मान लो, एक दिन तुम्हारी और मेरी बात न हुई, एक बार भी न कह पाए 'प्यार करता हूँ। तब क्या तुम मुझे भूल जाओगी? या मुझे याद करते-करते अपनी आँखों में सावन ले आओगे ?
मान लो, एक दिन चिलचिलाती धूप में मेरे इंतज़ार में तुम तपती रही, मैं आने का वादा करके भी नहीं आया,
तब क्या तुम गहरे अभिमान में जलकर मुझसे बात करना बंद कर दोगी? या अगले दिन मिलने पर धीमे स्वर में मुझसे पूछो "कल क्यों नहीं आएं? क्या बहुत काम था?" मान लो, बहुत दिनों तक हमारा मिलना न हुआ, न कोई बात, न फोन, न कोई पैगाम, तब क्या तुम मुझे भुलाना शुरू कर दोगी? या अपने दिल में एक खामोश सिसकी को छुपाकर मेरी यादों में ही खुद को लपेट लो? मान लो, बहुत दिनों तक उंगलियों ने उंगलियों को न छुआ, तुम्हारे कंधे पर मैंने सर न रखा, साँसों में वो गर्माहट न घुली ! तब क्या तुम किसी और के आँचल में सिर रखने का ठिकाना ढूँढो? या मेरे सीने से लगने और उंगलियों के उस स्पर्श के लिए, चातक की तरह एक-एक पल गिनो? मान लो, बहुत दिन हुए तुम्हें लेकर कोई कविता नहीं लिखी, तुम्हें अपनी लिखी नज़्में पढ़कर नहीं सुनाईं,
तब क्या तुम हर शाम मेरी दी हुई उस नीली डायरी के पन्ने पलटते हुए सोचेगी, "कब आओगे तुम?" या गुस्से और नाराजगी में उस डायरी का हर पन्ना तार-तार कर दोगी? मान लो, एक दिन मैं कहीं खो गया, और लौटकर नहीं आया, हर तरफ बस एक खालीपन का शोर हो। तब क्या करोगी तुम ? भूल जाओगी मुझे? या खिड़की पर खड़े होकर दूर तक ताकते हुए सोचोगी "वहाँ अकेली कैसा होगा? अब किसे कहती होगी - 'प्यार करती हूँ?"
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