भरहिं निरंतर होहिं न पूरे।तिन्ह के हिय तुम्ह कहुं गृह रुरे।।लोचन चातक जिन्ह करि राखे।रहहिं दरस जलधर अभिलाषे।। भावार्थ: निरन्तर भरते रहते हैं, परन्तु पूरे (तृप्त)नही होते,उनके हृदय आपके लिए सुंदर घर हैं और जिन्होने अपने नेत्रों को चातक बना रखा है,जो आपके दर्शनरुपी मेघ के लिए सदा लालयित हरते हैं।।३।। जय श्रीराम 🙏💫🌟🌠🌌
#🙏🏻सीता राम