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#🙏परशुराम जयंती🪔📿 सती अनुसूया और त्रिदेव अहंकार और परीक्षा की योजना एक बार देवी सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती के बीच स्वयं को श्रेष्ठ पतिव्रता सिद्ध करने की बहस छिड़ गई। जब त्रिदेवों ने ऋषि अत्रि की पत्नी माता अनुसूया को सर्वश्रेष्ठ बताया, तो ईर्ष्यावश देवियों ने त्रिदेवों को उनकी परीक्षा लेने के लिए विवश किया। त्रिदेवों का आगमन और अनुचित शर्त ब्रह्मा, विष्णु और महेश साधु का वेश धरकर महर्षि अत्रि के आश्रम पहुँचे। उस समय ऋषि आश्रम में नहीं थे। साधुओं ने अनुसूया के सामने भोजन ग्रहण करने के लिए एक अत्यंत कठिन शर्त रखी—कि वे उन्हें निर्वस्त्र होकर भोजन कराएं। सती का संकल्प और चमत्कार माता अनुसूया धर्म संकट में पड़ गईं, किंतु अपने तपोबल से उन्होंने जान लिया कि ये साधु स्वयं त्रिदेव हैं। उन्होंने अपने पति का स्मरण कर संकल्प किया कि यदि उनका पतिव्रत सच्चा है, तो ये तीनों साधु छह मास के शिशु बन जाएं। क्षण भर में त्रिदेव बालक बन गए। इसके बाद माता ने उन्हें वात्सल्य भाव से भोजन कराया। देवियों का पश्चाताप और वरदान जब सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा और त्रिदेव वापस नहीं आए, तब तीनों देवियाँ लज्जित होकर आश्रम पहुँचे और माता अनुसूया से क्षमा मांगी। माता ने शिशुओं को पुनः उनके वास्तविक रूप में बदल दिया। अनुसूया की भक्ति से प्रसन्न होकर त्रिदेवों ने उन्हें वरदान दिया और उनके पुत्रों के रूप में जन्म लिया: दत्तात्रेय (विष्णु के अंश) दुर्वासा (शिव के अंश) चंद्रदेव (ब्रह्मा के अंश) निष्कर्ष: यह कथा सिद्ध करती है कि जहाँ निष्काम भक्ति और चरित्र की शुद्धता होती है, वहाँ स्वयं ईश्वर को भी झुकना पड़ता है। . 🪷।। राधे राधे ।।🪷 . !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🔯अक्षय तृतीया पर विशेष उपाय📿🛐 #🔯अक्षय तृतीया पर विशेष लक्ष्मी पूजन📿🙏 #🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 #🙏अक्षय तृतीया का महत्व🗣️📿 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
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#🙏परशुराम जयंती🪔📿 भूमिका और राजसूय यज्ञ का संकल्प महाभारत के युद्ध में कौरवों पर विजय प्राप्त करने के बाद, हस्तिनापुर का राज्य पांडवों के अधीन आ गया। सबसे बड़े भाई, धर्मराज युधिष्ठिर, राजा बने। वे न्याय और धर्म के साक्षात् प्रतीक थे, इसलिए उनके राज्य में सब कुछ कुशल-मंगल था। समस्त हस्तिनापुर की प्रजा सुख और आनंदमय जीवन व्यतीत कर रही थी; दुःख का कहीं कोई नामो निशान न था। एक दिन, देवर्षि नारद महाराज युधिष्ठिर के पास आए। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि यद्यपि वे यहाँ वैभवशाली और सुखी जीवन जी रहे हैं, लेकिन स्वर्ग में उनके पिता, महाराज पाण्डु, बहुत दुखी हैं। जब युधिष्ठिर ने इसका कारण पूछा, तो नारद मुनि ने बताया कि पाण्डु का सपना था कि वे अपने जीवनकाल में एक भव्य 'राजसूय यज्ञ' कराएं, लेकिन वे इसे पूरा नहीं कर सके। अपनी इसी अधूरी इच्छा के कारण उनकी आत्मा अशांत और दुखी है। पिता की आत्मा की शांति और उनके सपने को पूरा करने के लिए, युधिष्ठिर ने तुरंत राजसूय यज्ञ करने का दृढ़ निर्णय लिया। ऋषि पुरुष-मृगा को आमंत्रण और भीम की खोज इस महान यज्ञ को संपन्न कराने के लिए ऋषि पुरुष-मृगा को बुलाना आवश्यक था। वे भगवान शिव के परम भक्त थे और उनका स्वरूप अत्यंत विशिष्ट था—उनका शरीर ऊपर से पुरुष का और नीचे से मृग (हिरण) का था, इसी कारण उन्हें 'पुरुष-मृगा' कहा जाता था। युधिष्ठिर ने अपने बलशाली भाई भीम को आज्ञा दी कि वे ऋषि पुरुष-मृगा को ढूंढ कर लाएं ताकि यज्ञ विधिवत पूरा हो सके। युधिष्ठिर की आज्ञा पाकर भीम जंगल की ओर चल दिए। रास्ते में, एक घने जंगल से गुजरते हुए, भीम को पवन-पुत्र हनुमान दिखाई दिए। भीम ने अपने बड़े भाई को सादर प्रणाम किया। हनुमान जी ने जब उनके आने का कारण पूछा, तो भीम ने राजसूय यज्ञ और ऋषि पुरुष-मृगा को ढूंढने की पूरी बात बताई। हनुमान जी ने कुछ क्षण सोचा और भीम को विपत्ति से बचाने के लिए अपने शरीर के तीन बाल दिए, और कहा कि ये उन्हें संकट के समय काम आएंगे। हनुमान जी का आशीर्वाद पाकर भीम आगे बढ़े। भीम और पुरुष-मृगा की दौड़ की शर्त काफी दूर तक भटकने और खोजने के बाद, भीम ने अंततः ऋषि पुरुष-मृगा को ढूंढ लिया। उस समय वे भगवान शिव के ध्यान में मग्न बैठे थे। भीम ने उन्हें प्रणाम किया और युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में चलने का निमंत्रण दिया। ऋषि तैयार हो गए, लेकिन उन्होंने भीम के सामने एक अनोखी शर्त रखी। शर्त यह थी कि भीम को हस्तिनापुर महल उनसे पहले पहुँचना होगा। यदि वे भीम से पहले पहुँच गए, तो वे भीम को खा जायेंगे। भीम सोच में पड़ गए। ऋषि पुरुष-मृगा का निचला हिस्सा हिरण का था, जिसके कारण वे अत्यंत तीव्र गति से दौड़ सकते थे। लेकिन, भीम को युधिष्ठिर की आज्ञा का पालन करना था और वे स्वयं भी पवन-पुत्र थे, उनकी गति भी बहुत तेज़ थी। साहस करके भीम ने शर्त स्वीकार कर ली और तुरंत हस्तिनापुर की ओर पूरी ताकत से दौड़ना शुरू कर दिया। दौड़, विपत्ति और हनुमान जी के बालों का चमत्कार भीम अपने पूरे वेग से दौड़ रहे थे, लेकिन जब उन्होंने पीछे मुड़कर देखा, तो ऋषि पुरुष-मृगा उनके ठीक पीछे थे। भीम को लगा कि अब वे शर्त हार जाएँगे और उनके प्राण नहीं बचेंगे। तभी उन्हें हनुमान जी द्वारा दिए गए तीन बालों की याद आई। वे समझ गए कि हनुमान जी ने उन्हें इसी विपत्ति से बचाने के लिए वे बाल दिए थे। भीम ने तुरंत एक बाल ज़मीन पर फेंक दिया। उस बाल की शक्ति से तत्काल पृथ्वी पर अनगिनत शिवलिंग प्रकट हो गए। चूँकि ऋषि पुरुष-मृगा शिव जी के परम भक्त थे, वे हर शिवलिंग को बिना पूजे आगे नहीं बढ़ सकते थे। वे प्रत्येक शिवलिंग की पूजा करते हुए आगे बढ़ने लगे, जिससे उनकी गति बहुत धीमी हो गई। सभी शिवलिंगों की पूजा समाप्त कर वे फिर तेज़ी से दौड़े और भीम के बिल्कुल करीब पहुँच गए। भीम ने फिर दूसरा बाल फेंका, और फिर से बहुत सारे शिवलिंग उत्पन्न हो गए। ऋषि फिर से पूजा में लग गए और भीम को कुछ और समय मिल गया। इसी तरह, भीम ने उन्हें पीछे रखने के लिए एक-एक कर तीनों बाल फेंक दिए और अंततः राजभवन के बिल्कुल निकट पहुँच गए। निर्णायक पल और युधिष्ठिर का न्याय जब भीम महल के द्वार में घुसने ही वाले थे, तभी पुरुष-मृगा ने उन्हें पीछे से पकड़ लिया और उनके पैर पीछे खींच लिए। इस कारण भीम के पैर महल के द्वार से बाहर रह गए। शर्त के अनुसार, चूँकि वे भीम को पकड़ चुके थे, वे उन्हें खाने के लिए आगे बढ़े। तभी वहाँ स्वयं राजा युधिष्ठिर और भगवान कृष्ण आ गए। उन्होंने ऋषि से विनती की कि वे भीम को न खाएं। ऋषि पुरुष-मृगा ने युधिष्ठिर को शर्त की बात बताई और कहा कि अब आप ही न्याय करें। युधिष्ठिर, जो धर्म और न्याय की प्रतिमूर्ति थे, ने अपना निष्पक्ष फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि "जब आपने भीम को पकड़ा, तब उसका आधा शरीर महल के अंदर और आधा बाहर था। चूँकि उसके पैर ही महल से बाहर रहे थे, इसलिए आप शर्त के अनुसार भीम के सिर्फ पैर खा सकते हैं, पूरा शरीर नहीं।" युधिष्ठिर के इस न्यायपूर्ण और चतुर फैसले से ऋषि पुरुष-मृगा अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने भीम को जीवनदान दिया और उन्हें आशीर्वाद दिया। इसके बाद, राजसूय यज्ञ अत्यंत मंगलपूर्वक संपन्न हुआ। ऋषि पुरुष-मृगा ने सबको आशीर्वाद दिया और फिर से अपने आश्रम को लौट गए। . 🪷।। राधे राधे ।।🪷 . !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🙏अक्षय तृतीया का महत्व🗣️📿 #🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 #🔯अक्षय तृतीया पर विशेष लक्ष्मी पूजन📿🙏 #🔯अक्षय तृतीया पर विशेष उपाय📿🛐 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
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#🙏परशुराम जयंती🪔📿 🪷 ईश्वर के सामने हर जीव 'स्त्री' (शरणागत) है और केवल परमात्मा ही एकमात्र 'पुरुष' है। जानिए मीरा बाई और जीव गोस्वामी के मिलन की यह ज्ञानवर्धक और अद्भुत कथा। राधे-राधे! 🙏✨ ॥ वृंदावन में केवल एक ही पुरुष हैं— श्री कृष्ण! ॥ 🦚 यह उस समय की बात है जब मेवाड़ में मीरा बाई पर अत्याचार अपनी सीमा पार कर चुके थे। सांसारिक मोह त्यागकर मीरा बाई अपने आराध्य की नगरी 'वृंदावन' आ गईं। वहाँ पहुँचकर उनकी इच्छा प्रसिद्ध संत और वैष्णव संप्रदाय के मुखिया 'जीव गोस्वामी' जी से मिलने की हुई। किंतु, जब मीरा जी का संदेश उन तक पहुँचा, तो जीव गोस्वामी जी ने यह कहकर मिलने से साफ इंकार कर दिया कि— "मैं एक संन्यासी हूँ और किसी स्त्री का मुख नहीं देखता।" ✉️ मीरा बाई का वह ऐतिहासिक संदेश: संत का यह उत्तर सुनकर मीरा बाई मुस्कुराईं और उन्होंने एक अत्यंत मार्मिक और ज्ञानपूर्ण संदेश वापस भिजवाया। उन्होंने कहा— "मुझे लगा था कि वृंदावन में केवल एक ही पुरुष हैं— स्वयं श्री कृष्ण! आज मुझे पता चला कि यहाँ उनके अलावा कोई और भी है, जो स्वयं को 'पुरुष' मानता है।" ⚡ अहंकार टूटा और हुआ अद्भुत चमत्कार: मीरा बाई के इस एक वाक्य ने जीव गोस्वामी के ज्ञान के अहंकार को भीतर तक झकझोर दिया। अगले ही पल मंदिर में एक अद्भुत चमत्कार हुआ! गर्भगृह के पट स्वयं जीव गोस्वामी जी ने बंद किए थे, किंतु जब उन्होंने अंदर देखा तो भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति स्त्री के वेश (घाघरा-चोली और आभूषणों) में सजी हुई दिखाई दी। यह स्पष्ट रूप से भगवान का संकेत था। 🌟 कथा का सार (परम ज्ञान): जीव गोस्वामी जी तुरंत समझ गए कि भक्ति के मार्ग में भौतिक शरीर या लिंग का कोई अस्तित्व नहीं है। परमार्थ के सत्य में— हर जीव 'प्रकृति' (स्त्री / शरणागत भाव) है और केवल परमात्मा (श्री कृष्ण) ही इस ब्रह्मांड के एकमात्र 'पुरुष' हैं। उन्हें अपनी भूल का आभास हुआ और वे तुरंत नंगे पैर दौड़कर मीरा बाई के पास गए। उन्होंने मीरा जी के समक्ष नतमस्तक होकर क्षमा मांगी। उस क्षण जीव गोस्वामी जी को मीरा और कृष्ण एक-दूसरे में पूर्णतः समाहित दिखाई दिए, जो भक्त और भगवान की परम एकता का साक्षात प्रमाण था। ॥ प्रेम से बोलिए... राधे-राधे ॥ 🌺🙏 . 🪷।। राधे राधे ।।🪷 . !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🙏अक्षय तृतीया का महत्व🗣️📿 #🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 #🔯अक्षय तृतीया पर विशेष लक्ष्मी पूजन📿🙏 #🔯अक्षय तृतीया पर विशेष उपाय📿🛐 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
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#🙏परशुराम जयंती🪔📿 🛕 जब एक भक्त की हठ के आगे भगवान जगन्नाथ को बदलना पड़ा अपना रूप! जानिए पुरी धाम का वह अद्भुत चमत्कार जब काठ की मूर्ति में साक्षात प्रकट हुए श्रीराम। 🙏✨ ॥ जब भगवान जगन्नाथ ने तुलसीदास जी के लिए लिया श्री राम का रूप! ॥ 🛕✨ यह एक अत्यंत मार्मिक और अलौकिक प्रसंग है, जो हमें बताता है कि परमात्मा अपने सच्चे भक्त के भाव के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। 🌸 तुलसीदास जी की निराशा: एक बार गोस्वामी तुलसीदास जी अपने ईष्ट भगवान श्रीराम के दर्शन की गहरी अभिलाषा लेकर 'जगन्नाथ पुरी' पहुँचे। किंतु गर्भगृह में जब उन्होंने भगवान की हस्तपादविहीन (हाथ-पैर रहित) काष्ठ (लकड़ी) की मूर्ति देखी, तो वे ठिठक गए। उनके मन में एक टीस उठी— "सौंदर्य की पराकाष्ठा, धनुर्धारी मेरे ईष्ट श्रीराम ऐसे कैसे हो सकते हैं?" दुखी मन से वे बिना दर्शन किए मंदिर के बाहर एक वृक्ष के नीचे बैठ गए और भूखे-प्यासे ही रात बिताने का निश्चय किया। 🍚 प्रभु की लीला और महाप्रसाद: रात के समय, स्वयं प्रभु एक मनमोहक बालक का रूप धारण कर उनके पास आए और जगन्नाथ जी का 'महाप्रसाद' (भात) उन्हें खाने को दिया। लेकिन तुलसीदास जी ने यह कहकर प्रसाद लेने से मना कर दिया कि, "मैं अपने ईष्ट श्रीराम को भोग लगाए बिना कुछ ग्रहण नहीं करता, और जगन्नाथ का यह रूप मुझे स्वीकार नहीं है।" 📖 जब भगवान ने याद दिलाई 'रामचरितमानस': तब उस दिव्य बालक ने मुस्कुराते हुए तुलसीदास जी को उन्हीं की रचित 'रामचरितमानस' की एक प्रसिद्ध चौपाई याद दिलाई: "बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु कर्म करइ बिधि नाना। आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥" बालक ने समझाया— "हे तुलसी! आपने ही तो लिखा है कि परमात्मा बिना पैरों के चलता है, बिना कानों के सुनता है और बिना हाथों के सारे कर्म करता है। वही निर्गुण ब्रह्म यहाँ सगुण रूप में (भगवान जगन्नाथ के रूप में) विराजमान है।" ✨ सत्य का बोध और अद्भुत दर्शन: यह सुनते ही तुलसीदास जी को सत्य का बोध हो गया और उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। अगली सुबह जब वे पुनः गर्भगृह में दर्शन के लिए गए, तो एक अद्भुत चमत्कार हुआ! उन्हें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी के स्थान पर साक्षात् श्रीराम, लक्ष्मण और माता जानकी के दर्शन हुए। सार: भगवान का कोई एक निश्चित आकार नहीं है। भक्त जिस रूप में, जिस अटूट श्रद्धा और भाव से उन्हें पुकारता है, वे उसी रूप में उसे दर्शन देते हैं। ॥ जय जगन्नाथ ॥ ॥ सियावर रामचन्द्र की जय ॥ 🙏🌺 🚩।। जय जय सियाराम ।।🚩 🚩।। जय बजरंगबली ।।🚩 . 🚩 !! जय जय श्री राम !!🚩 ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🔯अक्षय तृतीया पर विशेष उपाय📿🛐 #🔯अक्षय तृतीया पर विशेष लक्ष्मी पूजन📿🙏 #🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 #🙏अक्षय तृतीया का महत्व🗣️📿 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
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#🙏परशुराम जयंती🪔📿 🦚 माता सीता खिला रही हैं कंजक, और प्रभु श्रीराम माता कैकेयी के भवन में खा रहे हैं 'गुलगुले'! रामनवमी के पावन अवसर पर पढ़िए अयोध्या के कनक भवन की यह अद्भुत और मीठी लीला। 🙏 ॥ अवध में आज अद्भुत कपि-कौतुक हो रहा है! ॥ 🚩 🐒 वानरों की 'बमचक' और माता का बुलावा: सुबह से ही कनक भवन के बाहर वानर समूह में भारी उत्साह और 'बमचक' मची हुई है! सुग्रीव से लेकर अंगद, हनुमान, नल और नील... सभी ज़ोर-ज़ोर से हल्ला मचा रहे हैं। शोर कनक भवन के भीतर तक गूंज रहा है। वानर भली-भांति जानते हैं कि शोर सुनकर अंदर से बुलावा ज़रूर आएगा! सबकी आँखें और कान कनक भवन के द्वार पर टिके हैं। इतने में एक संतरी बाहर आया और बोला— "आप सबको माता जानकी बुला रही हैं!" 🌸 "जो कंजक लाएगा, वही लंगूर बनेगा!" सुनते ही सारे वानर अंदर की ओर भागे। होड़ लगी है कि कौन सबसे पहले पहुँचेगा! माता जानकी ने मुस्कुराते हुए हनुमान जी से पूछा— "भैया! इतना शोर क्यों मचा रहे हो?" हनुमान जी ने बड़े भोलेपन से उत्तर दिया— "माता! आज आप कंजक जिमाएंगी (कन्या पूजन), हम लोग बस यही चर्चा कर रहे थे कि 'लंगूर' कौन बनेगा?" माता सीता हँस पड़ीं और बोलीं— "जो कंजक लाएगा, वही लंगूर बनेगा!" 👧 अवध की गलियों में वानर सेना: यह सुनते ही पूरा वानर समूह वहां से गायब हो गया और सीधे अयोध्या की गलियों में पहुँच गया। बालिकाओं के हाथ-पैर जोड़े जा रहे हैं— "हमारे साथ कनक भवन चलो, वहाँ माता जानकी प्रतीक्षा कर रही हैं!" देखते ही देखते प्रत्येक वानर नौ-नौ कन्याओं को लेकर भवन वापस लौट आया। ✨ देवों का बाल रूप और अद्भुत पंगत: अब कनक भवन में तिल रखने की जगह नहीं बची है; चारों ओर केवल वानर और कन्याएं ही दिख रही हैं। आज माता सीता के हाथों का प्रसाद पाने के लिए स्वयं देवी-देवता भी बाल रूप धरकर वानरों के साथ आ बैठे हैं! जगत जननी माता जानकी अपने अनूप रूप में हैं। अपनी योगमाया से वे हर नौ बालिकाओं और एक लंगूर के साथ स्वयं कंजक जीम रही हैं। महादेवी सीता के हाथों से बने हलवा-पूरी का स्वाद चखने वाले वानरों का यह अहोभाग्य देखकर आज तीनों लोक सिहा रहे हैं (प्रसन्नता से ईर्ष्या कर रहे हैं)। 🥣 प्रभु श्रीराम कहाँ हैं? प्रसाद ग्रहण करने के बाद सभी अत्यंत प्रसन्न हैं। तभी हनुमान जी बोले— "माता का प्रसाद तो मिल गया, अब प्रभु श्रीराम से भी भेंट की जाए। लेकिन प्रभु सुबह से दिखे नहीं, वे कहाँ हैं?" सुग्रीव ने पूछा। अंगद ने मुस्कुराते हुए सूचना दी— "प्रभु माता कैकेयी के भवन में हैं, आज माता ने उनके लिए 'गुलगुले' बनाए हैं!" 'गुलगुले' का नाम सुनते ही वानरों की आँखों में फिर से चमक आ गई। 🌟 सार: आज अयोध्या की हर घड़ी में आनंद के क्षणों का वास है। पूरे 14 वर्षों के वनवास के बाद आज प्रभु श्रीराम का जन्मोत्सव अवध में मनाया जा रहा है। सुख के फूल ऐसे झर रहे हैं कि उनकी सुगंध से जन-जन का मन मधुर और आत्मा पुलकित हो उठी है! ॥ सियावर रामचन्द्र की जय ॥ ॥ पवनसुत हनुमान की जय ॥ 🌺🙏 🚩।। जय जय सियाराम ।।🚩 🚩।। जय बजरंगबली ।।🚩 . 🚩 !! जय जय श्री राम !!🚩 ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🙏अक्षय तृतीया का महत्व🗣️📿 #🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 #🔯अक्षय तृतीया पर विशेष लक्ष्मी पूजन📿🙏 #🔯अक्षय तृतीया पर विशेष उपाय📿🛐 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
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#🙏परशुराम जयंती🪔📿 🦚 हनुमान जी का आशीर्वाद मिल गया, तो समझो सारे काम बन गए! सभी बिगड़े काम चुटकियों में पूरे करने वाले 5 सिद्ध और अचूक उपाय... पोस्ट को सेव (Save) अवश्य करें। 🙏✨ ॥ संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥ 🚩 कहा जाता है कि कलयुग में हनुमान जी साक्षात पृथ्वी पर विद्यमान हैं। जहाँ भी श्रीराम कथा या सुंदरकांड का पाठ होता है, वहाँ हनुमान जी की उपस्थिति हमेशा महसूस की जाती है। महावीर, रुद्रावतार, पवन पुत्र और अंजनी पुत्र के नाम से प्रसिद्ध बजरंगबली का आशीर्वाद मिल जाए, तो समझो सारे बिगड़े काम चुटकियों में बन गए! हनुमान जी की पूजा से काले जादू, आर्थिक तंगी, स्वास्थ्य समस्याओं, नकारात्मक ऊर्जा और अनजाने डर से तुरंत निजात मिलती है। आइए जानते हैं संकटमोचन को प्रसन्न करने के 5 अचूक उपाय: 🪐 1. शनि दोष और अड़चनों से मुक्ति: यदि शनिदेव कोई समस्या खड़ी कर रहे हैं और पूजा-पाठ के बाद भी समाधान नहीं मिल रहा, तो शनिवार को हनुमान जी को चोला चढ़ाएं। साथ ही सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित कर तिल के तेल का दीपक जलाएं। हनुमान चालीसा का पाठ करें और काले चने व गुड़ के साथ नारियल चढ़ाकर हनुमान जी के 108 नामों का स्मरण करें। निश्चित ही आपकी ज़िंदगी में सकारात्मक बदलाव आएंगे। 🔴 2. मंगल दोष और स्वास्थ्य लाभ के लिए: अगर मंगल ग्रह के कारण जीवन में स्वास्थ्य संबंधी या अन्य बड़ी समस्याएं आ रही हैं, तो मंगलवार को हनुमान जी को चोला, चमेली का तेल, सिंदूर, चने और सूरजमुखी के फूल अर्पित करें। इसके बाद पीपल के 9 पत्तों पर चंदन से 'श्रीराम' लिखकर हनुमान जी को चढ़ाएं और उनकी 108 परिक्रमा करते हुए प्रार्थना करें। आपके सारे काम तुरंत बनने लगेंगे। 😨 3. डर, तनाव और मानसिक शांति के लिए: अगर कोई अनजाना डर आपका पीछा नहीं छोड़ रहा और आप मानसिक तनाव में हैं, तो 7 दिनों तक हनुमान जी की विशेष पूजा का संकल्प लें। प्रतिदिन हनुमान अष्टक और हनुमान चालीसा का 100 बार पाठ करें। यह हनुमान जी का सिद्ध कवच है, जो निश्चित ही आपको हर भय से मुक्त कर देगा। 🥥 4. मनोकामना पूर्ति का विशेष उपाय: बजरंगबली को पूर्णतः प्रसन्न करने के लिए एक लाल धागा (कच्चा सूत/मौली) अपनी ऊंचाई (कद) के बराबर नाप लें। उसे एक जटा वाले नारियल पर लपेट दें। अब उस पर केसर या सिंदूर से 'स्वास्तिक' बनाएं और हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए वह नारियल प्रभु के चरणों में अर्पित कर दें। ✨ 5. नवग्रह शांति और आर्थिक समृद्धि: अगर आपको लगातार ग्रहों की चाल सता रही है, तो प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी के मंदिर जाएं। प्रभु का दर्शन कर वहां काले चने और गुड़ का प्रसाद बांटें तथा वहीं बैठकर हनुमान चालीसा का श्रद्धापूर्वक जाप करें। सार: निर्मल मन से की गई बजरंगबली की आराधना कभी व्यर्थ नहीं जाती। वे अपने भक्तों पर सदा कृपा बनाए रखते हैं! ॥ सियावर रामचन्द्र की जय ॥ ॥ पवनसुत हनुमान की जय ॥ 🌺🙏 🚩।। जय जय सियाराम ।।🚩 🚩।। जय बजरंगबली ।।🚩 . 🚩 !! जय जय श्री राम !!🚩 ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🔯अक्षय तृतीया पर विशेष उपाय📿🛐 #🔯अक्षय तृतीया पर विशेष लक्ष्मी पूजन📿🙏 #🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 #🙏अक्षय तृतीया का महत्व🗣️📿 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
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#🙏परशुराम जयंती🪔📿 बैठे-बैठे पैर हिलाना: एक बुरी आदत या गंभीर समस्या? ॥ 🛑 अक्सर जब हम बैठे-बैठे पैर हिलाते हैं, तो घर के बड़े-बुजुर्ग हमें तुरंत टोक देते हैं। देखने में यह एक सामान्य सी बात लगती है, लेकिन इसके पीछे बहुत गहरे धार्मिक और वैज्ञानिक कारण छिपे हैं। हमारी दैनिक आदतें हमारे भाग्य और स्वास्थ्य दोनों को सीधे प्रभावित करती हैं। आइए जानते हैं शास्त्रों और विज्ञान की नज़र में यह आदत क्यों हानिकारक है: 🙏 शास्त्रों और धर्म के अनुसार (आध्यात्मिक कारण): 💸 धन का नाश: शास्त्रों में पैर हिलाने को बेहद अशुभ माना गया है। मान्यताओं के अनुसार, शाम के समय बैठे-बैठे पैर हिलाने से धन की देवी महालक्ष्मी रुष्ट हो जाती हैं, जिससे पैसों की तंगी और आर्थिक कार्यों में रुकावट आती है। 📿 पूजा का फल नष्ट होना: यदि कोई व्यक्ति पूजा-पाठ या किसी धार्मिक कार्य में बैठकर पैर हिलाता है, तो उसे उस कर्म का पूर्ण पुण्य प्राप्त नहीं होता। 🧠 चंचलता का प्रतीक: यह अस्थिर दिमाग और अनियंत्रित शारीरिक क्रिया का द्योतक है, जो एकाग्रता को भंग करता है। 🔬 मेडिकल साइंस के अनुसार (वैज्ञानिक कारण): 🦵 रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम (RLS): मेडिकल साइंस में इस लगातार पैर हिलाने की आदत को 'रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम' नामक बीमारी से जोड़ा जाता है। यह अक्सर मानसिक परेशानी, तनाव और नींद पूरी न होने के कारण होता है। ❤️ हृदय रोगों का खतरा: शोधकर्ताओं का स्पष्ट कहना है कि इस बीमारी (RLS) से ग्रस्त लोगों में 'कार्डियोवैस्कुलर' (Cardiovascular) बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है। लगातार पैर हिलाने से ब्लड प्रेशर और दिल की धड़कनें असंतुलित हो सकती हैं। 🦴 जोड़ों और नसों में दर्द: इस आदत से पैरों की नसों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है, जिससे घुटनों और जोड़ों में दर्द की समस्या जन्म ले सकती है। 🌟 निष्कर्ष: अब आप ही सोचिए, हमारे बड़े-बुजुर्ग जो कहते हैं, क्या वह गलत है? बिल्कुल नहीं! जो बातें हमारे वेदों और धर्मग्रंथों में हजारों साल पहले कह दी गई थीं, आज के वैज्ञानिक शोध उन्हीं बातों को प्रमाणित कर रहे हैं। इसलिए, अगर आपको भी यह आदत है, तो आज ही इसे सुधारने का प्रयास करें! स्वस्थ रहें, समृद्ध रहें। ॥ जय सनातन धर्म ॥ 🙏🌺 🚩।। जय जय सियाराम ।।🚩 🚩।। जय बजरंगबली ।।🚩 . 🚩 !! जय जय श्री राम !!🚩 ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🙏अक्षय तृतीया का महत्व🗣️📿 #🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 #🔯अक्षय तृतीया पर विशेष लक्ष्मी पूजन📿🙏 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/ #🔯अक्षय तृतीया पर विशेष उपाय📿🛐
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4 hours ago
#🙏परशुराम जयंती🪔📿 ॥ जोग और भोग: जैसी करनी, वैसी भरनी ॥ 🚩 एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों की सभा बुलाकर एक गूढ़ प्रश्न किया: "मेरी जन्म पत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था और मैं राजा बना। किन्तु उसी घड़ी और मुहूर्त में कई अन्य जातकों ने भी जन्म लिया होगा, वे राजा क्यों नहीं बन सके? एक ही मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके भाग्य अलग-अलग क्यों हैं?" राजा के इस प्रश्न से सभी विद्वान निरुत्तर हो गए। अचानक एक वृद्ध खड़े हुए और बोले— "महाराज! आपके प्रश्न का उत्तर घने जंगल में तपस्या कर रहे एक महात्मा दे सकते हैं।" 🔥 अंगार खाने वाले महात्मा: राजा की जिज्ञासा बढ़ी और वह जंगल पहुँचा। वहाँ उसने देखा कि एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठकर गरमा-गरम कोयले (अंगार) खा रहे हैं! सहमे हुए राजा ने जैसे ही प्रश्न पूछा, महात्मा ने क्रोधित होकर कहा— "मेरे पास समय नहीं है, मैं भूख से पीड़ित हूँ! तेरे प्रश्न का उत्तर आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं, वे दे सकते हैं।" 🩸 अपना ही मांस नोचने वाले महात्मा: राजा पुनः अंधकार और पहाड़ी मार्ग पार कर दूसरे महात्मा के पास पहुँचा। वहाँ का दृश्य देखकर राजा हक्का-बक्का रह गया! वे महात्मा अपना ही माँस चिमटे से नोच-नोच कर खा रहे थे। उन्होंने भी डांटते हुए कहा— "मैं भूख से बेचैन हूँ! आगे जाओ, पहाड़ियों के उस पार एक आदिवासी गाँव में एक बालक जन्म लेने वाला है, जो कुछ ही देर तक जिन्दा रहेगा। सूर्योदय से पूर्व वहाँ पहुँचो, वही तेरे प्रश्न का उत्तर देगा।" 👶 नवजात बालक का रहस्योद्घाटन: उत्सुकता से भरा राजा कठिन मार्ग पार कर सुबह होने तक उस गाँव में पहुँचा। जैसे ही वह बालक पैदा हुआ, दम्पत्ति ने उसे राजा के सामने उपस्थित किया। राजा को देखते ही वह नवजात बालक हँसते हुए बोला: "राजन्! मेरे पास भी समय नहीं है, अपना उत्तर सुन लो। मैं, तुम और वे दोनों महात्मा... सात जन्म पहले चारों भाई और राजकुमार थे।" "एक बार शिकार खेलते हुए हम जंगल में भटक गए। तीन दिन तक भूखे-प्यासे भटकने के बाद हमें आटे की एक पोटली मिली। जैसे-तैसे हमने चार बाटी सेंकीं। हम खाने ही वाले थे कि भूख-प्यास से तड़पते हुए एक महात्मा वहाँ आ गए।" ⚖️ कर्मों का हिसाब: बालक ने आगे बताया— "महात्मा ने अंगार खाने वाले भैया से आधी बाटी मांगी, तो उन्होंने गुस्से में कहा— 'तुम्हें दे दूँगा तो क्या मैं आग खाऊँगा? भागो यहाँ से!'" "फिर वे मांस खाने वाले भैया के पास गए, तो उन्होंने कहा— 'ये बाटी तुम्हें दे दूँगा तो क्या मैं अपना मांस नोचकर खाऊँगा?'" "वे मेरे पास आए, तो मैंने भी भूख में धैर्य खोकर कह दिया— 'चलो आगे बढ़ो, मैं क्या भूखा मरूँ?'" बालक बोला— "अंतिम आशा लिये वे महात्मा आपके पास आए। आपने उनकी दशा पर दया करते हुए, ख़ुशी-ख़ुशी अपनी आधी बाटी आदर सहित उन्हें दे दी। महात्मा बड़े खुश हुए और जाते हुए बोले— 'तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा।'" "हे राजन्! उसी घटना के आधार पर हम आज अपना-अपना भोग, भोग रहे हैं। धरती पर एक समय में अनेकों फूल खिलते हैं, किन्तु सबके फल, रूप, गुण और स्वाद भिन्न होते हैं!" इतना कहकर वह बालक मृत्यु को प्राप्त हो गया। 🌟 कथा का सार: राजा अपने महल लौट आया और समझ गया कि— एक ही मुहूर्त में अनेकों जातक जन्मते हैं, किन्तु सब अपना किया, दिया और लिया ही पाते हैं। जैसे कर्म करेंगे, वैसे ही योग बनेंगे! यही जीवन चक्र है। कारण स्पष्ट है— #अपना_कर्म! ॥ प्रेम से बोलिये.. जय जय श्री राधे ॥ 🙏🌺 . 🪷।। राधे राधे ।।🪷 . !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 #🌸जय सिया राम #🌺राधा कृष्ण💞 #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
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5 hours ago
#🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 ॥ श्री तिरुपति वेंकटेश्वर मंदिर: कलियुग का साक्षात वैकुंठ ॥ 🛕✨ आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में, समुद्र तल से 3200 फीट की ऊंचाई पर तिरुमला की पहाड़ियों पर स्थित है— भारत का सबसे प्रसिद्ध और आस्था का महान केंद्र श्री तिरुपति बालाजी मंदिर। प्राचीन संगम साहित्य में इसे 'त्रिवेंगदम' कहा गया है। दक्षिण भारतीय वास्तुकला का यह अद्भुत मंदिर चोल, होयसल और विजयनगर के राजाओं के विशेष योगदान से भव्यता के शिखर पर पहुँचा। आइए जानते हैं इस पावन तीर्थ से जुड़ी कुछ खास बातें: ⛰️ सप्तगिरि और पौराणिक अनुश्रुतियां: तिरुपति के चारों ओर स्थित पहाड़ियाँ शेषनाग के सात फनों का प्रतीक हैं, जिन्हें 'सप्तगिर‍ि' कहा जाता है। भगवान वेंकटेश्वर का मंदिर सातवीं पहाड़ी 'वेंकटाद्री' पर स्थित है। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने श्री स्वामी पुष्करणी तालाब के किनारे निवास किया था, इसलिए उन्हें तिरुपति बालाजी कहा जाता है। 11वीं सदी में संत रामानुजाचार्य ने इस पहाड़ी पर चढ़ाई की थी, जहाँ प्रभु ने साक्षात दर्शन दिए। इसी आशीर्वाद से वे 120 वर्ष तक जीवित रहे। 🛕 रोचक इतिहास और प्रबंधन: 9वीं शताब्दी में पल्लव शासकों से शुरू हुआ मंदिर का सफर 15वीं सदी के विजयनगर साम्राज्य में अपनी चरम ख्याति पर पहुँचा। 1843 से 1933 तक मंदिर का प्रबंधन 'हातीरामजी मठ' के पास रहा। 1933 में मद्रास सरकार ने एक स्वतंत्र समिति बनाई, जो आज आंध्र प्रदेश सरकार के अंतर्गत तिरुमाला-तिरुपति देवस्थानम (TTD) के नाम से जानी जाती है। (रोचक तथ्य: 1951 में हैदराबाद के सातवें निज़ाम, मीर उस्मान अली खान ने भी मंदिर को 80,000 रुपये का दान दिया था।) ✨ मुख्य आकर्षण और दर्शन: यह भारत के उन चुनिंदा मंदिरों में से है, जिसके पट सभी धर्मों के लिए खुले हैं। प्रतिदिन 50,000 से अधिक श्रद्धालु यहाँ आते हैं। (दर्शन के लिए विशेष पर्ची की व्यवस्था है)। मंदिर परिसर में पडी कवली महाद्वार, कृष्ण देवराय मंडपम, आईना महल और स्वर्ण मंडित ध्वजस्तंभ जैसे अद्भुत दर्शनीय स्थल हैं। पैदल यात्रियों के लिए 'अलिपिरी' से एक विशेष मार्ग बनाया गया है। 🌺 प्रमुख उत्सव और संस्कार: ब्रह्मोत्सवम: यह यहाँ का सबसे बड़ा 9 दिवसीय पर्व है, जो कन्या राशि में सूर्य के आगमन (सितंबर-अक्टूबर) पर मनाया जाता है। यहाँ का 'पुरोहित संघम' उत्तर और दक्षिण भारतीय दोनों रिवाजों से विवाह, नामकरण और उपनयन संस्कार संपन्न कराता है। वैष्णव संप्रदाय का यह मंदिर समानता और प्रेम का संदेश देता है। मान्यता है कि वैकुंठ एकादशी पर यहाँ दर्शन करने से व्यक्ति जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है। ॥ ओम नमो वेंकटेशाय ॥ ॥ गोविंदा नमो नम: ॥ 🙏🚩 👉 सनातन धर्म के पावन तीर्थों और पौराणिक इतिहास की ऐसी ही अद्भुत जानकारी के लिए हमारे पेज को फॉलो करना न भूलें। अगर जानकारी पसंद आई हो तो पोस्ट को शेयर (Share) जरूर करें! . 🪷।। राधे राधे ।।🪷 . !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 #🚩जय श्रीराम🙏 #🌸जय सिया राम #🌺राधा कृष्ण💞 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/