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*_!! रात्रिकालीन वंदन !!_*
*_आदिदेवं जगत्कारणं श्रीधरं लोकनाथं विभुं व्यापकं शंकरम्। सर्वभक्तेष्टं मुक्तिदं माधवं सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे।।_*
*_ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौ हुं क्लीं जूं स: ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।'_*
*_देवानां च ऋषीणां च गुरुं काञ्चनसन्निभम्। बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्।।_*
*_देवमन्त्री विशालाक्षः सदा लोकहिते रतः।अनेकशिष्यसंपूर्णः पीडां हरतु मे गुरुः।।_*
*_यः सेनानीर्वसूनां यः पृष्ठीनां नियोधकः। यो रथानां वाहांश्च स नो वायुर्मृडयातु नः॥_*
*_!! क्या सुविधाएँ सच में सुख देती हैं ? एक गहरी पड़ताल !!_*
*_✍🏻सुरेंद्र अरोडा की लेखनी द्वारा, चिंतन योग्य एक विचारोत्तेजक पोस्ट।✍🏻_*
*_☝🏻मित्रों, "सुबह मैंने जीवन दर्शन से संबंधीत एक परिच्छेद ( पैराग्राफ ) लिखा था। निम्नलिखित पोस्ट उसी परिच्छेद का विस्तृत रूप है।एक बहुत गहरी बात किसी ने कही है— "इच्छाएँ, आवश्यकताएँ और नींद—ये तीनों जीवन में कभी पूरी नहीं होतीं।" यह सुनते ही मन में सवाल उठता है: आखिर क्यों ? क्योंकि ये तीनों अंतहीन हैं। जैसे-जैसे एक इच्छा पूरी होती है, वैसे ही अगली जन्म ले लेती है। और सबसे दिलचस्प बात यह है कि जितनी सुविधा में मनुष्य होता है, उतनी ही दुविधा में वह घिर जाता है। आज हमारे पास पहले से कहीं अधिक साधन हैं स्मार्टफोन, तेज इंटरनेट, घर, गाड़ी, सुविधाएँ। लेकिन क्या हम पहले से ज्यादा संतुष्ट हैं ?शायद नहीं। क्योंकि हर उपलब्धि नई अनिवार्यता को जन्म देती है। जब तक हमारे पास साधारण मोबाइल था, तब तक वही काफी था। आज नया मॉडल आया तो लगता है—"यह तो होना ही चाहिए।" जो कल विलासिता थी, वह आज आवश्यकता बन जाती है। और फिर वही थकान, वही बेचैनी।_*
*_मित्रों, यह हमारी जीवन-दृष्टि का प्रश्न है। हम दो रास्तों पर खड़े हैं: एक रास्ता— सीमाओं को स्वीकार कर सुख का विस्तार करना। यानी यह समझना कि सब कुछ पाने से पूर्णता नहीं आती, "बल्कि जो है, उसमें पूर्णता देखने से आती है।" यह संतोष का मार्ग है—जहाँ सुख बाहरी वस्तुओं पर निर्भर नहीं, "बल्कि भीतर से उपजता है।" दूसरा रास्ता— असीमित इच्छाओं के बोझ से स्वयं को थकाना। यह वह मार्ग है जहाँ हम सोचते हैं—"बस यह मिल जाए, फिर चैन मिलेगा।" लेकिन यह चैन कभी नहीं मिलता, क्योंकि इच्छाएँ कभी रुकती नहीं। तो सच्ची पूर्णता कहाँ है ? बाहर नहीं। "सच्ची पूर्णता बाह्य साधनों में नहीं, अपितु आंतरिक संतोष में है।" जब हम यह समझ जाते हैं कि हर चीज़ का होना जरूरी नहीं, तब हर पल में सुख ढूंढ़ने लगते हैं। "तब सुविधा गुलामी नहीं, सहूलियत बन जाती है।" तब नींद भी पूरी होने लगती है, क्योंकि मन शांत होता है। क्या हम सुविधाएँ बढ़ाने में उतना ही समय लगा रहे हैं, जितना संतोष बढ़ाने में लगाना चाहिए ? क्या हम वास्तविक आवश्यकता और अस्थायी इच्छा में फर्क कर पा रहे हैं ? क्या हमने कभी यह महसूस किया है कि सब कुछ पाकर भी कुछ कमी रह जाती है ?_*👌🏻🤔
*_🙏🏻बृहस्पतिवार रात्रि की सुंदर, मधुर एवं सौम्य मंगल बेला में आप सभी मित्रजनों को भगवान श्रीहरि विष्णु जी एवं देवगुरु बृहस्पति जी का आशीर्वाद प्राप्त हो। भगवान श्री सत्यनारायण जी आपके भंडारे भरपूर रखें, आपको सुख, शांति एवं समृद्धि प्रदान करें तथा आप सदैव खुश रहें। इन्हीं शुभकामनाओं सहित, सुमंगलम, स्नेहिल रात्रि वंदन, मित्रों। आप एवं आपके समस्त परिवारजनों को दुर्गाष्टमी व्रत समापन की ढेरों बधाइयाँ और हार्दिक शुभकामनाएँ। मातेश्वरी आपके सभी मनोरथ पूर्ण करें। यदि पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृपया इसे अपने सभी परिचितों को अग्रेषित करें। धन्यवाद सहित आपका अपना, डॉ. एस.एस. अरोड़ा 9780077479🙏🏻_*
*_विशेष :-_*
*_☝🏻मित्रों, आज ही एक छोटा प्रयोग करें: अपनी तीन सबसे बड़ी इच्छाओं को लिखें। फिर गंभीरता से पूछें— "क्या इनके पूरे होने के बाद मैं सच में शांत हो जाऊँगा ? या फिर नई इच्छाएँ जन्म लेंगी ? यह एक छोटा सा सवाल है, "लेकिन इसका जवाब जीवन की बड़ी दिशा तय कर सकता है।" जीवन को साधनों से भरने से ज्यादा, "उसे संतोष से भरना ज्यादा सार्थक है।" क्योंकि संतोष ही एकमात्र ऐसी संपत्ति है, "जो बढ़ती है तो बोझ नहीं, हल्कापन देती है।" सीमाओं को स्वीकार करें, "पर सुख का विस्तार करें।" इच्छाओं को रोकें नहीं, "पर उनसे परे देखना सीखें।" आपकी क्या राय है ? क्या आप भी मानते हैं कि "आंतरिक संतोष ही सच्चा सुख है ?" ज्यादा ना लिखते हुए, पोस्ट को यहीं समाप्त करता हूं। यदि पोस्ट लिखते समय भूलवश व्याकरण संबंधी या अन्य कोई त्रुटि रह गई हो, तो कृपया क्षमा कर दीजिएगा।_*👏🏻
☯️🕉️🌴🌾🌈😴🌈💐🌴🕉️☯️ #🌙 गुड नाईट