1212 2122 1212 212
बसा है जो रूह में , कैसे में भुलाऊं उसे
ग़ज़ल बहाना करूँ , और गुनगुनाऊँ उसे
महक रहा फूल के खुशबू जैसे घर जिससेये
लगा के मैं जिस्म ओ जान में समाऊँ उसे
उजड़ चुका है मेरा आशियाँ बहारो में जो
बहारें फिर वो बुलाकर कैसे सजाऊँ उसे
रहा कदम दर कदम साथ सदा जो मेरे
कहाँ से अब में ढूँढ़ कर यहाँ में लाऊं उसे
न जाने किसकी नज़र लग गई खुशी को मेरे
बताये कोई मुझे अब में कैसे पाऊँ उसे
उदास दिन , रातें वीरान है मेरी अब यहाँ
घड़ी घड़ी दे के आवाज में बुलाऊँ उसे
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
10/2/2018
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