भागवत 1.1.1
जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञ: स्वराट्
तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरय: ।
तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा
धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि।।
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मैं उस परम सत्य (श्री कृष्ण/वासुदेव) का ध्यान करता हूँ, जो सृष्टि, पालन और संहार के मूल कारण हैं, जो सर्वज्ञ हैं और स्वयं प्रकाशमान हैं। वे ही परम ब्रह्म हैं, जिन्होंने ब्रह्माजी के हृदय में वैदिक ज्ञान प्रकट किया और जो भौतिक माया से हमेशा मुक्त हैं।