बर्फ से ढकी उस ऊँची पहाड़ी पर रात गहराने लगी थी। ठंडी हवाएँ ऐसे चल रही थीं मानो परीक्षा ले रही हों—हिम्मत की, संकल्प की। सीमा चौकी पर तैनात उप निरीक्षक अर्जुन सिंह, सशस्त्र सीमा बल का जवान, अपनी राइफल थामे दूर क्षितिज को निहार रहा था। देश की सीमा उसके सामने थी और देश का विश्वास उसके कंधों पर।
हज़ारों किलोमीटर दूर, एक छोटे से गाँव में, उसकी माँ हर शाम एक दीया जलाती थी।
“जब तक दीया जलता है, मेरा बेटा सुरक्षित है,” वह खुद से कहती।
अर्जुन को याद आया—पिछली छुट्टी में उसकी बेटी ने मासूमियत से पूछा था,
“पापा, आप हमेशा दूसरों की रखवाली करते हो, आपकी रखवाली कौन करता है?”
उस सवाल का जवाब शायद उसके पास नहीं था, पर आँखों में गर्व ज़रूर था।
उस रात सीमा पर हलचल हुई। दुश्मन की नापाक हरकत को अर्जुन और उसके साथियों ने समय रहते रोक लिया। गोलियों की आवाज़, बर्फ में दौड़ते कदम और “भारत माता की जय” का नारा—सब कुछ कुछ ही पलों में इतिहास बन गया।
अर्जुन घायल हुआ, पर डटा रहा… क्योंकि उसे पता था—अगर वह रुका, तो देश असुरक्षित होगा।
सुबह जब सूरज निकला, सीमा सुरक्षित थी।
और गाँव में माँ का दीया अब भी जल रहा था।
आज अर्जुन जैसे अनगिनत जवान हैं—
जो अपने परिवार से दूर,
अपने सुख-दुख को पीछे छोड़,
देश की सीमाओं पर खड़े हैं।
और उनके पीछे खड़े हैं उनके परिजन—
माँ, जो हर दिन प्रार्थना करती है
पत्नी, जो आँसू छुपाकर मुस्कुराती है
बच्चे, जो गर्व के साथ कहते हैं—
“मेरे पापा SSB में हैं।”
नमन है उन वीरों को
जो सीमा पर खड़े हैं, ताकि हम चैन की नींद सो सकें।
नमन है उन परिजनों को, जिनका त्याग भी उतना ही महान है।
सशस्त्र सीमा बल स्थापना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
आपका साहस, आपका बलिदान—भारत की पहचान है। 🇮🇳
जय हिन्द जय भारत 🇮🇳
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