जब फसलों को आस थी बरसात की,
शहर में बरसता रहा, गांव तरसता रहा!
सुख गए पुल-पुलिया, फसल झुलसता रहा!
बंजड़ हुई जमीनें, आंखें नम बरसता रहा!
लाखों की क्षति देख,तड़पता रहा!
फिर भी बचें फसलों पर, उम्मीद थोड़ा जगता रहा!
खेतों में अब वह, धिरे-धिरे पलता-फलता रहा!
अब फसलों को आस न थी बरसात की,
बस कुछ दिनों में पक कर, कटने की जज़्बात रहा!
फिर घनघोर बरसात ऐसी, सभी फसलें बर्बाद रहा!
महकते-गमकते सुनहरे बाल, लूढकर जमीन पे सो रहा!
टूटकर बिखर गए किसान भी, अब न कोई आस रहा!
प्रकृती किं महिमा ऐसी, केवल किसान ही बर्बाद रहा!
कहीं यह प्रकृति के साथ घेलवाड़ करने का वज़ह तो नहीं!
पेड़-पौधों की रक्षा करना, नये पेड़-पौधे लगाना,
मिट्टी-पानी का संरक्षण करना अति आवश्यक हो गया...
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