#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣5️⃣6️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डु का कुन्ती को समझाना और कुन्ती का पति की आज्ञा से पुत्रोत्पत्ति के लिये धर्मदेवता का आवाहन करने के लिये उद्यत होना...(दिन 356)
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स मेऽभिचारसंयुक्तमाचष्ट भगवान् वरम् । मन्त्रं त्विमं च मे प्रादादब्रवीच्चैव मामिदम् ।। १२ ।।
'तब भगवान् दुर्वासाने वरदानके रूपमें मुझे प्रयोगविधिसहित एक मन्त्रका उपदेश दिया और मुझसे इस प्रकार कहा- ।। १२ ।।
यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि । अकामो वा सकामो वा वशं ते समुपैष्यति ।। १३ ।।
'तुम इस मन्त्रसे जिस-जिस देवताका आवाहन करोगी, वह निष्काम हो या सकाम, निश्चय ही तुम्हारे अधीन हो जायगा ।। १३ ।।
तस्य तस्य प्रसादात् ते राज्ञि पुत्रो भविष्यति । इत्युक्ताहं तदानेन पितृवेश्मनि भारत ।। १४ ।।
'राजकुमारी! उस देवताके प्रसादसे तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा।' भारत ! इस प्रकार मेरे पिताके घरमें उस ब्राह्मणने उस समय मुझसे यह बात कही थी ।। १४ ।।
ब्राह्मणस्य वचस्तथ्यं तस्य कालोऽयमागतः । अनुज्ञाता त्वया देवमाह्वयेयमहं नृप । तेन मन्त्रेण राजर्षे यथास्यान्नौ प्रजा हिता ।। १५ ।।
'उस ब्राह्मणकी बात सत्य ही होगी। उसके उपयोगका यह अवसर आ गया है। महाराज ! आपकी आज्ञा होनेपर मैं उस मन्त्रद्वारा किसी देवताका आवाहन कर सकती हूँ। जिससे राजर्षे ! हम दोनोंके लिये हितकर संतान प्राप्त हो ।। १५ ।।
(यां मे विद्यां महाराज अददात् स महायशाः । तयाहूतः सुरः पुत्रं प्रदास्यति सुरोपमम् । अनपत्यकृतं यस्ते शोकं हि व्यपनेष्यति ।। अपत्यकाम एवं स्यान्ममापत्यं भवेदिति ।)
'महाराज ! उन महायशस्वी महर्षिने जो विद्या मुझे दी थी, उसके द्वारा आवाहन करनेपर कोई भी देवता आकर देवोपम पुत्र प्रदान करेगा, जो आपके संतानहीनताजनित शोकको दूर कर देगा; इस प्रकार मुझे संतान प्राप्त होगी और आपकी पुत्रकामना सफल हो जायगी।
आवाहयामि कं देवं ब्रूहि सत्यवतां वर ।
त्वत्तोऽनुज्ञाप्रतीक्षां मां विद्ध्यस्मिन् कर्मणि स्थिताम् ।। १६ ।।
'सत्यवानोंमें श्रेष्ठ नरेश! बताइये, मैं किस देवताका आवाहन करूँ। आप समझ लें, मैं (आपके संतोषार्थ) इस कार्यके लिये तैयार हूँ। केवल आपसे आज्ञा मिलनेकी प्रतीक्षामें हूँ' ।। १६ ।।
पाण्डुरुवाच
(धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि त्वं नो धात्री कुलस्य हि । नमो महर्षये तस्मै येन दत्तो वरस्तव ।। न चाधर्मेण धर्मज्ञे शक्याः पालयितुं प्रजाः ।।) अद्यद्यैव त्वं वरारोहे प्रयतस्व यथाविधि । धर्ममावाहय शुभे स हि लोकेषु पुण्यभाक् ।। १७ ।।
पाण्डु बोले- प्रिये! मैं धन्य हूँ, तुमने मुझपर महान् अनुग्रह किया। तुम्हीं मेरे कुलको धारण करनेवाली हो। उन महर्षिको नमस्कार है, जिन्होंने तुम्हें वैसा वर दिया। धर्मज्ञे ! अधर्मसे प्रजाका पालन नहीं हो सकता। इसलिये वरारोहे! तुम आज ही विधिपूर्वक इसके लिये प्रयत्न करो। शुभे! सबसे पहले धर्मका आवाहन करो, क्योंकि वे ही सम्पूर्ण लोकोंमें धर्मात्मा हैं ।। १७ ।।
अधर्मेण न नो धर्मः संयुज्यति कथंचन ।
लोकश्चायं वरारोहे धर्मोऽयमिति मन्यते ।। १८ ।।
धार्मिकश्च कुरूणां स भविष्यति न संशयः । धर्मेण चापि दत्तस्य नाधर्मे रंस्यते मनः ।। १९ ।।
तस्माद् धर्म पुरस्कृत्य नियता त्वं शुचिस्मिते ।
उपचाराभिचाराभ्यां धर्ममावाहयस्व वै ।। २० ।।
(इस प्रकार करनेपर) हमारा धर्म कभी किसी तरह अधर्मसे संयुक्त नहीं हो सकता। वरारोहे ! लोक भी उनको साक्षात् धर्मका स्वरूप मानता है। धर्मसे उत्पन्न होनेवाला पुत्र कुरुवंशियोंमें सबसे अधिक धर्मात्मा होगा- इसमें संशय नहीं है। धर्मके द्वारा दिया हुआ जो पुत्र होगा, उसका मन अधर्ममें नहीं लगेगा। अतः शुचिस्मिते! तुम मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर धर्मको भी सामने रखते हुए उपचार (पूजा) और अभिचार (प्रयोगविधि) के द्वारा धर्मदेवताका आवाहन करो ।। १८-२० ।।
वैशम्पायन उवाच
सा तथोक्ता तथेत्युक्त्वा तेन भर्जा वराङ्गना । अभिवाद्याभ्यनुज्ञाता प्रदक्षिणमवर्तत ।। २१ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! अपने पति पाण्डुके यों कहनेपर नारियोंमें श्रेष्ठ कुन्तीने 'तथास्तु' कहकर उन्हें प्रणाम किया और आज्ञा लेकर उनकी परिक्रमा की ।। २१ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि कुन्तीपुत्रोत्पत्त्यनुज्ञाने एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें कुन्तीको पुत्रोत्पत्तिके लिये आदेशविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२१ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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