sn vyas
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19 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣5️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन की उत्पत्ति...(दिन 359) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ ततः पाण्डुर्महाराजो मन्त्रयित्वा महर्षिभिः । दिदेश कुन्त्याः कौरव्यो व्रतं सांवत्सरं शुभम् ।। २५ ।। ऐसा निश्चय करके कुरुनन्दन महाराज पाण्डुने महर्षियोंसे सलाह लेकर कुन्तीको शुभदायक सांवत्सर व्रतका उपदेश दिया ।। २५ ।। आत्मना च महाबाहुरेकपादस्थितोऽभवत् । उग्रं स तप आस्थाय परमेण समाधिना ।। २६ ।। आरिराधयिषुर्देवं त्रिदशानां तमीश्वरम् । सूर्येण सह धर्मात्मा पर्यतप्यत भारत ।। २७ ।। तं तु कालेन महता वासवः प्रत्यपद्यत । और भारत ! वे महाबाहु धर्मात्मा पाण्डु स्वयं देवताओंके ईश्वर इन्द्रदेवकी आराधना करनेके लिये चित्तवृत्तियोंको अत्यन्त एकाग्र करके एक पैरसे खड़े हो सूर्यके साथ-साथ उग्र तप करने लगे अर्थात् सूर्योदय होनेके समय एक पैरसे खड़े होते और सूर्यास्ततक उसी रूपमें खड़े रहते। इस तरह दीर्घकाल व्यतीत हो जानेपर इन्द्रदेव उनपर प्रसन्न हो उनके समीप आये और इस प्रकार बोले- ।। २६-२७३ ।। शक्र उवाच पुत्रं तव प्रदास्यामि त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।। २८ ।। इन्द्रने कहा-राजन् ! मैं तुम्हें ऐसा पुत्र दूँगा, जो तीनों लोकोंमें विख्यात होगा ।। २८ ।। ब्राह्मणानां गवां चैव सुहृदां चार्थसाधकम्। दुहृदां शोकजननं सर्वबान्धवनन्दनम् ।। २९ ।। सुतं तेऽग्रयं प्रदास्यामि सर्वामित्रविनाशनम् । वह ब्राह्मणों, गौओं तथा सुहृदोंके अभीष्ट मनोरथकी पूर्ति करनेवाला, शत्रुओंको शोक देनेवाला और समस्त बन्धु-बान्धवोंको आनन्दित करनेवाला होगा, मैं तुम्हें सम्पूर्ण शत्रुओंका विनाश करनेवाला सर्वश्रेष्ठ पुत्र प्रदान करूँगा ।। २९३ ।। इत्युक्तः कौरवो राजा वासवेन महात्मना ।। ३० ।। उवाच कुन्तीं धर्मात्मा देवराजवचः स्मरन्। उदर्कस्तव कल्याणि तुष्टो देवगणेश्वरः ।। ३१ ।। दातुमिच्छति ते पुत्रं यथा संकल्पितं त्वया । अतिमानुषकर्माणं यशस्विनमरिंदमम् ।। ३२ ।। नीतिमन्तं महात्मानमादित्यसमतेजसम् । दुराधर्ष क्रियावन्तमतीवाद्भुतदर्शनम् ।। ३३ ।। महात्मा इन्द्रके यों कहनेपर धर्मात्मा कुरुनन्दन महाराज पाण्डु बड़े प्रसन्न हुए और देवराजके वचनोंका स्मरण करते हुए कुन्तीदेवीसे बोले- 'कल्याणि! तुम्हारे व्रतका भावी परिणाम मंगलमय है। देवताओंके स्वामी इन्द्र हमलोगोंपर संतुष्ट हैं और तुम्हें तुम्हारे संकल्पके अनुसार श्रेष्ठ पुत्र देना चाहते हैं। वह अलौकिक कर्म करनेवाला, यशस्वी, शत्रुदमन, नीतिज्ञ, महामना, सूर्यके समान तेजस्वी, दुर्धर्ष, कर्मठ तथा देखनेमें अत्यन्त अद्भुत होगा ।। ३०-३३ ।। पुत्रं जनय सुश्रोणि धाम क्षत्रियतेजसाम्। लब्धः प्रसादो देवेन्द्रात् तमाह्वय शुचिस्मिते ।। ३४ ।। 'सुश्रोणि! अब ऐसे पुत्रको जन्म दो, जो क्षत्रियोचित तेजका भंडार हो। पवित्र मुसकानवाली कुन्ती! मैंने देवेन्द्रकी कृपा प्राप्त कर ली है। अब तुम उन्हींका आवाहन करो' ।। ३४ ।। वैशम्पायन उवाच एवमुक्ता ततः शक्रमाजुहाव यशस्विनी । अथाजगाम देवेन्द्रो जनयामास चार्जुनम् ।। ३५ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- महाराज पाण्डुके यों कहने पर यशस्विनी कुन्तीने इन्द्रका आवाहन किया। तदनन्तर देवराज इन्द्र आये और उन्होंने अर्जुनको जन्म दिया ।। ३५ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️