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Ram Niwas
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Ram Niwas
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2 घंटे पहले
#GodMorningSunday #सुदामा_कृष्णजीके_भक्त_नहींथे . ॐ मन्त्र ॐ मन्त्र काल ब्रह्म का है। काल ब्रह्म मृतलोक के इक्कीस ब्रह्माण्ड का स्वामी है। इसको ज्योतनिरंजन अथार्त ओंकार भी कहते है। काल भगवान इन इक्कीस ब्रह्माण्ड के टोप फ्लोर पर महास्वर्ग का निर्माण कर रखा है उसमे रहता है। ॐ मन्त्र का जाप करने वाले साधक महास्वर्ग तक जा सकते है। महास्वर्ग भी पुनरावर्ती मे है। साधक को फिर अपनी की साधना की कमाई को समाप्त करके इस पृथ्वी पर आना पडेगा। ंगीता जी अध्याय 8के श्लोक 13मे कहा है कि ओम इती एकाक्षरम ब्रम्ह, व्याहरन माम् अनुस्मरन्। य: प्रयाति त्यजन् देहम् स: याती परमाम् गतिम्।। अथार्त गीता बोलने वाला ब्रम्ह अर्थात काल कह रहा है कि (माम् ब्रम्ह) मुझ ब्रम्ह का तो (इति) यह (ओम एकाक्षरम्) ॐ एक अक्षर है (व्याहरन्) उच्चारण करके (अनुस्मरन्) स्मरण करने का (य:) जो साधक (त्यजन् देहम्) शरीर त्यागने तक अर्थात अन्तिम स्वांस तक (प्रयाति) स्मरण साधना करता है (स:) वह साधक ही मेरे वाली (परमाम् गतिम्) परमगति को (याति) प्राप्त होता है।गीता जी के अध्याय 08 श्लोक 13 के अनुसार गीता ज्ञान दाता कह रहा है, की मेरा "ॐ" मंत्र है। जो साधक अंत समय तक ईस "ॐ" एकाक्षरी मंत्र की साधना करता है उस साधक को मेरे वाली परमगती को प्राप्त होता है। परन्तु ब्रह्मलोक भी स्थाइ नही है। ब्रह्म लोक का भी नाश होता है। वो है ब्रम्ह लोक के बारे मे पर गीता ज्ञान दाता अध्याय 08 के श्लोक 16 में कह रहा है कि आब्रम्हभुवनात् लोका:, पुनरावर्तिन:, अर्जुन..! माम्, उपत्य, तु, कौन्तेय, पुनर्जन्म, न विद्यते।। अथार्त (अर्जुन) हे अर्जुन!(आब्रम्हभुवनात्) ब्रम्ह लोक से लेकर (लोका:) सब लोक (पुनरावर्तिन:) पुनरावृत्ती में है,बारम्बार उत्पत्ति नाश वाले हैं (तु) परंतु (कौन्तेय) हे कुंती पुत्र (न, विद्यते) जो यह नहीं जानते वे (माम्) मुझे (उपत्य) प्राप्त होकर भी (पुन:) फिर (जन्म:) जन्मते है।गीता के अध्याय 08 के श्लोक 16 से स्पष्ट होता है कि, "ॐ" के जाप से मोक्ष प्राप्ति नहीं है ब्रम्ह लोक प्राप्ति है। 'श्रीमद्देवीभागवत' गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित है।इस पुराण में सातवा स्कंद अध्याय 36 में "देवी के द्वारा हिमालय को ज्ञानोपदेश- ब्रम्हस्वरुप का वर्णन" में श्री देवी कहती है कि हे सौम्य! उपनिषद में कथित महान अस्त्ररूप धनुष लेकर उसपर उपासना द्वारा तीक्ष्ण किया हुआ बाण संधान करो और फिर भावानुगत चित्त के द्वारा उस बाण को खींचकर उस अक्षर रुप ब्रम्ह को ही लक्ष बनाकर वेधन करो। प्रणव ॐ धनुष है, जीवात्मा बाण है और ब्रम्ह को उसका लक्ष्य कहा जाता है। इस आत्मा का ॐ के जपके साथ ध्यान करो। इससे अज्ञानमय अन्धकार से सर्वथा परे और संसार समुद्र से उस पार जो ब्रम्ह है, उसको पा जाओगे। वह यह सब का आत्मा ब्रम्ह लोक रूप दिव्य आकाश में स्थित है। अथार्त देवी भी कह रही है कि ॐ के जाप से ब्रम्ह लोक प्राप्ति है, उपर गीता कह रही है कि, ब्रम्ह लोक पर्यंत सभी पुनरावृत्ती मे है जन्मते मरते है, मोक्ष प्राप्ति नहीं है। यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्र 15 में ब्रम्ह साधना के लिए कहा है कि वायु: अनिलम् अमृतम् अथ इदम् भस्मान्तम् शरीरम्। ओम कृतम् स्मर, किलबे स्मर कृतु: स्मर।। अथार्त ब्रम्ह साधना का ॐ नाम है। इससे मिलने वाला अमृतम् अर्थात मोक्ष प्राप्ति के लिए, ब्रम्ह लोक प्राप्ति के लिए ॐ का जाप (वायु: अनिलम्) श्वास उश्वांस से पूरी लगन के साथ शरीर नष्ट होने तक (क्रतम्) कार्य करते करते स्मरण कर, पूरी कसक अर्थात किलबिलाहट यांनी विलाप जैसी स्थिति से कर, मनुष्य जीवन का मूल कार्य जानकर स्मरण कर। इस यजुर्वेद अध्याय 40 के मंत्र 15 में कहा है ॐ के जाप से ब्रम्ह लोक प्राप्ति है। . गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में गीता ज्ञान दाता ब्रह्म ने कहा है कि हे भारत! तू सर्व भाव से उस परमेश्वर की शरण में जा। उस परमेश्वर की कृपा से ही तू परम शान्ति को तथा शाश्वत् स्थान (अमर लोक) को प्राप्त होगा। हमारे आध्यात्म मार्ग में विशेषकर दो प्रभुओं का महत्व है। प्रथम तो क्षर पुरुष (ब्रह्मकाल) का क्योंकि हम इसके लोक में फँसे हैं और हमने तीसरे प्रभु पर अक्षर पुरुष के लोक में जाना है जहाँ जाने के पश्चात् साधक लौटकर पुनः संसार में कभी नहीं आते। श्रीमद्भगवत गीता का ज्ञान श्री कृष्ण जी के शरीर में प्रवेश करके क्षर पुरुष (ब्रह्म) ने कहा है। गीता अध्याय 7 श्लोक 29 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि जो साधक जरा (वृद्धावस्था) तथा मरण से छुटकारा पाने के लिए प्रयत्न करते हैं अर्थात् केवल मोक्ष प्राप्ति के लिए ही साधना करते हैं, वे तत् ब्रह्म से सब कर्मों से तथा सम्पूर्ण अध्यात्म से परीचित हैं। (गीता अध्याय 7 श्लोक 29) गीता अध्याय 8 श्लोक 1 में अर्जुन ने पूछा कि ‘‘तत् ब्रह्म’’ क्या है उस का उत्तर गीता ज्ञान दाता ब्रह्म ने गीता अध्याय 8 श्लोक 3 में दिया। बताया कि वह ‘परम अक्षर ब्रह्म’ है। गीता अध्याय 15 श्लोक 16 में क्षर पुरुष और अक्षर पुरुष दो प्रभु बताए हैं। ये दोनों तथा इनके लोकों में जितने शरीरधारी प्राणी हैं, वे सब नाशवान हैं। जीवात्मा तो किसी की नहीं मरती। गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में कहा है कि उत्तम पुरुष अर्थात् पुरुषोत्तम तो उपरोक्त श्लोक 18 में कहे क्षर पुरुष तथा अक्षर पुरुष से अन्य ही है। उसी को ‘परमात्मा’ कहा गया। वहीं परमात्मा तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है, वह अविनाशी परमात्मा है। यह परम अक्षर ब्रह्म है। Factful Debates Yt Channel #🙏गुरु महिमा😇
Ram Niwas
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3 घंटे पहले
#GodMorningSunday #सुदामा_कृष्णजीके_भक्त_नहींथे . गुरू और शिष्य गुरू जी तुम ना भूलिओ, चाहे लाख लोग मिल जाहिं। हमसे तुमको बहोत हैं, दाता तुमसे हमको नाहिं।। कबीर साहिब जी गुरु जी महिमा हमे बताते है कि हे गुरू जी! आप हमको दृष्टि मत हटाना, चाहे आपके लाखों शिष्य हो जाएं। आपको तो हम जैसे शिष्य बहुत मिल जायेंगे पर आप जैसा गुरु हमको नही मिल सकता। गुरु एवं शिक्षक में अंतर है, उसी प्रकार शिष्य और विद्यार्थी में भी भिन्नता है। शिक्षक को उनका शुल्क देने पर विद्यार्थी एवं शिक्षक का हिसाब पूर्ण होता है, जबकि गुरु आत्मज्ञान देते हैं। इसलिए गुरु के लिए कुछ भी और जितना भी किया जाए कम ही है। बचपन में माता पिता हमारे लिए सब कुछ करते हैं, उसके बदले में हम उनके लिए जितना करें, कम ही है; उसी समान गुरु शिष्य का संबंध है । इस संसार में केवल गुरु-शिष्य का नाता ही पवित्र माना गया है। यही एक नाता खरा है। गुरु-शिष्य के संबंध केवल आध्यात्मिक स्वरूप के होते हैं। शिष्य को ‘मेरा उद्धार हो’, यही एक भान होना चाहिए। गुरु को एक ही भान रहता है कि ‘इसका उद्धार होना चाहिए। गुरु शिष्य का नाता आयु पर नहीं, अपितु ज्ञानवृद्धि और साधना वृद्धि पर आधारित होता है। जीवसृष्टि के सर्व प्राणि ज्ञान और साधना के माध्यम से अभिवृद्धि साध्य करते हैं । शेष समस्त नाते भय अथवा सामाजिक बंधनों के कारण उत्पन्न होते हैं। गुरू द्रोण ने एक वचन के कारण एकलव्य को धनुर्विधा नही दी थी। एकलव्य ने माटी से गुरू प्रतिमा बनाकर गुरू द्रोण को गुरू मान लिया और और धनुर्विधा में पांडवो से निपुर्ण हो गया। एक बार गुरू द्रोण ने उस से पुछा तुम्हारा गुरू कौन है एकलव्य ने सारी बात बता दी और गुरू द्रोण ने एकलव्य से गुरू दक्षिणा में अपने दाहिने हाथ का अगुंठा मांग लिया और एकलव्य ने अंगूठा काट कर दे भी दिया। हे गुरूदेव जी! आपका आदेश सिर आंखो पर। ये तो था शस्त्रविद्या के गुरू जी। आध्यात्मिक गुरू और शस्त्रविद्या व अक्षरज्ञान गुरू मे काफी अन्तर होता है। अक्षरज्ञान गुरू अपनी आजीविका के लिये कार्य करते है जबकि आध्यात्मिक गुरु अपना सबकुछ शिष्यो पर न्योछावर कर देते है। परमात्मा कबीर साहिब जी कहते है कि "गुरू वचन निश्चय कर माने, पुरे गुरू की सेवा ठाने" आध्यात्मिक गुरू के लिये इतना सरल और निर्मल शिष्य का गुरू जी के लिये भाव होना चाहिये। गुरू द्रोण तो शस्त्र विधा के गुरू थे यह अगर आध्यात्मिक गुरू के लिये होती तो भी गुरू वचन समर्पण से सब कुछ मिल जाता। जैसे सम्मन ने त्याग किया और फिर नौलखा बादशाह और सुल्तान अधम बना फिर भी बात वही बनी जब सतगुरू वचन पर रहे। " गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वरः गुरुः साक्षात्परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः" गुरुर ब्रह्मा : गुरु ब्रह्मा के समान हैं।गुरुर विष्णु : गुरु विष्णु के समान हैं। गुरुर देवो महेश्वरा : गुरु प्रभु महेश्वर के समान हैं। गुरुः साक्षात : सच्चा गुरु, आँखों के समक्ष परब्रह्म : सर्वोच्च ब्रह्म तस्मै : उस एकमात्र को गुरुवे नमः : उस एकमात्र सच्चे गुरु को मैं नमन करता हूँ।गुरू जी तुलना बह्मा, विष्णु, महेश से करी गयी है। पर इसी श्लोक मे गुरू जी को साक्षात परमबह्म बताया गया है। इसलिए गीता में कहा है 4/34 में तत्वदर्शी संत को खोजिए उनको दंडवत प्रणाम कर आधिनी से पुछिए, वो आपको तत्वज्ञान प्रदान करेगे। Factful Debates Yt Channel #🙏गुरु महिमा😇
Ram Niwas
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20 घंटे पहले
#🙏गुरु महिमा😇 दुनिया जिसे कृष्ण-सुदामा की महान मित्रता मानती है, क्या वह पूरी सच्चाई है? यदि सुदामा जी कृष्ण भक्त होते तो केवल 104 किमी दूर रहते हुए भी जीवनभर द्वारका जाने से क्यों बचते रहे?अधिक जानकारी के लिए देखिए कलयुग में सतयुग की शुरुआत — भाग 6 Factful Debates YouTube चैनल पर। ⤵️ https://youtu.be/l_6E15odM2Q?si=0gkR0M8zB2YheLu9
Ram Niwas
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1 दिन पहले
#🙏गुरु महिमा😇 सुदामा जी जीवनभर गरीबी में रहे, लेकिन उन्होंने कभी कृष्ण के पास जाकर सहायता नहीं माँगी। क्या यह दर्शाता है कि वे कृष्ण को अपना भगवान मानते ही नहीं थे?अधिक जानकारी के लिए देखिए कलयुग में सतयुग की शुरुआत — भाग 6 Factful Debates YouTube चैनल पर। ⤵️ https://youtu.be/l_6E15odM2Q?si=0gkR0M8zB2YheLu9
Ram Niwas
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1 दिन पहले
#🙏गुरु महिमा😇 यदि सुदामा जी श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त होते, तो क्या वे अपने आराध्य के दर्शन के लिए व्याकुल न रहते? आखिर क्यों उन्होंने कभी द्वारका जाकर कृष्ण से मिलने की इच्छा नहीं जताई?अधिक जानकारी के लिए देखिए कलयुग में सतयुग की शुरुआत — भाग 6 Factful Debates YouTube चैनल पर। ⤵️ https://youtu.be/l_6E15odM2Q?si=0gkR0M8zB2YheLu9
Ram Niwas
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1 दिन पहले
#🙏गुरु महिमा😇 आज भक्त अपने इष्ट के दर्शन के लिए हजारों किलोमीटर यात्रा करते हैं, लेकिन सुदामा जी तो मात्र 104 किमी दूर रहते हुए भी कृष्ण के पास नहीं गए। क्या यह सच्ची भक्ति का संकेत है?अधिक जानकारी के लिए देखिए कलयुग में सतयुग की शुरुआत — भाग 6 Factful Debates YouTube चैनल पर। ⤵️ https://youtu.be/l_6E15odM2Q?si=0gkR0M8zB2YheLu9
Ram Niwas
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2 दिन पहले
#GodNightThursday #Kalyug_Mein_SatyugKiShuruat6 . देवताओं की महिमा एक समय देवराज इन्द्र की पालकी को चार ऋषि उठाकर चल रहे थे। इन्द्र को अपनी रानी से विलास करने की प्रबल इच्छा हुई थी। वह कार्यालय से अपने महल को जा रहा था। उसको शीघ्र जाने की इच्छा थी। वासनावश अंधा हो रहा था। पालकी को ले जाने वाले एक ऋषि के पैर में लंग (कुछ लंगड़ापन) था। जिस कारण से पालकी धीरे चल रही थी। उस कामांध (स्त्री भोग के लिए विवेक नष्ट) इन्द्र ने उस ऋषि को लात दे मारी कि तू धीरे-धीरे क्यों चल रहा है? शीघ्र नहीं चला जाता। ऋषि को दुःख हुआ और पालकी छोड़ दी। इन्द्र को शॉप दे दिया कि पत्नी मिलन से पहले ही तेरी मृत्यु हो जाएगी। वही हुआ। पुराण में कथा है एक बार देवराज इंद्र ने अपने गुरु गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के साथ कुकर्म करने की योजना बनाई। जब रंगे हाथों गौतम ऋषि ने देखा तो इन्द्र को‌ श्राप दे दिया। देवताओं के राजा इंद्र के यह गुण धर्म लक्षण है तो अन्य देवताओं के आचरण और व्यवहार को आप भली-भांति समझ सकते हैं। अन्य देवताओं की कथा लिखने लगूँ तो एक पुस्तक अलग से तैयार हो जाएगी। समझदार को संकेत ही पर्याप्त होता है। पुराणों में ऋषि महर्षियों का इतिहास पढ़ने‌ को मिलता है कि परमात्मा पाने के लिए घर परिवार त्याग दिया। पूर्ण संत नहीं मिलने से वेद विरुद्ध हठ योग तप‌ किया जिससे पूर्ण परमात्मा की प्राप्ति तो नहीं हुई केवल सिद्धियाँ प्राप्त हो गयी। सिद्धियों से ऋषिजनों ने बहुत रक्तपात, हिंसा तथा अनर्थ किया। क्रोध में आकर श्राप देकर वंश के वंश उजाड़ दिए। जैसे दुर्वासा जी ने अपने शिष्य श्री कृष्ण जी के पोत्र द्वारा मजाक करने मात्र से सम्पूर्ण यादव कुल को श्राप देकर 56 करोड यादवों का कृष्ण‌ जी सहित विनाश कर दिया। चुणक ऋषि ने राजा मांधाता की 72 क्षौणी सेना का नाश कर दिया। कपिल मुनि ने राजा सगड़ के 60हजार पुत्रों को मार दिया। ऋषि विश्वामित्र ने वशिष्ठ जी से द्वेष वश 100 पुत्रों की हत्या कर दी। वशिष्ठ मुनि ने राजा निमि द्वारा पुरोहित नहीं बनाने पर क्रोध में आकर तत्क्षण मरने का श्राप दे दिया। तत्वज्ञान के अभाव में देवताओं तथा ऋषियों में अहंकार तथा मान बड़ाई की चाह सदा रही है। क्रोध भी चरम सीमा पर रहा। जिस कारण पांडवों की यज्ञ ऋषियों तथा देवताओं के भोजन करने से सफल नहीं हुई। वह भी परमात्मा कबीर साहिब जी (द्वापर में करुणामय नाम‌ से प्रकट) के शिष्य सुपच सुदर्शन के‌ भोजन खाने से पूर्ण हुई। श्री कृष्ण जी ने अपनी शक्ति से युधिष्ठिर को उन सभी ऋषियों, महामंडलेश्वरों के भविष्य के होने वाले जन्म दिखाएं जिसमें किसी ने कैंचवे का, किसी ने भेड़- बकरी, बिल्ली, कुत्ता, भैंस व शेर आदि के रूप बना रखे थे। पांडवों के यज्ञ में जब सभी ऋषियों, देवताओं तथा सर्व साधु-संतों के भोजन खाने से शंख नहीं बजा तो युधिष्ठिर ने कृष्ण जी से इसका कारण जानना चाहा। तब कृष्ण जी कहा कि युधिष्ठिर ये सर्व भेषधारी एवं सर्व ऋषि महर्षि सिद्ध देवता ब्राह्मण आदि सब पाखंडी लोग हैं। ऊपर से तो ऋषि वेशधारी नज़र आते हैं परन्तु अन्दर राग-द्वेष ईष्या क्रोध से भरे है। मान-बड़ाई के भूखे क्रोधी तथा लालची है। सर्प से भी खूंखार है। जरा सी बात पर लड़ मरते हैं। श्राप दे देते है। हत्या- हिंसा करते समय आगा-पीछा नहीं देखते। विचार करें साधक समाज!‌ क्या ये ऋषि मोक्ष के अधिकारी है? ऐसे -ऐसे अनेकों प्रमाण है ऋषियों के घमंड, मान- बड़ाई, ईर्ष्या वश क्रोध से अनर्थ करने के। पूर्ण संत से सच्चा नाम अर्थात् सतनाम सारनाम का उपदेश लेकर भक्ति करने पर ही बुराईयां खत्म होती है तथा विकार शांत होते हैं, अन्यथा नहीं। Watch Factful Debates Yt #🙏गुरु महिमा😇
Ram Niwas
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2 दिन पहले
#GodNightThursday #Kalyug_Mein_SatyugKiShuruat6 मध्यप्रदेश में उमड़ा रक्तदान का महा-सैलाब संत रामपाल जी महाराज की पावन उपस्थिति में “विश्व शांति महा-अनुष्ठान" के तहत सतलोक आश्रम बैतूल में 210 यूनिट भारी रक्तदान हुआ। दूसरों के लिए रक्तदान करना ही असली परमार्थ है। Watch Factful Debates Yt #🙏गुरु महिमा😇
Ram Niwas
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5 दिन पहले
Even Lord Krishna did not attain salvation. Nor did Lord Rama. So, who will grant *you* salvation? To find out, watch 'The Dawn of the Golden Age in the Age of Kali — Part 6' on the Factful Debates YouTube channel. #कलयुगमेंसतयुगकीशुरुआत_भाग6 #VisitFactfulDebatesYT #Haryana #flood #floodrelief #flooding #farmer #AnnapurnaMuhimSantRampalJi #kalyug #satyug #goldenage #help #humanity #AnnapurnaMuhim #SantRampalJiMaharaj #KabirisGod #🙏गुरु महिमा😇
Ram Niwas
495 ने देखा
5 दिन पहले
According to the *Bhavishya Malika*, Lord Krishna possessed only one *Mahakala*. Who, then, is the current incarnation of Jagannath Mahaprabhu—the Creator of the entire universe—who is endowed with 16 *Mahakalas*? To find out, watch *Kalyug Mein Satyug Ki Shuruaat — Part 6* on the Factful Debates YouTube channel. #flooding #farmer #AnnapurnaMuhimSantRampalJi #kalyug #satyug #goldenage #help #humanity #AnnapurnaMuhim #SantRampalJiMaharaj #SaintRampalJi #🙏🏻आध्यात्मिकता😇