sn vyas
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8 days ago
#महाभारत #महाभारत एवं गीता ज्ञान कर्ण की मृत्यु के बाद कृपाचार्य ने दुर्योधन से कहा-- "राजन! राज्य के लोभ से लड़ा जा रहा यह युद्ध अब बंद किया जाना चाहिए। जिन वीरों ने आपकी सहायता की, वे लड़ते हुए स्वर्ग सिधार गए हैं। अब तुम्हारा कर्तव्य यही हैं कि पांडवों से संधि कर लो। दुर्योधन और अन्य कौरव वीरों को कृपाचार्य की बातें पसंद नहीं आई और युद्ध जारी रखने का संकल्प दोहराया गया। सब की सलाह पर दुर्योधन ने मद्रराज 'शल्य' को सेनापति नियुक्त किया। अन्य कौरव वीरों की तरह शल्य भी बड़ा पराक्रमी और शक्तिमान था। आज पांडवों की तरफ से महाराज युधिष्ठिर स्वयं मोर्चा संभाल रहे थे। शल्य पर उन्होंने स्वयं आक्रमण किया और प्रचंड वेग से टूट पड़े। दोनों के बीच भीषण संग्राम होता रहा, फिर युधिष्ठिर ने शल्य पर शक्ति का प्रयोग कर उसका अंत कर दिया। एक अन्य मोर्चे पर भीम के साथ दुर्योधन के बचें भाई लड़ रहे थे। भीम ने एक-एक कर सब का वध कर दिया। सभी धृतराष्ट्र-पुत्रों को मारने की उसकी प्रतिज्ञा में अब केवल दुर्योधन ही बच रहा था। सहदेव और शकुनि आपस में भिड़े हुए थे। अनर्थ की जड़ शकुनि को सहदेव ने मार गिराया। इस प्रकार कौरव सेना के सारे वीर कुरु-क्षेत्र की भूमि पर सदा के लिए सो गए। अकेला दुर्योधन जीवित बचा था। अब उसके पास न तो सेना थी न रथ। घायल और थका हुआ दुर्योधन पास ही के तालाब में जल-चिकित्सा के लिए घुसकर बैठ गया। उधर दूसरे दिन जब युद्ध-भूमि में दुर्योधन दिखाई नही दिया तो युधिष्ठिर और उनके भाई उसे खोजते हुए उसी जलाशय पर जा पहुंचे, जहां वह छिपा बैठा था। श्रीकृष्ण भी उनके साथ थे। सबको पता चल गया था कि दुर्योधन जलाशय में छुपा हुआ हैं। युधिष्ठिर ने उसे ललकारा-- "दुर्योधन अपने कुटुंब और वंश का नाश करने के बाद अब पानी में छिपकर प्राण बचाना चाहते हो ? तुम्हारे दर्प और आत्माभिमान का क्या हुआ ? बाहर निकलो और क्षत्रियोचित ढंग से युद्ध करो।" यह सुन दुर्योधन ने व्यथित होकर कहा-- "मैं प्राणों के डर से यहां नहीं छिपा। शरीर की थकान मिटाने को ही ठंडे जल में विश्राम कर रहा हूं। मेरे सभी संगी-साथी और बंधु-बांधव मारे जा चुके हैं। अब मैं बिल्कुल अकेला हूं। राज्य-सुख का मुझे लोभ नहीं रहा। यह सारा राज्य अब तुम्हारा ही हैं। निश्चिंत होकर तुम ही इसका उपभोग करो।" युधिष्ठिर ने उसको उसकी करतूतें याद दिलायीं और कहा-- "तुमने हमें जो हानियां पहुंचाई और द्रौपदी का अपमान किया वह सब पुकार-पुकार कर तुम्हारे प्राणों की बलि मांग रहे हैं। अब तुम बच नहीं पाओगे।" युधिष्ठिर की बातें सुनकर दुर्योधन जल में उठ खड़ा हुआ और कहा-- "मैं थका हुआ और घायल हूं। कवच भी मेरे पास नहीं हैं इसलिए तुम एक-एक कर निपट लो।" युधिष्ठिर ने कहा-- "यदि अकेले पर कइयों का हमला करना धर्म नहीं तो बालक अभिमन्यु कैसे मारा गया था ? तुम्हारी ही तो अनुमति पाकर उस एक बालक को सात-सात महारथियों ने मिलकर धर्म के विरुद्ध लड़ कर मारा था न! तब धर्म का ख्याल नहीं रखा ?...इस कारण अब बकवास बंद करो और जलाशय से निकल आओ। अपना कवच पहन लो और हम में से जिस किसी से भी चाहो द्वंद-युद्ध कर लो । यदि मारे गए तो स्वर्ग पाओगे और जीत गए तो सारे राज्य के तुम ही स्वामी बनोगे।" यह सुन दुर्योधन जलाशय से बाहर निकल आया और उसने भीम से गदा-युद्ध करने की इच्छा प्रकट की। गदा-युद्ध में दुर्योधन का कोई सानी नहीं था। उसे धर्म-युद्ध करके जीत पाना किसी के बस की बात नहीं थी। दुर्योधन और भीम आपस में लड़ रहे थे कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इशारा किया; यदि भीम, दुर्योधन की जांघ पर गदा मारेगा तो जीत जाएगा। भीम ने इशारे को समझ दुर्योधन की जांघ पर प्रहार किया। प्रहार करना था कि दुर्योधन पृथ्वी पर कटे पेड़ की तरह गिर पड़ा। भीम का पुराना वैर जाग उठा। उसने उन्मत्त अवस्था में आहत पड़े दुर्योधन के माथे पर एक जोर की लात जमायी। कृष्ण को भीम का यह काम पसंद नहीं आया। उन्होंने कहा-- "दुर्योधन एक राजा हैं और हमारे ही कुल का हैं। उसके माथे पर लात मारना उचित नहीं हैं।" मरणासन्न दुर्योधन को श्रीकृष्ण की यह सहानुभूति पसंद नहीं आयी उसने कृष्ण पर आरोप लगाते हुए कहा-- "कौरव पक्ष के सारे यशस्वी महारथी उसके कुचक्र के कारण ही मारे गए हैं। वह स्वयं भी मरने वाला हैं। कुछ ही देर में चील कौवे भी मेरे माथे पर अपनी लाते रखने ही वाले हैं, फिर भीम ने उस पर प्रहार कर दिया-- तो क्या ?" मरणासन्न में दुर्योधन को छोड़कर सभी पांडव वापस शिविर में चले आए।