2122 2122 212
कहते हैं सब मुझे आवारा हूँ मैं
ज़िन्दगी से अपने ही हारा हूँ मैं
बात जो थी खत्म कब की हो गई
अपने ही किस्मत से हरकारा हूँ मैं
बेवजह बदनाम हूँ मैं हर जगह
आसमाँ से टूटता तारा हूँ मैं
क्या किसी के काम आऊँगा कभी
बे वजह , बे कार नाकारा हूँ मैं
बेमुरव्वत धड़कने सुनती नहीं
उलझनों का इनके ही मारा हूँ मैं
चन्द रोज़ा ज़िन्दगी बाकी बची
ज़िन्दा रहमत से तेरी यारा हूँ मैं
रोऊँ क्या रोना बे रुखी का तेरी
अवगुणों काखुद एक पिटारा हूँ मैं
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
28/12/2017
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