जिनसे मिलकर मन स्थिर हो जाए, जिनकी उपस्थिति में सोच सहज हो और भीतर कोई खिंचाव न हो... वही सही संग है। सही संग वह नहीं जो सिर्फ हँसी या बातचीत दे, बल्कि वह है जो भीतर की उथल-पुथल को शांत कर दे। जहाँ दिखावा नहीं, दबाव नहीं, और खुद को साबित करने की जरूरत न पड़े। ऐसे संबंधों में शब्द कम और अनुभूति गहरी होती है। जब मन स्थिर रहता है, तो निर्णय स्पष्ट होते हैं, भावनाएँ संतुलित रहती हैं और जीवन अपनी लय में चलने लगता है। इसलिए लोगों को उनके व्यवहार से नहीं, उनके साथ अपने मन की स्थिति से पहचानिए... क्योंकि सही संग वही है, जो आपको अपने भीतर से जोड़ दे।
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