☯️🕉️🌳🌹🛕🌄🛕🌻🌳🕉️☯️
*_!! संध्या: कालीन वंदन !!_*
*_वामे करे वैरिभिदं वहन्तं शैलं परिश्रिंखलहारटंकम् ! दधानमच्छं तु सुवर्णवर्णं भजे ज्वलत्कुण्डलमाञ्जनेयम् !!_*
*_उद्यदादित्यसंकाशमुदारभुजविक्रमम् ! कन्दर्पकोटिलावण्यं सर्वविद्याविशारदम् !!_*
*_ॐ भौमाय विद्महे, लोहितांगाय धीमहि, तन्नो मंगलः प्रचोदयात्।_*
*_!! वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास रचित रामचरितमानस: अंतर का चिंतन !!_*
*_✍🏻सुरेंद्र अरोडा की लेखनी द्वारा, चिंतन योग्य एक विचारोत्तेजक पोस्ट✍🏻_*
*_☝🏻मित्रों, पिछले कई महीनों से मैं देख रहा हूँ कि मेरे अनेक बौद्ध धर्मावलंबी मित्र सोशल मीडिया पर "वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस के बीच की विभिन्नताओं" को लेकर काफी अनर्गल टिप्पणियाँ कर रहे हैं। यह पोस्ट उन्हीं मित्रों को सादर समर्पित है। आइए, संक्षेप में समझाने का प्रयास करता हूँ। हमारा धर्म श्रेष्ठ है, यह गर्व की बात है, लेकिन यह गलतफहमी कि केवल हमारा धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है, अक्सर कट्टरपंथियों ने अपने मन में पाल रखी है। भारतीय साहित्य की अमूल्य धरोहर वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास कृत रामचरितमानस में जो भिन्नता दिखती है, "वह न केवल साहित्यिक अपितु सांस्कृतिक, कालिक एवं दार्शनिक विविधता का सजीव उदाहरण है।" यह अंतर हमें यह चिंतन करने को विवश करता है कि आखिर एक ही कथा को दो महान कवियों ने इतने भिन्न ढंग से क्यों प्रस्तुत किया ? इसके मूल अंतर के कारण निम्नलिखित हैं।_*
*_1👉🏻 काल भेद :-_*
*_मित्रों वाल्मीकि रामायण "संस्कृत भाषा में लिखी गई और इसकी रचना त्रेतायुग के आसपास मानी जाती है।" जबकि तुलसीदास जी ने "16वीं शताब्दी में अवधी भाषा में रामचरितमानस की रचना की।" इन दोनों के बीच हजारों वर्षों का अंतराल है, जिससे सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषिक बदलाव स्वाभाविक थे।_*
*_2👉🏻 उद्देश्य में भिन्नता :-_*
*_मित्रों, वाल्मीकि ने "आदिकाव्य" की रचना की - जो मानवीय भावनाओं, राजनीति, संवाद और करुणा का महाकाव्य है। तुलसीदास का उद्देश्य भक्ति आंदोलन को गति देना और राम भक्ति को जन-जन तक पहुंचाना था। इसलिए मानस में भक्ति रस की प्रधानता है।_*
*_3👉🏻 भाषा और शैली :-_*
*_मित्रों, "संस्कृत में रचित वाल्मीकि रामायण श्लोकबद्ध है, जबकि मानस अवधी में लिखी गई " और इसमें चौपाई, दोहा, छंद आदि का सम्मिश्रण है।_*
*_4👉🏻 प्रमुख भिन्नताएँ, चरित्र चित्रण में अंतर :-_*
*_1) राम: "वाल्मीकि में राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं किंतु मानवीय संवेदनाओं से युक्त" - वे दुखी होते हैं, क्रोधित होते हैं। तुलसी के राम "सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं," उनमें दैवीयता कूट-कूटकर भरी है।_*
*_2) सीता: "वाल्मीकि में सीता का स्वतंत्र व्यक्तित्व है," वे राम को उनकी गलतियों पर टोकती हैं। तुलसी के सीता "पतिव्रता धर्म की " आदर्श प्रतिमा हैं।_*
*_3) रावण: "वाल्मीकि में रावण एक महान पंडित, तपस्वी और पराक्रमी राजा है," जिसके दोष भी हैं और गुण भी। तुलसी के रावण पूर्णतः "अधर्मी, अहंकारी और राक्षसी प्रवृत्ति के हैं। "_*
*_5👉🏻 प्रमुख प्रसंगों में भिन्नता :-_*
*_1) सीता स्वयंवर: "वाल्मीकि में यह एक सामान्य स्वयंवर है," तुलसी में शिव धनुष तोड़ने के बाद परशुराम संवाद का अद्भुत प्रसंग जुड़ता है। "_*
*_2) राम का वनवास: "वाल्मीकि में कैकेयी के दो वरदान और मंथरा की भूमिका विस्तार से है।" तुलसी में इसे "संक्षेप में किंतु भावप्रवणता " से प्रस्तुत किया गया।_*
*_3) सीता परीक्षा: "वाल्मीकि में सीता को दो बार अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है" और अंत में उनका धरती में समा जाना वर्णित है। "तुलसी में सीता की छाया का प्रसंग है और उनका पृथ्वी में समाना नहीं है। "_*
*_4) हनुमान: "वाल्मीकि में हनुमान एक कुशल दूत और वीर योद्धा हैं।" तुलसी में वे राम भक्ति के "सर्वोच्च " प्रतीक हैं - जिनकी "भक्ति " ही उनकी सबसे बड़ी "शक्ति " है।_*
*_6👉🏻 दार्शनिक भिन्नता :-_*
*_मित्रों, वाल्मीकि का राम धर्म के प्रति "प्रतिबद्ध " एक आदर्श मानव हैं - "रामो विग्रहवान् धर्मः"। तुलसीदास का राम साक्षात् ब्रह्म हैं - "राम सिया रम्य संजोग"। वाल्मीकि की रामायण कर्म प्रधान है, मानस भक्ति प्रधान।_*
*_7👉🏻 चिंतन के बिंदु :-_*
*_1) क्या यह भिन्नता "विरोधाभास है या पूरकता ?" - दोनों रचनाएँ एक ही सत्य के दो पहलू हैं - एक मानवीय पक्ष को उजागर करता है, दूसरा दैवीय पक्ष को।_*
*_2) काल और समाज का प्रभाव - तुलसीदास ने मध्यकालीन भारत के सामाजिक-धार्मिक संदर्भ में रामकथा को ढाला, जहाँ भक्ति आंदोलन अपने चरम पर था।_*
*_3) भाषा और पहुँच - तुलसी ने "जानबूझकर स्थानीय भाषा को चुना " ताकि रामकथा आम जन तक पहुँच सके।_*
*_4) आस्था और इतिहास - "क्या रामायण इतिहास है या आस्था का ग्रंथ ?" वाल्मीकि में इतिहास बोध प्रबल है, मानस में आस्था।_* 🤔👌🏻
*_🙏🏻मंगलवार संध्या: काल की सुंदर, मधुर एवं सौम्य मंगल बेला में, आप सभी मित्रजनों को भगवान बजरंगबली जी का आशीर्वाद प्राप्त हो। मंगलमय भगवान आपके भंडारे भरपूर रखें, आपको सुख, शांति व समृद्धि प्रदान करें तथा आप सदा खुश रहें। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ, आप सभी को सुमंगलम स्नेहिल संध्या वंदन, मित्रों ! यदि यह पोस्ट अच्छी लगी हो, तो कृपया इसे अपने सभी परिचितों में प्रेषित कर पुण्य लाभ अर्जित करें। धन्यवाद सहित — आपका अपना, डॉ. एस.एस. अरोड़ा 9877906419🙏🏻_*
*_विशेष :-_*
*_☝🏻मित्रों, "वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस में भिन्नता होना स्वाभाविक ही नहीं, आवश्यक भी था।" यह भिन्नता ही भारतीय संस्कृति की "जीवंतता और विविधता को दर्शाती है।" वाल्मीकि ने राम को धरती पर उतारकर "मानवीय संघर्षों से जोड़ा," तुलसी ने उन्हें आकाश में बिठाकर "भक्ति का मार्ग प्रशस्त किया। " दोनों रचनाएँ अपने-अपने स्थान पर "अद्वितीय हैं" और दोनों ने मिलकर राम कथा को ऐसी अमरता दी जो "सहस्राब्दियों तक भारतीय मानस को आलोकित करती रहेगी।" यह भिन्नता हमें सिखाती है कि सत्य को देखने के अनेक दृष्टिकोण हो सकते हैं "और हर दृष्टिकोण अपने ढंग से सत्य ही है।" आखिर में एक प्रश्न - "क्या यह भिन्नता हमें यह नहीं सोचने पर विवश करती कि जीवन के सत्य को समझने के लिए एक से अधिक दृष्टिकोण अपनाना कितना आवश्यक है ? ज्यादा ना लिखते हुए, पोस्ट को यहीं समाप्त करता हूं। यदि पोस्ट लिखते समय भुलवश व्याकरण संबंधी या अन्य कोई त्रुटि रह गई हो, तो कृपया क्षमा कर दीजिएगा।_*👏🏻
*_!! ┈┉❀꧁ Զเधॆ Զเधॆ ꧂❀┉┈ !!_*
☯️🕉️🌴🌾🛕🌝🛕💐🌴🕉️☯️ #🌜 शुभ संध्या🙏