हर ज़माने में ज़माने को बुरा कहते हैं,
लोग कब अपने ज़माने को भला कहते हैं?
जिससे मतलब हो उसी शख्स के हमराह चलो,
शायद इस दौर में इसको ही वफ़ा कहते हैं।
ये ग़ज़ल कहना भी एक तरह का पागलपन है,
हम इसे दर्दे मोहब्बत की दवा कहते हैं।
हमको इस तरह से जीने में मज़ा आता है ,
कहने दो लोग अगर हमको बुरा कहते हैं।
हम तो दुश्मन की भी तौहीन नहीं कर सकते।
बद्दुआ को भी तो हम उसकी दुआ कहते हैं।
जो सभी लोगों की दुखती हुई रग को छू ले,
हम उसी शेर को इक शेर हुआ कहते हैं।
अशोक मिज़ाज
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