#श्री कृष्ण
देवर्षि नारद मुनि और भगवान श्रीकृष्ण की भक्तिरस लीला
वृंदावन की पावन भूमि सदैव भगवान श्रीकृष्ण की मधुर लीलाओं से सुशोभित रही है। यहाँ का प्रत्येक वृक्ष, लता, पुष्प, यमुना की प्रत्येक लहर और पक्षियों का प्रत्येक स्वर भगवान के नाम का ही गुणगान करता है। इसी दिव्य वृंदावन में एक बार ऐसी अद्भुत लीला हुई, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि भगवान अपने भक्त के प्रेम के वश में हो जाते हैं।
देवर्षि नारद मुनि का परिचय
देवर्षि नारद ब्रह्माजी के मानस पुत्र और महान ऋषियों में से एक हैं। वे तीनों लोकों—स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल—में स्वतंत्र रूप से विचरण करते हैं। उनके हाथ में दिव्य वीणा "महती" रहती है और उनके मुख से निरंतर "नारायण-नारायण" का उच्चारण होता रहता है।
नारद मुनि केवल एक ऋषि ही नहीं, बल्कि भगवान के प्रेम और भक्ति के प्रचारक भी हैं। वे जहाँ भी जाते हैं, वहाँ भगवान के नाम, गुण, रूप और लीलाओं का कीर्तन करते हैं। उनका जीवन केवल एक ही उद्देश्य के लिए समर्पित है—हर प्राणी के हृदय में भगवान के प्रति प्रेम जागृत करना।
वृंदावन आगमन
एक दिन नारद मुनि भ्रमण करते-करते वृंदावन पहुँचे। यमुना जी का निर्मल जल मंद-मंद बह रहा था। वृक्षों पर कोयल मधुर स्वर में गा रही थीं। मोर नृत्य कर रहे थे। वातावरण में कदंब और मालती के पुष्पों की सुगंध फैली हुई थी।
यह सब देखकर नारद मुनि का हृदय आनंद से भर गया। उन्होंने मन ही मन कहा—
"यह वही भूमि है जहाँ स्वयं परब्रह्म श्रीकृष्ण ने अपनी मधुर लीलाएँ की हैं। यहाँ का प्रत्येक कण भगवान के चरणों से पवित्र हुआ है। ऐसी पावन भूमि पर यदि भगवान का नाम-संकीर्तन न किया जाए, तो इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा?"
नाम-संकीर्तन का आरंभ
नारद मुनि एक विशाल कदंब वृक्ष के नीचे बैठ गए। उन्होंने अपनी दिव्य वीणा हाथ में ली और मधुर स्वर में भगवान का कीर्तन प्रारंभ किया।
वे गा रहे थे—
"राधे कृष्ण... राधे कृष्ण...
श्याम सुंदर... वृंदावन बिहारी...
गोविंद... गोपाल...
नारायण... नारायण..."
उनकी वीणा की मधुर ध्वनि पूरे वन में गूँजने लगी। धीरे-धीरे उनका मन भगवान के प्रेम में इतना डूब गया कि वे स्वयं को भूल गए।
वे कभी आँखें बंद करके गाते, कभी भगवान का नाम लेते हुए नृत्य करने लगते, कभी दोनों हाथ उठाकर भगवान को प्रणाम करते और कभी आनंद के आँसू बहाने लगते।
उनके शरीर में रोमांच छा गया। उनके नेत्रों से प्रेमाश्रु बह रहे थे। उनके मुख पर अलौकिक तेज था।
भगवान श्रीकृष्ण की मधुर लीला
उसी समय भगवान श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ वृंदावन में विहार कर रहे थे।
अचानक उनके कानों में वीणा की मधुर ध्वनि पहुँची।
श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले—
"यह स्वर तो मेरे प्रिय भक्त नारद का है। देखूँ, आज वे किस भाव में मेरा स्मरण कर रहे हैं।"
भगवान धीरे-धीरे वहाँ पहुँचे। उन्होंने देखा कि नारद मुनि पूर्णतः भक्ति में लीन होकर नृत्य कर रहे हैं।
उनके प्रेम को देखकर भगवान इतने प्रसन्न हुए कि वे सामने प्रकट होने के बजाय पास ही एक वृक्ष के पीछे छिपकर अपने भक्त की निष्काम भक्ति देखने लगे।
वे मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।
श्रीकृष्ण ने सोचा—
"जब मेरा भक्त बिना किसी इच्छा के केवल मेरे प्रेम में डूबकर मेरा नाम गाता है, तब उसे देखकर मुझे भी असीम आनंद प्राप्त होता है।"
भक्ति का चरम आनंद
नारद मुनि अब बाहरी संसार से पूर्णतः अनजान थे।
उन्हें न यह पता था कि कोई उन्हें देख रहा है और न ही किसी प्रशंसा की इच्छा थी।
उनका प्रत्येक स्वर भगवान को समर्पित था।
उनकी वीणा का प्रत्येक तार केवल श्रीकृष्ण के प्रेम में झंकृत हो रहा था।
उनका प्रत्येक कदम भगवान के लिए नृत्य कर रहा था।
पूरा वृंदावन मानो उनके साथ भगवान के नाम का संकीर्तन कर रहा था।
भगवान का प्रकट होना
कुछ समय बाद भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्त का प्रेम और अधिक समय तक छिपकर नहीं देख सके।
वे वृक्ष के पीछे से बाहर आए।
उन्हें देखते ही नारद मुनि की वीणा हाथ से छूट गई।
वे तुरंत भूमि पर दण्डवत प्रणाम करते हुए बोले—
"प्रभो! आप... आप स्वयं यहाँ! मैं तो केवल आपके नाम का गुणगान कर रहा था। मुझे यह भी ज्ञात नहीं था कि आप मेरे सामने खड़े हैं।"
भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें उठाया और अपने हृदय से लगा लिया।
भगवान का वचन
श्रीकृष्ण ने प्रेमपूर्वक कहा—
"हे नारद! तुम्हारा यह निष्काम प्रेम मुझे अत्यंत प्रिय है। मैं वैकुण्ठ में नहीं रहता, न केवल योगियों के हृदय में रहता हूँ। जहाँ मेरे भक्त प्रेमपूर्वक मेरा नाम गाते हैं, वहीं मैं निवास करता हूँ।"
फिर भगवान बोले—
"मैं वृक्ष के पीछे इसलिए छिपा था क्योंकि मैं तुम्हारे प्रेमपूर्ण कीर्तन का आनंद लेना चाहता था। तुम्हारा प्रत्येक स्वर मेरे लिए अमूल्य है। तुम्हारी भक्ति ने मुझे अपने प्रेम से बाँध लिया है।"
नारद मुनि का उत्तर
नारद मुनि की आँखों से अश्रुधारा बहने लगी।
उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—
"प्रभु! मेरे पास न धन है, न तप का अभिमान, न ज्ञान का गर्व। मेरे पास यदि कुछ है, तो केवल आपका नाम है। यही मेरा धन है, यही मेरा जीवन है और यही मेरा परम आनंद है।"
भगवान मुस्कुराए और बोले—
"जो भक्त बिना किसी स्वार्थ के केवल प्रेम से मेरा स्मरण करता है, मैं सदैव उसके साथ रहता हूँ।"
इस कथा से मिलने वाली शिक्षा
सच्ची भक्ति में किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं होता।
भगवान को धन, वैभव या बाहरी दिखावा नहीं, बल्कि निष्काम प्रेम प्रिय है।
जो व्यक्ति प्रेमपूर्वक भगवान का नाम-संकीर्तन करता है, भगवान उसके समीप स्वयं उपस्थित होते हैं।
नाम-जप और कीर्तन मन को शुद्ध करके भगवान से जोड़ने का सरलतम मार्ग है।
भगवान अपने भक्त के प्रेम के अधीन हो जाते हैं और उसकी रक्षा तथा कृपा सदैव करते हैं।
भावार्थ:
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जब भक्त पूरे हृदय से भगवान का स्मरण करता है, तब भगवान दूर नहीं रहते। वे स्वयं उसके प्रेम का आनंद लेने आते हैं। यही भक्ति का सर्वोच्च रहस्य है—निष्काम प्रेम, नाम-संकीर्तन और पूर्ण समर्पण।