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. ॐ मन्त्र
ॐ मन्त्र काल ब्रह्म का है। काल ब्रह्म मृतलोक के इक्कीस ब्रह्माण्ड का स्वामी है। इसको ज्योतनिरंजन अथार्त ओंकार भी कहते है। काल भगवान इन इक्कीस ब्रह्माण्ड के टोप फ्लोर पर महास्वर्ग का निर्माण कर रखा है उसमे रहता है। ॐ मन्त्र का जाप करने वाले साधक महास्वर्ग तक जा सकते है। महास्वर्ग भी पुनरावर्ती मे है। साधक को फिर अपनी की साधना की कमाई को समाप्त करके इस पृथ्वी पर आना पडेगा। ंगीता जी अध्याय 8के श्लोक 13मे कहा है कि
ओम इती एकाक्षरम ब्रम्ह, व्याहरन माम् अनुस्मरन्।
य: प्रयाति त्यजन् देहम् स: याती परमाम् गतिम्।।
अथार्त गीता बोलने वाला ब्रम्ह अर्थात काल कह रहा है कि (माम् ब्रम्ह) मुझ ब्रम्ह का तो (इति) यह (ओम एकाक्षरम्) ॐ एक अक्षर है (व्याहरन्) उच्चारण करके (अनुस्मरन्) स्मरण करने का (य:) जो साधक (त्यजन् देहम्) शरीर त्यागने तक अर्थात अन्तिम स्वांस तक (प्रयाति) स्मरण साधना करता है (स:) वह साधक ही मेरे वाली (परमाम् गतिम्) परमगति को (याति) प्राप्त होता है।गीता जी के अध्याय 08 श्लोक 13 के अनुसार गीता ज्ञान दाता कह रहा है, की मेरा "ॐ" मंत्र है। जो साधक अंत समय तक ईस "ॐ" एकाक्षरी मंत्र की साधना करता है उस साधक को मेरे वाली परमगती को प्राप्त होता है।
परन्तु ब्रह्मलोक भी स्थाइ नही है। ब्रह्म लोक का भी नाश होता है। वो है ब्रम्ह लोक के बारे मे पर गीता ज्ञान दाता अध्याय 08 के श्लोक 16 में कह रहा है कि
आब्रम्हभुवनात् लोका:, पुनरावर्तिन:, अर्जुन..!
माम्, उपत्य, तु, कौन्तेय, पुनर्जन्म, न विद्यते।।
अथार्त (अर्जुन) हे अर्जुन!(आब्रम्हभुवनात्) ब्रम्ह लोक से लेकर (लोका:) सब लोक (पुनरावर्तिन:) पुनरावृत्ती में है,बारम्बार उत्पत्ति नाश वाले हैं (तु) परंतु (कौन्तेय) हे कुंती पुत्र (न, विद्यते) जो यह नहीं जानते वे (माम्) मुझे (उपत्य) प्राप्त होकर भी (पुन:) फिर (जन्म:) जन्मते है।गीता के अध्याय 08 के श्लोक 16 से स्पष्ट होता है कि, "ॐ" के जाप से मोक्ष प्राप्ति नहीं है ब्रम्ह लोक प्राप्ति है।
'श्रीमद्देवीभागवत' गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित है।इस पुराण में सातवा स्कंद अध्याय 36 में "देवी के द्वारा हिमालय को ज्ञानोपदेश- ब्रम्हस्वरुप का वर्णन" में श्री देवी कहती है कि हे सौम्य! उपनिषद में कथित महान अस्त्ररूप धनुष लेकर उसपर उपासना द्वारा तीक्ष्ण किया हुआ बाण संधान करो और फिर भावानुगत चित्त के द्वारा उस बाण को खींचकर उस अक्षर रुप ब्रम्ह को ही लक्ष बनाकर वेधन करो। प्रणव ॐ धनुष है, जीवात्मा बाण है और ब्रम्ह को उसका लक्ष्य कहा जाता है। इस आत्मा का ॐ के जपके साथ ध्यान करो। इससे अज्ञानमय अन्धकार से सर्वथा परे और संसार समुद्र से उस पार जो ब्रम्ह है, उसको पा जाओगे। वह यह सब का आत्मा ब्रम्ह लोक रूप दिव्य आकाश में स्थित है।
अथार्त देवी भी कह रही है कि ॐ के जाप से ब्रम्ह लोक प्राप्ति है, उपर गीता कह रही है कि, ब्रम्ह लोक पर्यंत सभी पुनरावृत्ती मे है जन्मते मरते है, मोक्ष प्राप्ति नहीं है। यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्र 15 में ब्रम्ह साधना के लिए कहा है कि
वायु: अनिलम् अमृतम् अथ इदम् भस्मान्तम् शरीरम्।
ओम कृतम् स्मर, किलबे स्मर कृतु: स्मर।।
अथार्त ब्रम्ह साधना का ॐ नाम है। इससे मिलने वाला अमृतम् अर्थात मोक्ष प्राप्ति के लिए, ब्रम्ह लोक प्राप्ति के लिए ॐ का जाप (वायु: अनिलम्) श्वास उश्वांस से पूरी लगन के साथ शरीर नष्ट होने तक (क्रतम्) कार्य करते करते स्मरण कर, पूरी कसक अर्थात किलबिलाहट यांनी विलाप जैसी स्थिति से कर, मनुष्य जीवन का मूल कार्य जानकर स्मरण कर। इस यजुर्वेद अध्याय 40 के मंत्र 15 में कहा है ॐ के जाप से ब्रम्ह लोक प्राप्ति है।
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गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में गीता ज्ञान दाता ब्रह्म ने कहा है कि हे भारत! तू सर्व भाव से उस परमेश्वर की शरण में जा। उस परमेश्वर की कृपा से ही तू परम शान्ति को तथा शाश्वत् स्थान (अमर लोक) को प्राप्त होगा। हमारे आध्यात्म मार्ग में विशेषकर दो प्रभुओं का महत्व है। प्रथम तो क्षर पुरुष (ब्रह्मकाल) का क्योंकि हम इसके लोक में फँसे हैं और हमने तीसरे प्रभु पर अक्षर पुरुष के लोक में जाना है जहाँ जाने के पश्चात् साधक लौटकर पुनः संसार में कभी नहीं आते।
श्रीमद्भगवत गीता का ज्ञान श्री कृष्ण जी के शरीर में प्रवेश करके क्षर पुरुष (ब्रह्म) ने कहा है। गीता अध्याय 7 श्लोक 29 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि जो साधक जरा (वृद्धावस्था) तथा मरण से छुटकारा पाने के लिए प्रयत्न करते हैं अर्थात् केवल मोक्ष प्राप्ति के लिए ही साधना करते हैं, वे तत् ब्रह्म से सब कर्मों से तथा सम्पूर्ण अध्यात्म से परीचित हैं। (गीता अध्याय 7 श्लोक 29) गीता अध्याय 8 श्लोक 1 में अर्जुन ने पूछा कि ‘‘तत् ब्रह्म’’ क्या है उस का उत्तर गीता ज्ञान दाता ब्रह्म ने गीता अध्याय 8 श्लोक 3 में दिया। बताया कि वह ‘परम अक्षर ब्रह्म’ है।
गीता अध्याय 15 श्लोक 16 में क्षर पुरुष और अक्षर पुरुष दो प्रभु बताए हैं। ये दोनों तथा इनके लोकों में जितने शरीरधारी प्राणी हैं, वे सब नाशवान हैं। जीवात्मा तो किसी की नहीं मरती। गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में कहा है कि उत्तम पुरुष अर्थात् पुरुषोत्तम तो उपरोक्त श्लोक 18 में कहे क्षर पुरुष तथा अक्षर पुरुष से अन्य ही है। उसी को ‘परमात्मा’ कहा गया। वहीं परमात्मा तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है, वह अविनाशी परमात्मा है। यह परम अक्षर ब्रह्म है।
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