#राधेश्याम
सखी जु इन नैनन पर मैं,
बार-बार बलिहारी जाऊँ।
इन चंचल, करुणामयी और प्रेम से भरे नयनों में कैसी अद्भुत मधुरता है! ऐसा लगता है मानो श्रीजी अपने नेत्रों से ही अनंत कृपा बरसा रही हों। एक दृष्टि में मान, दूसरी में लज्जा, तीसरी में करुणा और चौथी में प्रेम का अथाह सागर झलक रहा है।
उनकी यह मंद मुस्कान हृदय को चुरा लेती है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे वे कुछ कहे बिना ही सब कुछ कह रही हों। मन बार-बार उनके मुखकमल को निहारना चाहता है, पर तृप्ति नहीं होती। जितना देखूँ, उतनी ही प्यास बढ़ती जाती है।
सखी! श्रीराधा के नयन केवल सुंदर नहीं हैं, वे तो प्रेम के जीवित सरोवर हैं। उनमें झाँकते ही मन संसार के कोलाहल को भूल जाता है। वहाँ केवल शांति है, केवल माधुर्य है, केवल प्रेम है। ऐसा लगता है मानो वे अपने नेत्रों से हर जीव को आश्वासन दे रही हों "तुम मेरे हो, मैं तुम्हारी हूँ।"
उनके मस्तक की आभा, अलंकारों की शोभा और घूँघट की गरिमा सब मिलकर भी उन नयनों की महिमा का वर्णन नहीं कर सकते। वास्तव में श्रीजी का सम्पूर्ण सौंदर्य उन्हीं नयनों में समाया हुआ प्रतीत होता है।
भावांजलि श्री चरणों मे...
सखी, इन नैनन की क्या कहूँ बड़ाई,
इनमें प्रेम-सुधा भरि आई।
एक चितवन में जग विसरावे,
एक मुस्कान प्राण हरि जावे।
मोहे न रूप लुभावे कोई,
न चाहूँ वैभव जग का होई।
बस श्रीजी की चितवन पाऊँ,
इन नैनन पर बलि-बलि जाऊँ।
राधे राधे।
जय श्रीराधे।
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