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#🌙 गुड नाईट
🌙 गुड नाईट - ப்ரிச থক ডগী নী थोड़ा ' रूक जाना , लेकिन हिम्मत और उम्मीद அள कभी मत क्योंकि हर रात के बाद सुबह जरूर आती है। থুপ যাসি Gooddult ப்ரிச থক ডগী নী थोड़ा ' रूक जाना , लेकिन हिम्मत और उम्मीद அள कभी मत क्योंकि हर रात के बाद सुबह जरूर आती है। থুপ যাসি Gooddult - ShareChat
#🌙 गुड नाईट
🌙 गुड नाईट - "नियत" 3 "सोच" अच्छी होनी चाहिए बातें तो हर कोई अच्छी ही करता है शूभरत्रि ? "नियत" 3 "सोच" अच्छी होनी चाहिए बातें तो हर कोई अच्छी ही करता है शूभरत्रि ? - ShareChat
#🌙 गुड नाईट
🌙 गुड नाईट - शुभरात्रि चेहरा हमेशा हंसता हुआ मिलेगा मेरा हाल पूछना है तो अकेले में पूछना. Good Night आपको हमेशा HI శాాాగాే Soeet Dreams शुभरात्रि चेहरा हमेशा हंसता हुआ मिलेगा मेरा हाल पूछना है तो अकेले में पूछना. Good Night आपको हमेशा HI శాాాగాే Soeet Dreams - ShareChat
☯️🕉️🌳🌻🛕🌝🛕🌹🌳🕉️☯️ *_!! रात्रिकालीन वंदन !!_* *_आदिदेवं जगत्कारणं श्रीधरं लोकनाथं विभुं व्यापकं शंकरम्। सर्वभक्तेष्टं मुक्तिदं माधवं सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे।।_* *_ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौ हुं क्लीं जूं स: ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।'_* *_देवानां च ऋषीणां च गुरुं काञ्चनसन्निभम्। बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्।।_* *_देवमन्त्री विशालाक्षः सदा लोकहिते रतः।अनेकशिष्यसंपूर्णः पीडां हरतु मे गुरुः।।_* *_यः सेनानीर्वसूनां यः पृष्ठीनां नियोधकः। यो रथानां वाहांश्च स नो वायुर्मृडयातु नः॥_* *_!! क्या सुविधाएँ सच में सुख देती हैं ? एक गहरी पड़ताल !!_* *_✍🏻सुरेंद्र अरोडा की लेखनी द्वारा, चिंतन योग्य एक विचारोत्तेजक पोस्ट।✍🏻_* *_☝🏻मित्रों, "सुबह मैंने जीवन दर्शन से संबंधीत एक परिच्छेद ( पैराग्राफ ) लिखा था। निम्नलिखित पोस्ट उसी परिच्छेद का विस्तृत रूप है।एक बहुत गहरी बात किसी ने कही है— "इच्छाएँ, आवश्यकताएँ और नींद—ये तीनों जीवन में कभी पूरी नहीं होतीं।" यह सुनते ही मन में सवाल उठता है: आखिर क्यों ? क्योंकि ये तीनों अंतहीन हैं। जैसे-जैसे एक इच्छा पूरी होती है, वैसे ही अगली जन्म ले लेती है। और सबसे दिलचस्प बात यह है कि जितनी सुविधा में मनुष्य होता है, उतनी ही दुविधा में वह घिर जाता है। आज हमारे पास पहले से कहीं अधिक साधन हैं स्मार्टफोन, तेज इंटरनेट, घर, गाड़ी, सुविधाएँ। लेकिन क्या हम पहले से ज्यादा संतुष्ट हैं ?शायद नहीं। क्योंकि हर उपलब्धि नई अनिवार्यता को जन्म देती है। जब तक हमारे पास साधारण मोबाइल था, तब तक वही काफी था। आज नया मॉडल आया तो लगता है—"यह तो होना ही चाहिए।" जो कल विलासिता थी, वह आज आवश्यकता बन जाती है। और फिर वही थकान, वही बेचैनी।_* *_मित्रों, यह हमारी जीवन-दृष्टि का प्रश्न है। हम दो रास्तों पर खड़े हैं: एक रास्ता— सीमाओं को स्वीकार कर सुख का विस्तार करना। यानी यह समझना कि सब कुछ पाने से पूर्णता नहीं आती, "बल्कि जो है, उसमें पूर्णता देखने से आती है।" यह संतोष का मार्ग है—जहाँ सुख बाहरी वस्तुओं पर निर्भर नहीं, "बल्कि भीतर से उपजता है।" दूसरा रास्ता— असीमित इच्छाओं के बोझ से स्वयं को थकाना। यह वह मार्ग है जहाँ हम सोचते हैं—"बस यह मिल जाए, फिर चैन मिलेगा।" लेकिन यह चैन कभी नहीं मिलता, क्योंकि इच्छाएँ कभी रुकती नहीं। तो सच्ची पूर्णता कहाँ है ? बाहर नहीं। "सच्ची पूर्णता बाह्य साधनों में नहीं, अपितु आंतरिक संतोष में है।" जब हम यह समझ जाते हैं कि हर चीज़ का होना जरूरी नहीं, तब हर पल में सुख ढूंढ़ने लगते हैं। "तब सुविधा गुलामी नहीं, सहूलियत बन जाती है।" तब नींद भी पूरी होने लगती है, क्योंकि मन शांत होता है। क्या हम सुविधाएँ बढ़ाने में उतना ही समय लगा रहे हैं, जितना संतोष बढ़ाने में लगाना चाहिए ? क्या हम वास्तविक आवश्यकता और अस्थायी इच्छा में फर्क कर पा रहे हैं ? क्या हमने कभी यह महसूस किया है कि सब कुछ पाकर भी कुछ कमी रह जाती है ?_*👌🏻🤔 *_🙏🏻बृहस्पतिवार रात्रि की सुंदर, मधुर एवं सौम्य मंगल बेला में आप सभी मित्रजनों को भगवान श्रीहरि विष्णु जी एवं देवगुरु बृहस्पति जी का आशीर्वाद प्राप्त हो। भगवान श्री सत्यनारायण जी आपके भंडारे भरपूर रखें, आपको सुख, शांति एवं समृद्धि प्रदान करें तथा आप सदैव खुश रहें। इन्हीं शुभकामनाओं सहित, सुमंगलम, स्नेहिल रात्रि वंदन, मित्रों। आप एवं आपके समस्त परिवारजनों को दुर्गाष्टमी व्रत समापन की ढेरों बधाइयाँ और हार्दिक शुभकामनाएँ। मातेश्वरी आपके सभी मनोरथ पूर्ण करें। यदि पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृपया इसे अपने सभी परिचितों को अग्रेषित करें। धन्यवाद सहित आपका अपना, डॉ. एस.एस. अरोड़ा 9780077479🙏🏻_* *_विशेष :-_* *_☝🏻मित्रों, आज ही एक छोटा प्रयोग करें: अपनी तीन सबसे बड़ी इच्छाओं को लिखें। फिर गंभीरता से पूछें— "क्या इनके पूरे होने के बाद मैं सच में शांत हो जाऊँगा ? या फिर नई इच्छाएँ जन्म लेंगी ? यह एक छोटा सा सवाल है, "लेकिन इसका जवाब जीवन की बड़ी दिशा तय कर सकता है।" जीवन को साधनों से भरने से ज्यादा, "उसे संतोष से भरना ज्यादा सार्थक है।" क्योंकि संतोष ही एकमात्र ऐसी संपत्ति है, "जो बढ़ती है तो बोझ नहीं, हल्कापन देती है।" सीमाओं को स्वीकार करें, "पर सुख का विस्तार करें।" इच्छाओं को रोकें नहीं, "पर उनसे परे देखना सीखें।" आपकी क्या राय है ? क्या आप भी मानते हैं कि "आंतरिक संतोष ही सच्चा सुख है ?" ज्यादा ना लिखते हुए, पोस्ट को यहीं समाप्त करता हूं। यदि पोस्ट लिखते समय भूलवश व्याकरण संबंधी या अन्य कोई त्रुटि रह गई हो, तो कृपया क्षमा कर दीजिएगा।_*👏🏻 ☯️🕉️🌴🌾🌈😴🌈💐🌴🕉️☯️ #🌙 गुड नाईट
☯️🕉️🌳🌻🛕☀️🛕🌹🌳🕉️☯️ *_कबीरा गरब न कीजिए, ऊँचा देखि आवास। काल्हि परौं भूँइ लेटना, ऊपरि जमसी घास॥_* *_पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥_* *_!! इतिहास की वो जड़ें जो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से परे हैं !!_* *_✍🏻 सुरेंद्र अरोडा की लेखनी द्वारा, चिंतन योग्य एक विचारोत्तेजक पोस्ट।✍🏻_* *_मित्रों, आज जब हमारा समाज हर दिन ‘हिन्दू-मुस्लिम’ की द्वंद्वात्मकता में उलझता दिखता है, तब इतिहास के उन पन्नों को पलटना जरूरी हो जाता है, जो हमें बताते हैं कि हमारी सभ्यता की नींव आपसी सम्मान और सांस्कृतिक संश्लेषण पर टिकी थी। हाल ही में एक ऐतिहासिक तथ्य पर ध्यान गया, "जो इस मौजूदा सियासी माहौल में एक सोचने पर मजबूर करने वाली पृष्ठभूमि रखता है।" हम सभी जानते हैं कि छत्रपति शिवाजी महाराज के पिता का नाम "शाहजी राजे भोसले था।" लेकिन क्या आप जानते हैं कि शाहजी राजे के भाई ( शिवाजी महाराज के अंकल ) का नाम ‘शरीफजी’ था ?_* *_यह नाम महज एक पहचान नहीं थी, बल्कि यह उस सांस्कृतिक एकता की जीवंत मिसाल थी। ‘शरीफजी’ नाम कहां से आया ? "यह नाम एक सूफी संत के नाम पर रखा गया था।" यह केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं था, "बल्कि यह उस युग की मानसिकता का प्रतीक था," जहां एक मराठा योद्धा परिवार अपने सदस्य का नाम सूफी परंपरा से जुड़े आदर और आध्यात्मिकता के प्रतीक ‘शरीफ’ ( जिसका अर्थ है कुलीन, सम्मानित, पवित्र ) पर रख सकता था।_* *_👉🏻 आज के संदर्भ में क्यों है यह तथ्य महत्वपूर्ण ?_* *_1) इतिहास का चयनात्मक आख्यान: आज राजनीति और सामाजिक मीडिया के स्तर पर इतिहास को अक्सर ‘हम’ और ‘उन’ के संघर्ष के रूप में पेश किया जाता है। "शाहजी राजे और शरीफजी का उदाहरण हमें बताता है कि मध्यकालीन भारत का सामाजिक ताना-बाना केवल युद्धों और टकराव का नहीं था।" रोजमर्रा की जिंदगी, परिवार और नामकरण जैसे गहरे सांस्कृतिक कृत्यों में आस्था और परंपराओं का सम्मिश्रण था।_* *_2) हिन्दू-मुस्लिम की सरलीकृत बाइनरी: वर्तमान में ‘हिन्दू-मुस्लिम’ को दो खेमों में बांटकर "जो दकियानूसी राजनीति की जाती है, वह इस तथ्य को नजरअंदाज करती है कि हमारे पूर्वज इस धारणा से कहीं अधिक विचारशील और व्यावहारिक थे।" सूफी संतों का प्रभाव केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं था; वह हिंदू राजाओं और सरदारों के जीवन का अभिन्न हिस्सा था। ‘शरीफ’ सिर्फ एक नाम नहीं, "बल्कि एक अवधारणा थी"—जो सम्मान, संस्कार और सूफीयाना विचारधारा की श्रेष्ठता को दर्शाती थी।_* *_3) विचारोत्तेजक प्रश्न: आज जब हम ‘अपनी’ संस्कृति की रक्षा की बात करते हैं, तो क्या हम उस संस्कृति की वास्तविक विरासत—"जो सूफीवाद, भक्ति आंदोलन और गंगा-जमुनी तहजीब से सिंचित है"—को समझते हैं ? क्या हम उस मानसिकता के उत्तराधिकारी हैं, जिसने शिवाजी महाराज जैसे प्रतापी योद्धा के परिवार में ‘शरीफजी’ जैसे नाम को सम्मान दिया ? मित्रों, द्वेषपूर्ण राजनीति से उपर उठकर सोचिएगा जरूर।_* 🤔 *_🙏🏻बृहस्पतिवार मध्याह्न की सुंदर, मधुर एवं सौम्य मंगल बेला में आप सभी मित्रजनों को भगवान श्री हरि विष्णु जी एवं देवगुरु बृहस्पति जी का आशीर्वाद प्राप्त हो। भगवान श्री सत्यनारायण जी आपके भंडारे भरपूर रखें, आपको सुख, शांति एवं समृद्धि प्रदान करें तथा आप सदैव खुश रहें। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ सुमंगलम, स्नेहिल मध्याह्न वंदन, मित्रों। माँ दुर्गा आपके जीवन में सुख, समृद्धि, धैर्य और असीम ऊर्जा का संचार करें। आपके सभी कष्टों का नाश हो और घर में सुख-शांति का वास बना रहे।_*🙏🏻 *_विशेष :-_* *_☝🏻मित्रों, इतिहास हमें विरासत में केवल किले और तलवारें ही नहीं देता, "बल्कि वह हमें सह-अस्तित्व का मंत्र भी देता है।" शरीफजी भोसले का उदाहरण एक दर्पण की तरह है। यह हमें दिखाता है कि आज हम जिन सीमाओं ( धार्मिक, साम्प्रदायिक ) को इतना मजबूत और अपरिवर्तनीय बना रहे हैं, वे कभी इतनी कठोर नहीं थीं। यदि 17वीं सदी में एक मराठा परिवार सूफी संत के नाम पर अपने बेटे का नाम रख सकता था, "तो 21वीं सदी में हमें एक-दूसरे की आस्थाओं को लेकर इतनी असुरक्षा क्यों है ?" यह तथ्य हमें सिखाता है कि भारतीयता की परिभाषा कभी एकरूपवादी नहीं रही; "वह उदार, सम्मिश्रित और समावेशी रही है।" आइए, इतिहास को ध्रुवीकरण का हथियार बनाने के बजाय, "उससे जुड़ने और समझने का माध्यम बनाएं।" मित्रों, लिखने को तो ओर भी बहुत कुछ है लेकिन डर लगता है कि कहीं मेरे भाजपा समर्थक मित्रों की भावनाएं आहत ना हो इसलिए उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए पोस्ट को यहीं समाप्त करता हूं। यदि पोस्ट लिखते समय भूलवश व्याकरण संबंधी या अन्य कोई त्रुटि रह गई हो, तो कृपया क्षमा कर दीजिएगा।_*👏🏻 ☯️🕉️🌴🌾🌈☀️🌈💐🌴🕉️☯️ #🙏शुभ दोपहर
☯️🕉️🌴🌻🎥📽️🎥🌹🌴🕉️☯️ *_!! तथ्य बनाम कल्पना: धुरंधर में इतिहास का राजनीतिक पुनर्लेखन !!_* *_✍🏻सुरेंद्र अरोडा की लेखनी द्वारा, चिंतन योग्य एक विचारोत्तेजक पोस्ट।✍🏻_* *_☝🏻मित्रों, हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म धुरंधर और इसके सीक्वल "धुरंधर: द रिवेंज ने काफी राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है।" हालांकि फिल्म एक काल्पनिक कृति है, लेकिन वास्तविक ऐतिहासिक समय-सीमाओं और घटनाओं का इसका सुनियोजित उपयोग इस आलोचना को जन्म देता है कि यह फिल्म राजनीतिक प्रचार के लिए इतिहास को पुनः लिखने का प्रयास कर रही है। आइए, मैं आपको इस फिल्म में दिखाये गये अभियानों की समय-सीमा से जुड़े तथ्यों का विवरण बताता हूं जिसकी तुलना फिल्म में प्रस्तुत काल्पनिक कथा से की गई है :-_* *_1👉🏻 ऐतिहासिक समय-सीमा बनाम काल्पनिक कथा :-_* *_प्रमुख अभियान और सुरक्षा ढाँचे, जो फिल्म के भावनात्मक केंद्र हैं, स्वर्गीय डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ( संप्रगा ) सरकार ( 2004-2014 ) के कार्यकाल के दौरान स्थापित किए गए थे।_* *_ऐतिहासिक तथ्य ( 2004-2014 ) काल्पनिक चित्रण ( धुरंधर में ) प्रधानमंत्री: डॉ. मनमोहन सिंह (कांग्रेस) श्रेय दिया जाने वाला व्यक्ति: फिल्म में रणनीतिक रचयिता के रूप में विदेश मंत्री देवरत कपूर को दिखाया गया है, जिसके बारे में व्यापक रूप से चर्चा है कि यह चरित्र एक समकालीन राजनीतिक व्यक्तित्व ( नरेंद्र मोदी ) पर आधारित है। प्रमुख सुरक्षा ढांचा: राष्ट्रीय जाँच एजेंसी ( एनआईए ) का गठन मुंबई हमलों के बाद "2008 में आतंकवाद से निपटने के लिए विशेष रूप से संप्रगा सरकार द्वारा किया गया था।" प्रमुख अभियान: फिल्म "ऑपरेशन धुरंधर" नामक एक काल्पनिक गुप्त अभियान पर केंद्रित है, जिसे 1999 के कंधार अपहरण और 2001 के संसद हमले की प्रतिक्रिया में शुरू किया गया था। राजनीतिक परिप्रेक्ष्य: आतंकवाद रोधी कानूनों और एजेंसियों को मजबूत करने के लिए उत्तरदायी सरकार कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन था। राजनीतिक परिप्रेक्ष्य: फिल्म को 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों और 2016 में हुए नोटबंदी ( विमुद्रीकरण ) की पृष्ठभूमि में सेट किया गया है – ये घटनाएँ एक भिन्न सरकार के कार्यकाल में हुई थीं।_* *_2👉🏻संप्रगा ( यूपीए ) युग के वास्तविक अभियान और उपलब्धियाँ :-_* *_हालाँकि धुरंधर एक काल्पनिक कहानी है, "लेकिन डॉ. मनमोहन सिंह के समय में बनी वास्तविक सुरक्षा व्यवस्था सार्वजनिक रिकॉर्ड का विषय है।" यदि फिल्म राष्ट्रीय सुरक्षा अभियानों की प्रशंसा करना चाहती है, "तो इसका श्रेय उस सरकार को जाता है जिसने वास्तव में संस्थागत ढाँचा तैयार किया था। ना की भाजपा सरकार को। आतंकवाद रोधी ढाँचे को मजबूत करना: 26/11 मुंबई हमलों (2008) के बाद, डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने देश भर में आतंकवादी मामलों की पेशेवर और प्रभावी जाँच सुनिश्चित करने के लिए "राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) की स्थापना की।" आर्थिक सुधार: संप्रगा सरकार ने प्रमुख कर सुधारों की आधारशिला रखी और वस्तु एवं सेवा कर ( जीएसटी ) का ढाँचा शुरू किया, जिसे बाद में लागू किया गया। सूचना का अधिकार ( आरटीआई ): सरकार ने 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम पारित किया, जिससे नागरिकों को सशक्त बनाया गया और शासन में पारदर्शिता आई – जो लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण है। जिसे भाजपा सरकार ने अपने स्वार्थ हेतु इस कानून को अपने अनुकूल बनाया।_* *_3👉🏻 फिल्म को लेकर राजनीतिक विवाद :-_* *_श्रेय को उस स्थान पर देने का प्रयास, "जहाँ वह उचित नहीं है, किसी का ध्यान नहीं भटक पाया है।" विपक्षी नेताओं और राजनीतिक टिप्पणीकारों ने सार्वजनिक रूप से फिल्म में ऐतिहासिक विकृतियों के लिए इसकी आलोचना की है। नोटबंदी का विकृत चित्रण: कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने फिल्म में 2016 की नोटबंदी को एक "अभूतपूर्व कदम" के रूप में दिखाए जाने की आलोचना करते हुए इसे एक ऐसा फैसला बताया, "जिसने अर्थव्यवस्था और छोटे कारोबारियों को नुकसान पहुँचाया।" सांप्रदायिक कथावस्तु: समाजवादी पार्टी ( सपा ) के सांसद एस. टी. हसन और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ( एआईएमआईएम ) के नेता वारिस पठान जैसे नेताओं ने "फिल्म पर एक विभाजनकारी एजेंडा को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है।" उनके अनुसार, फिल्म में गैंगस्टर अतीक अहमद पर आधारित एक चरित्र को पाकिस्तान की आईएसआई से जोड़कर दिखाया गया है – "एक ऐसा दावा जिसका आधिकारिक जाँच रिकॉर्ड में कोई आधार नहीं है।" रिलीज़ का समय: कई राजनेताओं ने कहा कि फिल्म की रिलीज़ का समय "चुनावों से पहले जनता की भावनाओं को प्रभावित करने के लिए तय किया गया प्रतीत होता है।" उन्होंने फिल्म निर्माताओं पर सिनेमा को "प्रचार मशीन" के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाया।_* *_4👉🏻 सिनेमाई स्वतंत्रता बनाम ऐतिहासिक जिम्मेदारी :-_* *_हालाँकि सिनेमा अक्सर रचनात्मक स्वतंत्रता लेता है, लेकिन धुरंधर के निर्माताओं ( निर्देशक आदित्य धर ) ने जानबूझकर अपनी काल्पनिक कहानी को विशिष्ट वास्तविक दुनिया की तिथियों ( 1999, 2001, 2016, 2017) और राजनीतिक हस्तियों के साथ जोड़ा है। हालाँकि, इन सुरक्षा उपायों के निर्माण के वर्षों के दौरान सत्ता में रही सरकार के योगदान को मिटाकर, "फिल्म कहानी कहने के क्षेत्र से निकलकर राजनीतिक संदेश देने के दायरे में प्रवेश करती है।" हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए: जब कोई फिल्म अपनी कहानी के निर्माण के लिए संसद हमले जैसी वास्तविक त्रासदियों का उपयोग करती है, "लेकिन रणनीतिक जीत का श्रेय उन नेताओं को देती है जो उस समय सत्ता में नहीं थे," तो क्या यह अब भी केवल "मनोरंजन" है, या यह ऐतिहासिक पुनर्लेखन का एक उपकरण बन गई है ?_* *_विशेष :-_* *_☝🏻मित्रों, फिल्म की कहानी की आधारशिला रखने वाले "प्रमुख अभियान" – विशेष रूप से सीमा पार आतंकवाद के लिए एक मजबूत सुरक्षा प्रतिक्रिया का निर्माण – "पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रगा सरकार के अधीन शुरू और कार्यान्वित किए गए थे। इन काल्पनिक जीतों का श्रेय समकालीन राजनीतिक हस्तियों को देना मेरी नज़र में एक तथ्यात्मक विकृति है।" धुरंधर एक उदाहरण है कि कैसे सिनेमा का उपयोग राजनीतिक कथाओं को आकार देने के लिए किया जा सकता है। "जिम्मेदार नागरिक होने के नाते, हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है कि हम मनोरंजन और ऐतिहासिक तथ्यों के बीच अंतर करें," ताकि डॉ. मनमोहन सिंह जैसे नेताओं के योगदान को बॉक्स ऑफिस की कमाई की खातिर जनता की स्मृति से मिटाया न जा सके। ज्यादा ना लिखते हुए, पोस्ट को यहीं समाप्त करता हूं। यदि पोस्ट लिखते समय भूलवश व्याकरण संबंधी या अन्य कोई त्रुटि रह गई हो, तो कृपया क्षमा कर दीजिएगा।_*👏🏻 ☯️🕉️🌴🌾🎥📽️🎥💐🌴🕉️☯️ #🌞 Good Morning🌞