🕉️ हम ईश्वर का अंश होकर भी उससे दूर क्यों हैं? योग साधना से परम लक्ष्य की प्राप्ति का रहस्य।
हम अक्सर योग को केवल कुछ शारीरिक आसनों तक सीमित मान लेते हैं, लेकिन अध्यात्म विज्ञान के अनुसार योग का 'चरम लक्ष्य' कुछ और ही है— आत्मा का परमात्मा से मिलन!
आखिर आत्मा और परमात्मा क्या हैं? और हम ईश्वर का अंश होकर भी उससे अलग क्यों महसूस करते हैं? आइए समझते हैं:
🌊 आत्मा और परमात्मा का संबंध:
परमात्मा एक अनंत चेतना का महासागर है और हमारी जीवात्मा उस सागर की एक लहर है। जैसे सूर्य और उसकी किरणें अलग नहीं हैं, वैसे ही हम भी ईश्वर से अलग नहीं हैं। फिर भी हमें यह दूरी क्यों महसूस होती है? इसका कारण है हमारे ऊपर चढ़े हुए 'प्रकृति के तीन आवरण' या हमारे तीन शरीर!
शरीर विज्ञान के अनुसार हम तीन परतों (शरीरों) में लिपटे हुए हैं:
🔹 1. स्थूल शरीर (Physical Body): हाड़-मांस का वह शरीर जो हम देखते हैं। इसकी पराधीनता हमारी बुरी आदतें, वासना और आलस्य हैं। विवेक द्वारा इस पर नियंत्रण पाने से हमें उत्तम स्वास्थ्य और भौतिक सफलताएँ मिलती हैं।
🔹 2. सूक्ष्म शरीर (Mental/Subtle Body): यह हमारे विचारों, भावनाओं और बुद्धि का केंद्र है। जब यह भ्रम, कुरीतियों, ईर्ष्या और क्रोध से मुक्त हो जाता है, तब हमारे मस्तिष्क की प्रसुप्त (सोई हुई) शक्तियां जागृत हो जाती हैं। तब एक साधारण मनुष्य भी दूरदर्शी और महामानव बन सकता है!
🔹 3. कारण शरीर (Causal Body): यह 'अहंकार' (मैं और मेरा) और गहरी मान्यताओं का केंद्र है। जब चेतना यहाँ से भी शुद्ध हो जाती है, तब व्यक्ति देवात्मा और अंततः परमात्मा के स्वरूप को प्राप्त कर लेता है।
🕊️ असली 'मुक्ति' (Liberation) क्या है?
मुक्ति का अर्थ शरीर छोड़ना नहीं है। मुक्ति का अर्थ है— स्वाधीनता! अपनी पुरानी बुरी आदतों, दूषित विचारों और कुसंस्कारों की गुलामी की बेड़ियों को काट देना ही सच्ची मुक्ति है। जब हमारा विवेक हमारी आदतों पर शासन करने लगता है, तब जीवन में देवोपम आनंद और उल्लास भर जाता है।
🌟 निष्कर्ष:
जैसे एक माँ चाहती है कि बच्चा दिन भर खेलकर रात को वापस अपने घर लौट आए, वैसे ही परमात्मा भी चाहता है कि उसकी अंश रूपी आत्मा अंततः उसी में वापस समा जाए।
अपनी प्रवृत्तियों को शुद्ध करके वापस अपने मूल स्वरूप (ईश्वर) की ओर लौटने के इसी चेतन पुरुषार्थ का नाम 'योग' है।
. !! जय जय श्री महाकाल !!
➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶
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