sant ram pal ji maharaj

Vijay Dass
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21 hours ago
True worship (Satbhakti) grants deliverance from the affliction of birth and death. Thereafter, the soul never again wanders through the cycle of the 8.4 million species. It is solely through the practice of true worship that KavirDev (Kabir Saheb Ji) liberates the soul from the captivity of Kaal (Time/Death) and transports it to Satlok—the immortal and imperishable realm. Evidence found in Rigveda, Mandala 10—Hymn 161 (Verses 2, 5), Hymn 162 (Verse 5), and Hymn 163 (Verses 1–3)—affirms that the Supreme God, Kabir Saheb Ji, extends the lifespan of those who engage in true worship; furthermore, even if a sick person is on the verge of death, He can restore their health and bestow upon them a full lifespan of one hundred years. #TrueWorship_EndsSuffering #SaTrueStoryYouTubeChannel #worship #faith #cancer #fyp #coloncancer #healthcare #stroke #digitalhealth #cancertreatment #healthsecrets #meditation #waheguru #harharmahadev #shiv #viralreels #SantRampalJiMaharaj #TrueGuru #TatvdarshiSant #sant ram pal ji maharaj #me follow
Vijay Dass
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11 days ago
#GodMorningMonday #डॉBRअंबेडकरजी_कीबड़ीभूलPart2 , चौसठ लाख शिष्यों की परिक्षा लेना परमात्मा कबीर जी विशेषकर ऐसी लीला उस समय किया करते जिस समय दिल्ली का सम्राट सिकंदर लोधी काशी नगरी में आया हो। उस समय सिकंदर लोधी राजा काशी में उपस्थित था। काजी-पंडितों ने राजा को शिकायत कर दी कि कबीर जुलाहे ने जुल्म कर दिया। शर्म-लाज समाप्त करके सरेआम वैश्या के साथ हाथी के ऊपर गलत कार्य कर रहा था। शराब पी रहा है। राजा ने तुरंत पकड़कर गंगा में डुबोकर मारने का आदेश दिया। अपने हाथों से राजा सिकंदर ने हाथों में हथकड़ी तथा पैरों में बेड़ी तथा गले में तोक लगाई। नौका में बैठाकर गंगा दरिया के मध्य में ले जाकर दरिया में सिपाहियों ने पटक दिया। हथकड़ी, बेड़ी तथा तोक अपने आप टूटकर जल में गिर गई। परमात्मा जल पर पद्म आसन लगाकर बैठ गए। नीचे से गंगा जल चक्कर काटता हुआ बह रहा था। परमात्मा जल के ऊपर आराम से बैठे थे। कुछ समय उपरांत परमात्मा कबीर जी गंगा के किनारे आ गए। सिपाहियों ने शेखतकी के आदेश से कबीर जी को पकड़ कर नौका में बैठाकर कबीर परमात्मा के पैरों तथा कमर पर भारी पत्थर बाँधकर हाथ पीछे को रस्सी से बाँधकर गंगा दरिया के मध्य में फैंक दिया। रस्से टूट गए। पत्थर जल में डूब गए। परमेश्वर कबीर जी जल के ऊपर बैठे रह गए। जब देखा कि कबीर गंगा दरिया में डूबा नहीं तो क्रोधित होकर शेखतकी ने राजा से कहकर तोब के गोले मारने का आदेश दे दिया। पहले कबीर जी को पत्थर मारे, गोली मारी, तीर मारे। अंत में तोब के गोले चार पहर यानि बारह घण्टे तक कबीर जी के ऊपर चलाए। कोई तो वहीं किनारे पर गिर जाता, कोई दूसरे किनारे पर जाकर गिरता, कोई दूर तालाब में जाकर गिरता। एक भी गोला, पत्थर, बंदूक की गोली या तीर परमेश्वर कबीर जी के आसपास भी नहीं गया। इतना कुछ देखकर भी काशी के व्यक्ति परमेश्वर को नहीं पहचान पाए। तब परमेश्वर कबीर जी ने देखा कि ये तो अक्ल के अँधे हैं। ‌‌उसी समय गंगा के जल में समा गए और अपने भक्त रविदास जी के घर प्रकट हो गए। दर्शकों को विश्वास हो गया कि कबीर जुलाहा गंगा जल में डूबकर मर गया है। उसके ऊपर रेत व रेग (गारा) जम गई होगी। सब खुशी मनाते हुए नाचते-कूदते हुए नगर को चल पड़े। शेखतकी अपनी मण्डली के साथ संत रविदास जी के घर यह बताने के लिए गया कि जिस कबीर जी को तुम परमात्मा कहते थे, वह डूब गया है, मर गया है। संत रविदास जी के घर पर जाकर देखा तो कबीर जी इकतारा बजा-बजाकर शब्द गा रहे थे। शेखतकी की तो माँ सी मर गई। राजा सिकंदर के पास जाकर बताया कि वह आँखें बचाकर भाग गया है। रविदास के घर बैठा है। यह सुनकर बादशाह सिंकदर लोधी संत रविदास जी की कुटी पर गया। परमात्मा कबीर जी वहाँ से अंतध्र्यान होकर गंगा दरिया के मध्य में जल के ऊपर समाधि लगाकर जैसे जमीन पर बैठते हैं, ऐसे बैठ गए। रविदास से पूछा कि कबीर जी कहाँ पर हैं? संत रविदास जी ने कहा कि हे बादशाह जी! वे पूर्ण परमात्मा हैं, वे ही अलख अल्लाह हैं। आप इन्हें पहचानो। वे तो मर्जी के मालिक हैं। जहाँ चाहें चले जाऐं। मुझे कुछ नहीं पता, कहाँ चले गए? वे तो सबके साथ रहते हैं। उसी समय किसी ने बताया कि कबीर जी तो गंगा के बीच में बैठे भक्ति कर रहे हैं। सब व्यक्ति तथा राजा व सिपाही गंगा दरिया के किनारे फिर से गए। राजा ने नौका भेजकर मल्लाहों के द्वारा संदेश भेजा कि बाहर आऐं। मल्लाहों ने नौका कबीर जी के पास ले जाकर राजा का आदेश सुनाया कि आपको सिकंदर बादशाह याद कर रहे हैं। आप चलिए। परमेश्वर कबीर जी उस जहाज (बड़ी नौका) में बैठकर किनारे आए। राजा सिकंदर ने फिर गिरफ्तार करवाकर हाथ-पैर बाँधकर खूनी हाथी से मरवाने की आज्ञा कर दी। चारों और जनता खड़ी थी। सिकंदर ऊँचे स्थान पर बैठे थे। परमात्मा को बाँध-जूड़कर पृथ्वी पर डाल रखा था। महावत (हाथी के ड्राइवर) ने हाथी को शराब पिलाई और कबीर जी को कुचलकर मरवाने के लिए कबीर जी की ओर बढ़ा। कबीर जी ने अपने पास एक बब्बर सिंह खड़ा दिखा दिया। वह केवल हाथी को दिखा। हाथी चिंघाड़कर डर के मारे वापिस भाग गया। महावत को नौकरी का भय सताने लगा। हाथी को भाले मार-मारकर कबीर जी की ओर ले जाने लगा, परंतु हाथी उल्टा भागे। तब पीलवान (महावत) को भी शेर खड़ा दिखाई दिया तो डर के मारे उसके हाथ से अंकुश गिर गया। हाथी भाग गया। परमेश्वर कबीर जी के बंधन टूट गए। कबीर जी खड़े हुए तथा अंगड़ाई ली तो लंबे बढ़ गए। सिर आसमान को छूआ दिखाई देने लगा। प्रकाशमान शरीर दिखाई देने लगा। सिकंदर राजा भय से काँपता हुआ परमेश्वर कबीर जी के चरणों में गिर गया। क्षमा याचना की तथा कहा कि आप परमेश्वर हैं। मेरी जान बख्शो। मेरे से भारी भूल हुई है। मैं अब आपको पहचान गया हूँ। आप स्वयं अल्लाह पृथ्वी पर आए हो। तब परमेश्वर कबीर जी काशी नगर में आए तथा उसी गणिका के मकान के चैंक में बैठ गए। लड़की परमात्मा के चरण दबा रही थी। परमेश्वर कबीर जी के पैर अपनी साथलों (घुटनों से ऊपर की टाँग) पर रख लिए। फिर गणिका कै संग चले, शीशी भरी शराब। गरीबदास उस पुरी में, जुलहा भया खराब।।726।। तारी बाजी पुरी में, भिष्ट जुलहदी नीच। गरीबदास गनिका सजी, दहूं संतौं कै बीच।।727।। गावत बैंन बिलासपद, गंगाजल पीवंत। गरीबदास विह्नल भये, मतवाले घूमंत।।728।। भडु.वा भडु.वा सब कहैं, कोई न जानैं खोज। दास गरीब कबीर करम, बांटत शिरका बोझ।।729।। देखो गनिका संगि लई, कहते कौंम छतीस। गरीबदास इस जुलहदी का, दर्शन आन हदीस।।730।। शाह सिकंदर कूं सुनी, भिष्ट हुये दो संत। गरीबदास च्यारों वरण, उठि लागे सब पंथ।।731।। च्यारि वरण षट आश्रम, दोनौं दीन खुशाल। गरीबदास हिंदू तुरक, पड्या शहर गलि जाल।।732।। शाह सिकंदरकै गये, सुनि कबले अरदास। गरीबदास तलबां हुई, पकरे दोनौं दास।।733।। कहौ कबीर यौह क्या किया, गनिका लिन्हीं संग। गरीबदास भूले भक्ति, पर्या भजन में भंग।।734।। सुनौं सिकंदर बादशाह, हमरी अरज अवाज। गरीबदास वह राखिसी, जिन यौह साज्या साज।।735।। जड़ियां तौंक जंजीर गल, शाह सिकंदर आप। गरीबदास पद लीन है, तारी अजपा जाप।।736।। हाथौं जड़ी हथकड़ी, पग बेड़ी पहिराय। गरीबदास बीच गंग में, तहां दीन्हा छिटकाय।।737।। झड़ि गये तौंक जंजीर सब, लगै किनारै आय। गरीबदास देखै खलक, स्यौं काजी बादशाह।।738।। नीचै नीचै गंगाजल, ऊपर आसन थीर। गरीबदास बूडै़ नहीं, बैठे अधर कबीर।।739।। योह अचरज कैसा भया, देखैं दोनौं दीन। गरीबदास काजी कहंै, बांधि दिया जल सीन।।740।। गल में फांसी डारि करि, बांधौ शिला सुधारि। गरीबदास यौह जुलहदी, जब बूडै़ गंगधार।।741।। शिला धरी जब नाव में, बांधी गलै कबीर। गरीबदास फंद टूटि कै, ना डूबै जलनीर।।742।। शिला चली शाह और कौं, देखत काशी ख्याल। गरीबदास कबीर का आसन अधर हमाल।।743।। तीर बाण गोली चलैं, तोप रहकल्यौं शोर। गरीबदास उस जुलहदीकै, गई एक नहीं ओर।।744।। अधर धार गोले बहैं, जलकै बीच गभाक। गरीबदास उस जुलहदी पर, शस्त्रा छूटैं लाख।।745।। तोप रहकले सब चलैं, तीर बाण कमान। गरीबदास वह जुलहदी, जल पर रहै अमान।।746।। अधरि धार अपार गति, जल परि लगी समाधि। गरीबदास निज ब्रह्मपद, खेलैं आदि अनादि।।747।। जुलम हुआ बूडै़ नहीं, शस्त्रा लगै न बाण। गरीबदास इब कौंन गति, कैसैं लीजै प्राण।।748।। लगी समाधी अगाध में, बिचरै काशी गंग। गरीबदास किलोल सर, छूहैं चरण तरंग।।749।। च्यारि पहर गोले बगे, धमी मुलक मैदान। गरीबदास पोखर सुखैं, रहे कबीर अमान।।750।। अपनी करनी सब करी, थाके दोनौं दीन। गरीबदास अब जुलहदी, पैठि गये जलमीन।।751।। डूब्या डूब्या सब कहैं, हो गये गारत गोर। गरीबदास कबले धनी, तुम आगै क्या जोर।।752।। आनंद मंगल होत है, बटैं बधाई बेग। गरीबदास उस जुलहदी पर फिर गई रेती रेघ।।753।। हस्ती घोडे़ चढत हैं, पान मिठाई चीर। गरीबदास काशी खुसी, बूडे़ गंग कबीर।।754।। जावो घरि रैदासकै, हिलकारे हजूर। गरीबदास खुसिया कहौ, कहियो नहीं कसूर।।755।। झालरि ढोलक बजत हैं, गावैं शब्द कबीर। गरीबदास रैदास संगि, दोनौं एकही तीर।।756।। काजी पंडित सब गये, शाह सिकंदर उठ। गरीबदास रैदासकै, भेष गये जटजूट।।757।। कोठी कुठले सब झके, बासन टींडर गोलि। गरीबदास रहदास सुनौं, कहां गये वह बोल।।758।। वे प्रगट पूरण पुरूष हैं, अबिनाशी अलख अल्लाह। गरीबदास रैहदास कहैं, सुनौं सिकंदर शाह।।759।। सूरजमुखी सुभांन सर, खिले फूल गुलजार। गरीबदास काजी पंडित करता शाह पुकार।।760।। शाह सिकंदर फिर गये, उस गंगा कै तीर। दास गरीब कबीर हरी, बैठे ऊपर नीर।।761।। बैठि मलाह जिहाज में, गये धार कै बीच। गरीबदास हरि हरि करैं, प्रेम फुहारे सीच।।762।। करी अरज मलाह तहां, दीन दुनी बादशाह। गरीबदास आसन उधर, लगी समाधि जुलाह।।763।। भंवर फिरत हैं गंग जल, फूल उगानें कोटि। गरीबदास तहां बंदगी, हरिजन हरि की ओट।।764।। संकल सीढी लाय करि, उतरे तहां मलाह। गरीबदास हम बंदगी, याद किये बादशाह।।765।। बैठ कबीर जहाज में, आये गंगा घाट। गरीबदास काशी थकी, हांडे बौह बिधि बाट।।766।। ‘खूनी हाथी से कबीर परमेश्वर को मरवाने की कुचेष्टा’’ खूनी हाथी मस्त है, पग बंधे जंजीर। गरीबदास जहां डारिया, मसक बांधि कबीर।।767।। सिंह रूप साहिब धर्या, भागे उलटे फील। गरीबदास नहीं समझती, याह दुनिया खलील।।768।। बने केहरी सिंह जित, चैंर शिखर असमांन। गरीबदास हस्ती लख्या, दीखै नहीं जिहांन।।769।। कूटै शीश महावतं, अंकुश शीर गरगाप। गरीबदास उलटा भगै, तारी दीजैं थाप।।770।। भाले कोखौं मारिये, चरखी छूटैं पाख। गरीबदास नहीं निकट जाय, किलकी देवैं लाख।।771।। जैसी भक्ति कबीर की, ऐसी करै न कोय। गरीबदास कुंजर थके, उलटे भागे रोय।।772।। दुंम गोवैं मंूडी धुनैं, सैंन न समझै एक। गरीबदास दीखै नहीं, आगै खड़ा अलेख।।773।। पीलवान देख्या तबै, खड़ा केहरी सिंघ। गरीबदास आये तहां, धरि मौला बहु रंग।।774।। उतरे मौला अरस तैं, भाव भक्ति कै हेत। गरीबदास तब शाह लखे, कबीर पुरूष सहेत।।775।। लीला की कबीर ने, दो रूप में रहे दीस। दासगरीब कबीर कै, पास खडे़ जगदीश।।776।। जंभाई अंगडाईयां, लंबे भये दयाल। गरीबदास उस शाह कूं, मानौं दश्र्या काल।।777।। कोटि चन्द्र शशि भान मुख, गिरद कुंड दुम लील। गरीबदास तहां ना टिके, भागि गये रनफील।।778।। नयन लाल भौंह पीत हैं, डूंगर नक पहार। गरीबदास उस शाह कूं, सिंह रूप दीदार।।779।। मस्तक शिखर स्वर्ग लग, दीरघ देह बिलंद। गरीबदास हरि ऊतरे, काटन जम के फंद।।780। गिरद नाभि निरभै कला, दुदकारै नहीं कोय। गरीबदास त्रिलोकि में, गाज तास की होय।।781।। ज्यूं नरसिंह प्रहलादकै, यूं वह नरसिंह एक। गरीबदास हरि आईया, राखन जनकी टेक।।782।। बार-बार सताय कर, मस्तक लीना भार। गरीबदास शाह यौं कहै, बकसौ इबकी बार।।783।। तहां सिंह ल्यौलीन हुआ, परचा इबकी बार। गरीबदास शाह यौं कहै, अल्लह दिया दीदार।।784।। सुन काशी के पण्डितौ, काजी मुल्लां पीर। गरीबदास इसके चरण ल्यौह, अलह अलेख कबीर।।785।। यौह कबीर अल्लाह है, उतरे काशी धाम। गरीबदास शाह यौं कहैं, झगर मूंये बे काम।।786।। काजी पंडित रूठिया, हम त्याग्या योह देश। गरीबदास षटदल कहैं, जादू सिहर हमेश।।787।। इन जादू जंतर किया, हस्ती दिया भगाय। गरीबदास इत ना रहैं, काशी बिडरी जाय।।788।। काशी बिडरी चहौं दिशा, थांभन हारा एक। गरीबदास कैसे थंभै, बिडरे बौहत अनेक।।789।। Factful Debates YouTube #sant ram pal ji maharaj #me follow
Vijay Dass
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11 days ago
#GodMorningMonday #डॉBRअंबेडकरजी_कीबड़ीभूलPart2 . गरीब, यह चूक, धूरो दूर ! छःसौ वर्ष बाद वही इतिहास दोहराने की कोशिश हो रही है। छःसौ वर्ष पहले भी जब कबीर परमेश्वर जी हमें निज धाम सतलोक ले जाने के लिये आये थे तो उस वक्त भी उनको बहुत संघर्ष करना पड़ा था पाखंडी पंडितो ओर मुल्ला काजियो ने कबीर परमात्मा का बहुत विरोध किया। उन्हे झूठा बदनाम किया उन्हे यहां तक की उन्हे खत्म करने के लिये सभी प्रयास किये तोप से उड़ाने की कोशिश, भूखे शेर के पिंजरे में डाला, हाथी से कुचलना चाहा तो कभी गंगा में डुबोना चाहा, उबलते गर्म तेल की कड़ाई में डाला लेकिन वो दुष्ट लोग अविनाशी कबीर परमात्मा का कुछ नही बिगाड़ पाये। वो कबीर परमात्मा चाहते तो क्षण भर में सबको सबक सिखा सकते थे, लेकिन उन्होने ऐसा नही किया परमात्मा कहते है । यह सब मेरी ही आत्माये है। यह भटके हुऐ है क्योकि बच्चे जितने मर्जी बुरे हो जाये, लेकिन मां बाप कभी गलत नही हो सकता। इसलिये परमात्मा उनके जैसा नही बन सकता बल्कि हमे सीधे मार्ग पर लाने लिये हर कष्ट को सहन किये। लेकिन हम नीच लोग फिर भी परमात्मा को पहचान नही पाये, ओर वो 120 वर्ष लीला करने के बाद मगहर से सहशरीर वापिस सतलोक चले गये। और हम आज तक इस गंदे लोक में भटक रहे है। यह हमारी उसी गलती की सजा है। अब छःसौ वर्षो बाद परमात्मा पुनः आये है। फिर वही लीला कर रहे है। और हमारे लिये बहुत जुल्म सह रहे है। दूसरी बार जेल चले गये। लेकिन हम नीच फिर वही गलती दोहराने की राह पर चल रहे है लेकिन इस बार यह अंतिम मौका है। गरीब, यह चूक, धूरो दूर ! अब कि चूक गये तो पता नही काल कहां पटकेगा। लख चौरासी के फेर में कुत्ते गधे सुअर बनकर यहीं धक्के खाते रहेंगे। पिछली गलती को न दोहराये। इसलिये भक्तसमाज से निवेदन है की संत रामपाल जी को पहचानो। उनके वचनो को सुनो फिर अपने विवेक से निर्णय करो की संत रामपाल जी क्या है? ऐसे ही किसी कही सुनी बातो पर विश्वास करके संत रामपाल जी को बुरा न समझे। वो सबका कल्याण करने के लिये आये है। यह सुनहरा अवसर है। संत रामपाल जी की शरण में आओ और अपना कल्याण करवाओ। गरीब, मानुष जीवन दुर्लभ है, मिले न बारम्बार ! जैसे तरूवर से पत्ता टूट गिरे, बहुर लगे न डार !! Factful Debates YouTube #sant ram pal ji maharaj #me follow
Vijay Dass
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11 days ago
#GodMorningMonday #डॉBRअंबेडकरजी_कीबड़ीभूलPart2 . कविर् साहिब जी की अमृतवाणी में सृष्टि रचना का प्रमाण यह अमृतवाणी सन् 1403 से {जब पूज्य कविर्देव (कबीर परमेश्वर) लीलामय शरीर में पाँच वर्ष के हुए} सन् 1518 {जब कविर्देव (कबीर परमेश्वर) मगहर स्थान से सशरीर सतलोक गए} के बीच में लगभग 600 वर्ष पूर्व परम पूज्य कबीर परमेश्वर (कविर्देव) जी द्वारा अपने निजी सेवक (दास भक्त) आदरणीय धर्मदास साहेब जी को सुनाई थी तथा धनी धर्मदास साहेब जी ने लिपिबद्ध की थी। परन्तु उस समय के पवित्र हिन्दुओं तथा पवित्र मुसलमानों के नादान गुरुओं (नीम-हकीमों) ने कहा कि यह धाणक (जुलाहा) कबीर झूठा है। किसी भी सद् ग्रन्थ में श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी के माता-पिता का नाम नहीं है। ये तीनों प्रभु अविनाशी हैं इनका जन्म मृत्यु नहीं होता। न ही पवित्र वेदों व पवित्र कुरान शरीफ आदि में कबीर परमेश्वर का प्रमाण है तथा परमात्मा को निराकार लिखा है। हम प्रतिदिन पढ़ते हैं। भोली आत्माओं ने उन विचक्षणों (चतुर गुरुओं) पर विश्वास कर लिया कि सचमुच यह कबीर धाणक तो अशिक्षित है तथा गुरु जी शिक्षित हैं, सत्य कह रहे होंगे। आज वही सच्चाई प्रकाश में आ रही है तथा अपने सर्व पवित्र धर्मों के पवित्र सद्ग्रन्थ साक्षी हैं। इससे सिद्ध है कि पूर्ण परमेश्वर, सर्व सृष्टि रचनहार, कुल करतार तथा सर्वज्ञ कविर्देव (कबीर परमेश्वर) ही है जो काशी (बनारस) में कमल के फूल पर प्रकट हुए तथा 120 वर्ष तक वास्तविक तेजोमय शरीर के ऊपर मानव सदृश शरीर हल्के तेज का बना कर रहे तथा अपने द्वारा रची सृष्टि का ठीक-ठीक (वास्तविक तत्व) ज्ञान देकर सशरीर सतलोक चले गए। कृपा प्रेमी पाठक पढं़े निम्न अमृतवाणी परमेश्वर कबीर साहेब जी द्वारा उच्चारितः- धर्मदास यह जग बौराना। कोइ न जाने पद निरवाना।। यहि कारन मैं कथा पसारा। जगसे कहियो राम नियारा।। यही ज्ञान जग जीव सुनाओ। सब जीवोंका भरम नशाओ।। अब मैं तुमसे कहों चिताई। त्रयदेवनकी उत्पति भाई।। कुछ संक्षेप कहों गुहराई। सब संशय तुम्हरे मिट जाई।। भरम गये जग वेद पुराना। आदि रामका का भेद न जाना।। राम राम सब जगत बखाने। आदि राम कोइ बिरला जाने।। ज्ञानी सुने सो हिरदै लगाई। मूर्ख सुने सो गम्य ना पाई।। माँ अष्टंगी पिता निरंजन। वे जम दारुण वंशन अंजन।। पहिले कीन्ह निरंजन राई। पीछेसे माया उपजाई।। माया रूप देख अति शोभा। देव निरंजन तन मन लोभा।। कामदेव धर्मराय सत्ताये। देवी को तुरतही धर खाये।। पेट से देवी करी पुकारा। साहब मेरा करो उबारा।। टेर सुनी तब हम तहाँ आये। अष्टंगी को बंद छुड़ाये।। सतलोक में कीन्हा दुराचारि, काल निरंजन दिन्हा निकारि।। माया समेत दिया भगाई, सोलह संख कोस दूरी पर आई।। अष्टंगी और काल अब दोई, मंद कर्म से गए बिगोई।। धर्मराय को हिकमत कीन्हा। नख रेखा से भगकर लीन्हा।। धर्मराय किन्हाँ भोग विलासा। मायाको रही तब आसा।। तीन पुत्र अष्टंगी जाये। ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराये।। तीन देव विस्त्तार चलाये। इनमें यह जग धोखा खाये।। पुरुष गम्य कैसे को पावै। काल निरंजन जग भरमावै।। तीन लोक अपने सुत दीन्हा। सुन्न निरंजन बासा लीन्हा।। अलख निरंजन सुन्न ठिकाना‌ ब्रह्मा विष्णु शिव भेद नजाना।। तीन देव सो उनको धावें। निरंजन का वे पार ना पावें।। अलखनिरंजन बड़ाबटपारा। तीनलोक जिव कीन्ह अहारा।। ब्रह्मा विष्णु शिव नहीं बचाये। सकल खाय पुन धूर उड़ाये।। तिनके सुत हैं तीनों देवा। आंधर जीव करत हैं सेवा।। अकाल पुरुष काहू नहिं चीन्हां‌काल पाय सबही गह लीन्हां।। ब्रह्म काल सकल जग जाने। आदि ब्रह्मको ना पहिचाने।। तीनों देव और औतारा। ताको भजे सकल संसारा।। तीनों गुण का यह विस्त्तारा। धर्मदास मैं कहों पुकारा।। गुण तीनों की भक्ति में, भूल परो संसार। कहै कबीर निज नाम बिन, कैसे उतरैं पार।। उपरोक्त अमृतवाणी में परमेश्वर कबीर साहेब जी अपने निजी सेवक श्री धर्मदास साहेब जी को कह रहे हैं कि धर्मदास यह सर्व संसार तत्वज्ञान के अभाव से विचलित है। किसी को पूर्ण मोक्ष मार्ग तथा पूर्ण सृष्टि रचना का ज्ञान नहीं है। इसलिए मैं आपको मेरे द्वारा रची सृष्टि की कथा सुनाता हूँ। बुद्धिमान व्यक्ति तो तुरंत समझ जायेंगे। परन्तु जो सर्व प्रमाणों को देखकर भी नहीं मानंेगे तो वे नादान प्राणी काल प्रभाव से प्रभावित हैं, वे भक्ति योग्य नहीं। अब मैं बताता हूँ तीनों भगवानों (ब्रह्मा जी, विष्णु जी तथा शिव जी) की उत्पत्ति कैसे हुई? इनकी माता जी तो अष्टंगी (दुर्गा) है तथा पिता ज्योति निरंजन (ब्रह्म, काल) है। पहले ब्रह्म की उत्पत्ति अण्डे से हुई। फिर दुर्गा की उत्पत्ति हुई। दुर्गा के रूप पर आसक्त होकर काल (ब्रह्म) ने गलती (छेड़-छाड़) की, तब दुर्गा (प्रकृति) ने इसके पेट में शरण ली। मैं वहाँ गया जहाँ ज्योति निरंजन काल था। तब भवानी को ब्रह्म के उदर से निकाल कर इक्कीस ब्रह्माण्ड समेत 16 संख कोस की दूरी पर भेज दिया। ज्योति निरंजन (धर्मराय) ने प्रकृति देवी (दुर्गा) के साथ भोग-विलास किया। इन दोनों के संयोग से तीनों गुणों (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी) की उत्पत्ति हुई। इन्हीं तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी) की ही साधना करके सर्व प्राणी काल जाल में फंसे हैं। जब तक वास्तविक मंत्र नहीं मिलेगा, पूर्ण मोक्ष कैसे होगा? श्री ब्रह्मा जी श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी की स्थिति अविनाशी बताई गई थी। सर्व हिन्दु समाज अभी तक तीनों परमात्माओं को अजर, अमर व जन्म-मृत्यु रहित मानते रहे जबकि ये तीनों नाश्वान हैं। इन के पिता काल रूपी ब्रह्म तथा माता दुर्गा (प्रकृति/अष्टांगी) हैं जैसा आप ने पूर्व प्रमाणों में पढ़ा यह ज्ञान अपने शास्त्रों में भी विद्यमान है परन्तु हिन्दु समाज के कलयुगी गुरूओं, ऋषियों, सन्तों को ज्ञान नहीं। जो अध्यापक पाठ्यक्रम (सलेबस) से ही अपरिचित है वह अध्यापक ठीक नहीं (विद्वान नहीं) है, विद्यार्थियों के भविष्य का शत्रु है। इसी प्रकार जिन गुरूओं को अभी तक यह नहीं पता कि श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री शिव जी के माता-पिता कौन हैं? तो वे गुरू, ऋषि,सन्त ज्ञान हीन हैं। जिस कारण से सर्व भक्त समाज को शास्त्र विरूद्ध ज्ञान (लोक वेद अर्थात् दन्त कथा) सुना कर अज्ञान से परिपूर्ण कर दिया। शास्त्रविधि विरूद्ध भक्तिसाधना करा के परमात्मा के वास्तविक लाभ (पूर्ण मोक्ष) से वंचित रखा सबका मानव जन्म नष्ट करा दिया क्योंकि श्री मद्भगवत गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में यही प्रमाण है कि जो शास्त्रविधि त्यागकर मनमाना आचरण पूजा करता है। उसे कोई लाभ नहीं होता पूर्ण परमात्मा कबीर जी ने पाँच वर्ष की लीलामय आयु में सन् 1403 से ही सर्व शास्त्रों युक्त ज्ञान अपनी अमृतवाणी में बताना प्रारम्भ किया था। परन्तु उन अज्ञानी गुरूओं ने यह ज्ञान भक्त समाज तक नहीं जाने दिया। जो वर्तमान में सर्व सद्ग्रन्थों से स्पष्ट हो रहा है इससे सिद्ध है कि कर्विदेव (कबीर प्रभु) तत्वदर्शी सन्त रूप में स्वयं पूर्ण परमात्मा ही आए थे। Factful Debates YouTube #sant ram pal ji maharaj #me follow
Vijay Dass
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13 days ago
#GodMorningSaturday #रामनवमी_पर_जानें_आदिराम_कौन . #वाणी गरीब~कलियुग अंत की बात, सत्ययुग आदि बखानों। विलसतिया नर नारि,पंच वर्ष प्रसूताह जानों।। गरीब~बीस वर्ष की उमर, पांच तिस माहीं खंडा। काल कर्म और मीच, लगेंगे सब शिर डंडा।। गरीब~गदह्यों की ले लीद, द्वार सब चौका देवें। ना जल का प्रवेश, मूत्र का मेलें भेवें।। गरीब~मुरगे घर घर बार, कूकडुकू कर बोलें। बोक विश्वंभर नाथ,कामिनी नाचत डोलें।। गरीब~गदह्यों के अस्वार, सिलहरे ढाल लगावें। ऐसी चढे बरात, कलि बहु नाच नचावें।। गरीब~चामों के चहँडोल, चरित्र कह द्यों सारे। झूलों के शिरपोश, नीर पावेंगे खारे।। गरीब~सहस्र किरण का तेज, उलट कर बहे अपूठा। मिश्र मारेंगे बाट, शिकारी दगरे लूटा।। गरीब~धरती में बिल खोद, रहेंगे या विध प्राणी। नहीं मेंडी नहीं मंडप, सकल विध साची जानी।। गरीब~खड वृक्षों के पान, भबै जीव करे अहारा। चूहडों के घर न्याय, पंडित जहां जाय पुकारा।। गरीब~षट् दर्शन सब भेख, होत गृही घरबासे। अपनी नारी छाड, सकल वे दर जासे।। Factful Debates YouTube #sant ram pal ji maharaj #me follow
madhan Lal Ravi
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19 days ago
#मधुपरमहंस_की_टांयटांय_फिस्स2 क्या बिना नाम जपे केवल गुरु की कृपा से मोक्ष मिल सकता है? देखिए रांजड़ी वाले मधुपरमहंस की टांय - टांय फिस्स भाग - 02 Factful Debates यूट्यूब चैनल पर Factful Debates YtChannel #sant ram pal ji maharaj
Vijay Dass
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23 days ago
#me follow #sant ram pal ji maharaj #🙏गुरु महिमा😇 #GodMorningTuesday #Kalyug_Mein_Satyug_Part5 . कबीर साहिब का श्री हनुमान जी को शरण में लेना त्रेता युग में जब रावण ने सीता जी का हरण कर लिया तो उसकी खोज शुरू हुई। हनुमान जी ने सीता पता लगाया कि वह रावण की कैद में है। सीता ने हनुमान को एक कंगन दिया था कि यह श्री राम को दिखा देना। जब वे सीता जी की खोज कर के लंका से वापिस आ रहे थे तो समुद्र को आकाश मार्ग से पार करके एक पर्वत के ऊपर उतरे। वहाँ पास ही एक बहुत सुंदर निर्मल जल का सरोवर था। सुबह-सुबह की बात है। जो कंगन सीता जी ने हनुमान को दिया था, हनुमान जी उसको एक पत्थर पर रख कर स्नान करने लगे। उसी समय एक बंदर आया और कंगन उठा कर भाग लिया। हनुमान जी की नज़र जैसे सर्प की मणि पर होती है ऐसे कंगन पर थी। हनुमान जी पीछे दौड़ा। बंदर भाग कर एक आश्रम में प्रवेश कर गया और उस कंगन को एक मटके में दाल दिया। वह बहुत बड़ा घड़ा था। जब उस कुम्भ में हनुमान जी ने देखा तो ऐसे-ऐसे कंगनों से वह घड़ा लगभग भरा हुआ था। हनुमान जी ने कंगन उठा कर देखा तो सारे ही कंगन एक जैसे थे। भेद नहीं लग रहा था। असमंजस में पड़ गया। सामने एक महापुरुष आश्रम में बैठे हुए दिखाई दिए। उनके पास जाकर प्रार्थना की कि हे ऋषिवर! मैं सीता माता की खोज करने गया था और सीता जी का पता लग गया है। एक कंगन माता ने मुझे दिया था। उसको रखकर स्नान करने लग गया। बंदर ने शरारत की और उठकर इस मटके में दाल दिया। वह ऋषि उस समय मुनिन्द्र नाम से आये कबीर साहिब थे। मुनिन्द्र साहिब ने कहा कि आओ भक्त जी, दूध पीयो, बैठो विश्राम करो। हनुमान जी बोले कि काहे का दूध, मेरी तो साड़ी म्हणत विफल हो गयी। इस कुम्भ के अंदर एक ही जैसे सभी कंगन नज़र आ रहे हैं। मुझे पहचान नहीं हो रही, वह कंगन कौन सा है ? मुनिन्द्र जी बोले कि आपको हो भी नहीं सकती। यदि पहचान हो जाय तो आप इस काल के लोक में दुखी नहीं होते, यह कठिनाइयाँ नहीं आती। मुनिन्द्र कबीर साहिब जी का अवतार थे वे बोले की हनुमान जी आप कौन से राम की बात कर रहे हो ? कौन सीता ? मुझे यह तो बता। हनुमान जी बोले कि आप अजीब बात कर रहे हो। सारे के सारे वन तथा संसार में एक चर्चा हो रही है। आप को मालुम ही नहीं ? भगवन रामचन्द्र जी ने राजा दशरथ के घर पर जन्म लिया है। उनकी पत्नी का रावण ने अपहरण कर रखा है, आपको नहीं मालूम ? मुनिन्द्र जी कहते हैं कि कौन-कौन से नंबर के राम की मालूम करूँ ? हनुमान जी कहते हैं की राम का भी कोई नंबर होता है ? मुनिन्द्र साहिब ने कहा की ऐसे ऐसे यह दशरथ के पुत्र रामचन्द्र 30 करोड़ हो चुके हैं और यह सभी जन्म और मृत्यु के अंदर हैं। यह पूर्ण परमेश्वर नहीं है। यह केवल तीन लोक के प्रभु हैं। इनके उपासक भी मुक्त नहीं हैं। हनुमान जी, सत कर मानना। हनुमान जी बहुत महसूस करता है कि यह महात्मा बहुत अजीबो गरीब बात कर रहा है। हनुमान जी बोले कि क्या यह श्री रामचन्द्र जी तीस करोड़ बार आ चुके हैं ? मुनिन्द्र (कबीर) जी ने कहा - हाँ पुत्र, यह श्री राम अपना जीवन पूरा करके जब समाप्त हो जायेगा उसके बाद फिर नई आत्मा ऐसे ही जन्म लेती रहती हैं और आती रहती हैं। ऐसे ही तेरे जैसे हनुमान न जाने कितने हो लिए। यह तो इस ब्रह्म अथार्त कालभगवान ने एक फिल्म बना रखी है। उसमें पात्र आते रहते हैं।और इसी का प्रमाण यह कुम्भ दे रहा है। इसमें जितने भी कंगन हैं यह आप ही जैसे हनुमान आते हैं और वह बंदर इसमें कंगन डालता है। इस कुम्भ के अंदर मेरी कृपा से एक शक्ति है कि जो भी वस्तु इसमें डाली जाती है यह वैसी ही एक और बना देता है । ऐसे ही इस रूप का दूसरा कंगन तैयार कर देता है। आप इस में से कंगन ले जाइए और दिखाईये अपने राम जी को, ज्यों का त्यों मिलेगा। फिर कहा कि हनुमान जी सतभक्ति करो। यह भक्ति तुम्हारी परिपूर्ण नहीं है। यह काल जाल से आपको मुक्त नहीं होने देगी। हनुमान जी बोले कि अब मेरे पास इतना समय नहीं है कि आपके साथ वार्ता करूँ, परन्तु मुझे आपकी बातें अच्छी नहीं लग रही हैं। कंगन उठा कर चले गए। भगवान रामचन्द्र जी रावण का वध करके सीता को वापिस ले आये। कुछ दिनों के बाद हनुमान जी अयोध्या त्यागकर एक पहाड़ पर भजन कर रहे थे। यही दयालु परमेश्वर अपनी हंस आत्मा के पास गए तथा कहा की राम-राम भक्त जी। हनुमान जी ने ऋषि की तरफ देखा । फिर हनुमान जी बोले कि मुझे ऐसा लग रहा है कि आपको कहीं पर देखा हो। तब मुनिन्द्र साहिब बोले कि - हाँ, हनुमान। पहली बार तो तूने मुझे वहां पर देखा जब आप सीता की खोज करके वापिस आ रहे थे और कंगन को किसी बंदर ने मटके में दाल दिया था और दूसरी बार वहाँ पर देखा था जब श्री रामचन्द्र जी का समुद्र पर पुल नहीं बन रहा था। उस समय मैंने अपनी कृपा से पुल बनवाया था। मैं वही मुनिन्द्र ऋषि हूँ। हनुमान जी को याद आया। कहा की - आओ ऋषि जी, बैठो। क्योंकि हनुमान जी बहुत प्रभु प्रेमी और अतिथि सत्कार करने वाले महापुरुष थे। कहा की अब पहचान लिया। मुनिन्द्र जी फिर प्रार्थना करते हैं कि हनुमान जी जो आप साधना कर रहे हो, यह पूर्ण नहीं है। यह तुम्हें पार नहीं होने देगी। यह सर्व काल जाल है। सारी "सृष्टि रचना" सुनाई। हनुमान जी बहुत प्रभावित होते हैं। फिर भी कहा कि मैं तो इन प्रभु से आगे किसी को नहीं मान सकता। हमने तो आज तक यही सुना है कि यह तीन लोक के नाथ विष्णु हैं और उन्हीं का स्वरुप रामचन्द्र जी आये हैं। अगर मैं आपके सतलोक को अपनी आँखों देखूं तो मान सकता हूँ। कबीर साहिब ने हनुमान जी को दिव्य दृष्टि दी और स्वयं आकाश में उड़कर सतलोक पहुँच गए। पृथ्वी पर बैठे हनुमान जी को सब वहाँ सतलोक का दृश्य दिखाया। साथ में यह तीन लोक के भगवानों के स्थान दिखाए और वह काल दिखाया जहाँ पर एक लाख जीवों का प्रतिदिन आहार करता है। उसी को ब्रह्म, क्षर पुरुष तथा ज्योति स्वरूपी निरंजन कहते हैं। तब हनुमान जी ने कहा कि - प्रभु, नीचे आओ। क्षमा करना दास ने आपके साथ अभद्र व्यवहार भी किया होगा। दास को शरण में लो। हनुमान जी को प्रथम नाम दिया, फिर सत्यनाम दिया और मुक्ति का अधिकारी बनाया। Factful Debates YTChannel
Vijay Dass
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23 days ago
#GodMorningTuesday #Kalyug_Mein_Satyug_Part5 . साहेब कबीर द्वारा श्री नानक जी को शरण श्री नानकदेव जी को जो पहले एक औंकार मन्त्र का जाप करते थे तथा उसी को सत मान कर कहा करते थे एक ओंकार। उन्हें बेई नदी पर कबीर साहेब ने दर्शन दे कर सतलोक दिखाया तथा अपने सतपुरुष रूप को दिखाया। जब सतनाम का जाप दिया तब श्री नानक साहेब जी की काल लोक से मुक्ति हुई। श्री नानक साहेब जी ने कहा कि: इसी का प्रमाण पंजाबी गुरु ग्रन्थ साहिब के राग ‘‘सिरी‘‘ महला 1 पृष्ठ नं. 24 पर शब्द नं. 29 शब्द - एक सुआन दुई सुआनी नाल, भलके भौंकही सदा बिआल। कुड़ छुरा मुठा मुरदार, धाणक रूप रहा करतार।।1।। मै पति की पंदि न करनी की कार। उह बिगड़ै रूप रहा बिकराल।। तेरा एक नाम तारे संसार, मैं ऐहा आस एहो आधार। मुख निंदा आखा दिन रात, पर घर जोही नीच मनाति।। काम क्रोध तन वसह चंडाल, धाणक रूप रहा करतार।।2।। फाही सुरत मलूकी वेस, उह ठगवाड़ा ठगी देस।। खरा सिआणां बहुता भार, धाणक रूप रहा करतार।।3।। मैं कीता न जाता हरामखोर, उह किआ मुह देसा दुष्ट चोर। नानक नीच कह बिचार, धाणक रूप रहा करतार।।4।। इसमें स्पष्ट लिखा है कि एक मन रूपी कुत्ता तथा इसके साथ दो आसा-तृष्णा रूपी कुतिया अनावश्यक भौंकती उमंग उठती रहती हैं तथा सदा नई-नई आसाएँ उत्पन्न होती हैं। इनको मारने का तरीका जो सत्यनाम बिना झूठा साधन था। मुझे कबीर साहेब धाणक के रूप में परमात्मा मिला। उन्होंने मुझे सही उपासना बताई। श्री नानक साहेब जी कहते हैं कि उस ईश्वर धाणक कबीर साहेब की साधना बिना न तो पति रहनी थी न ही कोई अच्छी करनी बन रही थी। जिससे काल का भयंकर रूप जो अब महसूस हुआ है उससे केवल कबीर साहेब तेरा एक नाम पूर्ण संसार को पार कर सकता है। मुझे भी एही एक तेरे नाम की आश व यही नाम मेरा आधार है। पहले अनजाने में बहुत निंदा भी की होगी क्योंकि काम क्रोध इस तन में चंडाल रहते हैं। मुझे धाणक जुलाहे का कार्य करने वाले कबीर साहेब रूपी भगवान ने आकर सतमार्ग बताया तथा काल से छुटवाया। जिसकी सुरति बहुत प्यारी व मनमोहनी है तथा सुन्दर वेष भूशा जिन्दा रूप में मुझे मिले उसको कोई नहीं पहचान सकता। जिसने काल को भी ठग लिया अर्थात् लगता है धाणक जुलाहा फिर बन गया जिन्दा। काल भगवान भी भ्रम में पड़ गया कि यह कोई नीच जाति का है, भगवान पूर्णब्रह्म नहीं हो सकता। इसी प्रकार कबीर साहेब अपना वास्तविक अस्तित्व छुपा कर एक सेवक बन कर आते हैं। काल या आम व्यक्ति पहचान नहीं सकता। इसलिए श्री नानक साहेब जी ने उसे प्यार में ठगवाड़ा कहा है और साथ में कहा है कि वह धाणक जुलाहा कबीर बहुत समझदार है। दिखाई देता है कुछ परंतु है बहुत महिमा वाला जो धाणक जुलाहा रूप मंे स्वयं परमात्मा पूर्ण ब्रह्म आया है। प्रत्येक जीव को आधीनी समझाने के लिए अपनी भूल को स्वीकार करते हुए कि मैंने पूर्णब्रह्म के साथ बहस की तथा उन्होंने अपने आपको भी सेवक रूप में दर्शन दे कर तथा मुझको स्वामी नाम से सम्बोधित किया। इसलिए उनकी महानता तथा अपनी नादानी का पश्चाताप करते हुए श्री नानक जी कहते हैं कि मैं कुछ करने कराने योग्य नहीं था। फिर भी अपनी साधना को उत्तम मान कर भगवान से सम्मुख हुआ (ज्ञान संवाद किया)। मेरे जैसा नीच दुष्ट, हरामखोर कौन हो सकता है जो अपने स्वामी-मालिक पूर्ण परमात्मा धाणक रूप जुलाहा रूप में आए करतार कबीर साहेब को नहीं पहचान पाया। श्री नानक साहेब जी कहते हैं कि यह सब मैं पूर्ण सोच समझ से कह रहा हूँ कि परमात्मा धाणक जुलाहा कबीर रूप में हैं और अधिक प्रमाण के लिए प्रस्तुत है:-- ‘‘राग तिलंग महला 1‘‘ पृष्ठ नं. 721 यक अर्ज गुफतम पेश तो दर गोश कुन करतार। हक्का कबीर करीम तू बेएब परवरदगार।। दूनियाँ मुकामे फानी तहकीक दिलदानी। मम सर मुई अजराईल गिरफ्त दिल हेच न दानी।। जन पिसर पदर बिरादराँ कस नेस्त दस्तं गीर। आखिर बयफ्तम कस नदारद चूँ शब्द तकबीर।। शबरोज गशतम दरहवा करदेम बदी ख्याल। गाहे न नेकी कार करदम मम ई चिनी अहवाल।। बदबख्त हम चु बखील गाफिल बेनजर बेबाक। नानक बुगोयद जनु तुरा तेरे चाकरा पाखाक।। हे (कुन करतार)करन कत्ता (गोश)निर्गुणी जिन्द संत (करीम)दयालु (हक्का कबीर)सतकबीर (तू)आप (बेएब परवदगार) निर्विकार परमात्मा है। (पेश तो दर)आप के समक्ष (यक)एक (अर्ज गुफ्तम)हृदय से विनती है कि (दिलदानी)हे महबुब(दूनियाँ मुकामे) यह संसार रूपी ठिकाना (फानी) नाशवान है। (तहकीक) यह पूरी तरह जान लिया है। (दानी)हे दाता(मम सर मुई) इस जीव के मरने पर (अजराईल) अजराईल नामक यम दूत (गीरफ्त दिल हेच न)बेरहमी से पकड़ कर ले जाता है (कस) कोई (दस्तं गीर) साथी (पिसर) जैसे बेटा (पदर) पिता (बिरादराँ) भाईचारा (नेस्तं) साथ नहीं देता। (आखिर) अन्त में (बयफ्तम) सभी उपाय और (तकबीर) फर्ज (कस) कोई क्रिया (नदारद चूँ शब्द)काम नहीं आता। (शबरोज) प्रतिदिन (गशतम) गश्त की तरह न रूकने (दर हवा) वाली चलती हुई वायु (बदी ख्याल)की तरह बुरे विचार (करदेम) करते रहते हैं। (नेकी कार)शुसुभ कर्म (करदम)करने का (मम ई)मुझे (चिनी) कोई (अहवाल) जरीया या साधन (गाहे न) नहीं मिला। (बदबख्त) ऐसे बुरे समय में कलियुग में (हम चु) हमारे जैसे (बखील) नादान (गाफिल) लापरवाह (बेनजर)सत मार्ग का ज्ञान न होने से अंधे (बेबाक)गुंगे थे। नानक जी कहते हैं कि हे परमात्मा कबीर मैं आपके सेवकों का भी सेवक अर्थात् आपके सेवकों के चरणों की धूर हूँ, मैं नानक सच कह रहा हूँ अज्ञान साधना से भवसागर में डूबता हुआ बन्दा पार हो गया। हे करन कत्ता निर्गुणी संत दयालु ‘‘सतकबीर‘‘ आप निर्विकार परमात्मा हैं। आप के समक्ष एक हृदय से विनती है कि हे महबुब यह संसार रूपी ठिकाना नाशवान है। यह पूरी तरह जान लिया है। हे दाता इस जीव के मरने पर अजराईल नामक यम दूत बेरहमी से पकड़ कर ले जाता है कोई साथी जैसे बेटा पिता भाईचारा साथ नहीं देता। अन्त में सभी उपाय और फर्ज कोई क्रिया काम नहीं आता। प्रतिदिन गश्त की तरह न रूकने वाली चलती हुई वायु की तरह बुरे विचार करते रहते हैं। शुभ कर्म करने का मुझे कोई जरीया या साधन नहीं मिला। ऐसे बुरे समय कलियुग में हमारे जैसे नादान लापरवाह, सत मार्ग का ज्ञान न होने से अंधे गुंगे थे। नानक आपके सेवकों के भी सेवक के चरणों की धूर डूबता हुआ बन्दा पार हो गया। श्री नानक जी के पूर्व जन्म - सतयुग में राजा अम्बरीष, त्रोतायुग में राजा जनक हुए थे और फिर श्री नानक जी हुए। Factful Debates YTChannel #me follow #sant ram pal ji maharaj #🙏गुरु महिमा😇
Vijay Dass
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23 days ago
#GodNightTuesday #Kalyug_Mein_Satyug_Part5 आज हम किसी को मूर्ख नहीं बना सकते क्योंकि हमारा समाज आज के दिन पढ़े-लिखा है , अपने शास्त्रों को खोलकर देख सकता है और मिलान कर सकता है।🙏🙏 Factful Debates YTChannel #🙏गुरु महिमा😇 #sant ram pal ji maharaj #me follow
Vijay Dass
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28 days ago
संत रामपाल जी महाराज जी से नाम लेकर मर्यादा में रहकर सतभक्ति करने से शुभ संस्कारों में वृद्धि होने से दुःख का वक्त सुख में बदलने लग जाता है। कबीर, जब ही सत्यनाम हृदय धरयो भयो पाप को नाश। मानो चिंगारी अग्नि की पड़ी पुराने घास ।। कबीर साहेब के अवतार संत रामपाल जी महाराज वही भक्ति बताते हैं जो कबीर साहेब ने बताई है। जिससे पाप नाश होते हैं, भक्तों को अनगिनत लाभ मिल रहे हैं, उनके साथ आये दिन चमत्कार हो रहे हैं। जो व्यक्ति मनुष्य जन्म प्राप्त करके भक्ति नहीं करता, वह चौरासी लाख योनियों में कष्ट उठाता है। कुत्ता रात में ऊपर की ओर मुंह करके बहुत रोता है। इसलिए पूर्ण गुरु संत रामपाल जी महाराज जी से नाम लेकर सतभक्ति करनी चाहिए। सतभक्ति से शांतिदायक तथा अमर स्थान (सनातन परम धाम) प्राप्त हो जाता है (जिसके बारे में गीता जी के अध्याय 18 श्लोक 62 में कहा है) जहाँ जाने के पश्चात् साधक फिर लौटकर संसार में कभी नहीं आता। #TrueWorship_EndsSuffering #SaTrueStoryYouTubeChannel #worship #faith #cancer #fyp #coloncancer #healthcare #stroke #digitalhealth #cancertreatment #healthsecrets #meditation #waheguru #harharmahadev #shiv #viralreels #sant ram pal ji maharaj #me follow