फॉलो करें
Vijay Dass
@1400896866
951
पोस्ट
885
फॉलोअर्स
Vijay Dass
2.3K ने देखा
#GodMorningTuesday #2026_की_सबसे_बड़ी_भविष्यवाणी . सृष्टि रचना सृष्टि रचना से पहले सिर्फ एक सनातन परमात्मा था जो अपने अनामीलोक में अकेला रहता था। उस परमात्मा का वास्तविक नाम कविर्देव अर्थात कबीर परमेश्वर हैं। वेदों में उन्हें कविर्देव और क़ुरान में कबीरन नाम से पुकारा गया है। पूर्ण परमात्मा देखने में मनुष्य के समान है पर उनका शरीर दीप्तिमान है। उनके एक एक रोम कूप का प्रकाश संख सूर्यों कि रोशनी से भी अधिक है। उस प्रभु ने मनुष्य को अपने ही स्वरुप में बनाया है, इसलिए मानव का नाम भी पुरुष ही पड़ा है। पुरुष का सही अर्थ परमात्मा होता है। उसी परम पुरुष के शरीर में सभी आत्माएं समायी हुई थी। पूर्ण परमात्मा कविर्देव अथार्त कबीर परमेश्वर ने नीचे के तीन और लोकों अगम लोक, अलख लोक, सतलोक की रचना शब्द वचन से की। यही पूर्णब्रह्म परमात्मा कविर्देव कबीर परमेश्वर ही अगम लोक में प्रकट हुआ तथा कविर्देव अगम लोक का भी स्वामी है तथा वहाँ इनका उपमात्मक पदवी का नाम अगम पुरुष अर्थात् अगम प्रभु है। इसी अगम प्रभु का मानव सदृश शरीर बहुत तेजोमय है जिसके एक रोम कूप की रोशनी खरब सूर्य की रोशनी से भी अधिक है। यह पूर्ण परमात्मा कविर्देव अथार्त कबिर देव अथार्त कबीर परमेश्वर अलख लोक में प्रकट हुआ तथा स्वयं ही अलख लोक का भी स्वामी है तथा उपमात्मक नाम अलख पुरुष भी इसी परमेश्वर का है तथा इस पूर्ण प्रभु का मानव सदृश शरीर तेजोमय स्वयं प्रकाशित है। एक रोम कूप की रोशनी अरब सूर्यों के प्रकाश से भी ज्यादा है। यही पूर्ण प्रभु सतलोक में प्रकट हुआ तथा सतलोक का भी अधिपति यही है। इसलिए इसी का उपमात्मक नाम सतपुरुष है। इसी का नाम अकालमूर्ति - शब्द स्वरूपी राम - पूर्ण ब्रह्म - परम अक्षर ब्रह्म आदि हैं। इसी सतपुरुष कविर्देव अथार्त कबीर प्रभु का मानव सदृश शरीर तेजोमय है। जिसके एक रोमकूप का प्रकाश करोड़ सूर्यों तथा इतने ही चन्द्रमाओं के प्रकाश से भी अधिक है। सतलोक में अन्य रचना - इस कविर्देव अथार्त कबीर प्रभु ने सतपुरुष रूप में प्रकट होकर सतलोक में विराजमान होकर प्रथम सतलोक में अन्य रचना की। एक शब्द वचन से सोलह द्वीपों की रचना की। फिर सोलह शब्दों से सोलह पुत्रों की उत्पत्ति की। एक मानसरोवर की रचना की जिसमें अमृत भरा। सोलह पुत्रों के नाम हैं:-(1) ‘‘कूर्म’’, (2)‘‘ज्ञानी’’, (3) ‘‘विवेक’’, (4) ‘‘तेज’’, (5) ‘‘सहज’’, (6) ‘‘सन्तोष’’, (7)‘‘सुरति’’, (8) ‘‘आनन्द’’, (9) ‘‘क्षमा’’, (10) ‘‘निष्काम’’, (11) ‘जलरंगी‘ (12)‘‘अचिन्त’’, (13) ‘‘पे्रम’’, (14) ‘‘दयाल’’, (15) ‘‘धैर्य’’ (16) ‘‘योग संतायन’’ अर्थात् ‘‘योगजीत‘‘ है। सतपुरुष कविर्देव ने अपने पुत्र अचिन्त को सत्यलोक की अन्य रचना का भार सौंपा तथा शक्ति प्रदान की। अचिन्त ने अक्षर पुरुष अथार्त परब्रह्म की शब्द से उत्पत्ति की तथा कहा कि मेरी मदद करना। अक्षर पुरुष स्नान करने मानसरोवर पर गया, वहाँ आनन्द आया तथा सो गया। लम्बे समय तक बाहर नहीं आया। तब अचिन्त की प्रार्थना पर अक्षर पुरुष को नींद से जगाने के लिए कविर्देव अथार्त कबीर परमेश्वर ने उसी मानसरोवर से कुछ अमृत जल लेकर एक अण्डा बनाया तथा उस अण्डे में एक आत्मा प्रवेश की तथा अण्डे को मानसरोवर के अमृत जल में छोड़ा। अण्डे की गड़गड़ाहट से अक्षर पुरुष की निंद्रा भंग हुई। उसने अण्डे को क्रोध से देखा जिस कारण से अण्डे के दो भाग हो गए। उसमें से ज्योति निंरजन अथार्त क्षर पुरुष निकला जो आगे चलकर ‘काल‘ कहलाया। इसका वास्तविक नाम ‘‘कैल‘‘ है। तब सतपुरुष अथार्त कविर्देव ने आकाशवाणी की कि आप दोनों बाहर आओ तथा अचिंत के द्वीप में रहो। आज्ञा पाकर अक्षर पुरुष तथा क्षर पुरुष कैल दोनों अचिंत के द्वीप में रहने लगे। बच्चों की नालायकी उन्हीं को दिखाई कि कहीं फिर प्रभुता की तड़फ न बन जाए, क्योंकि समर्थ बिन कार्य सफल नहीं होता। फिर पूर्ण धनी कविर्देव ने सर्व रचना स्वयं की। अपनी शब्द शक्ति से एक राजेश्वरी राष्ट्री शक्ति उत्पन्न की, जिससे सर्व ब्रह्मण्डों को स्थापित किया। इसी को पराशक्ति परानन्दनी भी कहते हैं। पूर्ण ब्रह्म ने सर्व आत्माओं को अपने ही अन्दर से अपनी वचन शक्ति से अपने मानव शरीर सदृश उत्पन्न किया। प्रत्येक हंस आत्मा का परमात्मा जैसा ही शरीर रचा जिसका तेज सोलह सूर्यों जैसा मानव सदृश ही है। परन्तु परमेश्वर के शरीर के एक रोम कूप का प्रकाश करोड़ों सूर्यों से भी ज्यादा है। बहुत समय उपरान्त क्षर पुरुष अथार्त ज्योति निरंजन ने सोचा कि हम तीनों अचिन्त, अक्षर पुरुष, क्षर पुरुष एक द्वीप में रह रहे हैं तथा अन्य एक-एक द्वीप में रह रहे हैं। मैं भी साधना करके अलग द्वीप प्राप्त करूँगा। उसने ऐसा विचार करके एक पैर पर खड़ा होकर सत्तर युग तक तप किया। कबीर साहेब से ये भी प्रमाण मिलता है क़ि अपने कार्य में गफलत करने के कारण और क्षर पुरुष को क्रोध से देखने का अपराध करने के कारण अक्षर पुरुष अथार्त परब्रह्म को भी सतलोक से निकल दिया गया। दूसरा कारण अक्षर पुरुष अथार्त परब्रह्म अपने साथी ब्रह्म अथार्त क्षर पुरुष की विदाई में व्याकुल होकर परमपिता कविर्देव अथार्त कबीर परमेश्वर की याद भूलकर उसी को याद करने लगा। क्षर पुरुष क़ि याद और अलग राज्य क़ि चाह के कारण उसे भी सतलोक से निष्कासित करना पड़ा। इस प्रकार, सृष्टि रचना पूर्ण हुई और परब्रह्म के सात संख ब्रह्माण्ड तथा क्षर ब्रह्म अथार्त ज्योति-निरंजन, अथार्त काल के २१ ब्रह्मांडो की स्थापना हुई और जीवन का प्रारम्भ हुआ। ब्रह्माण्ड और सृष्टि की संरचना की सम्पूर्ण और विस्तृत जानकारी पूर्ण परमात्मा कबीर साहिब जी ने अपनी पवित्र अमृतवाणी में स्वयं भी बताई है और सर्व धर्म ग्रंथों में इसके प्रमाण हैं जिन्हे जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने खोल कर दिखाया है जिससे सोये हुए मानव समाज को नई दिशा प्राप्त हुई है। आप स्वयं भी इन प्रमाणों को अपने धार्मिक ग्रंथों जैसे पवित्र वेद, पुराण, पवित्र गीता जी, पवित्र बाइबल, पवित्र श्री गुरु ग्रन्थ साहिब, पवित्र क़ुरान शरीफ, पवित्र कबीर सागर, सूक्षमवेद, भविष्यपुराण आदि से मिला कर जांच सकते हैं। Factful Debates YouTube Channel #sant ram pal ji maharaj #me follow
Vijay Dass
284 ने देखा
#GodMorningTuesday #2026_की_सबसे_बड़ी_भविष्यवाणी . ज्ञान चर्चा कबीर साहिब व धर्म दास परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि हे धर्मदास! मैं आसमान के ऊपर सतलोक में रहता हूँ। पृथ्वी पर भी बैठा हूँ। आपके दिल में अज्ञान छाया है। आप मुझे पहचानने में धोखा खा रहे हो। मेरा तेरे जैसा शरीर नहीं है। मैं गृहस्थी हूँ क्योंकि अनंत ब्रह्माण्ड मेरा परिवार है। मेरे कारण ही सृष्टि में अमन-चैन यानि शांति है। मेरे पास मोक्ष का गुप्त मंत्रा है। हे धर्मदास! यह मेरी निशानी जान ले कि मैं भक्ति का गुप्त नाम प्रकट करता हूँ। परमात्मा के बिना यह गुप्त नाम कोई नहीं जानता। ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त नं. 95 मंत्र नं. 2 में कहा है कि परमात्मा अपने मुख से वाणी बोलकर भक्ति की प्रेरणा करता है। परमात्मा भक्ति के गुप्त नाम का आविष्कार करता है। कबीर परमात्मा ने कहा है कि सोहं शब्द हम जग में लाए। सारशब्द हम गुप्त छुपाए।।} न तो मेरा जन्म होता है, न मेरी मृत्यु होती है। सतलोक में गर्मी व सर्दी नहीं है। सदा बसंत रहती है। शब्द की शक्ति से विहंगम मार्ग से सतलोक जाया जाता है। बाबा जिंदा वेशधारी परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि हे धर्मदास! मेरा शरीर श्वांस उश्वांस वाला नहीं है। मेरा पाँच तत्त्व का शरीर नहीं है। मैं कभी माता के गर्भ में नहीं आता। माता-पिता के संयोग से मेरा जन्म कभी नहीं हुआ। हे धर्मदास! आप विष्णु जी की भक्ति करते हो, यह तो नाशवान है। इसकी मृत्यु होती है। आप जो गीता पढ़ रहे थे। इसमें देखो! आपका कृष्ण उर्फ विष्णु स्वयं कह रहा है कि हे अर्जुन! तेरे और मेरे बहुत जन्म हो चुके हैं। तू नहीं जानता, मैं जानता हूँ। अविनाशी तो उसे जान जिसे कोई मार नहीं सकता जिससे सर्व संसार व्याप्त है। (गीता अध्याय 2 श्लोक 12 तथा 17, गीता अध्याय 4 श्लोक 5, गीता अध्याय 10 श्लोक 2 में। गीता-ज्ञान दाता ने कहा है कि हे अर्जुन! तू सर्वभाव से उस परमेश्वर की शरण में जा जिसकी कृपया से तू परम शांति को तथा सनातन परम धाम को प्राप्त होगा। गीता अध्याय 18 श्लोक 62 गीता-ज्ञान दाता ने कहा है कि तत्त्वज्ञानी संत मिल जाए तो उससे तत्त्वज्ञान समझने के पश्चात् परमेश्वर के उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहाँ जाने के पश्चात् साधक कभी लौटकर संसार में नहीं आता। जिस परमेश्वर से संसार वृक्ष की प्रवृति विस्तार को प्राप्त हुई है यानि जिस परमात्मा ने सृष्टि की उत्पत्ति की है, उसकी भक्ति कर।गीता अध्याय 15 श्लोक 4 गीता-ज्ञान दाता ने कहा है कि हे अर्जुन! इस संसार में दो पुरूष हैं। एक क्षर पुरूष, दूसरा अक्षर पुरूष। इन दोनों प्रभुओं के अंतर्गत जितने प्राणी हैं, सब नाशवान हैं। ये दोनों (पुरूष) प्रभु भी नाशवान हैं। आत्मा किसी की नहीं मरती। गीता अध्याय 15 श्लोक 16। गीता-ज्ञान दाता ने कहा है कि उत्तम पुरूष अथार्त श्रेष्ठ पुरूष यानि पुरूषोत्तम तो इन दोनों से अन्य ही है जो परमात्मा कहा जाता है जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता रहता है। वह वास्तव में अविनाशी परमेश्वर है। गीता अध्याय 15 श्लोक 17 कबीर साहेब ने कहा कि धर्मदास! कृष्ण उर्फ विष्णु तो अन्य परमेश्वर को अविनाशी कह रहा है। उसी की शरण में जाने का निर्देश दे रहा है। क्या आप जानते हैं, वह परमेश्वर कौन है? मैं जानता हूँ। परमेश्वर के मुख कमल से गीता का गूढ़ रहस्य सुनकर धर्मदास स्तब्ध रह गया। उसको सब श्लोक याद थे, परंतु अभिमानवश हार मानने को तैयार नहीं था। कहा कि तुम मुसलमान हो। जीव हिंसा करते हो। हम कोई जीव हिंसा नहीं करते। सदा धर्म करते हैं। तुम पाप करते हो। कभी मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते। मैं आपकी कोई बात सुनने को तैयार नहीं हूँ। धर्मदास जी ने कहा कि हे जिन्दा! तू अपनी जुबान बन्द कर ले, मुझसे और नहीं सुना जाता। जिन्दा रुप में प्रकट परमेश्वर ने कहा, हे वैष्णव महात्मा धर्मदास जी! सत्य इतनी कड़वी होती है जितना नीम, परन्तु रोगी को कड़वी औषधि न चाहते हुए भी सेवन करनी चाहिए। उसी में उसका हित है। यदि आप नाराज होते हो तो मैं चला। इतना कहकर परमात्मा जिन्दा रुप धारी अन्तर्ध्यान हो गए। धर्मदास को बहुत आश्चर्य हुआ तथा सोचने लगा कि यह कोई सामान्य सन्त नहीं था। यह पूर्ण विद्वान लगता है। मुसलमान होकर हिन्दू शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान है। यह कोई देव हो सकता है। धर्मदास जी अन्दर से मान रहे थे कि मैं गीता शास्त्र के विरुद्ध साधना कर रहा हूँ। परन्तु अभिमानवश स्वीकार नहीं कर रहे थे। जब परमात्मा अन्तर्ध्यान हो गए तो पूर्ण रुप से टूट गए कि मेरी भक्ति गीता के विरुद्ध है। मैं भगवान की आज्ञा की अवहेलना कर रहा हूँ। मेरे गुरु श्री रुपदास जी को भी वास्तविक भक्ति विधि का ज्ञान नहीं है। अब तो इस भक्ति को करना, न करना बराबर है, व्यर्थ है। बहुत दुखी मन से इधर-उधर देखने लगा तथा अन्दर से हृदय से पुकार करने लगा कि मैं कैसा नासमझ हूँ। सर्व सत्य देखकर भी एक परमात्मा तुल्य महात्मा को अपनी नासमझी तथा हठ के कारण खो दिया। हे परमात्मा! एक बार वही सन्त फिर से मिले तो मैं अपना हठ छोड़कर नम्र भाव से सर्वज्ञान समझूंगा। दिन में कई बार हृदय से पुकार करके रात्रि में सो गया। सारी रात्रि करवट लेता रहा। सोचता रहा हे परमात्मा! यह क्या हुआ। सर्व साधना शास्त्रविरुद्ध कर रहा हूँ। मेरी आँखें खोल दी उस फरिस्ते ने। मेरी आयु 60 वर्ष हो चुकी है।धर्मदास जी की संतान द्वारा लिखी पुस्तक में 89 वर्ष आयु लिखी है। जो भी है, हमने तत्त्वज्ञान समझना है। अब पता नहीं वह देव पुनः मिलेगा कि नहीं। Factful Debates YouTube Channel #sant ram pal ji maharaj #me follow
Vijay Dass
357 ने देखा
#GodMorningTuesday #2026_की_सबसे_बड़ी_भविष्यवाणी . आदि सनातन पंथ आदि सनातन पंथ अथार्त धर्म अनादि काल से चला आ रहा है। सनातन धर्म से पूर्व का धर्म आदि सनातन धर्म कहलाता है। आदि सनातन धर्म' से उत्पन्न हुए सनातन धर्म से ही अन्य धर्मों की उत्पत्ति हुई है। संस्कृत के पुरातन कोष में कहीं पर हिन्दु शब्द नहीं लिखा है। कालांतर में सनातन धर्म को ही हिन्दू धर्म कहा जाने लगा। सनातन धर्म का आधार पुराण है तथा आदि सनातन धर्म' का आधार चार वेद तथा सूक्ष्मवेद है। गीता जी चारो वेदों का सार है। वेदों का ज्ञान ब्रह्मा जी ने ऋषि महर्षियों को दिया और ऋषियों ने उसमें अपना अनुभव मिला कर अपने अनुभव का बोध पुराणों को रचा। उसी आधार से जनमानस भक्ति साधना करने लगा। इसलिए सनातन धर्म का भक्ति आधार पुराण है। तथा आदि सनातन धर्म को पूर्ण परमात्मा कविर्देव अथार्त कबीर साहिब प्रत्येक युग में संत ऋषि रूप में प्रकट होकर वेद तथा सूक्ष्मवेद अथार्त कबीर साहिब के मुख कमल से बोली वाणी के आधार पर प्रकट है। लेकिन अज्ञानता व काल प्रेरणा वश मानव समाज उस तत्वज्ञान को स्वीकार नहीं कर पाता। परमात्मा को नहीं पहचान पाने तथा नकली गुरुओं आचार्यों द्वारा गुमराह करने के कारण अधिक विस्तार नहीं हो पाता। सनातन धर्म की साधना ॐ मंत्र तक सीमित है और यही सनातन धर्मियों का अंतिम मंत्र है। तथा आदि सनातन धर्म की साधना का मंत्र ॐ तत् सत् है, सांकेतिक है। इन तीनों मंत्र की साधना की विधि भी अलग-अलग है। ॐ मंत्र सनातन धर्मियों का अंतिम मंत्र है। उससे नीचे के जितने भी मंत्र ऋषियों ने खोज कर बनाये उनसे सिद्धियां प्राप्त हुई, मोक्ष नहीं मिला। वस्तुतः पूर्ण मोक्ष ॐ मंत्र के जाप से नहीं है। ॐ मंत्र से अधिकतम ब्रह्मलोक पाया जा सकता है, पुनरावृत्ति बनी रहेगी। सनातन धर्म में देवी-देवताओं की पूजा का विधान है व मोक्ष प्राप्त करने की अन्य विधि बताई जाती है। सच्चाई यह है कि "आदि सनातन धर्म" के मोक्ष के अलावा किसी भी प्रकार का मोक्ष पूर्ण नहीं है। पूर्ण मोक्ष सिर्फ "आदि सनातन धर्म" की साधना से ही प्राप्त किया जा सकता है। अन्य किसी भी साधना से क्षणिक लाभ या अधूरा मोक्ष है। "आदि सनातन धर्म" की साधना को करने के लिए सनातन धर्म के ॐ मंत्र के जाप के आगे अन्य प्रमुख पाँच देवी-देवताओं के मंत्र जाप के साथ उनका आदर भी जरूरी है। "आदि सनातन धर्म" की साधना में सनातन धर्म के मूल देवी-देवताओं की जरूरत पड़ती है। उनके यथार्थ मंत्रों की साधना करके कर्जा उतार कर पूर्ण मोक्ष की राह पायी जाती है। सनातन धर्म की साधना से सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती है। इतिहास में वर्णन है कि सिद्धियों का सदुपयोग कम और दुरुपयोग अधिक हुआ है। अतः सिद्धियों को प्राप्त करना "आदि सनातन धर्म" की साधना नहीं है, अपितु अपना निज स्थान अर्थात् शाश्वत स्थान सतलोक प्राप्त करने के लिए यह साधना की जाती है। संत रामपालजी महाराज "आदि सनातन धर्म" के उपासक हैं व आदि सनातन धर्म की दीक्षा देते हैं। संत रामपाल जी महाराज देवी देवताओं को पूर्ण आदर देने तथा पूर्णब्रह्म की पूजा करने की बात करते हैं। यह पूर्ण मोक्ष के लिए जरूरी है। सतगुरू रामपाल जी महाराज कोई नया धर्म खड़ा नहीं कर रहे अपितु सभी धर्मों का मूल "आदि सनातन धर्म" की यथार्थता को बता रहे हैं। उसी 'आदि सनातन धर्म' के रास्ते पर चलकर हम मानवता भाईचारा उत्पन्न कर सकते हैं। पूर्ण सन्त रामपाल जी महाराज ने आदि सनातन धर्म की पुनः स्थापना की है। उनका नारा है कि जीव हमारी जाति है, मानव धर्म हमारा। हिंदु मुस्लिम सिक्ख ईसाई, धर्म नहीं कोई न्यारा।। Factful Debates YouTube Channel #sant ram pal ji maharaj #me follow
Vijay Dass
233 ने देखा
#GodMorningTuesday #2026_की_सबसे_बड़ी_भविष्यवाणी . अधम सुल्तान बलख बुखारे का बादशाह सब तज के निज लिया फकीरी, अल्लाह नाम प्यारे का। खाते जा मुख लुकमा उमदा, मिसरी कन्द छुहारे का। सो अब खाते रूखा सूखा, टुकड़ा शाम सकारे का। जिस तन पहने खासा मलमल, तीन टंक नौ तारे का। सो अब भार उठावन लागे, गुद्दर सेर दस भारे का। चुन चुन कलियां सेज बिछाई, फूलां न्यारे न्यारे का। सो अब शयन करें धरती पर, कंकर नहीं बुहारे का। जिनके संग कटक दल बादल, झंडा न्यारे - न्यारे का। कहें कबीर सुनो भाई साधो, फक्कड़ हुआ अखाड़े का। Factful Debates YouTube Channel #sant ram pal ji maharaj #me follow
Vijay Dass
612 ने देखा
#GodMorningTuesday #2026_की_सबसे_बड़ी_भविष्यवाणी . #वाणी गर्भ उत्पत्ती का अद्भुत रहस्य धर्मदास एक कथा सुनाऊँ,अद्भुत सत्य अब तुम्हें बताऊ। सबही जीव गर्भ में जावैं, कौल बान्ध कै बाहर धावैं। चूके कौल गरभ का भाई, बारम्बार गरभ में जाई। नौ नाथ सिद्धि चौरासी भारी, उनहूँ देह गरभमें धारी। नौ अवतार विष्णु जो लीन्हा, उनहूँ ‌ गर्भ वसेरा कीन्हा। तेतिस किरोडी देव कहाये, गर्भ वास महँ ‌ देह बनाये। जोगी जंगम औ तप धारी, गर्भ वास में देह सवाँरी। गर्भ वास तब छूटे भाई, जब समरथ गुरू बाहँ गहाई। ओंधे मुख झूले लटकंता, मैल बहुत तहँ कीच रहंता। जठराग्नि तहं बहुत सतावै, संकट गर्भ तहँ अन्त न आवै। महा दुःख सो गरभ में पावे, बहुत बैराग हियामें आवे। जब जीव गर्भमें ज्ञान बिचारा,अब मैं सुमरूं सिरजन हारा। सोच मोह विज कछू न कीजै,अब सद्गुरू का शरणा लीजै। जिव अपने दिल माहि बिचारे,तब समर्थ को कीन पुकारे। बहुत सांकरी पिंजर पोई,तड़फडै़ बहुत निकसे नहिं जोई। मुखसों बोल निकसनहिं आवै विलापकर मनमे पछितावै। तादुख गति कासु कहीजै, कर्म उन्मान तहैं दुःख सहीजै। अब दुःख दूर निवारो स्वामी,कौल करूँ प्रभु अन्तरयामी। बाहर निकारो आदि सनेही, बहु दुःख पावै मेरी देही। मैं जन प्रभुको दास कहाऊँ, आन देव के निकट न जाऊँ। सतगुरूका होय रहों मैं चेरा, दम दम नाम उचारूँ तेरा। नित उठ गुरू चरणामृत लेऊँ,तन मन धनै निछावर देऊँ। जो मैं तन सों करूँ कमाई, अर्धमाल मैं गुरूहि चढाई। कुबुद्धि सीख काहू नहिं मानूं,हराम माल जहर करिजानूं। कुलकी त्यागूँ मान बडाई, निर्मल ज्ञान एक संत सगाई।। रात दिवस ऐसे लव लाऊँ,करत फुरत भक्ति गुरू कराऊँ। दुःख सुख परे सो तनसे सहूँ, भक्ति द्दढै गुरू चरणै रहू। यहां कोई मित्रा नहिं भाई, मातु पिता नहिं लोग लुगाई। देवी देव की कछू न चालै, गुरू बिन कौन करै प्रतिपालै। अब तो खबर परी यहि ठाहीं, और कोईकी चालै नाहीं। पिछली बात मैं हृदय जानी,कोई काहूका नहीं रे प्राणी। मद माया में जीव भरमाया। सो तो कोई काम न आया। बहुत विचार किया मैं सोई, अन्तकाल अपनो नहिं कोई। ऐसी करूणा करै विचारा, दया करो दुःख भंजर हारा। तीनलोक जीव काल सतावै,ब्रह्मा विष्णु शिवपार न पावै। सत्यपुरुष तब मोहीं पठावा, जीव उबारन मैं जग आवा। Factful Debates YouTube Channel #sant ram pal ji maharaj #me follow
Vijay Dass
526 ने देखा
#GodMorningTuesday #2026_की_सबसे_बड़ी_भविष्यवाणी . #शब्द जाग जाग जंजाली जियरा, यह तो मेला हाट का...। धोबी घर के कुत्ता होइहौ, नहिं घर का न घाट का...। खानिन भ्रमत अमित दुख पाय, मानुष तन हाथ का। माथे भार धरयो ममता का, मानो घोड़ा भाँट का....। ‌जाग जाग जंजाली जियरा, यह तो मेला हाट का....। धोबी घर के कुत्ता होइहौ, नहिं घर का न घाट का...। दुनिया दौलत माल खजाना, जामा दरकस पाट का। सोने रूप भंडार भरे हैं, धरा सन्दूखा काठ का.......। जाग जाग जंजाली जियरा, यह तो मेला हाट का....। धोबी घर के कुत्ता होइहौ, नहिं घर का न घाट का...। मातु पिता सुत बन्धु सहोदर कुटुम्ब कबीला ठाट का। अन्त की बेरिया चला अकेला, मानो बटोही बाट का। जाग जाग जंजाली जियरा, यह तो मेला हाट का...। धोबी घर के कुत्ता होइहौ, नहिं घर का न घाट का...। आये सन्त आदर न कीन्हों, धंधा किहो घर घाट का। कहे कबीर सुनो भाई साधो, भयो किरौना खाट का। जाग जाग जंजाली जियरा, यह तो मेला हाट का...। धोबी घर के कुत्ता होइहौ, नहिं घर का न घाट का...। Factful Debates YouTube Channel #sant ram pal ji maharaj #me follow
Vijay Dass
534 ने देखा
#GodMorningTuesday #2026_की_सबसे_बड़ी_भविष्यवाणी . कबीर साहिब जी ही सत्य पुरूष ‌हैं बौलै जिंद कबीर, सुनौ मेरी बाणी धर्मदासा। हम खालिक हम खलक, सकल‌ हमरा प्रकाशा।। हमहीं से चंद्र अरू सूर, हमही से पानी और पवना। हमही से धरणि आकाश, रहैं हम चौदह भवना।। हम रचे सब पाषान नदी यह सब खेल हमारा। अचराचर चहुं खानि, बनी बिधि अठारा भारा।। हमही सृष्टि संजोग, बिजोग ‌ किया बोह भांती। हमही आदि अनादि, हमैं अबिगत कै नाती।। हमही माया मूल है, हमही हैं ब्रह्म‌ उजागर। हमही अधरि बसंत, हमहि हैं सुख कै‌ सागर।। हमही से ब्रह्मा बिष्णु,‌ ईश है कला हमारी। हमही पद प्रवानि, कलप कोटि जुग तारी।। हमही साहिब सत्य पुरूष ‌हैं,यह सब रूप हमार। जिंद कहै धर्मदास सैं, शब्द ‌ सत्य घनसार।। हे धर्मदास! आपने जो भक्त बताए हैं, वे पूर्व जन्म के परमेश्वर के परम भक्त थे। सत्य साधना किया करते थे जिससे उनमें भक्ति-शक्ति जमा थी। किसी कारण से वे पार नहीं हो सके। उनको तुरंत मानव जन्म मिला। जहाँ उनका जन्म हुआ, उस क्षेत्रा में जो लोकवेद प्रचलित था, वे उसी के आधार से साधना करने लगे। जब उनके ऊपर कोई आपत्ति आई तो उनकी इज्जत रखने व भक्ति तथा भगवान में आस्था मानव की बनाए रखने के लिए मैंने वह लीला की थी। मैं समर्थ परमेश्वर हूँ। यह सब सृष्टि मेरी रचना है। हम (खालिक) संसार के मालिक हैं। (खलक) संसार हमसे ही उत्पन्न है। हमने यानि मैंने अपनी शक्ति से चाँद, सूर्य, तारे, सब ग्रह तथा ब्रह्माण्ड उत्पन्न किए हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश की आत्मा की उत्पत्ति मैंने की है। हे धर्मदास! मैं सतपुरूष हूँ। यह सब मेरी आत्माएँ हैं जो जीव रूप में रह रहे हैं। यह सत्य वचन है। Factful Debates YouTube Channel #sant ram pal ji maharaj #me follow
Vijay Dass
471 ने देखा
#GodMorningTuesday #2026_की_सबसे_बड़ी_भविष्यवाणी . परमात्मा पत्थर नहीं जिंदा है बोलत है धर्मदास, सुनौं जिंदे मम बाणी। कौन तुम्हारी जाति, कहां सैं आये प्राणी।। ये अचरज की बात, कही तैं मो सैं लीला। नामा के पीया दूध, पत्थर सैं करी करीला। नरसीला नित नाच, पत्थर के आगै रहते। जाकी हूंडी झालि, सांवल जो शाह कहंते।। पत्थर सेयै रैंदास, दूध जिन बेगि पिलाया। सुनौ जिंद जगदीश, कहां तुम ज्ञान सुनाया।। परमेश्वर प्रवानि, पत्थर नहीं कहिये जिंदा। नामा की छांनि छिवाई, दइ देखो सर संधा।। सिरगुण सेवा सार है, निरगुण सें नहीं नेह। सुन जिंदे जगदीश तूं, हम शिक्षा क्या देह।। धर्मदास जी कुछ नाराज होकर परमेश्वर से बोले कि हे (प्राणी) जीव! तेरी जाति क्या है? कहाँ से आया है? आपने मेरे से बड़ी (अचरज) हैरान कर देने वाली बातें कही हैं, सुनो! नामदेव ने पत्थर के देव को दूध पिलाया। नरसी भक्त नित्य पत्थर के सामने नृत्य किया करता यानि पत्थर की मूर्ति की पूजा करता था। उसकी (हूंडी झाली) ड्रॉफ्ट कैश किया। वहाँ पर सांवल शाह कहलाया। रविदास ने पत्थर की मूर्ति को दूध पिलाया। हे जिन्दा! तू यह क्या शिक्षा दे रहा है कि पत्थर की पूजा त्याग दो। ये मूर्ति परमेश्वर समान हैं। इनको पत्थर न कहो। नामदेव की छान (झोंपड़ी की छत) छवाई (डाली)। देख ले परमेश्वर की लीला। हम तो सर्गुण (पत्थर की मूर्ति जो साक्षात आकार है) की पूजा सही मानते हैं। निर्गुण से हमारा लगाव नहीं है। हे जिन्दा! मुझे क्या शिक्षा दे रहा है? Factful Debates YouTube Channel #sant ram pal ji maharaj #me follow
See other profiles for amazing content