“पापा ने नया जूता क्यों नहीं खरीदा?” – एक मार्मिक पिता की कहानी 👞
रवि कई दिनों से एक ही बात बोल रहा था—
“पापा, इस बार मेरे birthday पर वो white वाले shoes दिला देना… वही जो रोहन पहनकर स्कूल आता है।”
हर दिन स्कूल जाते समय वह दुकान के बाहर रुककर उन जूतों को देखता। उसकी आँखों में एक अलग ही चमक होती थी।
पापा हर बार मुस्कुरा देते, “हाँ बेटा… इस बार जरूर।”
लेकिन सच्चाई कुछ और थी।
रवि के पापा, मनोज, एक छोटी-सी किराने की दुकान पर काम करते थे। पूरे दिन खड़े-खड़े काम करने के बाद भी महीने के आखिर तक पैसे कम पड़ जाते थे।
घर का किराया… दादी की दवाई… स्कूल की फीस… और ऊपर से बढ़ती महंगाई।
मनोज कई बार रात को चुपचाप बैठकर खर्चों का हिसाब देखते रहते।
एक शाम रवि ने फिर पूछा, “पापा… birthday में बस 5 दिन बचे हैं।”
मनोज ने उसकी तरफ देखा और मुस्कुरा दिए, “मिल जाएंगे बेटा।”
लेकिन उस मुस्कान के पीछे चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
उसी रात जब सब सो गए, मनोज ने अपनी पुरानी अलमारी खोली। अंदर उनका फटा हुआ जूता रखा था।
जूते का तलवा लगभग निकल चुका था। बारिश में पानी अंदर आ जाता था। लेकिन फिर भी वो रोज वही जूते पहनकर काम पर जाते थे।
उन्होंने धीरे से जूते को हाथ में लिया और खुद से बोले—
“एक महीना और चला लेंगे… पहले बेटे के shoes जरूरी हैं।”
अगले दिन मनोज काम पर पैदल गए। क्योंकि उन्होंने बस का किराया भी बचाना शुरू कर दिया था।
पूरा हफ्ता उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं खरीदा। दोपहर का खाना तक छोड़ दिया।
सिर्फ इसलिए… ताकि बेटे की आँखों की चमक बनी रहे।
आखिर रवि का birthday आ गया।
सुबह मनोज एक छोटा-सा डिब्बा लेकर घर आए।
“Happy Birthday बेटा…”
रवि ने जल्दी से डिब्बा खोला— अंदर वही white shoes थे।
उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह खुशी से पापा के गले लग गया।
“पापा! Exactly वही वाले!”
मनोज बस उसे खुश होकर देखते रहे।
लेकिन तभी रवि की नजर नीचे गई…
पापा के जूते पूरी तरह भीगे हुए थे। एक तरफ से फटे हुए।
“पापा… आपके जूते?”
रवि धीरे से बोला।
मनोज ने तुरंत पैर पीछे कर लिए, “अरे कुछ नहीं… अभी चल रहे हैं।”
लेकिन पहली बार रवि समझ चुका था— उसके shoes सिर्फ पैसे से नहीं खरीदे गए थे… उनमें उसके पिता की भूख, थकान, और अधूरी जरूरतें भी शामिल थीं।
उस रात रवि अपने नए shoes को देखता रहा… और फिर चुपचाप उन्हें वापस डिब्बे में रख दिया।
अगली सुबह वह पापा के पास गया और बोला—
“पापा… मुझे ये shoes बाद में चाहिए। पहले आप अपने लिए नए जूते ले लो।”
मनोज की आँखें भर आईं।
उन्होंने बेटे को सीने से लगा लिया।
और उस पल… एक छोटा बच्चा थोड़ा बड़ा हो गया।
सीख 👇
पिता अक्सर अपने सपनों को नहीं, अपनी जरूरतों को मारते हैं— ताकि बच्चों की छोटी-सी खुशी भी अधूरी न रहे। ❤️
पाठकों से निवेदन 🙏
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