#🙏परशुराम जयंती🪔📿
भूमिका और राजसूय यज्ञ का संकल्प
महाभारत के युद्ध में कौरवों पर विजय प्राप्त करने के बाद, हस्तिनापुर का राज्य पांडवों के अधीन आ गया। सबसे बड़े भाई, धर्मराज युधिष्ठिर, राजा बने। वे न्याय और धर्म के साक्षात् प्रतीक थे, इसलिए उनके राज्य में सब कुछ कुशल-मंगल था। समस्त हस्तिनापुर की प्रजा सुख और आनंदमय जीवन व्यतीत कर रही थी; दुःख का कहीं कोई नामो निशान न था।
एक दिन, देवर्षि नारद महाराज युधिष्ठिर के पास आए। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि यद्यपि वे यहाँ वैभवशाली और सुखी जीवन जी रहे हैं, लेकिन स्वर्ग में उनके पिता, महाराज पाण्डु, बहुत दुखी हैं। जब युधिष्ठिर ने इसका कारण पूछा, तो नारद मुनि ने बताया कि पाण्डु का सपना था कि वे अपने जीवनकाल में एक भव्य 'राजसूय यज्ञ' कराएं, लेकिन वे इसे पूरा नहीं कर सके। अपनी इसी अधूरी इच्छा के कारण उनकी आत्मा अशांत और दुखी है। पिता की आत्मा की शांति और उनके सपने को पूरा करने के लिए, युधिष्ठिर ने तुरंत राजसूय यज्ञ करने का दृढ़ निर्णय लिया।
ऋषि पुरुष-मृगा को आमंत्रण और भीम की खोज
इस महान यज्ञ को संपन्न कराने के लिए ऋषि पुरुष-मृगा को बुलाना आवश्यक था। वे भगवान शिव के परम भक्त थे और उनका स्वरूप अत्यंत विशिष्ट था—उनका शरीर ऊपर से पुरुष का और नीचे से मृग (हिरण) का था, इसी कारण उन्हें 'पुरुष-मृगा' कहा जाता था। युधिष्ठिर ने अपने बलशाली भाई भीम को आज्ञा दी कि वे ऋषि पुरुष-मृगा को ढूंढ कर लाएं ताकि यज्ञ विधिवत पूरा हो सके।
युधिष्ठिर की आज्ञा पाकर भीम जंगल की ओर चल दिए। रास्ते में, एक घने जंगल से गुजरते हुए, भीम को पवन-पुत्र हनुमान दिखाई दिए। भीम ने अपने बड़े भाई को सादर प्रणाम किया। हनुमान जी ने जब उनके आने का कारण पूछा, तो भीम ने राजसूय यज्ञ और ऋषि पुरुष-मृगा को ढूंढने की पूरी बात बताई। हनुमान जी ने कुछ क्षण सोचा और भीम को विपत्ति से बचाने के लिए अपने शरीर के तीन बाल दिए, और कहा कि ये उन्हें संकट के समय काम आएंगे। हनुमान जी का आशीर्वाद पाकर भीम आगे बढ़े।
भीम और पुरुष-मृगा की दौड़ की शर्त
काफी दूर तक भटकने और खोजने के बाद, भीम ने अंततः ऋषि पुरुष-मृगा को ढूंढ लिया। उस समय वे भगवान शिव के ध्यान में मग्न बैठे थे। भीम ने उन्हें प्रणाम किया और युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में चलने का निमंत्रण दिया। ऋषि तैयार हो गए, लेकिन उन्होंने भीम के सामने एक अनोखी शर्त रखी। शर्त यह थी कि भीम को हस्तिनापुर महल उनसे पहले पहुँचना होगा। यदि वे भीम से पहले पहुँच गए, तो वे भीम को खा जायेंगे।
भीम सोच में पड़ गए। ऋषि पुरुष-मृगा का निचला हिस्सा हिरण का था, जिसके कारण वे अत्यंत तीव्र गति से दौड़ सकते थे। लेकिन, भीम को युधिष्ठिर की आज्ञा का पालन करना था और वे स्वयं भी पवन-पुत्र थे, उनकी गति भी बहुत तेज़ थी। साहस करके भीम ने शर्त स्वीकार कर ली और तुरंत हस्तिनापुर की ओर पूरी ताकत से दौड़ना शुरू कर दिया।
दौड़, विपत्ति और हनुमान जी के बालों का चमत्कार
भीम अपने पूरे वेग से दौड़ रहे थे, लेकिन जब उन्होंने पीछे मुड़कर देखा, तो ऋषि पुरुष-मृगा उनके ठीक पीछे थे। भीम को लगा कि अब वे शर्त हार जाएँगे और उनके प्राण नहीं बचेंगे। तभी उन्हें हनुमान जी द्वारा दिए गए तीन बालों की याद आई। वे समझ गए कि हनुमान जी ने उन्हें इसी विपत्ति से बचाने के लिए वे बाल दिए थे।
भीम ने तुरंत एक बाल ज़मीन पर फेंक दिया। उस बाल की शक्ति से तत्काल पृथ्वी पर अनगिनत शिवलिंग प्रकट हो गए। चूँकि ऋषि पुरुष-मृगा शिव जी के परम भक्त थे, वे हर शिवलिंग को बिना पूजे आगे नहीं बढ़ सकते थे। वे प्रत्येक शिवलिंग की पूजा करते हुए आगे बढ़ने लगे, जिससे उनकी गति बहुत धीमी हो गई। सभी शिवलिंगों की पूजा समाप्त कर वे फिर तेज़ी से दौड़े और भीम के बिल्कुल करीब पहुँच गए।
भीम ने फिर दूसरा बाल फेंका, और फिर से बहुत सारे शिवलिंग उत्पन्न हो गए। ऋषि फिर से पूजा में लग गए और भीम को कुछ और समय मिल गया। इसी तरह, भीम ने उन्हें पीछे रखने के लिए एक-एक कर तीनों बाल फेंक दिए और अंततः राजभवन के बिल्कुल निकट पहुँच गए।
निर्णायक पल और युधिष्ठिर का न्याय
जब भीम महल के द्वार में घुसने ही वाले थे, तभी पुरुष-मृगा ने उन्हें पीछे से पकड़ लिया और उनके पैर पीछे खींच लिए। इस कारण भीम के पैर महल के द्वार से बाहर रह गए। शर्त के अनुसार, चूँकि वे भीम को पकड़ चुके थे, वे उन्हें खाने के लिए आगे बढ़े।
तभी वहाँ स्वयं राजा युधिष्ठिर और भगवान कृष्ण आ गए। उन्होंने ऋषि से विनती की कि वे भीम को न खाएं। ऋषि पुरुष-मृगा ने युधिष्ठिर को शर्त की बात बताई और कहा कि अब आप ही न्याय करें। युधिष्ठिर, जो धर्म और न्याय की प्रतिमूर्ति थे, ने अपना निष्पक्ष फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि "जब आपने भीम को पकड़ा, तब उसका आधा शरीर महल के अंदर और आधा बाहर था। चूँकि उसके पैर ही महल से बाहर रहे थे, इसलिए आप शर्त के अनुसार भीम के सिर्फ पैर खा सकते हैं, पूरा शरीर नहीं।"
युधिष्ठिर के इस न्यायपूर्ण और चतुर फैसले से ऋषि पुरुष-मृगा अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने भीम को जीवनदान दिया और उन्हें आशीर्वाद दिया। इसके बाद, राजसूय यज्ञ अत्यंत मंगलपूर्वक संपन्न हुआ। ऋषि पुरुष-मृगा ने सबको आशीर्वाद दिया और फिर से अपने आश्रम को लौट गए।
. 🪷।। राधे राधे ।।🪷
. !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !!
➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶
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