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कृष्णा नदी, जिसे श्रद्धा से कृष्णावेणी भी कहा जाता है, दक्षिण भारत की सबसे पवित्र और जीवनदायिनी नदियों में से एक है। इसकी उत्पत्ति केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि गहरी धार्मिक मान्यताओं और देवताओं की दिव्य लीलाओं से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि इस पावन नदी का उद्गम महाराष्ट्र के महाबलेश्वर में हुआ। इसके पीछे एक अत्यंत रोचक पौराणिक कथा प्रचलित है, जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव की दिव्य घटनाओं से संबंधित है। कथा के अनुसार, एक समय ब्रह्मा जी महाबलेश्वर के समीप एक विशाल यज्ञ कर रहे थे। उस यज्ञ में उनकी पत्नी सावित्री का उपस्थित होना आवश्यक था, लेकिन वे समय पर नहीं पहुँच सकीं। यज्ञ का शुभ मुहूर्त निकलता जा रहा था, इसलिए ब्रह्मा जी ने वहाँ उपस्थित गायत्री से विवाह कर यज्ञ पूर्ण करने का निर्णय लिया। जब सावित्री वहाँ पहुँचीं और उन्होंने ब्रह्मा जी के पास किसी अन्य स्त्री को देखा, तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठीं। क्रोध में आकर उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) को श्राप दे दिया कि वे तीनों पृथ्वी पर नदियों के रूप में प्रवाहित होंगे। इस श्राप के प्रभाव से तीनों देवताओं ने नदी स्वरूप धारण किया— विष्णु जी कृष्णा नदी के रूप में प्रकट हुए, शिव जी वेणी नदी बने, और ब्रह्मा जी कुमुदनी नदी के रूप में प्रवाहित हुए। कुछ समय बाद जब सावित्री का क्रोध शांत हुआ, तो उन्हें अपनी भूल का आभास हुआ। उन्होंने श्राप को पूर्णतः समाप्त तो नहीं किया, लेकिन यह वरदान दिया कि देवताओं का दिव्य अंश नदी के रूप में पृथ्वी पर रहेगा और मानवता का कल्याण करेगा। इसी कारण कृष्णा नदी को भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है और इसमें स्नान करना अत्यंत पुण्यदायक बताया गया है। आगे चलकर वेणी और अन्य नदियाँ इसमें मिलती हैं, जिससे यह एक विशाल और जीवन देने वाली धारा बन जाती है। कृष्णा नदी से जुड़े प्रमुख तथ्य: इसका उद्गम महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थित महाबलेश्वर के गौमुख से होता है। महाबलेश्वर में पंचगंगा के रूप में पाँच नदियों—कृष्णा, वेणी, कोयना, सावित्री और गायत्री—का संगम माना जाता है। यह नदी महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से बहती हुई अंततः बंगाल की खाड़ी में समा जाती है। धार्मिक दृष्टि से इसे भगवान विष्णु का रूप माना जाता है, इसलिए इसका जल अत्यंत पवित्र और मोक्षदायक माना जाता है। जय कृष्णा मैया! 🚩 . 🪷।। राधे राधे ।।🪷 . !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #👏भगवान विष्णु😇 #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 #🌺राधा कृष्ण💞 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
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4 hours ago
महर्षि जमदग्नि की पत्नी माता रेणुका के तपोबल में तब बाधा आई, जब गंधर्वों को देख उनका मन क्षण भर के लिए विचलित हो गया। इस मानसिक विचलन के कारण उनका सिद्ध जल-पात्र टूट गया। क्रोधवश ऋषि जमदग्नि ने अपने पुत्रों को माता के वध का आदेश दिया। चार पुत्रों के मना करने पर वे पत्थर के हो गए, किंतु सबसे छोटे पुत्र परशुराम ने पितृ-आज्ञा को धर्म मानकर माता का वध कर दिया। पिता के प्रसन्न होने पर परशुराम जी ने वरदान में माता और भाइयों का जीवन पुनः मांग लिया, जिससे वे जीवित तो हो गए, किंतु मातृ-हत्या के सूक्ष्म पाप स्वरूप उनका फरसा (कुल्हाड़ी) उनके हाथों से चिपक गया। वर्षों तक अनेक तीर्थों में भटकने के बाद, जब वे अरुणाचल प्रदेश की पहाड़ियों में स्थित लोहित नदी के तट पर पहुंचे और उस पवित्र कुंड में स्नान किया, तब वह फरसा उनके हाथों से अलग हुआ। यही स्थान आज परशुराम कुंड के नाम से विख्यात है, जो हमें सिखाता है कि धर्म का मार्ग अत्यंत कठिन है, परंतु सच्ची भक्ति और प्रायश्चित से हर पाप का शमन संभव है। ।। ॐ नमः शिवाय ।। ।। हर हर महादेव ।। . !! जय जय श्री महाकाल !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌺राधा कृष्ण💞 #👏भगवान विष्णु😇 #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
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4 hours ago
१. त्रेता में जो राम थे, द्वापर कृष्ण वही: इस पंक्ति का अर्थ है कि समय (युग) बदल गया, लेकिन शक्ति वही रही। 'त्रेता युग' में जो मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के रूप में अवतरित हुए थे, वही परम तत्व 'द्वापर युग' में श्री कृष्ण के रूप में प्रकट हुए। यह हमें सिखाता है कि सत्य एक ही है, बस वह अलग-अलग कालखंडों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। २. रूप बदले पर तत्व नहीं: ईश्वर जब अवतार लेते हैं, तो उनके शरीर, उनकी लीलाएं और उनके सामाजिक नियम (मर्यादा बनाम प्रेम) अलग हो सकते हैं। राम 'मर्यादा' के प्रतीक थे, तो कृष्ण 'लीला' और 'ज्ञान' के। लेकिन उनके भीतर का 'तत्व' (दिव्यता, चेतना और परमात्मा का अंश) बिल्कुल एक समान और अपरिवर्तित रहा। ३. बात का सार यही: अंत में हमें बाहरी रूपों या नामों के भेद में नहीं फंसना चाहिए। चाहे हम राम की पूजा करें या कृष्ण की, हम उसी एक अखंड सत्ता का ध्यान कर रहे हैं। 🚩।। जय जय सियाराम ।।🚩 🚩।। जय बजरंगबली ।।🚩 . 🚩 !! जय जय श्री राम !!🚩 ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/ #🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #👏भगवान विष्णु😇
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🌸 जब एक साधारण कन्या की निश्छल भक्ति से माँ लक्ष्मी बनीं उसकी सहेली! 🌸 आइए पढ़ते हैं সত्यता, भक्ति और माँ लक्ष्मी की कृपा की एक अत्यंत अद्भुत और पौराणिक कथा: 🌿 पीपल की सेवा और दिव्य मित्रता: एक साहूकार की बेटी अत्यंत संस्कारी थी। वह प्रतिदिन नियम से पीपल के वृक्ष में जल चढ़ाती थी, जहाँ माता लक्ष्मी का वास होता है। कन्या की श्रद्धा देखकर माँ लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने उसे अपनी सहेली बना लिया। एक दिन माँ ने उसे अपने महल में आमंत्रित कर बड़े राजसी ठाट-बाट से भोजन कराया। विदा लेते समय, उस कन्या ने भी अत्यंत प्रेम से अपनी 'सहेली' को अपने घर आने का निमंत्रण दे दिया, जिसे माँ ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। 🏚️ गरीबी की चिंता और ईमानदारी का फल: घर लौटकर कन्या अपनी गरीबी देखकर उदास हो गई कि वह इतने बड़े मेहमान का स्वागत कैसे करेगी? उसके पिता ने ढांढस बंधाते हुए कहा- "बेटी, धैर्य रखो। घर को लीप-पोत कर साफ करो और श्रद्धा से चौमुखा दीया जलाओ।" तभी एक चमत्कार हुआ! एक चील उड़ते हुए रानी का बेशकीमती 'नौलखा हार' उनके आंगन में गिरा गई। साहूकार ने ज़रा भी लोभ न करते हुए वह हार तुरंत राजा को लौटा दिया। राजा इस ईमानदारी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कन्या की सहेली के स्वागत के लिए सभी राजसी वस्तुओं और छप्पन भोग की भव्य व्यवस्था करवा दी। 🪷 घर पधारीं माँ लक्ष्मी: नियत समय पर कन्या के निमंत्रण को मान देकर भगवान श्री गणेश और माता लक्ष्मी उसके घर पधारे। कन्या का निश्छल प्रेम, आदर-सत्कार और उसके परिवार की ईमानदारी देखकर माँ लक्ष्मी इतनी प्रसन्न हुईं कि वे सदा के लिए उस घर में ठहर गईं। देखते ही देखते साहूकार का घर धन-धान्य और सुख-समृद्धि से परिपूर्ण हो गया। ✨ इस कथा से क्या सीखें? जहाँ साफ-सफाई, मन की पवित्रता, ईमानदारी (लोभ का त्याग) और निश्छल भक्ति होती है, माता लक्ष्मी वहीं स्थायी रूप से वास करती हैं। राधे राधे! 🙏🌺 👇 इस प्रेरक कथा को अपने प्रियजनों के साथ शेयर करें और कमेंट्स में 'जय माँ लक्ष्मी' अवश्य लिखें! . 🪷।। राधे राधे ।।🪷 . !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 #👏भगवान विष्णु😇 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌺राधा कृष्ण💞 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
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4 hours ago
रेत के 4 ढेर और ईश्वर पर अटूट विश्वास की अद्भुत कथा! ⏳✨ एक बार पुत्र प्राप्ति की लालसा में एक राजा ने तांत्रिकों की सलाह मानकर एक मासूम बच्चे की बलि देने का क्रूर निर्णय लिया। दूसरी ओर, घोर निर्धनता के कारण एक परिवार ने धन के लालच में अपने ही बेटे को राजा के हाथों सौंप दिया। ⚔️ बलि का समय और बच्चे की अंतिम इच्छा: जब बलि का समय समीप आया, तो परंपरानुसार बच्चे से उसकी अंतिम इच्छा पूछी गई। बच्चे ने थोड़ी सी रेत मँगवाई और अपने हाथों से रेत के चार छोटे-छोटे ढेर बनाए। इसके बाद उसने जो किया, वह हैरान करने वाला था! उसने एक-एक करके पहले तीन ढेरों को पैरों से तोड़ दिया और चौथे ढेर के सामने हाथ जोड़कर, आँखें मूंदकर बैठ गया। यह विचित्र दृश्य देखकर राजा और तांत्रिक घबरा गए। उन्होंने आश्चर्यचकित होकर बच्चे से इसका कारण पूछा। बच्चे ने बड़ी ही शालीनता और निर्भयता से उत्तर दिया: "हे राजन्! 👨‍👩‍👦 पहला ढेर: मेरे माता-पिता का प्रतीक था। उनका परम कर्तव्य मेरी रक्षा करना था, लेकिन उन्होंने धन के लिए मुझे बेच दिया। इसलिए मैंने वह ढेर तोड़ दिया। 👥 दूसरा ढेर: मेरे सगे-संबंधियों और समाज का था। उनका काम गलत को रोकना था, लेकिन किसी ने मेरे माता-पिता को ऐसा करने से नहीं रोका। इसलिए मैंने उसे भी गिरा दिया। 👑 तीसरा ढेर: स्वयं आपका (राजा का) था। राजा तो प्रजा का रक्षक होता है, पिता समान होता है, लेकिन आप स्वयं मेरी बलि लेने पर तुले हैं। इसलिए यह ढेर भी मेरे लिए व्यर्थ था।" 🙏 चौथा ढेर क्यों छोड़ा? "अंत में बचा यह चौथा ढेर, जो मेरे 'परमात्मा' और 'गुरु' का है। जब दुनिया के सारे सहारे स्वार्थी निकले और टूट गए, तो अब मुझे सिर्फ और सिर्फ अपने ईश्वर पर पूर्ण विश्वास है कि वे ही मेरी रक्षा करेंगे।" 👑 राजा का हृदय परिवर्तन: मृत्यु के मुख में खड़े एक छोटे से बालक की यह अद्भुत समझदारी, वैराग्य और ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा देखकर राजा की आत्मा झकझोर उठी। राजा के मन का सारा अंधकार पल भर में छंट गया। उसने तुरंत बलि रोक दी और उस ज्ञानी बालक को अपना दत्तक पुत्र बनाकर राज्य का 'राजकुमार' घोषित कर दिया! ✨ सीख: संसार के सारे रिश्ते और सहारे एक बार छूट सकते हैं, लेकिन जब मनुष्य अपना सब कुछ उस परवरदिगार पर छोड़ देता है, तो ईश्वर स्वयं उसकी रक्षा के ढाल बन जाते हैं। राधे राधे! 🙏🌺 👇 संकट के समय ईश्वर ही हमारा एकमात्र सच्चा सहारा हैं! अगर आप भी इस बात से सहमत हैं, तो कमेंट्स में 'जय श्री राम' या 'राधे राधे' जरूर लिखें! . 🪷।। राधे राधे ।।🪷 . !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 #🕉️सनातन धर्म🚩 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
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जब सती अनुसूया के सतीत्व के आगे नतमस्तक हुए त्रिदेव! 🌸✨ क्या आप जानते हैं कि एक बार स्वयं भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिदेव) को एक पतिव्रता नारी के तपोबल के सामने शिशु बनना पड़ा था? आइए जानते हैं माता अनुसूया के सतीत्व और वात्सल्य की यह अद्भुत कथा: 👑 अहंकार और परीक्षा की योजना: एक बार माता सरस्वती, लक्ष्मी जी और पार्वती जी के बीच यह बहस छिड़ गई कि तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता नारी कौन है। जब त्रिदेवों ने महर्षि अत्रि की धर्मपत्नी 'माता अनुसूया' को सर्वश्रेष्ठ बताया, तो देवियों को ईर्ष्या हुई। उन्होंने त्रिदेवों को विवश किया कि वे पृथ्वी पर जाकर माता अनुसूया के सतीत्व की परीक्षा लें। disguise साधु वेश में त्रिदेव और एक अनुचित शर्त: ब्रह्मा, विष्णु और महेश साधु का वेश धरकर महर्षि अत्रि के आश्रम पहुँचे। उस समय महर्षि आश्रम में नहीं थे। तीनों ने माता अनुसूया से भोजन मांगा, लेकिन एक अत्यंत कठिन और अनुचित शर्त रख दी— "हम भोजन तभी ग्रहण करेंगे जब आप हमें निर्वस्त्र होकर परोसेंगी।" 👶 सती का तपोबल और चमत्कार: माता अनुसूया पल भर के लिए धर्म संकट में पड़ गईं। किंतु अपने तपोबल से उन्होंने तुरंत जान लिया कि ये कोई साधारण भिक्षुक नहीं, बल्कि जगत के स्वामी त्रिदेव हैं। उन्होंने अपने पति का स्मरण किया और जल हाथ में लेकर संकल्प किया- "यदि मेरा पतिव्रत धर्म सच्चा है, तो ये तीनों साधु छह मास के अबोध शिशु बन जाएं!" देखते ही देखते उनका संकल्प सिद्ध हुआ और तीनों देव छोटे से बालक बन गए। फिर माता ने उन्हें वात्सल्य भाव से भोजन कराया। 🙏 देवियों का पश्चाताप और दिव्य वरदान: जब कई दिनों तक सृष्टि का संचालन रुक गया और त्रिदेव वापस नहीं लौटे, तो तीनों देवियाँ व्याकुल होकर आश्रम पहुँचीं। उन्होंने अपना अहंकार त्याग कर माता अनुसूया से क्षमा मांगी। माता ने प्रसन्न होकर त्रिदेवों को पुनः उनके वास्तविक स्वरूप में लौटा दिया। सती अनुसूया की इस निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर त्रिदेवों ने उन्हें वरदान दिया और आगे चलकर उनके घर पुत्रों के रूप में जन्म लिया: 🕉️ दत्तात्रेय (भगवान विष्णु के अंश) 🕉️ दुर्वासा ऋषि (भगवान शिव के अंश) 🕉️ चंद्रदेव (ब्रह्मा जी के अंश) ✨ निष्कर्ष: यह पावन कथा सिद्ध करती है कि जहाँ निष्काम भक्ति और चरित्र की पूर्ण शुद्धता होती है, वहाँ स्वयं परमपिता परमेश्वर को भी शीश झुकाना पड़ता है। राधे राधे! 🙏🌺 👇 इस अद्भुत कथा के लिए कमेंट्स में 'राधे राधे' या 'जय सती अनुसूया' अवश्य लिखें! . 🪷।। राधे राधे ।।🪷 . !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🌺राधा कृष्ण💞 #👏भगवान विष्णु😇 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
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जब शनिदेव के अहंकार पर भारी पड़ी बजरंगबली की भक्ति! 🚩✨ यह अद्भुत कथा शक्ति के अहंकार पर सच्ची भक्ति की विजय का प्रतीक है। एक बार कर्मफल दाता शनिदेव को अपनी अजेय शक्ति और वक्र दृष्टि पर अत्यधिक गर्व हो गया। इसी मद में चूर होकर उन्होंने अपने आराध्य प्रभु श्रीराम के ध्यान में लीन हनुमान जी को चुनौती दे डाली और उन पर अपना प्रभाव डालने का दुस्साहस किया। बजरंगबली ने पहले तो अत्यंत शालीनता से उन्हें समझाने का प्रयास किया, लेकिन जब शनिदेव नहीं माने और बलपूर्वक उनके शरीर पर सवार होने लगे, तब संकटमोचन ने उन्हें अपनी वज्र समान शक्तिशाली पूँछ में कसकर लपेट लिया! 🐒 हनुमान जी अपनी धुन में राम-काज करते हुए पहाड़ों और वृक्षों के बीच से उड़ने लगे, जिससे पूँछ में बंधे शनिदेव बुरी तरह रगड़ा गए। उनका शरीर लहूलुहान हो गया और क्षण भर में ही उनका सारा अहंकार चूर-चूर हो गया। ⛰️💥 अंततः पीड़ा से कराहते हुए शनिदेव ने अपनी भूल स्वीकार की और क्षमा की गुहार लगाई। दयानिधान अंजनीपुत्र ने तुरंत उन्हें मुक्त कर दिया और उनके घावों की पीड़ा शांत करने के लिए उन पर सरसों का तेल लगाया। 🌿 कृतज्ञ होकर शनिदेव ने बजरंगबली को यह दिव्य वरदान दिया: "जो भी भक्त शनिवार के दिन हनुमान जी की आराधना करेगा और मुझ पर सरसों का तेल अर्पित करेगा, उसे मेरी दशा (साढ़े साती या ढैय्या) के कष्टों से सदैव मुक्ति मिलेगी।" ⚖️🙏 राधे राधे! 🌺 जय श्रीराम! 🏹 जय बजरंगबली! 🚩 🚩।। जय जय सियाराम ।।🚩 🚩।। जय बजरंगबली ।।🚩 . 🚩 !! जय जय श्री राम !!🚩 ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🙏परशुराम जयंती🪔📿 #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय! 🙏 क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान विष्णु को 'नारायण' और 'हरि' क्यों कहा जाता है? आइए जानते हैं श्रीहरि के इन दिव्य नामों और उनके शांत स्वरूप का अद्भुत रहस्य! ✨ शास्त्रों में जगत के पालनहार भगवान विष्णु के दो अद्भुत रूप बताए गए हैं। एक रूप में वे अत्यंत कोमल, प्रसन्न और सौम्य हैं, तो वहीं दूसरे रूप में प्रभु काल-स्वरूप विशाल शेषनाग की शय्या पर विश्राम कर रहे हैं। 🐍 सर्पों के राजा पर शयन करते हुए भी प्रभु का मुखमंडल एकदम शांत है। उनका यह रूप हमें जीवन की एक बहुत बड़ी सीख देता है: परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन या विपरीत क्यों न हों, शांत रहकर ही हर समस्या का सफलतापूर्वक समाधान निकाला जा सकता है। 🌿 शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं । विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ॥ 🌿 आखिर भक्त अपने इन भक्तवत्सल प्रभु को अलग-अलग नामों से क्यों पुकारते हैं? 💧 प्रभु का नाम 'नारायण' क्यों? पौराणिक कथाओं के अनुसार, जल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के चरणों से हुई है। जल को "नीर" या "नर" भी कहा जाता है। चूंकि भगवान विष्णु स्वयं जल (क्षीर सागर) में निवास करते हैं, इसलिए इसी "नर" शब्द से उनका पावन नाम 'नारायण' पड़ा। 🌸 उन्हें 'हरि' क्यों कहा जाता है? शास्त्रों में एक बहुत सुंदर वाक्य है- "हरि हरति पापानि"। इसका अर्थ है कि जो हमारे जीवन में आने वाले सभी पापों, कष्टों और समस्याओं को हर लेते हैं (दूर कर देते हैं), वही 'हरि' हैं। संकट चाहे जितना भी बड़ा हो, सच्चे मन से श्रीहरि का स्मरण करने वालों को कभी निराशा नहीं मिलती। प्रभु का स्वरूप कोई भी हो, उनका हृदय अत्यंत कोमल है। जीवन में जब भी मुश्किलें आएं, बस शांत मन से उनका ध्यान करें और सब उन पर छोड़ दें। ✨ आप भगवान विष्णु के किस नाम का सबसे ज्यादा स्मरण करते हैं? कमेंट्स में 'जय श्री हरि' या 'ओम नमो नारायण' जरूर लिखें! 👇 . 🪷।। राधे राधे ।।🪷 . !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 #🌺राधा कृष्ण💞 #👏भगवान विष्णु😇 #🕉️सनातन धर्म🚩 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
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🌺 ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे 🌺 क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे शास्त्रों और तंत्र साधना में 'रात्रि' का इतना विशेष महत्व क्यों है? जिस प्रकार दिन भर के कार्य के बाद सारी जीवसृष्टि रात्रि में विश्राम करती है, ठीक उसी प्रकार माँ आदिशक्ति 'रात्रिरूपा' हैं, जिनमें ब्रह्मा से लेकर सभी प्राणी विश्राम पाते हैं। श्री दुर्गा सप्तशती में देवी के इन्हीं अद्भुत रात्रि स्वरूपों का अत्यंत गूढ़ और रहस्यमयी वर्णन किया गया है: 🌿 कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा। त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिरबोधलक्षणा॥ 🌿 (अर्थात: हे देवि! तुम्हीं भयानक कालरात्रि, महारात्रि, मोहरात्रि व दारुण रात्रि हो। तुम्हीं श्री, ईश्वरी, ह्रीं और बोधरूपा हो।) आइए जानते हैं माँ जगदंबा के इन विभिन्न 'रात्रि' स्वरूपों और उनसे जुड़े साधना के महापर्वों का अर्थ: 🌑 १. कालरात्रि: जो सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का भी लय कर दे, वह कालरात्रि है। तंत्र शास्त्रों के अनुसार दीपावली की रात्रि (कार्तिक अमावस्या व चतुर्दशी) को 'कालरात्रि' माना गया है। यह महारात्रि भगवती तारा और माँ काली को अत्यंत प्रिय है। 🌌 २. महारात्रि: संसार का प्रलय करने वाली शक्ति महारात्रि है। मुख्य रूप से महाशिवरात्रि (फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी) और शारदीय नवरात्र की महाअष्टमी की रात को 'महारात्रि' कहा जाता है। ✨ ३. मोहरात्रि: जो अज्ञानरूपी निशा में डालकर जीव को ममता और मोह के भंवर में फँसाती है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की पावन बेला यानी जन्माष्टमी (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी) को 'मोहरात्रि' प्रकीर्तित किया गया है। 🔥 ४. दारुण रात्रि: सभी भीषणताओं से अधिक भीषण। इसे अज्ञानता के अंधकार को चीरकर ब्रह्मज्ञान का प्रकाश देने वाली रात्रि माना गया है। सामान्यतः होली की रात्रि या विशिष्ट नक्षत्रों (जैसे संक्रांति, ग्रहण या मंगलवार युक्त विशेष तिथियों) में बनने वाले योग को 'दारुण रात्रि' कहते हैं। शास्त्रों में वर्णित अन्य सिद्ध रात्रियां: इन चार प्रमुख रात्रियों के अलावा तंत्र शास्त्र में और भी कई दिव्य रात्रियों का उल्लेख है, जो साधना और सिद्धि के लिए अचूक मानी जाती हैं: वीररात्रि: चतुर्दशी तिथि का कुलवासर व अर्द्धरात्रि के साथ संक्रमण। घोररात्रि: महाकाली स्वरूपा मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी। क्रोधरात्रि: तारा स्वरूपा चैत्र शुक्ल नवमी (यदि मंगलवार हो)। अचलरात्रि: शुक्रवार या मंगलवार से युक्त फाल्गुन कृष्ण एकादशी। दिव्यरात्रि: दशयोग युक्त ज्येष्ठ शुक्ल दशमी (यदि शुक्रवार और एकादशी हो)। इन सभी पुण्यकालों और रात्रियों की अधिष्ठात्री स्वयं भगवती महामाया हैं। इन विशेष रात्रियों में की गई मंत्र-साधना (विशेषकर गायत्री और नवार्ण मंत्र) सीधे फलित होती है और जीवन के हर अंधकार को मिटा देती है। 🙏 ॥ जय माता दी ॥ 🙏 आपको यह आध्यात्मिक जानकारी कैसी लगी? अपने विचार कमेंट्स में साझा करें और माँ के आशीर्वाद के लिए 'जय माता दी' जरूर लिखें! 👇 ।। ॐ नमः शिवाय ।। ।। हर हर महादेव ।। . !! जय जय श्री महाकाली !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 #🔯अक्षय तृतीया पर विशेष लक्ष्मी पूजन📿🙏 #🙏परशुराम जयंती🪔📿 #🔯अक्षय तृतीया पर विशेष उपाय📿🛐 https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/
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4 hours ago
महादेव का अत्यंत रौद्र रूप: कैसे प्रकट हुए भगवान 'काल भैरव'? 🔱🔥 क्या आप जानते हैं कि काशी के कोतवाल और भगवान शिव के सबसे उग्र स्वरूप 'काल भैरव' की उत्पत्ति कैसे हुई थी? आइए जानते हैं शिवपुराण में वर्णित यह अद्भुत कथा: अहंकार का टकराव और वेदों का निर्णय 📜 एक बार सुमेरु पर्वत पर देवताओं ने ब्रह्मा जी से पूछा कि इस सृष्टि का अविनाशी तत्व (परम सत्य) कौन है? शिव जी की माया से मोहित होकर ब्रह्मा जी ने स्वयं को ही सृष्टि का रचयिता और एकमात्र परब्रह्म घोषित कर दिया। वहां उपस्थित भगवान विष्णु ने इसका विरोध किया और दोनों के बीच अपने-अपने प्रभुत्व को लेकर विवाद छिड़ गया। जब सत्य जानने के लिए चारों वेदों का आह्वान किया गया, तो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—सभी ने एक स्वर में कहा: "जिसके भीतर समस्त ब्रह्मांड समाहित है, जो सुख-दुःख से परे है और जिसे योगी जन ढूंढ़ते हैं, वे एकमात्र त्र्यम्बक शिव ही परब्रह्म हैं।" महादेव का प्राकट्य और ब्रह्मा जी का अहंकार 🕉️ वेदों की बात सुनकर भी ब्रह्मा जी और विष्णु जी का मोह भंग नहीं हुआ। उन्होंने भस्मधारी, दिगंबर शिव को परब्रह्म मानने से इनकार कर दिया। तभी उन दोनों के मध्य एक विशाल ज्योति प्रकट हुई, जिसमें से त्रिशूलधारी महादेव प्रकट हुए। अज्ञानतावश ब्रह्मा जी ने महादेव का अपमान करते हुए उन्हें अपना पुत्र मानकर अपनी शरण में आने को कहा। काल भैरव की उत्पत्ति ⚔️ ब्रह्मा जी के इन अंहकार युक्त वचनों को सुनकर महादेव अत्यंत क्रोधित हो उठे। उसी क्षण उनके क्रोध से एक भयंकर स्वरूप प्रकट हुआ— 'काल भैरव'! शिव जी की आज्ञा पाकर काल भैरव ने अपने बाएँ हाथ की छोटी उंगली के नाखून से ब्रह्मा जी का वह पाँचवां सिर धड़ से अलग कर दिया, जिससे अहंकार के बोल फूट रहे थे। कपालमोचन तीर्थ और काशी के कोतवाल 🛕 ब्रह्मा और विष्णु को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने शिव जी की स्तुति की। भगवान शिव ने शांत होकर भैरव को आशीर्वाद दिया कि काल (समय) को भी भयभीत करने और भक्तों के पापों का भक्षण करने के कारण तुम 'काल भैरव' कहलाओगे और आज से काशी नगरी के अधिपति होगे। ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए भैरव जी ब्रह्मा का कटा हुआ शीश (कपाल) लेकर काशी पहुँचे। काशी पहुँचते ही उनके हाथ से वह कपाल धरती पर गिर गया। आज वह पवित्र स्थान 'कपालमोचन तीर्थ' के नाम से जाना जाता है, जहाँ स्नान-तर्पण करने से बड़े से बड़े पापों से मुक्ति मिल जाती है। ✨ काल भैरव भगवान की जय! ✨ आज भी मान्यता है कि काशी जाने वाले हर भक्त को बाबा विश्वनाथ के दर्शन से पहले काशी के कोतवाल यानी काल भैरव की आज्ञा लेनी पड़ती है। 👇 अगर आप भी महादेव और काल भैरव के भक्त हैं, तो कमेंट्स में 'हर हर महादेव' या 'जय काल भैरव' जरूर लिखें! ।। ॐ नमः शिवाय ।। ।। हर हर महादेव ।। . !! जय जय श्री महाकाल !! ➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶ ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पाने के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘शिव पुराण ’ को फॉलो और लाईक करें हमारा पेज का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। फेसबुक लिंक– https://www.facebook.com/share/16z3CgT2xK/ https://www.facebook.com/share/17k2bcrKp8/ #🤝अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं🫂 #🙏परशुराम जयंती🪔📿 #🙏🌺जय बजरंगबली🌺🙏 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🔱हर हर महादेव