"जिस दिन समझ आया कि मैं खुद को ही ढो रहा था"
कुछ बोझ ऐसे होते हैं जिनका वजन कंधों पर नहीं महसूस होता।
वे चलते समय कदम नहीं रोकते, साँस नहीं फूलने देते, न ही किसी डॉक्टर की रिपोर्ट में दिखाई देते हैं। फिर भी वे इतने भारी होते हैं कि आदमी पूरी ज़िंदगी उन्हें उठाए-उठाए थक जाता है।
मुझे हमेशा लगता था कि थकान काम की वजह से है।
फिर लगा कि शायद जिम्मेदारियाँ ज़्यादा हैं।
कुछ समय बाद मैंने लोगों को जिम्मेदार ठहराया। परिस्थितियों को भी।
लेकिन एक दिन अचानक यह शक पैदा हुआ कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं दुनिया को नहीं, खुद को ढो रहा हूँ।
यह विचार किसी किताब से नहीं आया था। किसी गुरु ने भी नहीं बताया था। वह धीरे-धीरे पैदा हुआ था उन दिनों में जब कोई बड़ी समस्या नहीं थी, फिर भी भीतर एक अजीब बेचैनी बनी रहती थी।
सब कुछ ठीक होने के बावजूद कुछ ठीक नहीं था।
मैं वही काम कर रहा था जो हमेशा करता आया था। वही लक्ष्य, वही योजनाएँ, वही भागदौड़। बाहर से देखने वाला शायद कहता कि जीवन पटरी पर है।
लेकिन भीतर जैसे कोई लगातार पूछ रहा था
"अगर यह सब मिल भी गया, तो फिर क्या?"
पहले मैं उस सवाल को अनसुना करता रहा।
फिर उससे बहस की।
फिर उसे गलत साबित करने की कोशिश की।
लेकिन कुछ सवाल ऐसे होते हैं जो उत्तर मांगने नहीं आते। वे केवल यह दिखाने आते हैं कि जिस रास्ते पर हम चल रहे हैं, वह अब हमारे लिए पर्याप्त नहीं रह गया है।
उसके बाद मैंने अपने भीतर एक अजीब चीज़ देखनी शुरू की।
हर बार जब कोई मेरी तारीफ़ करता, मुझे अच्छा लगता, लेकिन वह अच्छा लगना बहुत देर तक नहीं टिकता था।
हर उपलब्धि कुछ दिनों तक चमकती और फिर सामान्य हो जाती।
हर मंज़िल के बाद अगली मंज़िल सामने खड़ी मिलती।
जैसे कोई अदृश्य प्यास हो जो पानी से नहीं भरती।
बहुत बाद में समझ आया कि मैं सफलता नहीं खोज रहा था।
मैं अपने बारे में एक कहानी बचाए रखने की कोशिश कर रहा था।
एक कहानी जिसमें मुझे महत्वपूर्ण होना था।
ज़रूरी होना था।
कुछ विशेष होना था।
और शायद उसी कहानी को बचाने में मेरी सबसे ज़्यादा ऊर्जा खर्च हो रही थी।
यहीं से मेरी सबसे कठिन सीख शुरू हुई।
क्योंकि किसी आदत को छोड़ना आसान है।
किसी वस्तु को छोड़ना भी आसान है।
लेकिन अपने बारे में बनाई हुई कहानी को छोड़ना यह किसी पुराने घर को छोड़ने जैसा नहीं, बल्कि अपनी ही त्वचा से बाहर निकलने जैसा होता है।यह शुरुआत अधिक मानवीय लगती है क्योंकि यह किसी सार्वभौमिक कथन से नहीं, बल्कि एक निजी अनुभव, आत्म-स्वीकृति और धीरे-धीरे खुलते एहसास से शुरू होती है।
Gauti ✒️✒️
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