. अहंकार से मुक्ति
राजा पृथ्वीराज को विश्वास था कि उनके गुरु की तंत्र विद्या के कारण ही उनका राज-काज और शासन सुरक्षित है। वे अक्सर अपने गुरु तारानाथ को घर पर भोजन (प्रसाद) के लिए आमंत्रित करते थे, लेकिन तारानाथ यह कहकर मना कर देते थे कि राजा की पत्नी एक वैष्णव है और वैष्णव के हाथ का भोजन करने से उनकी तांत्रिक शक्तियाँ नष्ट हो जाएंगी।
इस बात को लेकर राजा और उनकी पत्नी के बीच अक्सर विवाद होता था। राजा अपनी पत्नी पर दबाव डालते थे कि वह तारानाथ से दीक्षा लेकर उनकी शिष्या बन जाए, परन्तु रानी अपने गुरु कृष्णदास पयहारी जी और अपनी वैष्णव भक्ति के प्रति अडिग थीं।
घर के कलह से परेशान होकर रानी ने अपने गुरु कृष्णदास पयहारी जी से मदद मांगी। जब गुरु को पता चला कि राजा एक तांत्रिक के प्रभाव में हैं, तो वे स्वयं तारानाथ के आश्रम के बाहर जाकर बैठ गए।
तारानाथ ने उन्हें वहाँ से हटाने के लिए अपनी तंत्र विद्या का प्रयोग किया और शेर का रूप धारण कर लिया ताकि वे डर कर भाग जायें।
जब तारानाथ शेर बनकर पयहारी जी के सामने दहाड़ने लगे।
पयहारी जी ने शांत भाव से कहा कि तुम स्वभाव से गधे हो और शेर का रूप धर कर आए हो।
उन्होंने अपने कमण्डल से अभिमंत्रित जल उन पर छिड़का, जिससे तारानाथ अपनी तंत्र विद्या खो बैठे और वास्तव में एक गधे में परिवर्तित हो गए। वे डर के मारे भागकर गधों के झुण्ड में शामिल हो गए।
जब राजा पृथ्वीराज अपने गुरु के दर्शन करने पहुँचे, तो वहाँ तारानाथ गायब थे और आश्रम के अन्य शिष्य रो रहे थे। पयहारी जी ने राजा को बताया कि उनके गुरु अपनी ही विद्या के अहंकार में गधा बन चुके हैं।
राजा ने पूरी सेना लगाकर ढूँढवाया और अंततः एक ऐसे गधे को पाया जिसके कानों में कुण्डल और पैरों में कड़े थे–जैसा कि तारानाथ पहना करते थे।
अपनी आँखों के सामने गुरु की यह दशा देखकर राजा का अहंकार टूट गया। उन्होंने पयहारी जी से क्षमा मांगी और प्रार्थना की कि ‘उनके गुरु को पुनः मनुष्य बना दिया जाये।’
पयहारी जी की कृपा से तारानाथ वापस अपने रूप में आए, लेकिन इस घटना ने उनका जीवन बदल दिया। तारानाथ ने स्वयं अपनी तंत्र विद्या त्याग कर कृष्णदास पयहारी जी से वैष्णव दीक्षा ली।
उन्हें देखकर राजा पृथ्वीराज भी वैष्णव बन गए। अंततः राजा, रानी और उनके पूर्व गुरु, सभी भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में लीन हो गए और पूरा राजभवन भक्ति के रंग में रंग गया।
॥जय जय श्री राधे॥
#जय श्री राधे