गीता का गूढ रहस्य
प्रश्नः - काल भगवान अर्थात् ब्रह्म
अविनाशी है या जन्मता-मरता है?
उत्तर:- जन्मता-मरता है।
अध्याय 4 का श्लोक 5
(भगवान उवाच)
बहूनि, मे, व्यतीतानि, जन्मानि, तव, च, अर्जुन, तानि, अहम्, वेद, सर्वाणि, न, त्वम्, वेत्थ, परन्तप।।5।।
अनुवादः (परन्तप) हे परन्तप (अर्जुन) अर्जुन! (मे) मेरे (च) और (तव) तेरे (बहूनि) बहुत-से (जन्मानि) जन्म (व्यतीतानि) हो चुके हैं। (तानि) उन (सर्वाणि) सबको (त्वम्) तू (न) नहीं (वेत्थ) जानता किंतु (अहम्) मैं (वेद) जानता हूँ। (5)
हिन्दीः हे परन्तप अर्जुन ! मेरे और तेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं। उन सबको तू नहीं जानता किंतु मैं जानता हूँ।
प्रमाण के लिए देखें-
श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 2 श्लोक 12,
गीता अध्याय 4 श्लोक 5,
गीता अध्याय 10 श्लोक 2
में गीता ज्ञान दाता स्वयं स्वीकार करता है कि मेरी भी जन्म व मृत्यु होती है, मैं अविनाशी नहीं हूँ।
संत रामपाल जी महाराज द्वारा खुलासा
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