वदन्तु शास्त्राणि यजन्तु देवान कुर्वन्तु कर्माणि भजन्तु देवता:।
आत्मैक्यबोधेन विना विमुक्ति-र्न सिध्यति ब्रह्मशतान्तरेऽपि॥६॥
- विवेक चूड़ामणि
*भले ही कोई शास्त्रों की व्याख्या करें, देवताओं का यजन करें, नाना शुभ कर्म करें अथवा देवताओं को भजे, तथापि जब तक ब्रह्म और आत्मा की एकता का बोध नहीं होता तब तक सौ ब्रह्माओं के बीत जाने पर भी {अर्थात् सौ कल्पमें भी} मुक्ति नहीं हो सकती।*
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