#कभी-कभी मन करता है बहुत दूर चली जाऊँ... इतनी दूर कि न कोई ताना सुनाई दे, न कोई उम्मीदों का बोझ मेरे कंधों पर रखा जाए।
हर दिन एक नई कसौटी पर परखा जाता है। पढ़ाई करो, अच्छे नंबर लाओ, बैक नहीं आनी चाहिए। घर का काम करो, किचन संभालो, सलीका सीखो। और अगर कहीं ज़रा सी भी कमी रह जाए, तो सुनो — "तुम्हें कुछ नहीं आता..." "ससुराल कैसे संभालोगी?"
कभी समझ नहीं आता कि आखिर हमसे चाहिए क्या? हम पढ़ें भी, घर भी संभालें, सबकी उम्मीदों पर भी खरे उतरें, और थकें भी नहीं...
सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तब होती है, जब ये बातें किसी अजनबी से नहीं, अपने ही माँ-बाप से सुनने को मिलती हैं। जिनसे हौसला मिलने की उम्मीद होती है, वहीं कई बार हमारी कमियाँ गिनाने लगते हैं।
क्या एक लड़की की काबिलियत सिर्फ़ किचन से तय होगी? क्या उसकी मेहनत, उसकी पढ़ाई, उसके सपने, उसका संघर्ष... सबकी कीमत बस इतनी है कि उसे घर का काम कितना आता है?
गुस्सा भी आता है... रोना भी आता है... और कभी-कभी खुद पर शक भी होने लगता है।
फिर भी हम रुकते नहीं। हम हर रोज़ लड़ते हैं — थकान से, उम्मीदों से, दबाव से, और उन तानों से जो धीरे-धीरे दिल में उतर जाते हैं।
शायद हम परफेक्ट नहीं हैं... लेकिन हम कोशिश कर रहे हैं। और यकीन मानिए, हर दिन की ईमानदार कोशिश, किसी भी परफेक्शन से कहीं ज़्यादा बड़ी होती है।
— Sakshi 🌸
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