sn vyas
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13 hours ago
#जय श्री राम श्रवण सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर । त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर ।। हे शरणागत वत्सल राम ! हे दीनों और पतितों के आश्रयदाता लोकाभिराम ! हे अपने आचरणों से लोक-मर्यादा की स्थापना करनेवाले सर्वाधार राम ! हम तुम्हारी शरण हैं ! प्रभो ! रक्षा करो, रक्षा करो ! हम अज्ञानी हैं, तुम्हारी 'शिव-विरंचि-मोहिनी' माया में फँस रहे हैं, हमें कर्तव्याकर्तव्य का पता नहीं है, इसी से तुम्हें छोड़कर विषयों के अनुरागी बन रहे हैं । नाथ ! अपनी सहज दया से हमारी रक्षा करो । एक बार जो शरण होकर यह कह देता है कि मैं तुम्हारी शरण हूँ, तुम उसको अभय कर देते हो यह तुम्हारा प्रण है, सच है प्रभो ! हम तुम्हारी शरण नहीं हुए ! नहीं तो तुम्हारे प्रण के अनुसार अबतक अभय पद पा चुके होते । परंतु नाथ ! यह भी तो तुम्हारे ही हाथ है । अब हम दीन, पतित, मार्गभ्रष्ट और निर्बल हैं और तुम दीनबन्धु, पतित-पावन, पथप्रदर्शक और निर्बल के बल हो ! अब हम कहाँ जायँ, तुम्हारे सिवा हम-सरीखे पामर गरीब दीनों को कौन आश्रय देगा ? अपनी ओर देखकर ही अब तो हमें खींचकर अपने चारू चरणों में डाल दो । प्रभो ! हमें मोक्ष नहीं चाहिये, तुम्हारा कोई धाम नहीं चाहिये, स्वर्ग या मतर्यलोक में कोई नाम नहीं चाहिये । हमें तो बस, तुम अपनी चरण रज में लोट-लोटकर बेसुध होनेवाले पागल बना दो, अपने प्रेम में ऐसे मतवाले कर दो कि लोक-परलोक की कोई सुधि ही न रहे, आँखोंपर सदा 'पावस-ऋतु' ही छायी रहे और तुम उस जल-धारा से सदा अपने चरण-कमल पखरवाते रहो । प्रभो ! वह दिन कब होगा जब- नयनं गलदश्रुधारया वदनं गद्गदरूद्धया गिरा । पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नामग्रहणे भविष्यति ।। ( श्रीश्रीचैतन्य ) 'तुम्हारा नाम लेते ही नेत्रों से आनन्द के आँसुओं की धारा बहने लगेगी, गद्गद होकर वाणी रूक जायगी और समस्त शरीर रोमांचित हो जायगा ।'