। श्री राम जी शबरी माता से कहते हैं कि छलहीन मुझे प्रिय है।रामजी स्वयं भेद नहीं रखते हैं इसीलिए तो अंगद जी को रावण के दरबार में भेज दिया कि जाओ हमारा संदेश देकर आओ। राम जी की जगह कोई और होता तो यही सोचता कि इसके बाप को हमने मार दिया यह हमारी तरफ का संदेश लेकर जाएगा तो कहीं ऐसा न हो कि उसी का हो जाए ।पर श्री राम जी ऐसा नहीं सोचते हैं वह अपने भक्त के भाव को जानते हैं। मारीच ने श्री राम जी के साथ छल किया परि श्री राम जी उसके अंतः करण में छुपे प्रेम को जानते थे इसीलिए तो उसे परम गति प्रदान की। अंतर प्रेम तासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्ह सुजाना।। छल कपट रखते हुए चाहे कोई कितना ही भगवान को अपना समझने लगे पर श्री राम जी तो अंतर्यामी हैं सब जानते हैं। हनुमान जी ने सुग्रीव जी की मित्रता राम जी से करा दी। सुग्रीव जी को लगा कि भगवान अब मेरे मित्र हो गए हैं। पर श्री राम जी के प्रति अभी भी पूर्ण समर्पण नहीं किया। श्री राम जी ने अपने मन में विचार किया कि सुग्रीव जी मेरे भक्त तो हुए हैं पर अभी भी पूरी तरह से मेरे भक्त नहीं हुए हैं इसीलिए तो सुग्रीव जी को बाली के पास लड़ने को भेजा। राम जी ने सुग्रीव जी से यही कहा कि तुम मेरी शक्ति लेकर जाओ और फिर बाली से युद्ध करो तुम्हरी विजय होगी।पर सुग्रीव जी ने राम जी की बात पर भरोसा नहीं किया। अपने ही बल पर छल बल करते हुए बाली से लड़ने लगे। बहु छल बल सुग्रीव कर हियं हारा भय मानि मारा बालि राम तब हृदय माझ सर तान।। जब सुग्रीव जी ने देख लिया कि अब तो मैं मरने ही वाला हूं, बाली मुझे छोड़ेगा नहीं ।तब हारकर भगवान के प्रति पूर्ण समर्पित हुए तब भगवान ने कहा हां अब ठीक है,अब तुम पूरी तरह मेरे पर आश्रित हो तब भगवान ने बाली का वध किया। श्री राम जी शबरी माता से कहते हैं मेरा भक्त वही है जिसने छल कपट का त्याग कर दिया हो वह बिल्कुल सरल हो गया हो ऐसे भक्त को मैं अपनी शरण देता हूं। प्रिय पाठकों नौवीं भक्ति प्रसंग की व्याख्या अभी शेष है। प्रसंग अधिक लम्बा न हो इसलिए शेष व्याख्या अगली पोस्ट में ।।जय श्री राम।।