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Sachin
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Sachin
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5 months ago
घरेलू सहायिका ललिता ने बताया तो अचंभा हुआ कि मीठे सीताफल की सब्जी कोई कैसे बना सकता है । छत्तीसगढ़ में जिस सब्जी को हम कुम्हड़ा कहते है उसे ही दिल्ली में सीताफल के नाम से जानते है लेकिन मुझे नही मालूम था । मैं जिसे सीताफल कह रही थी उसे दिल्ली में शरीफ़ा कहते है। मतलब ललिता और मेरा सीताफल अलग अलग था। मैं फल की तो वो सब्जी की बात कर रही थी। मैंने ललिता से फिर सवाल किया "सीताफल की सब्जी बहुत मीठी लगती होगी ?" चूंकि वो कद्दू के विषय में बता रही थी तो उसने हाँ में हाँ मिलाया, "हाँ दीदी, सीताफल तो हल्का मीठा होता है ।" सीताफल के काले,कड़े बीजों की सोच मेरे अचरज का पारावार नही था, "ललिता उसमें इतने बीज होते है तो सब्जी कैसे बनती है? " कुम्हड़े में भी बीज होते है तो ललिता ने फिर जवाब दिया , " सीताफल के सारे बीज निकाल कर ही सब्जी बनती है। " मैं झुंझला गयी, "हद करते हो दिल्ली वालों।इतने स्वादिष्ट फल में नमक मिर्ची डालकर सत्यानाश कर देते हो ।" ललिता को यकीन नही हो पा रहा था कि मैंने सीताफल की सब्जी कभी नही सुनी, "दीदी आप लोग सब्जी नही बनाते तो सीताफल कैसे खाते हो?" ललिता की नादानी पर तरस आया, "सीताफल को तू एक बार कच्चा खा कर देखना ।सब्जी बनाना छोड़ देगी ।मैं तो चम्मच से खाती हूँ और एक बार में तीन-चार खा सकती हूँ ।" ललिता के चेहरे पर दया के भाव थे , " आप छत्तीसगढ़ में जंगल साइड के हो तो उधर खाते होंगे। सीताफल तो कच्चा खा ही नही सकते ।एक फल तीन से 4 किलो का होता है ।आप दो कैसे खा लेते हो , वो भी चम्मच से ?" अब मेरा माथा ठनका । छत्तीसगढ़ में गेंद के आकार का सीताफल दिल्ली पहुँचते पहुँचते तीन से चार किलो का कैसे हो गया । बचपन से सुनती आई थी कि दिल्ली दूर है लेकिन इतनी भी दूर नही कि फलों के वजन ऐसे बदल जाए । मैंने गूगल करके कस्टर्ड एप्पल की तस्वीर दिखाई , "ललीता तुम इसकी सब्जी बनाकर खाती हो ?" ललिता ने सर ठोका , "हम शरीफा की सब्जी क्यों बनाएंगे । पागल थोड़े न है ? " अब हम दोनों को गफलत समझ आई और खूब हँसे । उसने बताया कि वो लोग पेठा बनाने वाली सफेद सब्जी को को कद्दू और पीले कुम्हड़े को सीताफल कहते है। मैंने कहा हम मीठा पेठा बनाने वाले सफेद कद्दू को 'रखिया' कहते है । सही बात है -"कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी।" भारत इतना बड़ा देश है कि "एक ही शब्द के अनेक मायने और एक ही मायने के अनेक शब्द हो सकते है ।" दिल्ली में पहली बार गोलगप्पे खाने गयी थी तो ठेले पर कहा, "भैय्या गुपचुप तीखा बनाना ।" ठेलेवाले ने पूछा ,"क्या आपके वहाँ गोलगप्पे छीपकर खाते है जिसकी वजह से इसे गुपचुप कहते है ?" दिल्ली में गोलगप्पों को 'पानी बताशे' भी बोलते सुना जबकि छत्तीसगढ़ में दीपावली की पूजा पर लक्ष्मी जी को चढ़ने वाले शक्कर की टिकिया को बताशे कहते है । नमकीन में पड़ने वाले काले दाने-सी कलौंजी नही मिली दिल्ली की दुकानों में ।मुश्किल से पता चला कि कलौंजी यहाँ मंगरैला नाम से जाना जाता है । छत्तीसगढ़ के मुनगा को यहाँ सहजन बुलाते है और वहाँ की बरबट्टी दिल्ली में 'लोबिया' हो गयी । छत्तीसगढ़ में पत्ता गोभी को हम 'बंदी' कहते है। छत्तीसगढ़ में जिस फल को खरबूज कहते है उसे दिल्ली में कचरा बोलते है । यहाँ कुम्हड़े ने कई नाम धरे है जिसमें सीताफल के अलावा काशीफल भी एक है । बेटा इस साल पुणे हॉस्टल में गया तो उस मालूम हुआ कि आज हॉस्टल में कांदा भजिया मिलेगा । उसे कांदा मतलब शकरकन्द मालूम है ।अमरूद को पुणे में पेरू ,दिल्ली में अमरूद कहते है जबकि छत्तीसगढ़ में बिही और जाम ।पुणे में मूंगफली को सींगदाना और एप्पल को सफ़रचन्द । वैसे सफरचन्द किसी इंसान का नाम लगता है । सफरचन्द किस फल का नाम है पूछने पर उस व्यक्ति ने वयाख्या कि लाल होते है । मैंने कहा, "टमाटर ?" "अरे नही कश्मीर में होते है । डॉक्टर कहते है कि रोज एक खाने से बीमारी दूर होती है।" तब समझ आया कि सेब की बात कर रहे है। महाराष्ट्र के हॉस्टल में बेटा सब्जियों के नए नाम सीख रहा है । बैगन का नया नाम वांगी , मटर का बटाना और आलू का बटाटा हो जाता था। बेटे ने ले देकर किसी तरह कद्दू को दिल्ली में सीताफल बोलना सीखा तो पुणे पहुँचकर कद्दू फिर नाम बदलकर 'लाल भोपला' हो गया ।पुणे में धनिया को कोथंबीर,अदरक को आल़,राई को मोहरी कहते है।" चाय में जरा आल (अदरक)ज्यादा डालना" सुना तो लगा अरे! चाय में आलू क्यो डाल रहे ?गुजरात में तो नमक ने गजब धोखा दिया । नमक को स्वाभाव के विपरीत 'मीठ' कहते है । शक्कर को नमक क्यो नही बुलाते फिर ? शक्कर ने भी नमक की देखादेखी नाम बदलकर खांड रख लिया। छत्तीसगढ़ में बैगन - भटा, टमाटर- पताल, भिंडी -रमकेरिया , गंवार फल्ली- चुटचुटइया , अरबी- कोचई होती है। सोचकर देखिए सब्जियों के चार्ट के चार्ट बदल गए .। 😂 मैं वेजिटेरियन हूँ ।पुणे में होटलों में जगह जगह बोर्ड लगे होते है -यहाँ ताज़े कुम्हड़ी मिलते है। हर जगह यह पढ़कर मैंने सोचा कि कुम्हड़ी भी कद्दू का ही नाम है ।होटल में जाकर पूछने पर पता चला कि मुर्गा को पुणे में कुम्हड़ी कहते है।😂पुणे में भगवान जी ने भी नाम बदल लिया - पाडूरंगा, भगवान विठ्ठल । ज्ञात हुआ भगवान श्री कृष्ण को ही विट्ठल महाराज कहते है । बेटे को महाराष्ट्र में हलवा का नया नाम मालूम हुआ- 'शीरा' जबकि दिल्ली आने के बाद सोन पापड़ी का नाम पतिसा हो गया। छत्तीसगढ़ में मूंगफल्ली को फल्लीदाना कहते है । दिल्ली में फल्लीदाना मांगा तो दुकानदार ने कौन सी फल्ली पूछा ।मैंने बार-बार फल्लीदाना कहा तो उन्हें नही समझा ।फिर बताया पोहे में डलता है ।तब उन्होंने कहा , "अच्छा मूंगफली।" अब फल्लीदाना कहना छोड़, मूंगफली कहती हूँ तो बेटे ने पुणे में सेंगदाना कहना शुरू कर दिया । मूंगफली बिहार में बदाम हो जाती है तो बादाम का नाम क्यो नही बदला ।बेटे से अब फोन पर पूछो तो बताता है लाल भोपटा (कद्दू) की सब्जी खाया। राजस्थानी परिवार के एक कार्यक्रम में उनकी माता जी ने मुझे बेटी मानकर पैर छू शगुन का लिफाफा पकड़ाया । मैंने अपनी सहेली से कहा - आँटी ने मुझे क्यो रुपये दिए ? उसने कहा , "अरे तुम्हे धोक (शगुन )का दिया ।" मुझे लगा मुझे किसी और के धोखे में पैसे पकड़ा दिए ।मैं लिफाफा जिद से लौटाने लगी कि किसी और के धोखे का पैसा मैं कैसे लूं ?बाद में धोक का अर्थ पता चला और सब लोग बहुत हँसे । छत्तीसगढ़ में भगौना या पतीले को गंजी कहते है जबकि बिहार में गंजी मतलब बनियान । एक बार एक राजस्थानी महिला ने बताया उसने बाज़ार से 100 रुपये का घाघरा लिया । मैंने लालच में आँखे फाड़ दी ।भला 100 रुपये में कहाँ घाघरा चोली मिला । उन्हें घाघरा दिखाने कहा तो सब्जी पकाने वाली बड़ी का पैकेट लाकर दिखाया । वो सब्जी बनाने वाली बड़ी को घाघरा कह रही थी ।😂 तेलंगाना में इडली डोसा को टीफिन कहते है। मेरी एक तमिल कलीग हमेशा कहती थी -रात के डिनर में हम टिफिन(इडली डोसा) ही खाते है । मुझे लगा कितनी आलसी है ।खाना बनाने से बचने टिफिन बंधा लिया । मैंने कहा - दो लोगों का खाना बनाने में कितना टाइम लगता है ।टिफिन क्यो खाती हो? ।उसने जवाब दिया - आप नार्थ इंडियन लोगों को रोटी बनाने की आदत है तो आलस नही आता । हम साउथ के लोग एक टाइम तो टिफिन(इडली डोसा ) खाते ही है। बहुत दिनों बाद उसके टिफिन का मतलब समझने पर हम दोनों खूब हँसे। पंजाब में पिंड का अर्थ गाँव होता है जबकि हरियाणा में घी,रोटी और गुड़ को मिसकर बनाए जाने वाले लड्डू को पिंड कहते है।एक किसान सम्मलेन में हरियाणावी पिंड खा रहा था तो पंजाब के किसान ने पूछा, "किस पिंड (गाँव) से?" हरियाणवी ने कहा, "बाजरे का।" पंजाब का किसान सर खुजाता चला गया ये सोचते हुए कि अच्छा बाजरा नाम का गाँव भी है ।😂 छत्तीसगढ़ का समोसा बंगाल पहुँचकर सिंघाड़ा हो जाता है तो वहाँ तालाब में उगने वाले सिंघाड़ा को समोसा क्यो नही कहते ।😂 जब हम अपना शहर और राज्य छोड़ते है तो घर गलियाँ और लोग ही नही, कुछ शब्द भी हमें हमेशा के लिए छूट जाते है । अपनी भाषा ,धर्म , रंग या जाति के लिए कट्टर आग्रह या अगाध श्रेष्ठता-बोध दिमाग के दरवाज़े बंद करता है। सर्वग्राह्यता और समभाव हमें बेहतर इंसान बनाता है ।नई चीजों की स्वीकार्यता ,सीखना और शामिल करने का अर्थ जड़ से कटना नही बल्कि विकसित और समृद्ध होना है । ललिता से कुछ ऐसे शब्द सीखे जो कभी नही सुने थे , "दीदी मेरा वीरवार का उपवास रहता है।" मैंने विस्मय से पूछा , "सन्डे उपवास तो पहली बार सुन रही ।" ललिता से स्पष्ट किया, " रविवार नही वीरवार ।" मैंने फिर सवाल किया, "ललिता ,वीरवार किस दिन को बोलते है।" ललिता ने समझाया, "दीदी गुरुवार को वीरवार बोलते है।" एक दिन सफाई करती हुई कहने लगी , "परली साइड वाली मेट्रो में जाऊँगी ।" मुझे लगा 'परली' किसी जगह का नाम है मगर मालूम हुआ कि उरली साइड मतलब दाई तरफ परली साइड मतलब बायीं तरफ । यहाँ राजगीर के लड्डू को अमरनाथ या चौलाई के लड्डू कहा जाता है , लौकी को घीया और चौराहे को गोल चक्कर कहते है जबकि बिहार में चौक को गोलाम्बर कहते है। दिल्ली में जो सबसे जबरदस्त सुना वो था टक्कर , टक्कर मतलब तिराहा - आगे जाकर एक 'टक्कर' मिलेगा तो उरली साइड (दाई तरफ) मुड़ जाना। 😂 पहले-पहल इन नए ,अनसुने शब्दों को बोलने में हिचकिचाहट , अटपटापन और खुद को बड़ा बेचारा सा लगता है । घर छोड़कर आये लोगों में अस्थायित्व का भाव स्थायी होता है । घोंसले छोड़कर उड़े परिंदों का संघर्ष लम्बा होता है। पहली शुरुवात भाषा छूटने की पीड़ा ही होती है लेकिन रिश्तों , भाषा और शहर की फितरत एक-सी होती है। जैसे-जैसे हम इन्हें जानने लगते है , वो भी थोड़ा-थोड़ा हमें समझने और अपनाने लगते है..। यात्राओं से मिला अनुभव भिन्नताओं को सम्मान देना सीखाता है । "वसुधैव कुटुम्बकम" उक्ति तो यही कहती है कि पूरी धरा ही परिवार है । अब मैं छत्तीसगढ़ जाने पर सीताफल कच्चे खाती हूँ और दिल्ली में सीताफल(कद्दू)की सब्जी बनाती हूँ क्योकि दिल्ली में सीताफल शराफत में रहते हुए शरीफ़ा हो जाता है । 😊 हमारे इस भव्य देश की विविधता सर आँखों पर । यहाँ एक शब्द के पर्यायवाची के साथ साथ अनेकार्थी शब्दों की ऐसी बाहुल्यता है ,जो भारत से बाहर किसी और देश में बिरले ही देखने मिलेगी । 💗 (पोस्ट शेयर करने अनुमति की आवश्यकता नही है ।) #contentcreator #trendingpost #posts #followers #📚कविता-कहानी संग्रह #😉 और बताओ #😝 पकाऊ पोस्ट्स👻 #🏚चुटकुलों का घर😜 #😆 कॉमेडी एक्टिंग
Sachin
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5 months ago
" वकील ने फोन किया "अरविंद जी एक बुरा समाचार है। " अरविंद बोला " अब बुरा समाचार कहा से आ गया? आप तो बोल रहे थे एक दो पेशी मे हम केस जीत जाएंगे!, वकील बोला " मुझे खबर मिली है आज आपका भाई आपके दुश्मनो की तरफ से आपके खिलाफ गवाही देने वाला है। अरविंद बोला " विवाद तो कोई खास नही चल रहा वकील साहब । मगर चार पांच साल से भाई से बोलचाल बन्द है। " वकील बोला "अगर विवाद नही चल रहा तो उसे फोन करके मना कीजिए। अगर आपके भाई ने आपके खिलाफ गवाही दी तो हमारा केस कमजोर पड जाएगा। अरविंद बोला " मगर इस केस से भाई का क्या लेना देना है। उसकी गवाही से केस कैसे कमजोर पड जाएगा।? " वकील बोला " अगर आपका भाई ये गवाही दे दे कि आप लालची और फ्रॉड किस्म के हो। आपने उसके साथ भी सम्पति बांटने मे बेईमानी की है। तब इस केस मे हमें अपनी लोयल्टी सिद्ध करने मे परेसानी होगी। आप एक बार अपने भाई से बात कीजिए। " वकील के फोन काटने के बाद अरविंद बैचेन हो गया। भाई दुश्मनों के साथ मिल गया है ये सोचते हुए उसका दिल बैठा अरविंद की पत्नी रसोई मे काम करते हुए सब सुन रही थी। वह अरविंद के पास आकर बोली " क्या कह रहे है वकील साहब ? देवर जी हमारे खिलाफ गवाही दे रहे हैं? " अरविंद बुझे मन से बोला " किशोर से मुझे ये उम्मीद नही थी गायत्री। खुद की भुजा ही शरीर को नुकसान पहुंचाएगी तो हम कैसे जीतेंगे? " गायत्री बोली " बिक गया होगा आपका भाई। दुश्मनों ने जरूर उन्हे लालच दिया होगा। आप अपने भाई को फोन मिलाइये। मैं बात करती हूं उनसे । " अरविंद ने कांपते हाथो से भाई को फोन मिलाया। मगर भाई ने फोन नही उठाया। पत्नी बोली " आप उनके घर जाईए उनसे बात कीजिए। हमारे आपसी झगड़े मे दुश्मनों को फायदा मिल रहा है। अगर भाई से सुलह नही करोगे तो हम हार जाएंगे। " अरविंद विचलित मन से कुर्सी पर पसरता हुआ बोला "अगर उसे मुझसेबात करनी होती तो फोन उठा लेता। अब घर जाने से भी कोई फायदा नही है। तुम चिंता मत करो जो होगा सो देखा जाएगा। " मगर अरविंद के माथेपर चिंता की लकीरें उभर आई थी। वह उस दिन को कोस रहा था जिस दिन उसने महिपाल के साथ साझीदारी मे जमीन खरीदी थी। महिपाल और अरविंद ने मिलकर दस साल पहले 20 लाख रुपयों में एक जमीन खरीदी थी। अब जमीन की कीमत 50 लाख रुपये से ऊपर थी। पिछले दस सालो मे अरविंद ने महिपाल को 15 लाख रुपये उधार दे दिये थे। तब महिपाल ने कहा था "तुम वह पूरी जमीन रखो। मेरे हिस्से के पैसे समझ लो जब तुम जमीन बेचोगे तब मै बिना कुछ पैसे लिए उन कागजो पर दस्तखत कर दूंगा। मगर जब अरविंद जमीन बेचने लगा तब महिपाल ने कहा " " आधी जमीन मेरी है आधे पैसे दोगे तभी दस्तखत करूँगा। समझौता मौखिक हुआ था । अरविंद बोला " लेकिन तुम्हारे हिस्से के मै तुम्हे 15 लाख रुपये दे चुका हूँ। जब हमने तुम्हारे हिस्से का हिसाब किया था तब जमीन की कीमत 30 लाख रुपये थी। इसलिए तुम्हारा अब उस जमीन पर कोई हक नही है।" महिपाल बोला " समझौते के कागज दिखाओ।" अरविंद के पास इसका कोई प्रमाण नही था। इसी बात को लेकर दोनों कोर्ट मे पहुँच गए थे। कोर्ट मे महिपाल अरविंद के भाई किशोर के साथ पहुंचा था। आज महिपाल के चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी। जिसे देखकर अरविंद का कलेजा बैठा जा रहा था। मुकदमा शुरू हुआ तब महिपाल का वकील बोला " मिलार्ड मेरे मुवक़िल का साझीदार अरविंद निहायत ही घटिया आदमी है। धोखा करना इसकी पुरानी आदत है। जिस शक्स ने अपने सगे भाई को नही छोड़ा वह दूसरों के साथ बेईमानी करने से कैसे बाज आ सकता है?" महिपाल का वकील बोला " जजसाहब, मै प्रतोवादी पक्ष के सगे भाई को बातौर गवाह पेश करना चाहता हूँ। मिस्टर अरविंद की फितरत कैसी है आप उसके भाई के मुख से सुन लीजिए। फिर किशोर कटघरे मे आकर खड़ा हो गया। अरविंद ने एक नजर अपने छोटे भाई पर डाली। दोनो भाईयो की नजरें मिली। अरविंद की नजरों मे लाचारी और बेबसी थी। आँखो मे पानी था। जज साहब ने इशारा किया तो किशोर ने भगवत गीता की शपथ लेकर बोलना शुरू किया। "जज साहब मै अरविंद कुमार का छोटा भाई हूँ। मेरा बचपन उनकी गोद मे बीता है। पिता के गुजरने के बाद उन्होंने मुझे पिता का प्यार भी दिया है। अगर उनके आचरण और फितरत के बारे मे बताऊँ। तो सिर्फ इतना ही कहूंगा वो मेरे लिए भगवान राम है। वो कभी झूठ नही बोलते । जो इंसान झूठ नही बोलता वो भला किसी के साथ बेईमानी और धोखा कैसे कर सकता है। " किशोर के इतना कहते ही महिपाल और उसके वकील का मुँह उतर गया। उधर अरविंद की आंखे भर आई। वह भाई को ऐसे निहार रहा था जैसे बचपन मे उस मुस्कराते देखकर किशोर बोला " जज साहब ये महिपाल और उसका वकील कल मेरे घर आए थे। इन लोगों ने मुझे पैसो का लालच देकर मेरे भाई के विरुद्ध बोलने के लिए तैयार किया था। इन्होंने मुझे क्या क्या कहा उसका मैने वीडियो बना लिया है। फिर जेब से उस वीडियो का सबूत किशोर ने जज साहब को सौंप दिया। जज साहब ने वीडियो देखा फिर अपना फैसला अरविंद के पक्ष मे सुना दिया। और महिपाल और उसके वकील के विरुद्ध लीगल कार्यवाही करने का आदेश दे दिया। कोर्ट के बाहर निकलते ही अरविंद की नजर भाई को तलाश कर रही थी। मगर किशोर भाई की नजर बचा कर चुपके से अपने घर चला गया था। उसके बाद अरविंद अपने पूरे परिवार को लेकर किशोर के घर गया। पुराने गिले शिकवे दूर किये और दोनो भाई गले मिल गए। दोनों परिवार फिर से एक हो गए। कहानी का मोरल :- भाईयो के बीच आपस मे कितने भी मतभेद हो । मगर जब भाई संकट मे हो तो उसकी ढाल बन जाओ। एक और एक मिलकर 11 बन जाओ और दुश्मन के 12 बजा दो यही एक भाई का कर्तव्य है।....... पोस्ट कैसी लगी अपनी प्रतिक्रिया अपने अनमोल विचार जरुर व्यक्त करें...। अच्छा लगे तो शेयर जरूर करें🙏 #📗प्रेरक पुस्तकें📘 #📚कविता-कहानी संग्रह
Sachin
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6 months ago
*ब्रेकिंग न्यूज़: चौंकाने वाली खबर..* मध्य प्रदेश में पलाश अधिकारी नाम के एक व्यक्ति को पुलिस ने बांग्लादेशी होने के शक में हिरासत में लिया। पलाश टूटी-फूटी हिंदी में बता रहा था कि वह भारतीय है और हिंदू भी। बाकी कहानी पढ़कर आपको हैरानी होगी.. 😨 पुलिस ने कहा कि वह भारतीय नहीं है। लेकिन पलाश ने अपना आधार कार्ड, वोटर आईडी, पैन कार्ड और कई अन्य दस्तावेज़ दिखाकर साबित किया कि वह भारतीय नागरिक और हिंदू है। इसके बावजूद, पुलिस ने उस पर विश्वास नहीं किया और मामला अदालत पहुँच गया। अदालत में पलाश से कुछ बुनियादी सवाल पूछे गए: नाम? पलाश अधिकारी उम्र? 42 वर्ष पिता का नाम? रमेश अधिकारी पता? काशिमपुर, मालदा, पश्चिम बंगाल अदालत ने इन तथ्यों की जाँच मतदाता सूची और आधार रिकॉर्ड से की और पाया कि ये सभी जानकारी रिकॉर्ड में मौजूद थीं। रमेश अधिकारी के चार बेटे दिखाए गए थे: पलाश, सुभ्रतो, सौमेन और राहुल। अब सवाल यह उठा कि अगर रमेश अधिकारी भारतीय हैं, तो उनके बेटे भी स्वाभाविक रूप से भारतीय ही होंगे। लेकिन जब अदालत ने पुराने रिकॉर्ड, खासकर 2002 की विशेष जाँच रिपोर्ट (SIR) देखी, तो एक चौंकाने वाला सच सामने आया। 2002 और 2010 के रिकॉर्ड में, रमेश अधिकारी के केवल दो बेटे थे: सुभ्रतो और सौमेन। पलाश और राहुल का कोई ज़िक्र नहीं था। 2015 में, अचानक रमेश के चारों बेटे मतदाता सूची में दिखाई देने लगे। जैसे-जैसे जाँच आगे बढ़ी, पता चला: रमेश की शादी 1993 में हुई थी। पहला बेटा सुभ्रतो 1995 में पैदा हुआ था (अब 30 साल का है)। दूसरा बेटा सौमेन 1997 में पैदा हुआ था (अब 28 साल का है)। लेकिन पलाश 42 साल का था - यानी उसका जन्म 1983 में हुआ था, यानी रमेश की शादी से पहले। यह मुमकिन नहीं था..!!! जब रमेश अधिकारी से पूछा गया कि क्या वह पलाश या राहुल को जानता है, तो उसने साफ़ कहा कि वह नहीं जानता। तब असली पहचान उजागर हुई: पलाश अधिकारी असल में शेख मोइनुद्दीन था, जो अहमदपुर, खुलना, बांग्लादेश का रहने वाला था। उसने फ़र्ज़ी दस्तावेज़ बनाकर और खुद को भारतीय और हिंदू बताकर घुसपैठ की थी। पिछले 10 सालों से वह मज़दूर बनकर गुप्त रूप से कट्टरपंथी गतिविधियों में शामिल था। राहुल अधिकारी नाम का यह शख्स कौन है, यह कोई नहीं जानता - पुलिस उसकी तलाश कर रही है। रमेश अधिकारी, जो एक साधारण किसान हैं, खुद हैरान थे कि कैसे एक अनजान व्यक्ति उनके बच्चे के रूप में दस्तावेज़ों में शामिल हो गया। यह मामला दिखाता है कि कैसे हज़ारों बांग्लादेशी घुसपैठिए फ़र्ज़ी नामों से आधार, वोटर आईडी और पैन कार्ड बनवाकर खुद को भारतीय साबित कर रहे हैं। यह देश की सुरक्षा के लिए एक गंभीर ख़तरा है। सरकार से माँग है कि मतदाता सूची की गहन जाँच की जाए और ऐसे फ़र्ज़ी नागरिकों की पहचान करके उन्हें बाहर निकाला जाए। *कृपया इस पोस्ट को शेयर करें और जागरूकता फैलाएँ।* #💼सरकारी सेवा और योजना 👷 #✍🏻भारतीय संविधान📕 #🙄फैक्ट्स✍ #📗प्रेरक पुस्तकें📘
Sachin
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7 months ago
“सर, मैं कसम खाती हूँ कि जब मैं बड़ी हो जाऊँगी, तो पैसे लौटा दूँगी। प्लीज़, मेरे छोटे भाई के लिए दूध का एक पैकेट बेच दीजिए?” ये नन्हीं, काँपती आवाज़ मुंबई की झुलसा देने वाली दोपहर में सुपरमार्केट की पार्किंग में गूँज उठी। आर्या नायर, नौ साल की, अपनी फटी हुई सलवार में सिकुड़कर खड़ी थी, गोद में अपने नवजात भाई कबीर को पुराने कंबल में लपेटे हुए। उसके होंठ सूखे थे, और कबीर का धीमा, थका हुआ रोना शहर की हलचल में खो जाता था। रात तक वह वीडियो सोशल मीडिया पर छा गया। सुर्खियाँ आईं — “मुंबई के अरबपति ने गरीब बच्ची के नवजात भाई के लिए पूरा बेबी-किट खरीदा।” शुरुआत में राजीव इस प्रचार से झल्लाया — वो कोई नायक नहीं बनना चाहता था। उसने बस वही किया जो इंसानियत माँगती है। लेकिन कहानी वहीं नहीं रुकी — दान आने लगे, एनजीओ जुड़ गए, आर्या के पड़ोसी मदद करने लगे, खाना, कपड़े, यहाँ तक कि स्कूल की सहायता तक। आर्या, जो पहले भीड़ में गुम थी, अब दिखने लगी। कबीर, जो कमजोर और कुपोषित था, अब हर दिन थोड़ा मजबूत होने लगा। कई हफ्तों बाद, राजीव अपने ऑफिस पहुँचा — थका हुआ, लेकिन संतुष्ट। लॉबी में, वो देखकर चौंका — आर्या वहाँ खड़ी थी, कबीर को गोद में लिए हुए। वो मुस्कराते हुए आगे बढ़ी और एक कागज़ थमाया — क्रेयॉन से बनी एक ड्रॉइंग थी: वो, कबीर और राजीव — एक बड़े दूध के डिब्बे के सामने। नीचे लिखा था, काँपते अक्षरों में — “धन्यवाद। मैं बड़ी होकर आपको लौटाऊँगी।” राजीव हँस पड़ा। उसके चेहरे पर एक दुर्लभ मुस्कान उभरी। “आर्या, तुमने तो पहले ही लौटा दिया,” उसने कहा। “तुमने मुझे याद दिलाया — इंसान होना क्या होता है।” उसके लिए, ये कहानी दान की नहीं थी — ये याद दिलाने की थी कि असली दौलत पैसों में नहीं, उन जिंदगियों में होती है जिन्हें हम छू लेते हैं। और आर्या के लिए, वो दिन उसकी ज़िंदगी का मोड़ बन गया। अब वो अदृश्य नहीं थी — लोग उसे देख रहे थे, समझ रहे थे, और उम्मीद फिर से उसके घर लौट आई थी। कबीर, जो कभी एक भूखा नवजात था, अब खिलखिलाने लगा था। मुंबई शहर के लिए भी ये एक सबक था — कि इंसानियत अब भी ज़िंदा है, और कभी-कभी, दुनिया को उसकी याद दिलाने के लिए बस एक बच्चे की आवाज़ ही काफ़ी होती है। #📚कविता-कहानी संग्रह #📗प्रेरक पुस्तकें📘
Sachin
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7 months ago
#😎मज़ेदार पोस्ट 🤩 🤣 कहानी: “गड्ढा और लोगों की टाँग-अड़ाने की आदत” एक दिन बादशाह अकबर दरबार में बोर बैठे थे, बोले — “बीरबल, बताओ दुनिया में सबसे बड़ा रोग कौन-सा है?” बीरबल हँसकर बोले — “जहाँपनाह, यह तो आसान है — ‘दूसरों के काम में टाँग अड़ाने का रोग!’” अकबर बोले — “सबूत है?” बीरबल बोले — “कल दिखा दूँगा, हुजूर।” अगले दिन सुबह-सुबह बीरबल ने शहर के चौक में एक बड़का गड्ढा खुदवा दिया, और एक पट्टी लगवा दी — 🪧 “जो इस गड्ढे में नहीं गिरेगा, उसे दस सोने के सिक्के मिलेंगे।” बस फिर क्या था — पूरा शहर दौड़ पड़ा देखने! पहला बोला — “अरे सई, इ गड्ढा में गिर जाई तो पैर तूट जाई!” दूसरा बोला — “न रे, राजा पैसा दे रहा है, कुछ तो बात है!” तीसरा बोला — “हम गिरेंगे नहीं, लेकिन देखेंगे ज़रूर!” और चौथा बोला — “अरे तू मत गिर, मैं पहले देख लूँ!” बस सब बहस करने लगे — कोई गिरा ही नहीं! सूरज ढल गया, गड्ढा खाली का खाली 😆 बीरबल ने अकबर को बुलाया और बोले — “हुजूर, देख लीजिए — सबको अपने काम से ज़्यादा दूसरों के काम की चिंता है!” अकबर ठहाका मार के हँसे — “वाह बीरबल, तू तो हमारा ‘देसी गूगल’ है!” 🤣