#जय श्री राम
प्रभु राम-सीता माता हनुमान जी से बोले --- वृक्ष की शोभा को देखकर भगवान् श्रीराम हनुमानजी से बोले – ‘देखो हनुमान ! यह लता कितनी सुन्दर है | वृक्ष के चारों ओर कैसी छायी हुई है | यह लता अपने सुन्दर-सुन्दर फल, सुगन्धित फूल और हरी-हरी पतियों से इस वृक्ष की कैसी शोभा बढा रही है इससे जंगल के अन्य सब वृक्षों से यह वृक्ष कितना सुन्दर दीख रहा है | इतना ही नहीं, इस वृक्ष के कारण ही सारे जंगल की शोभा हो रही है | इस लता के कारण ही पशु-पक्षी इस वृक्ष का आश्रय लेते हैं | धन्य है यह लता !’
भगवान् श्रीराम के मुख से लता की प्रशंसा सुनकर सीता जी हनुमानजी से बोलीं – ‘देखो बेटा हनुमान ! तुमने ख्याल किया कि नहीं ? देखो, इस लता का ऊपर चढ़ जाना, फूल पतों से छा जाना, तन्तुओं का फ़ैल जाना – ये सब वृक्ष के आश्रित हैं, वृक्ष के कारण ही हैं | इस लता की शोभा भी वृक्ष के ही कारण है | इस वास्ते मूल में महिमा तो वृक्ष की ही है | आधार तो वृक्ष ही है | वृक्ष के सहारे बिना लता स्वयं क्या कर सकती है ? कैसे छा सकती है ? अब बोलो हनुमान ! तुम्हीं बताओ, महिमा वृक्ष की ही हुई न ?’
रामजी ने कहा – ‘क्यों हनुमान ! यह महिमा तो लता की ही हुई न ?’
हनुमानजी बोले – ‘हमें तो तीसरी बात ही सूझती है |’
सीताजी ने पूछा – ‘वह क्या है बेटा ?’
हनुमानजी ने कहा –‘माँ ! वृक्ष और लता की छाया बड़ी सुन्दर है | इस वास्ते हमें तो इन दोनों की छाया में रहना ही अच्छा लगता है, अर्थात हमें तो आप दोनों की छाया (चरणों का आश्रय) – में रहना ही अच्छा लगता है |’
सेवक सुत पति मातु भरोसें |
रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें ||
(मानस. ४/३/२)