#📢LPG पर सरकार का बड़ा फैसला सत्यं परं धीमहि
-------------------
जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरयः।
तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि।।
–श्रीमद्भागवत 1/1/1
"जिससे इस जगत् का सर्जन, पोषण एवं विसर्जन होता है क्योंकि वह सभी सत् रूप पदार्थों में अनुगत है और असत् पदार्थों से पृथक् है; जड़ नहीं, चेतन है; परतंत्र नहीं, स्वयं प्रकाश है; जो ब्रह्मा अथवा हिरण्यगर्भ नहीं, प्रत्युत उन्हें अपने संकल्प से ही जिसने उस वेदज्ञान का दान किया है; जिसके सम्बन्ध में बड़े-बड़े विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं; जैसे तेजोमय सूर्यरश्मियों में जल का, जल में स्थल का और स्थल में जल का भ्रम होता है, वैसे ही जिसमें यह त्रिगुणमयी जाग्रत-स्वप्न-सुषिप्तरूपा सृष्टि मिथ्या होने पर भी अधिष्ठान-सत्ता से सत्यवत् प्रतीत हो रही है, उस अपनी स्वयं प्रकाश ज्योति से सर्वदा और सर्वथा माया और मायाकार्य से पूर्णतः मुक्त रहने वाले सत्यरूप परमात्मा का हम ध्यान करते हैं।"
भावार्थ
---------
अर्थों में गृहीत अन्वय(अन्वय व्यतिरेक न्याय निम्न उदाहरण से स्पष्ट होगा- यदि कोई कहे कि पर्वत में आग लग रही है क्योंकि धुआँ दिखायी देता है। यहाँ एक अनुमान यह होता है कि जहाँ-जहाँ धूम है वहाँ-वहाँ अग्नि है- जैसे चूल्हा में। यह हुआ अन्वय। दूसरा अनुमान यह होता है कि जहाँ अग्नि नहीं वहाँ धूम भी नहीं है जैसे तालाब में। यह हुआ व्यतिरेक। इसी प्रकार यह अनुमान भी हो सकता है कि आकाश आदि कार्यों में ईश्वर का सत् रूप अन्वय है और आकाश पुष्प आदि अकार्यों में व्यतिरेक है। मुक्तावली में लिखा है- ‘तत्सत्वे तत्सतत्त्वमन्वयः, तदभावे तद्भावों व्यतिरेक’।) और व्यतिरेक से जो जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संहार का कारण है, जिसने आदि कवि ब्रह्मा के लिए मन से (संकल्प से) ही वेदों को प्रकाशित किया, जिसके विषय में विद्वान लोगों को भी मोह होता है, जिसमें तेज, जल और मिट्टी में परस्पर एक की दूसरे में सत्यरूप से प्रतीति होने की भाँति तेज में जल की प्रतीति होती है जैसे मृगतृष्णा का जल। काँच (मिट्टी) में जल की और जल में काँच की प्रतीति भी अनुभव में आती है जैसे दुर्योधन को हुई थी। जैसे ये प्रतीतियाँ असत्य हैं वैसे ही पञ्चमहाभूत इंद्रियाँ और इनके देवताओं की सृष्टि वास्तव में सत्य नहीं है किंतु अहंकार से कल्पित है, और अधिष्ठान (ब्रह्म) की सत्यता से सांसारिक पुरुषों को सत्य सी प्रतीत होती है। असत्य त्रिविध सृष्टि जिसकी सत्यता से सत्य सी भासती है, और जिसके तेज से अज्ञानान्धकार सदा निरस्त है उस सर्वज्ञ स्वतः सिद्धज्ञान, सत्य परब्रह्म परमात्मा का हम ध्यान करते हैं।