वीरता और स्वाभिमान के अमर प्रतीक महाराणा प्रताप जी की जन्मजयंती पर उन्हें शत-शत नमन।
महाराणा प्रताप जी केवल रणभूमि के अद्वितीय योद्धा नहीं थे, बल्कि वे मेवाड़ के जल, जंगल, जमीन और जन-जीवन के सच्चे संरक्षक भी थे। संघर्ष के कठिन समय में भी उन्होंने चावंड को अपनी राजधानी बनाकर मेवाड़ के पुनर्निर्माण, कृषि व्यवस्था और जल-संरक्षण की दिशा में दूरदर्शी प्रयास किए।
उनके काल में पंडित चक्रपाणि मिश्र द्वारा रचित ‘विश्व वल्लभ’ जैसे ग्रंथों में कृषि, वृक्ष-विज्ञान और जल संसाधनों के संरक्षण का उल्लेख मिलता है। यह दर्शाता है कि महाराणा प्रताप जी के लिए राष्ट्ररक्षा का अर्थ केवल सीमाओं की रक्षा नहीं, बल्कि जलस्रोतों, धरती और प्रकृति की रक्षा भी था।
मेवाड़ की परंपरा में तालाब, बावड़ियां, कुंड और जल-संचयन की व्यवस्थाएं केवल पानी का साधन नहीं, बल्कि जीवन, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता का आधार रही हैं। महाराणा प्रताप जी की यही प्रेरणा आज भी हमें जल संरक्षण को जन-कर्तव्य बनाने का संदेश देती है।
मातृभूमि, प्रकृति और जल-संपदा के महान रक्षक महाराणा प्रताप जी को विनम्र श्रद्धांजलि।
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