sant Ram pal jee mahraj ka satsang

Vijay Dass
549 ने देखा
1 दिन पहले
#GodNightThursday #Kalyug_Mein_SatyugKiShuruat6 . ज्ञान गंगा ज्ञान गंगा केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि कोटि जन्म से भक्त रहे जीव को प्राप्त हुए मानव जीवन को सही दिशा दिखाने वाला दिव्य ज्ञान का अमृत स्रोत है। जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज द्वारा लिखित ज्ञान गंगा पुस्तक ने करोड़ों लोगों के जीवन में आध्यात्मिक जागृति लाई है। यह पुस्तक धर्मग्रंथों के गूढ़ रहस्यों को सरल भाषा में समझाकर बताती है कि वास्तविक मोक्ष मार्ग क्या है और पूर्ण परमात्मा कौन है। इस पवित्र पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें दिए गए प्रत्येक ज्ञान का प्रमाण हमारे पवित्र वेदों, गीता जी, कुरान शरीफ, बाइबल और गुरु ग्रंथ साहिब जी से दिया गया है। ज्ञान गंगा पढ़ने से जीवन जीने की सही राह मिलती है। मनुष्य बुराइयों से दूर होता है।भक्ति का वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है। मन में शांति और सकारात्मकता आती है। आज के तनावपूर्ण और भटकते समाज के लिए यह पुस्तक एक प्रकाश स्तंभ के समान है। यदि आपने अभी तक ज्ञान गंगा नहीं पढ़ी, तो अवश्य पढ़ें और अपने परिवार व मित्रों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित करें। और सबसे बड़ी बात यह पुस्तक निशुल्क मिलती है। अपना पूरा नाम पता फोन नंबर समेत 7496801825 पर Whatsapp कर दीजिए। ज्ञान गंगा पढ़ें जीवन को सफल बनाएं। Watch Factful Debates Yt #sant ram pal ji maharaj #me follow
Vijay Dass
564 ने देखा
1 दिन पहले
#GodNightThursday #Kalyug_Mein_SatyugKiShuruat6 . आशा और तृष्णा भगत आत्माऔ,! देखो आशा और तृष्णा दोनों बहनें हैं और इन दोनों का जोड़ा है। ये दोनों ही काल के हुक्म में बंधी रहती हैं और उसके हुकम से कभी बाहर नहीं जाती । ये दोनों बंदे के अंदर घुसकर व अपने जाल में फंसा कर उसको 84 लाख योनियों में भर्मा देती हैं । यह इनका नित्य, रोज का कर्म है। आशा कहती है कि अपनी बहन तृष्णा को बोलती है कि सुन बहन तृष्णा, देख ! मैं कितनी चालाक हूं । मैं इस बंदे के अंदर रम कर इसको सारी उम्र पैसे, औलाद, ठाठ-बाठ , खाने-पीने आदि की आशा ही आशा में रख देती हूं और सतगुरु का कभी खोज नहीं करने देती । अंत समय में इसको यम के दूत पकड़ ले जाते हैं और चौरासी में डाल देते हैं। फिर तृष्णा कहती है कि सुन बहन आशा अब तू मेरी भी सुन, मैं तुझ से कितनी ज्यादा चालाक और तगड़ी हूं । जब मैं बंदे के अंदर बैठ जाती हूं तो बंदे को ऐसी तृष्णा लगाती हूं कि वो सब बातों को भूल जाता है और तृष्णा में फंस कर मन व इंद्रियों का यार हो जाता है तथा अपनी सारी उम्र विषय विकारों में बिता देता है। बंदा जितनी भी आशाएं लेकर चलता है उन सब पर पानी फेर देती हूं। जब अंत समय आता है तो बंदा अपने किये हुए पर सिर धुन धुन कर पछताता है। इसलिए परम संत रामपाल दास महाराज जी कहते है कि आशा व तृष्णा से बचो। ये सबके मन मे काल के दूत बनकर निवास करते है। और जीवआत्मा को भगती मार्ग पर नही लगने देते। "फिर जीव इनके चक्र मे चौरासी मे चला जाता है।" Watch Factful Debates Yt #sant ram pal ji maharaj #me follow
Vijay Dass
592 ने देखा
1 दिन पहले
#GodNightThursday #Kalyug_Mein_SatyugKiShuruat6 . भक्ति की श्रेष्ठ स्थिति गरीब, बैराग नाम है त्याग का, पाँच पचीसों मांही। ‌ जब लग सांसा सर्प है, तब लग त्यागी नाहीं।।1।। पाँच तत्व तथा प्रत्येक पाँच-पाँच प्रकृति हैं जो कुल पच्चीस हैं जिनसे शरीर बना है तथा जीव प्रभावित रहता है। यानि इस शरीर में रहते-रहते वैराग्य करना है। बैराग त्याग का दूसरा नाम है। जिन भक्तों को तत्वज्ञान हो जाता है तो उनको वैराग्य हो जाता है। इसी को बिरह भी कहते हैं। जब तक शंका रूपी सर्प का विष चढ़ा है, वह परमात्मा के प्रति समर्पित नहीं हो सकता। तब तक त्यागी नहीं हो सकता। भावार्थ है कि यदि घर त्यागकर वन में चले गए और भक्ति विधि संशय रहित नहीं है तो भक्ति व्यर्थ है तथा घर को क्लेश (झंझट) समझकर वन गए तो सत्य साधना के अभाव में पाँचों प्रकृतियों का प्रभाव प्राणी के क्लेश का कारण बना रहेगा। इसलिए सत्य भक्ति मिलने पर घर में रहकर शरीर से भक्ति भी कर। निर्वाह के लिए भी कर्म कर। गरीब, बैराग नाम है त्याग का, पांच पचीसों संग। ऊपरकी कंचली तजी, अंतर विषै भुवंग।। शरीर की पच्चीस प्रकृति अपना प्रभाव शरीर पर जमाए रखती है। माता-पिता का स्वभाव भी शरीर में प्रभाव दिखाता है क्योंकि उन्हीं के पदार्थ से अपना शरीर बना है। अच्छे स्वभाव के माता-पिता से शरीर बना है तो भक्ति में सहयोगी होता है। यदि शराबी-कवाबी, चोर, रिश्वतखोर, डाकू से शरीर मिला है। तो उसका प्रभाव भक्ति में बाधा करता है। उससे संघर्ष करते हुए तत्वज्ञान को आधार बनाकर बिरह (वैराग्य) को बनाए रखें। इसे कहा कि बैराग नाम है त्याग का, शरीर की प्रकृति से संघर्ष करते हुए इन्हीं पाँच-पच्चीस में रहते हुए भक्ति की भावना बनी रहे। यदि ऐसा नहीं है तो ऊपर की काँचली (सर्प की कैंचुली) की तरह शरीर के वस्त्र बदल लेने मात्र से बैरागी नहीं बन जाता। अंदर सब विकार विद्यमान हैं। जैसे जनताजन अपने क्षेत्र में प्रचलित वस्त्र धारण करते हैं। यदि कोई भक्ति के लिए किसी पंथ से जुड़ता है, साधु बनता है तो उसको संसारिक वस्त्र उतारने पड़ते हैं तथा उस पंथ वाले भगवा वस्त्र धारण करने पड़ते हैं। यदि उसको तत्वज्ञान नहीं है तो वह नकली त्यागी है। उसमें विकार (काम, क्रोध, अहंकार, लोभ, मोह) यथावत बने रहते हैं। उसके विषय में कहा है कि ऊपर की काँचली तजी (वस्त्र बदलकर बाबा बन गया) अंदर विषय (विकार) रूपी भुवंग (भुजंग) यानि सर्प यथावत है। वह त्याग नहीं है। गरीब, असन बसन सब तज गए, तज गए गाम अरू गेह। माहे संसा सूल है, दुर्लभ तजना येह।। जब तक सतगुरू नहीं मिलता, तब तक भक्तजन भक्ति भी करते रहते हैं और शंका भी रहती है कि वह व्यक्ति यह साधना भी करता है तथा शंका भी करता है कि कहीं मेरी साधना सत्य न हो। इसलिए अपनी साधना के साथ-साथ दूसरे की साधना भी करने लगता है। जैसे एक साधक शनिदेव को मानता था। शनिवार को व्रत रखता था। दूसरे ने बताया कि मैं मंगलवार का व्रत करता हूँ और बाबा हनुमान की भक्ति करता हूँ। सालासर धाम (राजस्थान) में एक वर्ष में अवश्य जाता हूँ। मेरे को बहुत लाभ हो रहा है। उस शनिवार के पुजारी ने मंगलवार का व्रत भी प्रारम्भ कर दिया और वर्ष में सालासर भी जाने लगा। यह संसा सूल यानि शंका रूपी काँटा मन में तब तक खटकता रहता है, जब तक तत्वदर्शी सतगुरू नहीं मिलता। (असन-बसन तज गए) घर-बार, राजपाट सब त्याग गए। जंगल में चले गए, परंतु अज्ञान के कारण शंका भी बनी है। इस शंका का निवारण दुर्लभ है। यदि कोई तत्वज्ञानी संत उनको समझाने की चेष्टा करता है तो वे शास्त्रविरूद्ध साधना त्यागते नहीं। इसलिए कहा है कि उसको त्यागना दुर्लभ है। उसके त्यागे बिना भक्ति की उपलब्धि नहीं होती। गरीब, बाज कुही गति ज्ञान की, गगन गिरज गरजंत। छूटें सुंन अकासतैं, सांसा सर्प भछंत।। तत्वज्ञान की स्थिति बाज पक्षी जैसी है। जैसे बाज पक्षी अपने शिकार सर्प को आकाश में ऊँचा चढ़कर खोजकर एकदम ऐसे गिरता है जैसे आकाशीय बिजली गर्ज-गर्जकर गिरती है। ऐसे अज्ञान रूपी सर्प को भछंत (भखंत) यानि खा जाता है, समाप्त कर देता है। गरीब, ज्ञान ध्यान दो सार हैं, तीजें तत्त अनूप। ‌ चौथें मन लाग्या रहैं, सो भूपन सिर भूप।।6। ज्ञान तथा ध्यान भक्ति का सार है अर्थात् तत्वज्ञान से परमात्मा में ध्यान दृढ़ होता है। ज्ञान बिना ध्यान विश्वास के साथ नहीं लगता। इसलिए ये परमात्मा प्राप्ति में दो मुख्य सहयोगी हैं। तीसरा तत् अनूप का अर्थ है कि परमात्मा पूर्ण है। चौथे मन भक्ति में निरंतर लगा रहे तो वह भक्त भक्ति धन का धनी यानि राजाओं का भी भूप (राजा) यानि भक्ति का महाराज है। परमेश्वर कबीर जी ने कहा है कि कबीर, सब जग निर्धना, धनवन्ता (धनी) ना कोय। धनवन्ता सो जानियो, जापै राम नाम धन होय।। गरीब, काशी करोंत लेत हैं, आन कटावें शीश। ‌। बन-बन भटका खात हैं, पावत ना जगदीश।। शास्त्र विरूद्ध साधक नकली-स्वार्थी गुरूओं द्वारा भ्रमित होकर कोई जंगल में जाता है। कोई काशी शहर में करौंत से सिर कटवाने में मुक्ति मानता है। इस प्रकार की व्यर्थ साधना जो शास्त्रोक्त नहीं है, उसे करने से कोई लाभ नहीं होता यानि परमात्मा नहीं मिलता। गरीब, संसा तो संसार है, तन पर धारै भेख। मरकब होंही कुम्हार कै, सन्यासी ओर सेख।। भक्ति मार्ग किसका सही है? किसका गलत है? यह शंका पूरे संसार में है और भक्तजन अपने-अपने पंथों की पहचान बनाए रखने के लिए शरीर के ऊपर भिन्न-भिन्न पोषाक पहने हैं या कान चिराकर, जटा (सिर पर बाल) बढ़ाकर अपने-अपने भेखों (पंथों) की पहचान बनाकर साधना करते हैं। तत्वज्ञान के अभाव से शास्त्र के विपरित साधना करके हिन्दु धर्म के सन्यासी तथा मुसलमान धर्म के शेख कुम्हार के घर गधे बनेंगे यानि मोक्ष तो होगा नहीं, पशु शरीर मिलेगा।(8) गरीब, मन की झीनि ना तजी, दिलही मांहि दलाल। हरदम सौदा करत है, कर्म कुसंगति काल।। तत्वज्ञान न होने के कारण मन का सुक्ष्म दोष समाप्त नहीं हुआ। दिल में मन रूपी दलाल बैठा है जो गलती करवाता है। वह प्राणी हर श्वांस में जो भक्ति करता है। उसके साथ धोखे का सौदा मन करता है। सत्य साधना से मुँह मोड़ता है। व्यर्थ साधना चाहे कितनी ही कठिन हो, उसे करता है। जैसे खड़ा होकर या बैठकर तप करना, विकट पहाडि़यों पर चढ़कर किसी मंदिर में धोक मारने जाना, कावड़ लाने के लिए पैदल चलना आदि- आदि महाकठिन साधना में कोई आलस नहीं करता। यह धोखे का सौदा मन करता है। यह गलत सत्संग का परिणाम है।( गरीब, मन सेती खोटी घड़े, तन से सुमरन कीन। माला फेरे क्या हुवा, दूर कुटन बेदीन। ऐसे व्यक्ति साधु का स्वांग करके मन से खोटी घड़े (बुरे विचार करते हैं) यानि गंदी सोच रखते हैं। तन (शरीर) से स्मरण करते रहते हैं। ऐसे माला फिराने से कोई लाभ नहीं होता। दूर कुटन बेदीन यानि हे धर्महीन खोटे व्यक्ति! वह वस्तु यानि परमात्मा ऐसे व्यक्ति से दूर है। कभी नहीं मिलेगा। गरीब, तन मन एक अजूद करि, सुरति निरति लौ लाइ। बेड़ा पार समंद होइ, जे एक पलक ठहराइ।। भक्ति की श्रेष्ठ स्थिति बताई है कि नाम जाप करते समय मन को विकारों से हटाकर स्मरण पर लगाऐं। तन-मन को एक करके सुरति तथा निरति से नाम में लौ (लगन) लगाऐं। एक पल (एक सैकिण्ड) भी ध्यान नाम पर लगेगा तो धीरे-धीरे अभ्यास हो जाएगा और संसार सागर से बेड़ा (जीव रूपी बेड़ा) पार हो जाएगा यानि मोक्ष प्राप्त करेगा।(11) गरीब, दृष्टि पड़े सो फना है, धर अम्बर कैलाश। कृत्रिम बाजी झूठ है, सुरति समोवो श्वांस।।1 जो कुछ आप देख रहे हो यानि खेत-खलिहान, बाग-बगीचे, पर्वत, झरने, वन, दरिया, गाँव-शहर, जीव-जंतु, राजा, मानव सब फना (नाशवान) है। शिव जी का घर कैलाश पर्वत पर है। वह कैलाश पर्वत भी नष्ट होगा। यह सब कृत्रिम संसार सब झूठ है। एक स्वपन के समान है। इसलिए श्वांस-उश्वांस से स्मरण (नाम जाप) करो। संसार को असार मानो। परमात्मा की भक्ति करो। अपना कल्याण करवाओ।(12) गरीब, सुरति स्वांस कूं एक कर, कुंजि किनारै लाई। जाका नाम बैराग है, पांच पचीसों खाई।।13।। श्वांस से नाम जाप करते समय सुरति (ध्यान) को उसी नाम स्मरण पर लगाना। यह श्वांस-सुरति एक करना है। कुंज कमल (अंतिम नौवें कमल) के निकट ध्यान को पहुँचाऐं। इसका नाम वैराग्य है जिसने शरीर की प्रकृति को अनुकूल कर लिया। ध्यान तब ही लगता है जब मन संसारिक प्रेरणाओं से विचलित नहीं होता। गरीब, पांच पचीसों भून करि, बिरह अगनि तन जार। सो अविनासी ब्रह्म है, खेले अधर अधार।। शरीर की प्रकृतियों को परमात्मा प्राप्ति की तड़फ रूपी अग्नि में जलाकर दृढ़ रहे, वह अमरत्व प्राप्त करता है। वह जीव ब्रह्म (पीव) के गुणों युक्त अमर हो जाता है। वह अधर-आधार यानि सर्वोपरि स्थान सतलोक में आनन्द से रहता है (खेलता है) यानि मौज-मस्ती करता है।इसी विषय में संत गरीबदास जी की वाणी है। गरीब, अनन्त कोटि ब्रह्मा आये, अनन्त कोटि भये ईश। साहिब तेरी बंदगी से, जीव होत जगदीश। गरीब, त्रिकुटी आगे झूलता, बिनहीं बांस बरत। अजर अमर आनंद पद, परखे सुरति निरत।। परमात्मा अन्य वेश में त्रिकुटी कमल में रहता है। बिन ही बाँस बरत का भावार्थ बिना छत्र, मुकुट व सिंहासन के त्रिकुटी में परमेश्वर जी सतगुरू रूप में रहते हैं। वह परमेश्वर सुखदाई (आनन्द कन्द) है, अजर-अमर है। उसको सत्यनाम के जाप से सुरति-निरति से भक्त परख (जाँच) करता है। सत्यनाम के जाप से यदि सतगुरू रूप में विराजमान परमात्मा के चेहरे यानि स्वरूप में परिवर्तन नहीं होता है तो समझा जाता है कि वास्तविक सतगुरू कबीर जी ही हैं। यदि काल ब्रह्म ने सतगुरू का रूप बना रखा होता है तो सत्यनाम के जाप से उसका काल रूप प्रकट हो जाता है। सतगुरू का स्वांग नष्ट हो जाता है। झूलने का भावार्थ है कि जिधर देखें, उधर ही सतगुरू खड़ा दिखाई देता है। ‌‌ गरीब, यह महिमा कासे कहूँ, नैनों मांही नूर। पल पल में दीदार है, सुरति सिन्धु भरपूर।। भक्त की साधना से भक्ति की कमाई की रेखाऐं आँखों के सामने दिखाई देती हैं जो अन्य को दिखाई नहीं देती। प्रत्येक भक्त को अपनी-अपनी रेखाऐं आँखों के सामने दिखाई देती हैं। पलकें बंद कर लेते हैं तो पलकों के अंदर दिखाई देती हैं। सुक्ष्म रूप बन जाती हैं। यदि किसी कार या बस के शीशे के बाहर दृष्टि दौड़ाते हैं तो शीशे को पार करके बाहर दिखाई देती हैं। एक भक्त की रेखाऐं (जिसे संत गरीबदास जी ने बंकड़ा साहेब भी कहा है) दूसरे भक्त को दिखाई नहीं देती। इसलिए कहा है कि यह महिमा किसको बताऊँ कि मेरे नैनों (आँखों) में परमेश्वर का नूर (नूरी झलक) दिखाई देता है। उसके मैं पल-पल (क्षण-क्षण में) दीदार (दर्शन) करता हूँ। मेरी सुरति-निरति इस नूरी शक्ति से भरी है। सुरति दूर की वस्तु को देखती है। निरति निर्णय (परख) करती है कि यह गाय है या भैंस। इसको सुरति तथा निरति स्पष्ट करती है। गरीब, झीना दरसें दास कूं, पौहप रूप प्रवान। बिनही बेली गहबरै, है सो अकल अमान।। झीना = सुक्ष्म, पतला। दरसें = दिखाई देता है। दास कूँ = भक्त को। पोहप = पुष्प। रूप = के आकार में। प्रवान = पूर्ण रूप से प्रमाणित। वह बंकड़ा साहेब रूपी फूल किसी बेल (लता) के नहीं लगा है। वह तो अकल (अविनाशी) है। अमान = शांत, आनंददायक। गहबरै = विकसित होता है। श्रभक्तों को वह सुक्ष्म रूप बंकड़ा साहेब रूपी फूल दिखाई देता है। वह बिना लता (बेल) के विकसित होता है। जिस भक्त को वह भक्ति की कमाई रूपी रेखाऐं दिखाई देती हैं, वह मोक्ष का अधिकारी हो चुका है। यदि आजीवन मर्यादा में रहकर भक्ति करता रहेगा तो वह अमर होगा। आनन्द व चैन से सतलोक में रहेगा। गरीब, अकल अभूमी आदि है, जाका नाहीं अंत। दिलही अंदर देव है, निरमल निरगुन तंत।। अकल (अविनाशी = जिसका काल न हो), भूमि = ऊपर के चारों लोक जो अमर धरती है, वह सनातन है। उसमें निवास करने वाला निर्मल निर्गुण (अव्यक्त) देव (परमेश्वर) जो तंत यानि सब देवों का सार प्रभु यानि कुल का मालिक है। वह हमारे दिल में बसा है। गरीब, तन मन सेती दूर है, मांहे मंझ मिलाप। तरबर छाया विरछ में, है सो आपे आप।। वह परमेश्वर दूर सतलोक में है जिसे स्थूल शरीर तथा मन की कल्पनाओं से नहीं देख सकते। वैसे उस प्रभु का प्रभाव शरीर में भी है। इस प्रकार जीव से मिला भी है। जैसे तरवर (वृक्ष) की छाया वृक्ष का ही प्रतिबिंब होती है। ऐसे परमेश्वर तो सतलोक आदि-आदि ऊपर के लोकों में है। उसकी शक्ति वृक्ष की छाया की तरह सर्व ब्रह्मण्डों में फैली है गरीब, नौ तत्त के तो पांच हैं, पांच तत्त के आठ। आठ तत्त का एक है, गुरु लखाई बाट।। आँखों में जो नूरी रेखाऐं हैं, वे सँख्या में 14 हैं जिनमें से नौ तत यानि परमेश्वर की नौ सिद्धियों के प्रतीक तो पाँच हैं। पाँच तत (सिद्धियों) के प्रतीक आठ हैं तथा आठ तत (सिद्धियों) का प्रतीक एक है जो कुल मिलाकर (5़8़1) चौदह हैं जो भिन्न-शक्ति का ग्राफ है। यह बाट यानि मार्ग सतगुरू जी ने दिखाया है। गरीब, चार पदारथ एक करि, सुरति निरति मन पौन। असल फकीरी जोग यौंह, गगन मंडल कूं गौन।। स्मरण (नाम जाप) करते समय अपने मन को, सुरति-निरति को पवन (श्वांस) पर टिकाकर रखें। वास्तव में (फकीरी) सन्यासी होना तथा जोग (योग) यानि भक्ति करना यह है। वन में जाने की अपेक्षा गगन मण्डल अर्थात् आकाश खण्ड में ध्यान रखो। सतलोक जाने की आश रखो। शास्त्र विरूद्ध साधना करने से कोई लाभ नहीं होता।(21) गरीब, पंछी घाल्या आलना, तरबर छाया देख। गरभ जूंनि के कारणै, मन में किया बिबेक।। जैसे पक्षी ने गर्भ धारण किया तो विवेक (विचार) किया। वृक्ष की अच्छी छाया देखकर घोंसला बनाया। शब्दार्थ :- आलहना = घोंसला, घाल्या = बनाया, डाला। गरीब, जैसे पंछी बन रमया, संझा लै बिसराम। प्रातः समै उठि जात है, सो कहिये निहकाम।। जैसे पक्षी सारा दिन वन में रमता (घूमता) है। सूर्य अस्त होने के समय (शाम के समय) किसी भी वृक्ष पर बैठकर रात्रि व्यतीत करता है। प्रातः काल उड़कर चला जाता है। वह उस वृक्ष से लगाव नहीं रखता। इसी प्रकार तत्वज्ञान प्राप्त साधक को संसार समझना चाहिए। अपने आवास को सीमित (छोटा) बनाऐ। यह उद्देश्य रखे कि सुबह (मृत्यु के समय) सब छोड़कर उठ जाना है। यह तो अस्थाई ठिकाना है। स्थाई ठिकाना सतलोक है, वहाँ जाना है। गरीब, जाके नाद न बिंद है, घट मठ नहीं मुकाम। गरीबदास सेवन करे, आदि अनादी राम।। जिस परमेश्वर का शरीर पाँच तत्व से निर्मित नहीं है, उस परमेश्वर को वही प्राप्त कर सकता है जिसने नाद यानि वचन के शिष्य रूपी परिवार को तथा बिन्द यानि शरीर के परिवार को अपना न मानकर परमेश्वर के बच्चे माने हैं। उन पर अपना दावा नहीं करता। जिसको काल के लोक में अपना कोई ठिकाना दिखाई नहीं देता। संत गरीबदास जी कहते हैं कि आदि-अनादि यानि सर्व प्रथम (आदि सनातन) परमात्मा की सेवा यानि भक्ति वही करेगा, उसी को उसकी प्राप्ति होगी। Watch Factful Debates Yt #sant ram pal ji maharaj #me follow
madhan Lal Ravi
617 ने देखा
2 दिन पहले
#Kalyug_Mein_SatyugKiShuruat6 विश्व में कैसे आएगी शांति? जानने के लिए देखिए कलयुग में सतयुग की शुरुआत — भाग 6, Factful Debates यूट्यूब चैनल पर #sant ram pal ji maharaj
Vijay Dass
827 ने देखा
7 दिन पहले
#GodMorningSaturday #संतरामपालजीने_दिलजीता_जनताका 👆👆संत रामपाल जी महाराज जी के आश्रम में जाकर आप कुछ भी मांग सकते हो, आपको वहां से ना नहीं मिलेगी। क्योंकि भगवान के दरबार में किसी भी वस्तु की कमी नहीं होती। किसी भाई को अगर प्रैक्टिकल करना है तो आप अपने गांव के सरपंच आदि को ले जाकर कुछ भी मांग कर सकते हैं, संत रामपाल जी महाराज जी से। Sa News YtChannel #sant ram pal ji maharaj #me follow
Vijay Dass
1.2K ने देखा
16 दिन पहले
किसी रोते हुए गरीब को हंसाना और भूखे को खाना खिलाना ही सच्ची मानवता है। संत रामपाल जी महाराज की अन्नपूर्णा मुहिम से लाखों जिंदगियां संवर रही हैं। उनका पूरी दुनिया को एक ही संदेश है- 'बाँट कर खाओ' और दुनिया को खुशहाल बनाओ। तभी विश्व में शांति आएगी। आइए, संत रामपाल जी महाराज के 'बाँट कर खाओ' के संदेश को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। जब हर समर्थ इंसान बेसहारा लोगों की मदद करेगा, उन्हें रोटी-कपड़ा देगा, तभी सही मायनों में विश्व में शांति का वास होगा। भोजन और छत पर सबका अधिकार है। संत रामपाल जी महाराज की 'अन्नपूर्णा मुहिम' इसी अधिकार को सुनिश्चित कर रही है। उनका 'बाँट कर खाओ' का संदेश विश्व शांति और मानव कल्याण का सबसे पवित्र और अहम सूत्र है। एक ऐसा भविष्य जहां कोई गरीब न हो, कोई भूखा न सोए! संत रामपाल जी महाराज इसी सपने को अपनी 'अन्नपूर्णा मुहिम' से सच कर रहे हैं। 'बाँट कर खाओ' का उनका यह नियम विश्व से अपराध और अशांति को खत्म करने का मूल मंत्र है। रोटी, कपड़ा, शिक्षा, चिकित्सा और मकान हर इंसान की जरूरत है। जो लोग इनसे वंचित हैं, संत रामपाल जी महाराज उन्हें गले लगा रहे हैं। 'बाँट कर खाओ' की इस मुहिम से ही गरीबी का नाश होगा, लोगों का जीवन सुखी होगा और विश्व में शांति का नया सवेरा होगा। इंसानियत का सबसे बड़ा धर्म है भूखे को खाना खिलाना। संत रामपाल जी महाराज 'अन्नपूर्णा मुहिम' के तहत यही पुनीत कार्य कर रहे हैं। उनका संदेश 'बाँट कर खाओ' विश्व में भाईचारा स्थापित कर रहा है, जिससे लोग सुखी हो रहे हैं। वो परिवार जो कभी दो वक्त की रोटी के लिए तरसते थे, आज संत रामपाल जी महाराज की कृपा से सुखी जीवन जी रहे हैं। 'बाँट कर खाओ' का यह संदेश हर चेहरे पर मुस्कान ला रहा है, और जहां मुस्कान है, वहीं शांति है। सिर्फ बातों से नहीं, बल्कि कर्मों से दुनिया बदल रही है। संत रामपाल जी महाराज की 'अन्नपूर्णा मुहिम' बेसहारा लोगों का सहारा बन रही है। आइए, हम भी उनके 'बाँट कर खाओ' के संदेश को अपनाएं और विश्व शांति में अपना योगदान दें। एक सच्चे संत की पहचान यही है कि वह दूसरों का दुख नहीं देख सकता। संत रामपाल जी महाराज अपनी 'अन्नपूर्णा मुहिम' से गरीबों को रोटी, कपड़ा और मकान देकर 'बाँट कर खाओ' का जो दिव्य संदेश दे रहे हैं, वह विश्व को नई दिशा दिखा रहा है। पूरी दुनिया को आज नफरत और स्वार्थ छोड़कर संत रामपाल जी महाराज के 'बाँट कर खाओ' के सिद्धांत को अपनाना चाहिए। जब हम अपना भोजन और खुशियां जरूरतमंदों के साथ बांटेंगे, तभी विश्व में स्थायी शांति आएगी। #बांट_कर_खाओ #AnnapurnaMuhimSantRampalJi #रोटीकपड़ा_शिक्षाचिकित्सा_मकान #Haryana #flood #floodrelief #flooding #farmer #india #sanatandharma #kalyug #satyug #goldenage #help #humanity #Kindness #AnnapurnaMuhim #heaven #SantRampalJiMaharaj #sant ram pal ji maharaj #me follow
akshay kumar
1.5K ने देखा
19 दिन पहले
AI indicator
#विश्व_शांति_केलिए_निमंत्रण #MahaAnushthan_SantRampalJi 🌾🗒️🌾 "पूरी मानवता के लिए खुला निमंत्रण" चाहे आप किसी भी देश, धर्म, जाति या समुदाय से हों, यह निमंत्रण सिर्फ़ आपका है! 1, 2 और 3 मई 2026 को भारत और नेपाल के सभी सतलोक आश्रमों में आयोजित विश्व शांति महा धार्मिक अनुष्ठान में सपरिवार सादर आमंत्रित हैं। आइए, मानवता के इस महाकुंभ में शामिल होकर एक परमात्मा की शरण में विश्व शांति का संकल्प लें। #WorldPeace_With_SantRampalJi #WorldPeace #DivineLove #InternationalRelations #GlobalSecurity #GeoPolitics #military #faith #pray #viralreels #Iran #Hinduism #Buddhism #MiddleEast #USA #UK #IndianWisdom #FutureOfHumanity #SanatanDharma #GuidanceOfSantRampalJi #PeaceCompassionLove #sant ram pal ji maharaj
madhan Lal Ravi
1.4K ने देखा
22 दिन पहले
#विश्वशांतिकेलिए_महाअनुष्ठान वह महापुरुष संत रामपाल जी महाराज हैं। उनके तत्वज्ञान से ही धरती पर स्वर्ग उतरेगा। संत रामपाल जी महाराज का मूल संदेश है: जीव हमारी जाति है, मानव धर्म हमारा। हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई, धर्म नहीं कोई न्यारा।। #sant ram pal ji maharaj
madhan Lal Ravi
2.6K ने देखा
22 दिन पहले
#विश्वशांतिकेलिए_महाअनुष्ठान संत रामपाल जी महाराज का संदेश: जीव हमारी जाति है, मानव धर्म हमारा। हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई, धर्म नहीं कोई न्यारा।। आइए, विश्व शांति महा धार्मिक अनुष्ठान से जुड़ें 1, 2, 3 मई 2026 #sant ram pal ji maharaj