🌸 प्रभु श्रीराम की शरणागति और सरल भक्ति 🌸
चौपाई:
भृकुटि बिलास नचावइ ताही। अस प्रभु छाड़ि भजिअ कहु काही॥
मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई। भजत कृपा करिहहिं रघुराई॥
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सुंदर भावार्थ:
इस चौपाई में गोस्वामी तुलसीदास जी प्रभु श्रीराम की असीम सत्ता और उनकी सहज दयालुता का वर्णन कर रहे हैं।
१. प्रभु की माया और सामर्थ्य: जो अपनी भौहों के मात्र एक इशारे (भृकुटि बिलास) से इस समस्त जगत और काल (समय) को नचाते हैं, जिनकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता—ऐसे परम शक्तिशाली और समर्थ प्रभु को छोड़कर भला और किसकी शरण में जाया जाए?
२. भक्ति का सरल मार्ग: भगवान को रिझाने के लिए किसी बड़े आडंबर या चालाकी की आवश्यकता नहीं है। प्रभु केवल सरलता के भूखे हैं।
३. पूर्ण समर्पण: यदि हम अपने मन, कर्म और वाणी से सारी चतुराई (अभिमान और कपट) त्यागकर प्रभु की शरण में जाते हैं, तो वह 'रघुराई' अत्यंत शीघ्र अपने भक्त पर दया करते हैं और उसे अपना लेते हैं।
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निष्कर्ष:
संसार की उलझनों और चतुराइयों को प्रभु के चरणों में समर्पित कर दें। जब हृदय निर्मल और कपट रहित होता है, तब रघुनाथ जी की कृपा स्वतः ही बरसने लगती है।
🚩 ॥ जय श्री राम ॥ 🚩
🚩 ॥ जय गोस्वामी तुलसीदास ॥ 🚩
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