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तुमारी यादें जब हमको सताती है
खनकती चूड़ियाँ तुमको बुलाती है
यकीं कर ले खुदाया मेरे बातों पर
रुला कर दास्ताँ अपनी सुनाती है
बुझाने से कहाँ बुझती अगन दिल की
दिखा कर खाब सुहाने बढाती है
सुबहओ शाम तो फिर भी गुजर जाते
लगा कर सीने से ,रातों को जगाती है
बड़ी ही संगदिल आवाज है इसकी
सुना कर धुन मुहब्बत की रुलाती है
करूँ जब शिक्वे मैं तेरी जफ़ाओं के
बना कर बातें वो झूठी मनाती है
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
15/4/2017
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