हम सारी ज़िंदगी माँगते रहते हैं — किसी की पहचान, किसी का प्यार, बस कोई हमें नोटिस कर ले। और जितना हम संसार से माँगते हैं, उतना ही वो हमें तरसाता है।
पर ज़रा उस आत्मा को देखो, जिसने माँगना छोड़ दिया।
जो प्रेम के पीछे नहीं भागता — प्रेम खुद उस तक पहुँच जाता है। जिसे वाहवाही की ज़रूरत नहीं — सम्मान खुद चलकर आता है। ये किस्मत नहीं है। ये उस आत्मा की भरपूरता है, जो अब बाहर ऊर्जा बहाना बंद कर चुकी है।
संसार सिर्फ टुकड़े देता है — उन्हें, जो माँगते रहते हैं।
परमात्मा भरपूरता देता है — उन्हें, जो बस संतुष्ट हैं।
क्योंकि जब आपकी संतुष्टि परमात्मा से जुड़ी होती है — न कि लोगों से, न परिस्थितियों से, न किसी की मंज़ूरी से — तब आप संसार की बची-खुची चीज़ों के लिए लाइन में खड़े होना छोड़ देते हैं।
आप सीधे स्रोत से पाना शुरू कर देते हैं। 🤍
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