गया, मैं तो आपके सेवकों के चरणों की धूर तुल्य हूँ।
•• गुरु ग्रन्थ साहिब, राग "सिरी" महला 1, पृष्ठ 24, शब्द 29
फाही सुरत मलूकी वेस, उह ठगवाड़ा ठगी देस ।। खरा सिआणां बहुता भार, धाणक रूप रहा करतार।।3।।
मैं कीता न जाता हरामखोर, उह किआ मुह देसा दुष्ट चोर। नानक नीच कह बिचार, धाणक रूप रहा करतार।।4।। श्री नानक जी ने कहा कि परमात्मा मनमोहिनी सूरत में तथा जिस देश में जाता है वैसा ही वेश बना लेता है, जैसे जिंदा महात्मा रूप में बेई नदी पर मिले, सतलोक में पूर्ण परमात्मा वाले वेश में तथा उतर प्रदेश में धाणक (जुलाहे) रूप में स्वयं करतार (पूर्ण प्रभु) विराजमान है। यही धाणक (जुलाहे) रूप में सतपुरुष अर्थात् अकाल मूर्त ही है। वह परमात्मा कबीर है।
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