धर्मराज

Utkarsh Bajpai
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1 days ago
# 💀🕉️ गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा: स्वर्ग, नरक और पुनर्जन्म का रहस्य **Meta Description:** मृत्यु के बाद आत्मा कहाँ जाती है? गरुड़ पुराण के अनुसार जानिए यमलोक, स्वर्ग, नरक और पुनर्जन्म का पूरा रहस्य — सरल हिंदी में। --- ## 🌑 प्रस्तावना — वह सवाल जो हर इंसान के मन में है एक दिन घर में किसी अपने की मृत्यु होती है। सब रोते हैं, अंतिम संस्कार होता है। और फिर एक सवाल मन में उठता है — **"वो कहाँ गए? उनकी आत्मा अभी क्या कर रही है?"** यह सवाल हर इंसान के जीवन में एक बार जरूर आता है। और इसका सबसे विस्तृत, सबसे गहरा उत्तर मिलता है — **गरुड़ पुराण** में। गरुड़ पुराण वह ग्रंथ है जिसे भगवान विष्णु ने स्वयं अपने वाहन गरुड़ को सुनाया था। इसमें मृत्यु के बाद की पूरी यात्रा का वर्णन इतने विस्तार से है कि पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं — और साथ ही जीवन जीने का तरीका भी बदल जाता है। आइए आज इस रहस्यमय यात्रा को समझते हैं। --- > *"मृत्यु अंत नहीं है — यह एक नई यात्रा का पहला कदम है।"* --- ## 📖 गरुड़ पुराण क्या है? गरुड़ पुराण **18 महापुराणों** में से एक है। इसमें भगवान विष्णु ने गरुड़ के प्रश्नों के उत्तर में **मृत्यु, यमलोक, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक और मोक्ष** का विस्तृत वर्णन किया है। यह पुराण घर में किसी की मृत्यु के बाद **13 दिनों तक** पढ़ा जाता है — ताकि आत्मा को शांति मिले और परिजनों को सत्य का ज्ञान हो। गरुड़ पुराण के तीन मुख्य भाग हैं — - **पूर्वखंड** — धर्म, ज्ञान और मोक्ष - **प्रेतखंड** — मृत्यु के बाद की यात्रा - **उत्तरखंड** — पुनर्जन्म और कर्मफल --- ## 💨 मृत्यु के समय क्या होता है? गरुड़ पुराण के अनुसार जब किसी मनुष्य की मृत्यु निकट होती है — - **यमदूत** उसके पास आते हैं — लेकिन केवल पापी आत्मा को दिखते हैं - **विष्णुदूत** पुण्यात्माओं को लेने आते हैं — शांत और दिव्य रूप में - मृत्यु के समय **वायु (प्राण)** शरीर से निकलती है - आत्मा **अंगूठे के बराबर** सूक्ष्म शरीर में होती है गरुड़ पुराण कहता है कि मृत्यु के समय — *"जो व्यक्ति जिसका स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है, उसे वही गति प्राप्त होती है।"* इसीलिए अंतिम समय में **राम नाम** का जप इतना महत्वपूर्ण माना गया है। --- > *"मृत्यु के समय जो नाम होठों पर हो — वही तुम्हारी मंजिल तय करता है।"* --- ## 🛤️ मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा — चरण दर चरण ### **पहला चरण: सूक्ष्म शरीर की प्राप्ति** मृत्यु के बाद आत्मा स्थूल शरीर छोड़ती है लेकिन **सूक्ष्म शरीर** बना रहता है। यह सूक्ष्म शरीर — - भूख-प्यास महसूस करता है - कष्ट और सुख अनुभव करता है - परिवार को देख सकता है लेकिन बोल नहीं सकता इसीलिए **13 दिनों का पिंडदान और जलदान** किया जाता है — ताकि यात्रा में आत्मा को भूख-प्यास न लगे। --- ### **दूसरा चरण: यमदूतों के साथ यात्रा** मृत्यु के बाद आत्मा को **यमदूत** यमलोक की ओर ले जाते हैं। यह यात्रा **86,000 योजन** (लाखों किलोमीटर) की होती है। रास्ते में — - भयंकर गर्मी और सर्दी - तेज हवाएं और अंधेरा - भूख और प्यास की पीड़ा जो व्यक्ति जीवन में **दान, पुण्य और सत्कर्म** करता है — उसे यह यात्रा सुगम होती है। जो पापी होता है — उसे हर कदम पर कष्ट मिलता है। --- ### **तीसरा चरण: यमराज के दरबार में** यमलोक पहुंचने पर **चित्रगुप्त** आत्मा का पूरा हिसाब खोलते हैं। चित्रगुप्त के पास — - हर मनुष्य के **जन्म से मृत्यु तक** के सभी कर्मों का लेखा-जोखा होता है - एक भी कर्म न छूटता है, न भूलता है - **मन में सोचा** — वह भी दर्ज होता है > *"चित्रगुप्त की कलम से कोई बच नहीं सकता — न राजा, न रंक।"* यमराज **न्यायी** हैं — न दयालु, न क्रूर। वे केवल कर्म के आधार पर निर्णय देते हैं। --- ## 🔥 नरक के 28 प्रकार — पापों का दंड गरुड़ पुराण में **28 प्रकार के नरकों** का वर्णन है। हर पाप के लिए अलग नरक है। कुछ प्रमुख नरक और उनके कारण — | नरक का नाम | किस पाप के लिए | |---|---| | **तामिस्र** | दूसरे की संपत्ति चुराना | | **रौरव** | निर्दोष को कष्ट देना | | **महारौरव** | झूठ बोलकर दूसरों को ठगना | | **कुंभीपाक** | पशुओं पर अत्याचार | | **कालसूत्र** | माता-पिता का अपमान | | **असिपत्रवन** | धर्म का पाखंड करना | | **अंधकूप** | कुएं, तालाब को दूषित करना | | **वैतरणी** | गाय को कष्ट देना | **वैतरणी नदी** — नरक के रास्ते पर यह भयंकर नदी है जो रक्त और मवाद से भरी है। जिन्होंने **गोदान** किया हो — उन्हें गाय पार कराती है। इसीलिए मृत्यु से पहले **गोदान** का इतना महत्व है। --- > *"जो दूसरों को कष्ट देता है — प्रकृति उसे वही लौटाती है, इस जन्म में नहीं तो अगले में।"* --- ## ✨ स्वर्ग — पुण्यात्माओं का निवास जो आत्माएं पुण्यकर्मी होती हैं — उन्हें **स्वर्गलोक** की प्राप्ति होती है। गरुड़ पुराण के अनुसार स्वर्ग में — - कोई भूख-प्यास नहीं - कोई रोग-शोक नहीं - दिव्य आनंद और सुख - इच्छित भोजन और वातावरण स्वर्ग की प्राप्ति किससे होती है? - **सत्य बोलने** से - **दान करने** से - **माता-पिता की सेवा** से - **तीर्थयात्रा** से - **निस्वार्थ सेवा** से लेकिन स्वर्ग भी **स्थायी नहीं** है। जब पुण्य समाप्त होते हैं — आत्मा पुनः पृथ्वी पर जन्म लेती है। --- ## ♻️ पुनर्जन्म का रहस्य गरुड़ पुराण कहता है — **"कर्म ही अगला जन्म तय करता है।"** पुनर्जन्म की प्रक्रिया — - स्वर्ग या नरक का भोग पूरा होने पर आत्मा **पुनः जन्म** लेती है - अच्छे कर्म = **उच्च कुल में जन्म** - बुरे कर्म = **निम्न योनि में जन्म** (पशु, कीट, पक्षी आदि) - **84 लाख योनियों** में भटकने के बाद मनुष्य जन्म मिलता है गरुड़ पुराण में स्पष्ट लिखा है — *"मनुष्य जन्म सबसे दुर्लभ है। इसे व्यर्थ मत गंवाओ।"* ### पुनर्जन्म कैसे तय होता है? - **जो विचार मृत्यु के समय मन में हों** — अगला जन्म उसी के अनुसार - **जो कर्म जीवन में किए हों** — उनका फल अगले जन्म में - **जो संस्कार आत्मा में गहरे हों** — वे अगले जन्म में भी साथ आते हैं --- > *"यह मनुष्य जन्म 84 लाख योनियों की तपस्या के बाद मिला है — इसे पाप में मत गंवाओ।"* --- ## 🕉️ मोक्ष — जन्म-मृत्यु से मुक्ति स्वर्ग और नरक दोनों अस्थायी हैं। पुनर्जन्म का चक्र चलता रहता है। इस चक्र से मुक्ति का नाम है — **मोक्ष।** गरुड़ पुराण के अनुसार मोक्ष की प्राप्ति होती है — - **ज्ञान** से — स्वयं को जानने से - **भक्ति** से — भगवान में पूर्ण समर्पण से - **निष्काम कर्म** से — फल की इच्छा के बिना कर्म - **गुरुकृपा** से — सच्चे गुरु का मार्गदर्शन मोक्ष का अर्थ है — **न स्वर्ग, न नरक, न पुनर्जन्म — केवल परमात्मा में विलीन हो जाना।** --- ## 📌 गरुड़ पुराण से जीवन के लिए सीख गरुड़ पुराण केवल मृत्यु का ग्रंथ नहीं — यह **जीवन जीने का दर्पण** है। इससे हमें सीख मिलती है — - ✅ **झूठ मत बोलो** — चित्रगुप्त सब देखते हैं - ✅ **माता-पिता की सेवा करो** — यही सबसे बड़ा धर्म है - ✅ **दान करो** — यही यात्रा में काम आता है - ✅ **किसी को कष्ट मत दो** — वही लौटकर आता है - ✅ **ईश्वर का स्मरण करो** — अंतिम समय में यही साथ देता है - ✅ **जीव हत्या से बचो** — इसका दंड घोर नरक है --- ## 🙏 निष्कर्ष — मृत्यु से डरो नहीं, तैयार रहो गरुड़ पुराण हमें डराने के लिए नहीं — **जगाने के लिए** लिखा गया है। मृत्यु निश्चित है — लेकिन उसके बाद क्या होगा, यह हमारे **आज के कर्मों** पर निर्भर है। जो व्यक्ति गरुड़ पुराण को समझकर जीता है — वह न मृत्यु से डरता है, न जीवन में पाप करता है। **अच्छे कर्म करो, सत्य बोलो, दूसरों की सेवा करो —** और जब यात्रा होगी, तो यमदूत नहीं, **विष्णुदूत** आएंगे। --- ## 📢 Call To Action 👉 इस आर्टिकल को अपने परिवार के साथ शेयर करें — यह ज्ञान हर किसी को होना चाहिए। 👉 **Comment करें** — क्या आपने कभी गरुड़ पुराण पढ़ा है? 👉 Page को **Follow करें** — ऐसे आध्यात्मिक रहस्य रोज पाएं। --- ## 🔍 SEO Keywords 1. गरुड़ पुराण मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा 2. मृत्यु के बाद क्या होता है हिंदू धर्म 3. स्वर्ग नरक और पुनर्जन्म का रहस्य 4. Garud Puran in Hindi 5. यमलोक और चित्रगुप्त की कहानी 6. 84 लाख योनि और पुनर्जन्म 7. मोक्ष क्या है सनातन धर्म --- ## #️⃣ Hashtags `#GarudPuran` `#गरुड़पुराण` `#MrityuRahasya` `#SanatanDharma` `#Swarg_Narak` `#Punarjanm` `#HinduDharma` `#AatmaKiYatra` `#VedicKnowledge` `#मोक्ष` #धर्म
sn vyas
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10 days ago
#धर्मराज दसवीं यमराज का दूसरा नाम धर्मराज क्यों? 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ प्राणी की मृत्यु या अंत को लाने वाले देवता यम हैं। यमलोक के स्वामी होने के कारण ये यमराज कहलाए। चूंकि मृत्यु से सब डरते हैं, इसलिए यमराज से भी सब डरने लगे जीवित प्राणी का जब अपना काम पूरा हो जाता है, तब मृत्यु के समय शरीर में से प्राण खींच लिए जाते हैं, ताकि प्राणी फिर नया शरीर प्राप्त कर नए सिरे से जीवन प्रारंभ कर सके। यमराज सूर्य के पुत्र हैं और उनकी माता का नाम संज्ञा है। उनका वाहन भैंसा और संदेशवाहक पक्षी कबूतर, उल्लू और कौवा भी माना जाता है। उनका अचूक हथियार गदा है। यमराज अपने हाथ के कालसूत्र या कालपाश की बदौलत जीव के शरीर से प्राण निकाल लेते हैं। यमपुरी यमराज की नगरी है, जिसके दो महाभयंकर चार आंखों वाले कुत्ते पहरेदार हैं। यमराज अपने सिंहासन पर न्यायमूर्ति की तरह बैठकर विचार भवन कालीची में मृतात्माओं को एक-एक कर बुलवाते हैं, जहां चित्रगुप्त सब प्राणियों की बही खोलकर लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हैं। कर्मों को ध्यान में रखकर यमराज अपना फैसला देते हैं, क्योंकि वे जीवों के शुभाशुभ कर्मों के निर्णायक हैं। यमराज की यूं तो कई पत्नियां थीं, लेकिन उनमें सुशीला, विजया और हेमनाल अधिक जानी जाती हैं। उनके पुत्रों में धर्मराज युधिष्ठिर को सभी जानते हैं। न्याय के पक्ष में फैसला देने के गुणों के कारण ही यमराज और युधिष्ठिर जगत में धर्मराज के नाम से जाने जाते हैं यम द्वितीया के अवसर पर जिस दिन भाई-बहन का त्योहार भैया-दूज मनाया जाता है। यम और यमुना की पूजा का विधान बनाया गया हैं। उल्लेखनीय है कि यमुना नदी को यमराज की बहन माना जाता है। भौमवारी चतुर्दशी को यमतीर्थ के दर्शन कर सब पापों से छुटकारा मिल जाए, उसके लिए प्राचीन काल में यमराज ने यमतीर्थ में (संकटाघाट) कठोर तपस्या करके भक्तों को सिद्धि प्रदान करने वाले यमेश्वर और यमादित्य मंदिरों की स्थापना की थी। यम द्वितीया को यहां मेला लगता है। इन मंदिरों को प्रणाम करने वाले एवं यमतीर्थ में स्नान करने वाले मनुष्यों को नारकीय यातनाओं को न तो भोगना पड़ता है और न ही यमलोक देखना पड़ता है। इसके अलावा मान्यता तो यहां तक है कि यमतीर्थ में श्राद्ध करके, यमेश्वर 1. का पूजन करने और यमादित्य को प्रणाम करके व्यक्ति अपने पितृ-ऋण से भी उऋण हो सकता है। श्राद्धं कृत्वा यमे तीर्थे पूजयित्वा यमेश्वरम्। यमादित्यं नमस्कृत्य पितृणामनृणो भवेत्॥ दीपावली से पूर्व दिन यमदीप देकर तथा दूसरे पर्वों पर यमराज की आराधना करके मनुष्य उनकी कृपा प्राप्त करने के उपाय करता है। पुराणों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि किसी समय माण्डव ऋषि ने कुपित होकर यमराज को मनुष्य के रूप में जन्म लेने का शाप दिया। इसके कारण यमराज ने ही दासी पुत्र के रूप में धृतराष्ट्र तथा पाण्डु के भाई होकर जन्म लिया। यूं तो यमराज परम धार्मिक और भगवद् भक्त है। मनुष्य जन्म लेकर भी वे भगवान् के परम भक्त तथा धर्म-परायण ही बने रहे। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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10 days ago
#धर्मराज दसवीं #धर्मराज धर्मराज दशमी 〰️🌼〰️🌼〰️ धर्मराज दशमी का व्रत व त्योहार चैत्र शुक्ल पक्ष की दशमी को है। धर्मराज को यमराज भी कहते हैं। यमराज को पितृपति और दण्डधर भी कहते हैं। लाभ तथा महत्त्व 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ भगवान श्रीकृष्ण के मुख से इस कथा को सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा- हे गोविन्द! यह दशमी व्रत किस प्रकार और कैसे किया जाता है तथा इसके क्या लाभ हैं? आप सर्वज्ञ हैं। आप इसे बतायें। युधिष्ठिर की बात सुनकर श्रीकृष्ण बोले- हे राजन! इस व्रत के प्रभाव से राजपूत्र अपना राज्य, कृषि, खेती, वणिक व्यापार में लाभ, पुत्रार्थी पुत्र तथा मानव धर्म, अर्थ एवं काम की सिद्धि प्राप्त करते हैं। कन्या श्रेष्ठ वर प्राप्त करती है। ब्राह्मण निर्विघ्र यज्ञ सम्पन्न कर लेता है। असाध्य रोगों से पीड़ित रोगी रोग से मुक्त हो जाता है और पति के यात्रा-प्रवास पर जाने पर और जल्दी न आने पर स्त्री इस व्रत के द्वारा अपने पति को शीघ्र प्राप्त कर सकती है। शिशु के दन्तजनिक पीड़ा में भी इस व्रत से पीड़ा दूर हो जाती है और कष्ट नहीं होता। इसी प्रकार अन्य कार्यों की सिद्धि के लिए इसी दशमी व्रत को करना चाहिए। जब भी जिस किसी को कष्ट पड़े, उसकी निवृत्ति के लिए इस व्रत को पूरी श्रद्धा और सच्चे मन से करना चाहिए। यह व्रत चैत्र शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को किया जाता है। इस दिन प्रातः काल स्नान करके देवताओं की पूजा कर रात्रि में पुष्प, अलक तथा चन्दन आदि से दस दिशाओ की पूजा करनी चाहिए। घर के आँगन में जौ से अथवा पिष्टातक से पूर्वादि दसों दिशाओं के अधिपतियों की प्रतिमाओं को उनके वाहन तथा अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित कर उन्हें ही ऐन्द्री आदि दिशा- देव देवियों के रूप मे मानकर पूजन करना चाहिए। सब को घृतपूर्ण नैवेद्य, पृथक-पृथक् दीपक तथा ऋतु फल आदि समर्पित करना चाहिए। इस प्रकार विधिवत पूजा कर ब्राह्मण को दक्षिणा प्रदान कर प्रसाद ग्रहण करना चहिए। अनन्तर बन्धु-बान्धवों एवं मित्रों के साथ प्रसन्न मन से भोजन करना चाहिए। जो इस दशमी व्रत को श्रद्धापूर्वक करता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं. पौराणिक कथा 〰️〰️〰️〰️〰️ धर्मराज के बारे में एक कथा है कि गहन वन से तृषार्त पाण्डव गुजर रहे थे। पानी की तलाश में वे इधर-उधर घूम ही रहे थे कि अकस्मात उन्हें एक सरोवर दिखाई दिया। भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव जल पीने के पूर्व ही मृत्यु का ग्रास बन गए। कारण यह था कि एक यक्ष ने उनसे प्रश्न किए थे, किंतु उन्होंने उस ओर ध्यान नहीं दिया और बिना जवाब दिए ही पानी पीने लगे, जिससे वे यक्ष का कोपभाजन बने और उन्हें मृत्यु प्राप्त हुई। इतने में युधिष्ठिर आए और पानी पीने की कोशिश करने लगे। उनसे भी यक्ष ने प्रश्न किए, जिनके युधिष्ठिर ने समुचित उत्तर दे दिए। तब यक्ष ने प्रसन्न होकर कहा, तुम जल पीने के अधिकारी हो। मेरी इच्छा है कि तुम्हारे चारों भ्राताओं में से किसी एक को जीवन दान दूं। बोलो, मैं किसे पुनर्जीवित करूं? प्रश्न बड़ा ही विचित्र था और साथ ही कठिन भी, क्योंकि युधिष्ठिर को चारों भाई एक समान प्रिय थे, तथापि एक क्षण भी सोचे बिना वे बोले, यक्षश्रेष्ठ आप नकुल को ही जीवन दान दें। यक्ष हंस पड़ा और बोला, धर्मराज, कौरवों से युद्ध में भीम की गदा और अर्जुन का गांडीव बड़ा ही उपयोगी सिद्ध होगा। इन दो सगे भाइयों को छोड़कर नकुल का जीवन क्यों चाहते हो। धर्मराज बोले, यक्षश्रेष्ठ हम पांचों भ्राता ही माताओं के स्नेह चिह्न हैं। माता कुंती के पुत्रों से मैं शेष हूं, किंतु माद्री मां के तो दोनों ही पुत्र मर चुके हैं। अतः यदि एक के ही जीवन का प्रश्न है, तो माद्री मां के नकुल का ही पुनर्जीवन इष्ट है। यक्ष ने सुना, तो भावविह्वल हो बोला, युधिष्ठिर तुम धर्मतत्व के ज्ञाता हो, मैं तो सिर्फ तुम्हारी परीक्षा ले रहा था कि तुम वास्तव में धर्म के अवतार हो या नहीं। अतएव मैं चारों भाईयों को जीवन देता हूं। तब से धर्मराज दशमी व्रत कि शुरुआत हुई.. इस व्रत के करने वाले व्रती को अपने आँगन में दसों दिशाओं के चित्रों की पूजा करनी चाहिए। दशमी का व्रत के करने से व्यक्ति की सभी कामना पूर्ण हो जाती हैं। इस व्रत को पूर्ण करने से कन्या श्रेष्ठ वर प्राप्त करती है। पति के यात्रा-प्रवास पर जाने और जल्दी लौट कर न आने पर स्त्री इस व्रत के द्वारा अपने पति को शीघ्र प्राप्त कर सकती है। शिशु के दन्तजनिक पीड़ा में भी इस व्रत के करने से पीड़ा दूर हो जाती है। धर्मराज दशमी व्रत कथा 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ पुराणों में धर्मराजजी की कई कथाएं मिलती हैं उनमें से एक कथा ज्यादा प्रचलित है। कहते हैं कि एक ब्राह्मणी मृत्यु के बाद यम के द्वारा पहुंची। वहां उसने कहा कि मुझे धर्मराज के मंदिर का रास्ता बताओ। एक दूत ने कहा कि कहां जाना है? वो बोली मुझे धर्मराज के मंदिर जाना है। वह महिला बहुत दान पुण्य वाली थी। उसे विश्वास था कि धर्मराज के मंदिर का रास्ता अवश्‍य खुल जाएगा। दूत ने उसे रास्ता बता दिए। वहां देखा कि बहुत बड़ा सा मंदिर है। वहां हीरे मोती जड़ती सोने के सिंहासन पर धर्मराज विराजमान है और न्यायसभा ले रहे हैं। न्याय नीति से अपना राज्य सम्भाल रहे थे। यमराजजी सबको कर्मानुसार दंड दे रहे थे। ब्राह्मणी ने जाकर प्रणाम किया और बोली मुझे वैकुण्ठ जाना हैं। धर्मराजजी ने चित्रगुप्त से कहा लेखा–जोखा सुनाओ। चित्रगुप्त ने लेखा सुनाया। सुनकर धर्मराजजी ने कहां तुमने सब धर्म किए पर धर्मराजजी की कहानी नहीं सुनी। वैकुण्ठ में कैसे जाएगीए? महिला बोली– 'धर्मराजजी की कहानी के क्या नियम हैं? धर्मराजजी बोले– 'कोई एक साल, कोई छ: महीने, कोई सात दिन ही सुने पर धर्मराजजी की कहानी अवश्य सुने। फिर उसका उद्यापन कर दें। उद्यापन में काठी, छतरी, चप्पल, बाल्टी रस्सी, टोकरी, लालटेन, साड़ी ब्लाउज का बेस, लोटे में शक्कर भरकर, पांच बर्तन, छ: मोती, छ: मूंगा, यमराजजी की लोहे की मूर्ति, धर्मराजजी की सोने की मूर्ति, चांदी का चांद, सोने का सूरज, चांदी का सातिया ब्राह्मण को दान करें। प्रतिदिन चावल का साठिया बनाकर कहानी सुने। यह बात सुनकर ब्राह्मणी बोली भगवान मुझे सात दिन वापस पृथ्वी लोक पर जाने दो में कहानी सुनकर वापस आ जाऊंगी। धर्मराजजी ने उसका लेखा–जोखा देखकर सात दिन के लिए पृथ्वी पर भेज दिया। ब्राह्मणी जीवित हो गई। ब्राह्मणी ने अपने परिवार वालों से कहा की मैं सात दिन के लिए धर्मराजजी की कहानी सुनने के लिए वापस आई हूं। इस कथा को सुनने से बड़ा पुण्य मिलता हैं। उसने चावल का सातिया बनाकर परिवार के साथ सात दिन तक धर्मराजजी की कथा सुनी। सात दिन पूर्ण होने पर वापस धर्मराजजी का बुलावा आया और ब्राह्मणी को वैकुण्ठ में श्रीहरी के चरणों में स्थान मिला। धर्मराज महाराज की आरती 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ धर्मराज कर सिद्ध काज प्रभु में शरणागत हु तेरी पड़ी नव मंज धार भवन में पार करो ना करो देरी धर्म लोक के तुम हो स्वामी श्री यमराज कहलाते हो जो जो प्राणी कर्म करते तुम सब लिखते जाते हो अंत समय में तुम सबको दूत भेज बुलवाते हो पाप पुण्य का सारा लेखा उनको बांच सुनाते हो भुगताते हो प्राणी को तुम लख चौरासी की फेरी से धर्मराज कर सिद्ध काज ................. पड़ी नाव मंजधार भवन में .............. चितरगुप्त है लेखक तुम्हारे फुर्ती से तो लिखने वाले अलग अलग से सब जीवो का लेखा -जोखा लेने वाले पापी जन को पकड़ बुलाते नरको में ढाने वाले बुरे काम करने वालो को खूब सजा तो देने वाले कोई नहीं तुमसे बच पाता यह न्याय नीति ऐसी तेरी धर्मराज कर सिद्ध काज ............... प्रभु में शरणागत हु तेरी .................. दूत भयंकर तेरे स्वामी बड़े बड़े डर जाते है पापी जन तो जिन्हे देखते वे भय से थर्राते है | बांध गले में रस्सी वे पापी जन को ले जाते है चाबुक मार लाते जरा रहम नहीं मन में लाते है | धर्म राज कर सिद्ध काज ................ पड़ी मंज धार भवन में ................... धर्मी जन को धर्मराज तुम खुद ही लेने आते हो सादर ले जाकर उनको तुम स्वर्गधाम पहुंचाते हो जो जन पाप कपट से डरकर तेरी भक्ति करते है नर्क यातना कभी ने पाते भवसागर से तरते है कपिल मोहन पर कृपा करके जपती हु में माला तेरी धर्म राज कर सिद्ध काज प्रभु में शरनागत हु तेरी पड़ी नाव मंज धार भवन में पार करो ना करो देरी साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️