यह कथा महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध की है। युद्ध की तैयारी के समय एक हाथी ने एक पेड़ उखाड़ा, जिससे एक चिड़िया का घोंसला जमीन पर गिर गया। चिड़िया ने श्रीकृष्ण से अपने बच्चों की सुरक्षा की गुहार लगाई। श्रीकृष्ण ने काल के नियम में हस्तक्षेप करने से मना किया, लेकिन चिड़िया को भोजन संग्रह करने की सलाह दी।
युद्ध के आरंभ में, श्रीकृष्ण ने अर्जुन का धनुष लेकर एक हाथी की गले की घंटी पर तीर मारा, जिससे घंटी जमीन पर गिर गई। अठ्ठारह दिनों के युद्ध के बाद, जब पांडव जीत गए, श्रीकृष्ण अर्जुन को उसी स्थान पर ले गए। उन्होंने अर्जुन से वह घंटी उठाने को कहा।
जैसे ही अर्जुन ने घंटी उठाई, उसके नीचे से चिड़िया का परिवार सही-सलामत बाहर निकला। उस घंटी ने इतने दिनों तक उन बच्चों की रक्षा की थी। इस पर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी और उन्हें जगत के रक्षक के रूप में स्वीकार किया। इस कथा का सार यही है कि ईश्वर की इच्छा और सुरक्षा के बिना कुछ भी संभव नहीं है।
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