sn vyas
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1 days ago
#☝आज का ज्ञान #❤️जीवन की सीख तमिलनाडु के समुद्र तट पर बसे सुंदर नगर करैक्काल में एक धनवान व्यापारी के घर एक कन्या ने जन्म लिया। उसका नाम रखा गया — पुणीतवती। बचपन से ही उसका मन भगवान शिव की भक्ति में डूबा रहता था। वह साधुओं की सेवा करती, भूखों को भोजन कराती और हर समय “ॐ नमः शिवाय” का जाप करती रहती।🚩 समय बीता और पुणीतवती का विवाह एक व्यापारी परमदत्तन से हुआ। विवाह के बाद भी वह शिवभक्ति और सेवा में लगी रहीं। उनका घर आने वाले साधुओं के लिए हमेशा खुला रहता।🚩 एक दिन परमदत्तन ने अपने घर दो दुर्लभ आम भेजे और कहा कि इन्हें संभालकर रखना। उसी समय एक भूखा शिवभक्त साधु घर पर आया। पुणीतवती ने प्रेम से उसे भोजन कराया और भगवान का प्रसाद समझकर एक आम भी दे दिया। कुछ देर बाद परमदत्तन घर लौटा। भोजन करते समय उसने आम माँगा। पुणीतवती ने दूसरा आम परोस दिया। उसका स्वाद इतना अद्भुत था कि उसने दूसरा आम भी माँग लिया। अब पुणीतवती चिंता में पड़ गईं, क्योंकि दूसरा आम तो वे साधु को दे चुकी थीं। उन्होंने मन ही मन भगवान शिव को पुकारा — “हे महादेव! मेरी लाज रख लीजिए।”🚩 कहते हैं, तभी उनके हाथ में चमत्कारिक रूप से एक दिव्य आम प्रकट हो गया। उन्होंने वह आम अपने पति को दे दिया। जैसे ही परमदत्तन ने वह आम खाया, उसे लगा कि यह कोई साधारण फल नहीं है। उसने पूछा — “यह आम कहाँ से आया?” पहले तो पुणीतवती चुप रहीं, लेकिन बार-बार पूछने पर उन्होंने सारी बात बता दी। परमदत्तन को विश्वास नहीं हुआ। उसने कहा — “यदि यह सच है, तो एक और आम मँगाकर दिखाओ।” पुणीतवती ने फिर भगवान शिव से प्रार्थना की और तुरंत एक और दिव्य आम प्रकट हो गया। लेकिन जैसे ही परमदत्तन ने उसे हाथ में लिया, वह आम अदृश्य हो गया। अब परमदत्तन समझ गया कि उसकी पत्नी कोई साधारण स्त्री नहीं, बल्कि स्वयं शिव की परम भक्त हैं। उसके मन में भय और श्रद्धा भर गई। कुछ समय बाद वह चुपचाप घर छोड़कर दूसरे नगर चला गया और वहाँ दूसरा विवाह कर लिया। जब पुणीतवती को यह पता चला, तो उन्हें संसार की नश्वरता का एहसास हुआ। उन्होंने भगवान शिव से प्रार्थना की — “हे प्रभु! मुझे इस सुंदर शरीर की आवश्यकता नहीं। मुझे ऐसा रूप दीजिए, जिससे मेरा मन कभी संसार की ओर आकर्षित न हो।” भगवान शिव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। कहते हैं, उनका शरीर अस्थिपंजर जैसा हो गया, लेकिन उनका चेहरा दिव्य तेज से चमकता रहा। तभी से वे करैक्काल अम्मैयार कहलाने लगीं। इसके बाद वे कैलाश पर्वत की यात्रा पर निकल पड़ीं। लेकिन उन्होंने सोचा कि पवित्र कैलाश पर पैरों से चलना उचित नहीं। इसलिए वे अपने हाथों के बल चलते हुए कैलाश पहुँचीं। भगवान शिव उनकी भक्ति देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए और प्रेम से उन्हें “अम्मैयार” यानी “माँ” कहकर पुकारा। यह सम्मान पाने वाली वे पहली महान शिवभक्त मानी जाती हैं। कहते हैं, शिव तांडव के समय करैक्काल अम्मैयार हमेशा भगवान के चरणों में बैठकर भक्ति गीत गाती थीं। 🌸 संदेश:🙏 सच्ची भक्ति वह है, जहाँ मनुष्य संसार के मोह को छोड़कर पूरी तरह भगवान में समर्पित हो जाए। भगवान अपने सच्चे भक्त को कभी अकेला नहीं छोड़ते। 🙏