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साहिब जय बंदीछोड़
गरीब
यौह माटी का महल है, छार मिलै क्षण माहि। चार सख्स कांधै धरें, मरहट कूँ ले जाहि
▲ सत् साहिब
बंदीछोड़ गरीबदास साहिब जी अपनी वाणी में फरमाते है कि यह मानव शरीर केवल माटी का बना हुआ महल जितना भी सौंदर्य, बल या अभिमान क्यों न हो, क्षण भर में यह मिट्टी में मिल जाता है। प्राण निकलने पर वह हम “मैं” कहते थे, उसे चार व्यक्ति कंधे पर उठाकर श्मशान (मरघट) की ओर ले जाते हैं। तब न कोई अपना यहीं छूट जाता है। यह जीवन अस्थायी है; स्थायी केवल आत्मा और परमात्मा का स्मरण है। मनुष्य को देह-अि
भक्ति, सदाचार और आत्मज्ञान की ओर ध्यान देना चाहिए।