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*_!! संध्या: कालीन वंदन !!_*
*_ॐ श्री संतोषी महामाये गजाननभगिनी पूजिता। सद्भक्तं सुखसम्पत्ति देहि देहि नमोस्तुते॥_*
*_ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि। तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥_*
*_हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम्। सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम्॥_*
*_दैत्यमन्त्री गुरुस्तेषां प्राणदश्च महामतिः। प्रभुस्ताराग्रहाणां च पीडां हरतु मे भृगुः॥_*
*_नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते। शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोस्तुते॥_*
*_नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयङ्करि। सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोस्तुते॥_*
*_ॐ शुक्राय विद्महे भृगुसुताय धीमहि तन्नः शुक्रः प्रचोदयात्॥_*
*_!! मन का लचीलापन: जहाँ तूफ़ान भी ऊर्जा बन जाता है !!_*
*_✍🏻सुरेंद्र अरोडा की लेखनी द्वारा, चिंतन योग्य एक विचारोत्तेजक पोस्ट✍🏻_*
*_☝🏻मित्रों, सुबह मैंने "व्यवहार और संस्कार " से संबंधित एक प्रेरक परिच्छेद ( पैराग्राफ ) लिखा था। निम्नलिखित पोस्ट उसी परिच्छेद का विस्तृत रूप है। मित्रों, "एक ही घटना दो अलग-अलग मनःस्थितियों में दो विपरीत अर्थ रखती है।" जब मन कमज़ोर होता है, "तो हवा का एक झोंका भी तूफ़ान लगता है।" लेकिन जब मन मज़बूत होता है, तो वही तूफ़ान "ऊर्जा का स्रोत बन जाता है।" जब मन बदलता है, नज़रिया बदल जाता है — और नज़रिया बदले तो संसार ही "सजल " हो जाता है।_*
*_यह सामर्थ्य बाहर से नहीं आती—"यह भीतर से उपजती है।" परिस्थितियाँ वही रहती हैं, बस हमारा "दृष्टिकोण बदल जाता है।" हम अक्सर "समझौते को कमज़ोरी समझ लेते हैं।" पर सच यह है कि रिश्तों में थोड़ा झुक जाना, "उन्हें तोड़ देने से कहीं अधिक साहस का काम है।" एक पेड़ तूफान में टिका रहता है "क्योंकि वह झुकना जानता है।" वही पेड़, जो अकड़ा रहता है, "उखड़" जाता है।_*
*_कठोरता टिकती नहीं, लचीलापन बचाता है — नदी पत्थर को काटती है, "क्योंकि वह बहती है, न कि टकराती है।" यह झुकाव हार नहीं, सम्मान है—"रिश्ते के प्रति, अपनेपन के प्रति, उस विश्वास के प्रति " जो वर्षों में सिरजा गया है।_*
*_बहस में तर्क हो सकते हैं, पर व्यवहार में संस्कार झलकते हैं। आप कितना जानते हैं, इससे लोग प्रभावित हो सकते हैं; पर आप कैसे हैं, इससे वे जुड़ते हैं। "ज्ञान प्रशंसा दिलाता है, व्यवहार विश्वास।" और विश्वास ही रिश्ते की नींव है। शब्द सिखाते हैं, मौन बदल देता है — और व्यवहार वह दर्पण है, जिसमें आत्मा झलकती है।_*
*_जहाँ धड़कनों की गुफ्तगू हो, वहाँ शब्द अनिवार्य नहीं। कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, "जहाँ ख़ामोशी भी संवाद होती है।" एक नज़र, एक स्पर्श, एक चुप्पी—सब कुछ कह देती है। हम शब्दों के पीछे इतने भागते हैं कि "मौन का अर्थ भूल जाते हैं।" पर सच्चा संवाद वहाँ शुरू होता है, "जहाँ भाषा समाप्त होती है।" जहाँ बोलना सीखा, वहाँ चुप रहना भूल गए — पर जितना शब्दों ने छुपाया, उतना मौन ने खोल दिया।_* 👌🏻
*_🙏🏻शुक्रवार संध्या: काल की सुंदर, मधुर एवं सौम्य मंगल बेला में आप सभी मित्रजनों को माँ लक्ष्मी जी एवं माँ संतोषी जी का स्नेहभरा आशीर्वाद प्राप्त हो। मातेश्वरी आपके भंडारे भरपूर रखें, आपको सुख, शांति एवं समृद्धि प्रदान करें, आप सदा खुश रहें। इन्हीं शुभकामनाओं सहित सुमंगलम, स्नेहिल संध्या वंदन, मित्रों। यदि यह पोस्ट आपको अच्छी लगी हो, तो कृपया इसे अपने सभी परिचितों में प्रेषित करें।धन्यवाद सहित आपका अपना, डॉ० एस.एस.अरोड़ा 9977906419🙏🏻_*
*_विशेष :-_*
*_☝🏻मित्रों, इसलिए, मन को मज़बूत कीजिए—"पर कठोर नहीं, लचीला।" परिस्थितियों को अवसर में बदलिए, "बाधा में नहीं।" रिश्तों में झुकना सीखिए—अपने अहंकार के आगे नहीं, "अपने अपनों के लिए।" और सबसे बड़ी बात—चुप्पी को समझिए। "क्योंकि कभी-कभी, सबसे गहरी बातें वहीं कही जाती हैं, जहाँ कोई बोलता नहीं।" मन बदला, नज़रिया बदला — फिर वही जगत, "पर दिखा कुछ और ही।" ज्यादा ना लिखते हुए, पोस्ट को यहीं समाप्त करता हूं। यदि पोस्ट लिखते समय भुलवश व्याकरण संबंधी या अन्य कोई त्रुटि रह गई हो, तो कृपया क्षमा कर दीजिएगा।_*👏🏻
*_!! ┈┉❀꧁ Զเधॆ Զเधॆ ꧂❀┉┈ !!_*
☯️🕉️🌴🌾🛕🌝🛕💐🌴🕉️☯️ #🌜 शुभ संध्या🙏