"आज तू मेरे अंग लगा है, आज से ये संसार तुझे गुरु अंगद देव के नाम से जानेगा।" 🚩
एक दिन गुरु नानक देव जी ने अजब वेश धारण किया: काले वस्त्र, हाथ में चिमटा, एक झोला और साथ में कुछ खूंखार कुत्ते। बिल्कुल काल भैरव का रूप धरकर वे करतारपुर नगर से बाहर की तरफ जाने लगे। उनके पीछे-पीछे सारी संगत भी चल पड़ी।
कुछ दूर चलकर गुरु नानक साहेब ने मुड़कर देखा, अपने झोले में हाथ डाला, सोने के सिक्के निकाले और संगत की तरफ उछाल दिए। कुछ लोग वो सिक्के इकट्ठे करने लग गए और वहीं रुक गए। गुरु साहेब आगे बढ़ गए।
कुछ दूर जाकर उन्होंने झोले से हीरे निकाले और संगत की तरफ फेंके। फिर कुछ आगे जाकर रत्न, फिर पन्ने... हर बार दुनियावी चीजों के मोह में पड़कर लोग वहीं रुकते गए और संगत कम होती गई।
जब मुट्ठी भर लोग ही पीछे रह गए, तो महाराज ने उन पर खूंखार कुत्ते छोड़ दिए। डर के मारे सब भाग गए, बस दो सिख रह गए— भाई लहणा जी और बाबा बुड्ढा जी। अब गुरु नानक साहेब ने उन्हें चिमटे से पीटना शुरू कर दिया, पर वे मौन रहकर मार सहते रहे और पीछे चलते रहे।
गुरु नानक साहेब ने बाबा बुड्ढा जी को रुकने का इशारा किया, तो वे भी गुरु का हुक्म मानकर वहीं हाथ जोड़कर रुक गए। गुरु जी ने पूछा, "लहणे, देख सारे मुझे छोड़ कर चले गए, मेरा सबसे बड़ा सेवक बुड्ढा भी रुक गया, तू क्यों नहीं जाता?"
भाई लहणा जी ने हाथ जोड़कर कहा:
"सतगुरु... जिनको तुझसे संतान की आस थी, वो मुराद पा कर मुड़ गए। कोई सोने की चाह में सोना ले गया, कोई हीरे की चाह में हीरे। कोई तेरी रम्ज़ में छुपे भले को नहीं देख पाया, तो तेरे दिए दुख से डर कर चला गया। किसी को तूने रुकने का इशारा कर दिया तो वो तेरे हुक्म में रुक गया... लेकिन दाता, मैं कहाँ जाऊँ? मेरा कुनबा भी तू, मेरी ओट भी तू, मेरा आसरा भी तू, मेरा बल भी तू, मेरी बुद्धि भी तू, और मेरा धन भी तू। मैं आपके बिना अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता।"
यह सुनकर गुरु नानक साहेब ने कहा, "लहणे, जब तेरा सब कुछ मैं हूँ, तो ठीक है। वहां जो वो एक मुर्दा शरीर पड़ा है, जा उसे खा कर आ।"
भाई लहणा जी उठे, उस मुर्दे के निकट गए और बैठ गए। गुरु नानक साहेब बोले, "लहणे बैठा क्यों है? मुर्दा खा।"
भाई लहणा जी ने नम्रता से पूछा, "सतगुरु, कहाँ से खाना शुरू करूँ? पैर की तरफ से या सिर की तरफ से?"
हुक्म हुआ— "सिर की तरफ से।"
भाई लहणा जी ने जैसे ही कफ़न हटाया, तो वहाँ कोई मुर्दा था ही नहीं, बल्कि प्रसाद था! गुरु नानक साहेब दौड़ कर आए और भाई लहणा जी को गले से लगा लिया।
"भाई लहणे... तूने सतगुरु को अपना सब कुछ माना है। तेरी सेवा धन्य है। आज तू मेरे अंग लगा है, आज से ये संसार तुझे 'गुरु अंगद देव' के नाम से जानेगा।"
. 🪷।। राधे राधे ।।🪷
. !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !!
➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶
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