#🌸शुभ शुक्रवार🙏
चतुर्ष्वपि च वेदेषु पुराणेषु च सर्वशः।
श्रीमहेशात्परो देवो न समानोऽस्ति कश्चन ॥१॥
ब्रह्मा विष्णुर्बलारातिः सर्वे यस्य वशे स्थिताः।
उत्पत्तिः सर्वदेवानां स एव ध्येय उच्यते ॥२॥
नास्ति शम्भोः परो धर्मो नास्त्यर्थः शंकरात्परः।
शिवादन्यत्सुखं नास्ति मोक्षो नैव हरात्परः ॥३॥
यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः।
तदा शिवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ॥४॥
स्रष्टृत्वं ब्रह्मणो येन ध्येयत्वं येन शार्ङ्गिणः।
विष्णुत्वं येन शक्रस्य तस्मादन्यः परो न हि ॥५॥
(सौर पुराण ,अध्याय 38 श्लोक 1 से 5)
सूतजी कहते हैं चारों वेद तथा सभी पुराणों का मत यह है कि महेश्वर (शिव)की अपेक्षा श्रेष्ठ अथवा उनके समान कोई दूसरा देवता नहीं है। ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र सभी जिनके वश में है, जिनसे सर्वदेवगण उत्पन्न होते हैं, वे शिव ही एकमात्र ध्येय हैं। शिव के बिना धर्म नहीं है, शिव के बिना अर्थ नहीं है, शिव के बिना सुख नहीं है, शिव के बिना मुक्ति नहीं है। जब मनुष्य आकाश को चमड़े की भाँति लपेट लेंगे (अर्थात असंभव कार्य कर लेंगे), तब भी शिव को जाने बिना दुःखों का अंत होना असंभव है। (अर्थात शिव कृपा के बिना मुक्ति संभव नहीं है)। जिनकी कृपा से ब्रह्मा सृष्टिकर्त्ता हैं, विष्णु ध्येय हैं तथा इन्द्र को इन्द्रत्व प्राप्त हैं, उन शिव की बढ़कर ओर कुछ नहीं है ।।
. !! जय जय श्री महाकाल !!
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