#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣5️⃣1️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डु का कुन्ती को पुत्र-प्राप्ति के लिये प्रयत्न करने का आदेश...(दिन 351)
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सन्ति क्वचिन्महादर्यो दुर्गाः काश्चिद् दुरासदाः । नातिक्रामेत पक्षी यान् कुत एवेतरे मृगाः ।। १३ ।।
'कहीं-कहीं बहुत बड़ी गुफाएँ हैं, जिनमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन है। कइयोंके तो निकट भी पहुँचना कठिन है। ऐसे स्थलोंको पक्षी भी नहीं पार कर सकता, फिर मृग आदि अन्य जीवोंकी तो बात ही क्या है? ।। १३ ।।
वायुरेको हि यात्यत्र सिद्धाश्च परमर्षयः । गच्छन्त्यौ शैलराजेऽस्मिन् राजपुत्र्यौ कथं त्विमे ।। १४ ।।
न सीदेतामदुःखार्डे मा गमो भरतर्षभ ।
'इस मार्गपर केवल वायु चल सकती है तथा सिद्ध महर्षि भी जा सकते हैं। इस पर्वतराजपर चलती हुई ये दोनों राजकुमारियाँ कैसे कष्ट न पायेंगी? भरतवंशशिरोमणे ! ये दोनों रानियाँ दुःख सहन करनेके योग्य नहीं हैं; अतः आप न चलिये' ।। १४३ ।।
पाण्डुरुवाच
अप्रजस्य महाभागा न द्वारं परिचक्षते ।। १५ ।।
स्वर्गे तेनाभितप्तोऽहमप्रजस्तु ब्रवीमि वः । पित्र्यादृणादनिर्मुक्तस्तेन तप्ये तपोधनाः ।। १६ ।।
पाण्डुने कहा- महाभाग महर्षिगण! संतानहीनके लिये स्वर्गका दरवाजा बंद रहता है, ऐसा लोग कहते हैं। मैं भी संतानहीन हूँ, इसलिये दुःखसे संतप्त होकर आपलोगोंसे कुछ निवेदन करता हूँ। तपोधनो! मैं पितरोंके ऋणसे अबतक छूट नहीं सका हूँ, इसलिये चिन्तासे संतप्त हो रहा हूँ ।। १५-१६ ।।
देहनाशे ध्रुवो नाशः पितृणामेष निश्चयः । ऋणैश्चतुर्भिः संयुक्ता जायन्ते मानवा भुवि ।। १७ ।।
निःसंतान अवस्थामें मेरे इस शरीरका नाश होने पर मेरे पितरोंका पतन अवश्य हो जायगा। मनुष्य इस पृथ्वीपर चार प्रकारके ऋणोंसे युक्त होकर जन्म लेते हैं ।। १७ ।।
पितृदेवर्षिमनुजैर्देयं तेभ्यश्च धर्मतः । एतानि तु यथाकालं यो न बुध्यति मानवः ।। १८ ।।
न तस्य लोकाः सन्तीति धर्मविद्भिः प्रतिष्ठितम् । यज्ञैस्तु देवान् प्रीणाति स्वाध्यायतपसा मुनीन् ।। १९ ।।
(उन ऋणोंके नाम ये हैं) पितृ ऋण, देव ऋण, ऋषि ऋण और मनुष्य-ऋण। उन सबका ऋण धर्मतः हमें चुकाना चाहिये। जो मनुष्य यथासमय इन ऋणोंका ध्यान नहीं रखता, उसके लिये पुण्यलोक सुलभ नहीं होते। यह मर्यादा धर्मज्ञ पुरुषोंने स्थापित की है। यज्ञोंद्वारा मनुष्य देवताओंको तृप्त करता है, स्वाध्याय और तपस्याद्वारा मुनियोंको संतोष दिलाता है ।। १८-१९ ।।
पुत्रैः श्राद्धेः पितूंश्चापि आनृशंस्येन मानवान् । ऋषिदेवमनुष्याणां परिमुक्तोऽस्मि धर्मतः ।। २० ।।
त्रयाणामितरेषां तु नाश आत्मनि नश्यति । पित्र्यादृणादनिर्मुक्त इदानीमस्मि तापसाः ।। २१ ।।
पुत्रोत्पादन और श्राद्धकर्मोंद्वारा पितरोंको तथा दयापूर्ण बर्तावद्वारा वह मनुष्योंको संतुष्ट करता है। मैं धर्मकी दृष्टिसे ऋषि, देव तथा मनुष्य- इन तीनों ऋणोंसे मुक्त हो चुका हूँ। अन्य अर्थात् पितरोंके ऋणका नाश तो इस शरीरके नाश होनेपर भी शायद ही हो सके। तपस्वी मुनियो ! मैं अबतक पितृ ऋणसे मुक्त न हो सका ।। २०-२१ ।।
इह तस्मात् प्रजाहेतोः प्रजायन्ते नरोत्तमाः।
यथैवाहं पितुः क्षेत्रे जातस्तेन महर्षिणा ।। २२ ।।
तथैवास्मिन् मम क्षेत्रे कथं वै सम्भवेत् प्रजा ।
इस लोकमें श्रेष्ठ पुरुष पितृ ऋणसे मुक्त होनेके लिये संतानोत्पत्तिका प्रयत्न करते और स्वयं ही पुत्ररूपमें जन्म लेते हैं। जैसे मैं अपने पिताके क्षेत्रमें महर्षि व्यासद्वारा उत्पन्न हुआ हूँ, उसी प्रकार मेरे इस क्षेत्रमें भी कैसे संतानकी उत्पत्ति हो सकती है? ।। २२ ।।
ऋषय ऊचुः
अस्ति वै तव धर्मात्मन् विद्मो देवोपमं शुभम् ।। २३ ।।
अपत्यमनघं राजन् वयं दिव्येन चक्षुषा । दैवोद्दिष्टं नरव्याघ्न कर्मणेहोपपादय ।। २४ ।।
ऋषि बोले- धर्मात्मा नरेश! तुम्हें पापरहित देवोपम शुभ संतान होनेका योग है, यह हम दिव्यदृष्टिसे जानते हैं। नरव्याघ्र! भाग्यने जिसे दे रखा है, उस फलको प्रयत्नद्वारा प्राप्त कीजिये ।। २३-२४ ।।
अक्लिष्टं फलमव्यग्रो विन्दते बुद्धिमान् नरः । तस्मिन् दृष्टे फले राजन् प्रयत्नं कर्तुमर्हसि ।। २५ ।।
अपत्यं गुणसम्पन्नं लब्धा प्रीतिकरं ह्यसि।
बुद्धिमान् मनुष्य व्यग्रता छड़कर बिना क्लेशके ही अभीष्ट फलको प्राप्त कर लेता है। राजन्! आपको उस दृष्ट फलके लिये प्रयत्न करना चाहिये। आप निश्चय ही गुणवान् और हर्षोत्पादक संतान प्राप्त करेंगे ।। २५ ।।
वैशम्पायन उवाच
नच्छ्रुत्वा तापसवचः पाण्डुश्चिन्तापरोऽभवत् ।। २६ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! तपस्वी मुनियोंका यह वचन सुनकर राजा पाण्डु बड़े सोच-विचारमें पड़ गये ।। २६ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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