Dr.S.S.Arora
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1 days ago
☯️🕉️🌳🌻🌈☀️🌈🌹🌳🕉️☯️ *_!! चिता आंदोलन: "क्या विकास के नाम पर समुदायों का अस्तित्व मिटाना न्यायसंगत है ?” !!_* *_✍🏻सुरेंद्र अरोडा की लेखनी द्वारा, चिंतन योग्य एक विचारोत्तेजक पोस्ट।✍🏻_* *_☝🏻मित्रों, “चिता आंदोलन” केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के विरोध में छेड़ा गया एक चरम और प्रतीकात्मक आंदोलन है। इसका सार यह है कि प्रभावित समुदाय के लोग “इस परियोजना के कारण अपनी भूमि, वन और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत के विनाश को अपनी सामूहिक मृत्यु के समान मान रहे हैं।” वे प्रश्न करते हैं – क्या नदियों को जोड़ने के नाम पर समुदायों को मिटाना न्यायसंगत है? यह परियोजना पन्ना टाइगर रिजर्व के एक विशाल हिस्से को जलमग्न कर देगी। “अनुमान है कि लगभग 20 लाख पेड़ काटे जाएंगे तथा 21 से अधिक गाँवों के लोग विस्थापित होंगे।” लोग आरोप लगाते हैं कि ग्राम सभाएँ केवल कागजों तक सीमित रह गईं – “न तो उन्हें वास्तविक सुनवाई मिली, न ही पारदर्शी चर्चा।” पुनर्वास नीति में “भूमि के बदले भूमि” का कोई प्रावधान नहीं है, जो आदिवासी एवं वनवासी समाज के लिए जीवन की अनिवार्य शर्त रही है।_* *_मित्रों, आंदोलनकारियों का मानना है कि "उनकी ज़मीन और जंगल छिनने का सीधा अर्थ उनके अस्तित्व का अंत है।" वे पूछते हैं – बिना ज़मीन के क्या कोई आदिवासी परिवार जी सकता है ? क्या विकास केवल शहरी सुविधाओं का नाम है ? प्रशासन ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए सख्त धाराएँ लागू कर दी हैं। “प्रदर्शन स्थलों तक खाद्य और जलापूर्ति बाधित करने का प्रयास किया गया है।” भूख और निर्जलीकरण को हथियार बनाकर लोगों को समर्पण के लिए मजबूर किया जा रहा है। क्या यह परियोजना दीर्घकालिक पर्यावरणीय क्षति और जैव विविधता के “विनाश से विकास की परिभाषा” को चुनौती नहीं देती ?_* *_क्या ग्राम सभाओं की उपेक्षा करके “बनाई गई योजनाएँ लोकतांत्रिक हो सकती हैं,” जबकि संविधान की पंचायत (अनुसूचित क्षेत्र) अधिनियम, 1996 ग्राम सभा को सर्वोच्च अधिकार देता है? जिस समुदाय की सांस्कृतिक पहचान जंगल और नदी से जुड़ी है, “उसे मुआवज़े की कुछ राशि देकर विस्थापित करना किस नैतिकता का परिचायक है ?” क्या सरकार उन लोगों से सीधे वार्ता करने को तैयार होगी, जो अपनी चिता जलाकर एक ही प्रश्न पूछते हैं – “हमें मारकर किसका कल्याण होगा ?” 🤔😡_* *_विशेष :-_* *_☝🏻मित्रों, “चिता आंदोलन” केवल एक परियोजना का विरोध नहीं है; यह उस विकास मॉडल के खिलाफ एक कराह है, "जो प्रकृति और मनुष्य के बीच सदियों पुराने सामंजस्य को तोड़ता है।" यह हम सबके सामने एक असहज प्रश्न रखता है – “क्या हम उस सभ्यता की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ नदियाँ तो जुड़ेंगी, लेकिन जीवन अलग हो जाएँगे ?” क्या सरकार इस चुप्पी को और सुन सकती है, जो चीख बन चुकी है ? "उत्तर सिर्फ नीति-निर्माताओं को नहीं, बल्कि पूरे समाज को खोजना होगा।" ज्यादा न लिखते हुए, पोस्ट को यहीं समाप्त करता हूँ। यदि पोस्ट लिखते समय भूलवश व्याकरण संबंधी या अन्य कोई त्रुटि रह गई हो, तो कृपया क्षमा कर दीजिएगा। 👏🏻_* *_!! ┈┉❀꧁ Զเधॆ Զเधॆ ꧂❀┉┈ !!_* ☯️🕉️🌴🌾🌈🌅🌈💐🌴🕉️☯️ #🌞 Good Morning🌞