वाल्मीकि रामायण

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sn vyas
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#रामचरितमानस #🌺 श्री रामचरितमानस चौपाई 🌺 #वाल्मीकि रामायण 🧘वाल्मीकि द्वारा श्रीराम के चौदह निवास स्थान🧘 📕श्रीरामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में एक अत्यन्त अद्भुत प्रसंग आता है। जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास के समय चित्रकूट पहुँचते हैं, तब वे महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में पधारते हैं।📕 🛐मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अत्यन्त विनम्र होकर महर्षि से पूछते हैं—🛐 🙏«"हे मुनिवर! हम तीनों कहाँ निवास करें? कृपा करके कोई उपयुक्त स्थान बताइये।"»🙏 🧘तब महर्षि वाल्मीकि मुस्कराते हैं। वे जानते हैं कि प्रश्न पूछने वाले स्वयं सम्पूर्ण विश्व के अधिष्ठाता हैं। अतः वे कहते हैं—🧘 🙏"हे राम! आप तो घट-घटवासी हैं। ऐसा कौन-सा स्थान है जहाँ आप नहीं हैं? फिर भी यदि आप निवासस्थान पूछते हैं तो मैं आपको वे हृदय बताता हूँ जहाँ आपको सपरिवार निवास करना चाहिए।"🙏 🚩१. जिनके कान रामकथा के समुद्र हों जिन्हें आपकी कथा सुनने से कभी तृप्ति नहीं होती। जिनके कान समुद्र के समान हैं और जो आपकी लीलारूपी नदियों को निरन्तर ग्रहण करते रहते हैं। 🚩२. जिनकी आँखें चातक के समान हों जो केवल आपके दर्शन की अभिलाषा रखते हैं। जिनकी दृष्टि संसार में नहीं, केवल श्रीरामरूपी स्वाति- बिन्दु पर लगी रहती है। 🚩३. जिनका मन मानसरोवर हो । जिनके हृदय रूपी मानसरोवर में आपकी कीर्ति रूपी हंस विहार करते हैं। जो निरन्तर रामनाम का जप करते हैं। 🚩४. जिनकी नासिका प्रसाद की सुगन्ध ग्रहण करे। जो भगवान के चरणों में अर्पित पुष्पों की सुगन्ध को पवित्र मानते हैं। जो प्रसाद को देवकृपा समझकर ग्रहण करते हैं। 🚩५. जिन्हें संत- दर्शन प्रिय हो। जो संतों को देखकर आनन्दित होते हैं। जो सज्जनों की सेवा को सौभाग्य मानते हैं। 🚩६. जिनके हाथ सेवा में लगे हों। जिनके हाथ पूजा, सेवा और धर्मकार्य में लगे रहते हैं। 🚩७. जिनके चरण तीर्थमार्ग पर चलते हों। जो तीर्थ, मन्दिर और सत्संग की ओर अग्रसर होते हैं। 🚩८. जिनका मस्तक विनम्र हो। जो भगवान, गुरु और संतों के चरणों में झुकते हैं। 🚩९. जिनके मन में छल न हो। जो कपट रहित और सरल स्वभाव वाले हैं। 🚩१०. जो जगत को राममय देखते हैं। जो सम्पूर्ण चराचर जगत में भगवान का ही स्वरूप देखते हैं। 🚩११. जो समदर्शी हों। जिनके लिए सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान समान हों। 🚩१२. जो लोभ और शोक से मुक्त हों। जिन्हें धन का अभिमान नहीं और हानि का दुःख नहीं। 🚩१३. जो सत्यप्रिय हों। जो सदैव सत्य बोलते हैं और धर्म का पालन करते हैं। 🚩१४. जिनके हृदय में निष्काम भक्ति हो। जो किसी फल की इच्छा से नहीं, केवल प्रेमवश भगवान का स्मरण करते हैं। 🛐महर्षि वाल्मीकि का यह उपदेश अत्यन्त गूढ़ है। यहाँ भगवान राम को किसी भौतिक कुटिया में नहीं, बल्कि भक्त के अन्तःकरण में स्थापित किया गया है। इसी से स्पष्ट होता है कि श्रीराम केवल अयोध्या के राजकुमार नहीं हैं। वे स्वयं घट-घटवासी, अन्तर्यामी, सर्वव्यापक परब्रह्म हैं।🛐 🌷«"जहाँ निर्मल भक्ति है, वहीं राम का निवास है।"»🌷 🙏जय श्रीराम।🙏
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sn vyas
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#👉 लोगों के लिए सीख👈 #वाल्मीकि रामायण व्याख्या: इस दोहे का सीधा संबंध रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि के जीवन से है। पंक्तियों का अर्थ इस प्रकार है: राम नाम की ओट ले, मरा मरा जो गाये: महर्षि वाल्मीकि (अपने पूर्व जीवन में रत्नाकर डाकू) को जब 'राम' नाम का जप करने को कहा गया, तब अपने पापों के कारण उनके मुख से 'राम' शब्द नहीं निकल रहा था। उन्होंने इसके विपरीत 'मरा-मरा' कहना शुरू कर दिया। लेकिन निरंतर और सच्चे मन से 'मरा-मरा' रटने पर भी ध्वनि बदलकर 'राम-राम' में परिवर्तित हो गई। यानी उन्होंने राम नाम की ओट (सहारा) ले ली। तप के बल से ऋषि भये, रामायण रच जाए: इस नाम जप और घोर तपस्या की शक्ति (तप के बल) से उनका कायाकल्प हो गया। वे एक साधारण मनुष्य या डाकू से महान ब्रह्मर्षि वाल्मीकि बन गए। आगे चलकर इसी तप और ज्ञान के प्रभाव से उन्होंने हिंदुओं के पवित्र और महान ग्रंथ 'रामायण' की रचना की। मुख्य संदेश: यह दोहा दर्शाता है कि ईश्वर के नाम में इतनी शक्ति है कि यदि कोई अनजाने में या उल्टे नाम से भी पूरी श्रद्धा के साथ उनका स्मरण करे, तो उसका जीवन बदल सकता है और वह महानता के शिखर पर पहुँच सकता है।
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sn vyas
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#जय श्री राम #रामचरितमानस #🌺 श्री रामचरितमानस चौपाई 🌺 #वाल्मीकि रामायण भारतीय संस्कृति में महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण के जिस रचना ने सर्वाधिक असर छोड़ा है वो गोस्वामी तुलसीदास रचित श्री रामचरितमानस है। हालाँकि तुलसीदास ने अपने ग्रन्थ मानस में कुछ ऐसी घटनाओं को भी जोड़ा है जो मूल वाल्मीकि रामायण में नहीं है। साथ ही कई अन्य घटनाओं को मानस में स्थान नहीं दिया गया है। ऐसी ही एक जानकारी महाराज दशरथ की पत्नियों के विषय में है। रामचरितमानस में ये बताया गया है कि महाराज दशरथ की केवल तीन पत्नियाँ थी - कौशल्या, सुमित्रा एवं कैकेयी। हालाँकि यदि आप मूल वाल्मीकि रामायण को पढ़ेंगे तो हमें ये पता चलता है कि महाराज दशरथ की मुख्य एवं गौण मिलाकर कुल रानियों की संख्या ३५० से अधिक थी। उन रानियों के विषय में बहुत ही कम वर्णित है किन्तु फिर भी, विशेष रूप से अयोध्या कांड में उनका वर्णन किया गया है। महाराज दशरथ की तीन से अधिक रानियां होने का पहला प्रमाण हमें अयोध्या कांड में मिलता है। हालाँकि इस श्लोक में महाराज दशरथ ने स्पष्ट रूप से इन्हे पत्नी नहीं कहा है पर ये तय है कि उनके अंतःपुर में सहस्त्रों स्त्रियां थी। ये बात महाराज दशरथ कैकेयी से तब कहते हैं जब वे श्रीराम के वनवास की बात करती है। अयोध्या कांड के सर्ग १२ के श्लोक २७ में लिखा है: बहूनां स्त्रीसहस्राणां बहूनां चोपजीविनाम्। परिवादोऽपवादो वा राघवे नोपपद्यते।। अर्थात: मेरे यहाँ कई सहस्र स्त्रियाँ हैं और बहुत-से उपजीवी भृत्यजन हैं, परंतु किसी के मुँह से श्रीराम के सम्बन्ध में सच्ची या झूठी किसी प्रकार की शिकायत नहीं सुनी जाती। इसके बाद महाराज दशरथ की कई पत्नियों के होने का वर्णन तब तब आता है जब कैकेयी दशरथ से श्रीराम का वनवास मांगती है और दशरथ इस धर्म संकट में हैं कि श्रीराम को इसकी सूचना कैसे दें। अयोध्या कांड, सर्ग ३४ के श्लोक १० में लिखा है: सुमन्त्रानय मे दारान्ये केचिदिह मामकाः। दारैः परिवृतः सर्वैदृष्टुमिच्छामि राघवम।। अर्थात: हे सुमंत! इस घर में मेरी जितनी स्त्रियाँ है, उन सभी को बुला लो। मैं उन सबके सहित श्रीरामचन्द्र को देखना चाहता हूँ। अयोध्या कांड, सर्ग ३४ के श्लोक ११ में लिखा है: सोSन्तःपुरमतीत्यैव स्त्रियस्ता वाक्यंब्रवीत। आर्या हयति वो राजाSगम्यतां तत्र मा चिरम।। अर्थात: ये सुन सुमंत अंतःपुर गए और सभी रानियों से बोले कि, महाराज आपको बुलाते हैं - शीघ्र आइये। अयोध्या कांड, सर्ग ३४ के श्लोक १२ में लिखा है: एवमुक्ताः स्त्रियः सर्वाः सुमन्त्रेण नृपाज्ञा। प्रचक्रमुस्तद्ववनं भर्तुराज्ञाय शासनं।। अर्थात: जब सुमंत ने उन स्त्रियों को इस प्रकार महाराज की आज्ञा सुनाई, तब अपने पति की आज्ञा से वे महाराज के पास जाने को तैयार हुई। अयोध्या कांड, सर्ग ३४ के श्लोक १३ में इसे सबसे स्पष्ट रूप से लिखा गया है: अर्द्धसप्तशतास्तास्तु प्रमदास्ताम्रलोचनाः। कौशल्यां परिवार्यार्थ शनैर्जग्मुर्धतव्रताः।। अर्थात: साढ़े तीन सौ स्त्रियाँ, जिनके नेत्र श्रीरामचन्द्र जी के वियोगजन्य दुःख के कारण रोते रोते लाल हो गए थे, कौशल्या को घेर कर धीरे-धीरे महाराज के पास गयीं। अयोध्या कांड, सर्ग ३४ के श्लोक १४ में लिखा है: आगतेषु च दारेषु समवेक्ष्य महीपतिः। उवाच राजां तुं सुतं सुमंत्रानय में सुतं।। अर्थात: जब महाराज ने देखा कि, सब स्त्रियाँ आ गयी, तब उन्होंने सुमंत को आज्ञा दी कि हे सुमंत! मेरे पुत्र को ले आओ। अयोध्या कांड, सर्ग ३९ के श्लोक ३६ में लिखा है: एता वदभिनितार्थमुक्तवासजननींवच:। त्रय:शतशतर्धा हिददर्शावेक्ष्यमातर:।। अर्थात: अपनी माता को सांत्वना देने के पश्चात राम ने एक पल सोच कर वहाँ खड़ी अपनी ३५० विमाताओं की ओर देखा। अयोध्या कांड, सर्ग ३९ के श्लोक ३७ में लिखा है - कौशल्या की ही भांति राम ने अपनी सभी विमाताओं से, जो दुख से विह्लल हो रही थी, करबद्ध हो कहा - "माता! यदि मुझसे अनजाने में कोई अपराध हो गया हो तो मुझे क्षमा करें।" अयोध्या कांड, सर्ग ३९ के अंतिम श्लोक ४१ में लिखा है: मुरजपणवमेघघोषव दशरथवेश्म वभूव यत्पुरा। विलपितपरिदेवनकुलं व्यसंगतं तद्युत्सुदुःखितं।। अर्थात: हा! महाराज के जिस भवन में पहले मृदंग, ढोल के मेघ-गर्जनवत शब्द हुआ करते थे, वही भवन आज रानियों के करुणापूर्ण आर्तनाद एवं परिताप के अत्यंत दुःख से भर गया है। तो वाल्मीकि रामायण के इन श्लोकों से पता चलता है कि महाराज दशरथ की कई (कम से कम ३५०) रानियाँ थी। इसके अतिरिक्त महर्षि वाल्मीकि ने ये लिखा है कि महाराज दशरथ अपनी तीनों प्रमुख पत्नियों (कौशल्या, सुमित्रा एवं कैकेयी) से एक सा प्रेम करते थे। किन्तु जब गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की तो उन्होंने महाराज दशरथ की केवल इन्ही तीन रानियों का वर्णन किया है। साथ ही उन्होंने ये भी वर्णन किया है कि महाराज दशरथ अपनी तीनों रानियों में से कैकेयी से सबसे अधिक प्रेम करते थे। हो सकता है कि चूँकि स्वयं महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में महाराज दशरथ की अन्य रानियों का विस्तार पूर्वक वर्णन नहीं किया है इसी कारण तुलसीदास जी ने उन्हें रामचरितमानस में सम्मलित नहीं किया है।
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