sn vyas
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5 days ago
#हनुमानजी प्रथम पंक्ति (दुर्गम काज सुगम करें, कृपा तुम्हारी होय): इसका अर्थ है कि इस संसार में जो कार्य अत्यंत कठिन (दुर्गम) लगते हैं या जिन्हें पूरा करना असंभव सा प्रतीत होता है, वे भी हनुमान जी की कृपा से बहुत सरल (सुगम) हो जाते हैं। यहाँ 'कृपा' का अर्थ केवल दैवीय मदद नहीं, बल्कि हनुमान जी से मिलने वाले साहस और बुद्धि से है, जो किसी भी बाधा को पार करने की शक्ति देती है। द्वितीय पंक्ति (जो सुमिरै हनुमान को, व्याधि न व्यापै कोय): 'सुमिरै' का अर्थ है स्मरण करना या ध्यान लगाना। 'व्याधि' का अर्थ है रोग, कष्ट या मानसिक तनाव। इस पंक्ति का भाव यह है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से हनुमान जी का ध्यान करता है, उसे किसी भी प्रकार का शारीरिक या मानसिक कष्ट नहीं सताता। हनुमान जी को "संकटमोचन" कहा गया है, इसलिए उनका स्मरण ही समस्त दुखों और नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखने के लिए पर्याप्त है। निहित भाव: यह दोहा हमें विश्वास दिलाता है कि भक्ति और आत्मबल के सहारे हम जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। जब हम संकट में होते हैं, तो हनुमान जी का नाम हमें वह मानसिक दृढ़ता प्रदान करता है जिससे "दुर्गम" मार्ग भी "सुगम" लगने लगता है। राधे राधे