#सनातन
अगर ईश्वर है तो संसार में होनेवाले पाप को वो रोकते क्यों नहीं?
क्योंकि हमारा सनातन धर्म, हमारी संस्कृति ईश्वर को हमसे अलग नहीं करती। मुझे अन्य के बारे में नहीं कहना लेकिन हिन्दू धर्म में ईश्वर हमसे भिन्न नहीं हैं, वह परम सत्य हमारे अंदर ही विराजमान है, हम भगवान को ढूंढने में लगे रहते हैं जबकि वे हमारे अंदर हैं, हमें उस परम चेतना को जागृत करना होगा। हमारे धर्म में ईश्वर आसमान में बैठता कोई व्यक्ति नहीं बल्कि सर्वव्यापी ऊर्जा है, जो सब जगह है भिन्न भिन्न रूपों में।
अपने अंदर देवत्व को जागृत नहीं करेंगे तो आसुरी शक्तियां बढ़ेंगी, और पाप बढ़ेंगे। सब हमारे भीतर है हम बाहर ढूंढने में लगे रहते हैं उतनी देर में अपराध हो जाता है और हम सोचते हैं कि भगवान हैं तो पाप क्यों हो रहे हैं, इस इंतजार में रहते हैं कि कोई ऊपर वाला धरती पर उतरेगा और हमें बचाएगा जबकि ईश्वर का उद्देश्य स्वयं ही पाप मिटाना होता तो पहली बात तो इतने सारे जीवों की उत्पत्ति का कोई अर्थ ही नहीं बनता। ऐसे में हम जो इस दुनिया में झुझ रहे हैं, भगवान जो हमारे अंदर हैं हम आध्यात्मिक हो जाएं तो स्वयं ही बुराई का अंत करने का सामर्थ्य रखते हैं।
भगवान का अवतरण तब होता बुराई अपनी चरम सीमा पर होती है, साधु जनों के बस के बाहर, आसुरी शक्तियां हावी होती हैं, तब समस्त सृष्टि की चेतना एक जगह केंद्रित हो जाती है तब उस स्थान पर भगवान का अवतरण होता है। तब धर्म की स्थापना होती है और अधर्म का विनाश।
अभी जो स्थिति इस संसार की है, वो खराब तो है लेकिन नियंत्रित करी जा सकती है, बुराई तो है लेकिन अच्छाई भी है, बुरे लोग पाप तो कर रहे हैं लेकिन अच्छे लोग महान कार्य भी कर रहे हैं, जब उन अच्छे लोगों की अच्छाई भी किसी काम नहीं आएगी तभी ईश्वरीय शक्ति का हस्तक्षेप होगा। रामायण में युद्ध में वानर सेना लड़ रही थीं, श्री राम तभी आए जब कोई बड़ा दानव कुंभकरण या रावण आए, महाभारत में पांडवों को स्वयं ही लड़ना पड़ा था, श्री कृष्ण सारथी थे, उन्होंने हस्तक्षेप तभी किया जब पांडवों पर बड़ा संकट आया, पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार जब देवता त्रिपुरासुर को हरा नहीं सके तब महादेव आए और त्रिपुरासुर का वध किया और त्रिपुरारी कहलाए। उसी प्रकार रक्तबीज और महिषासुर जब देवताओं पर हावी हुए तब भगवती ने उनका संहार किया।
तो अभी के समय जितनी बुराई है, उसे अभी भी हम अपनी अच्छाई से पराजित कर सकते हैं, प्रयत्न तो करके देखिए। बुराई को हराने के लिए सबसे पहले अपने अंदर से बुराई को हटाना आवश्यक है, फिर समाज, फिर शहर, प्रदेश, देश और फिर दुनिया।
इस प्रकार ईश्वर द्वारा हमें आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ाया जाता है, ईश्वर हमें जीवन जीना सिखाते हैं, खुद ही सब कर देंगे तो हमारे अस्तित्व का अर्थ ही नहीं होगा। मुगलों ने हम पर आक्रमण किया, भगवान स्वयं नहीं आए बल्कि भगवान की भक्ति करके छत्रपति शिवाजी महाराज और संभाजी महाराज जैसे महावीर हुए जिन्होंने उन्हें रोका जिससे वे पूरे भारतवर्ष पर कब्जा नहीं कर पाए।
अंग्रेजों ने हम पर राज किया, भगवती जगदंबा स्वयं नहीं आई, बल्कि रामकृष्ण परमहंस ने उनकी भक्ति करी,
रामकृष्ण परमहंस से उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद ने प्रेरणा ली।
विवेकानंद जी से फिर सुभाष चंद्र बोस ने प्रेरणा ली,
नेताजी बोस से फिर आजाद हिंद फौज और बाकि देशवासियों ने प्रेरणा ली और हमें आजादी मिली।
तो भगवती काली ने स्वयं आकर अंग्रेजों को नहीं भगाया, बल्कि रामकृष्ण परमहंस को दिव्य शक्ति दी जो उन्होंने अपने शिष्य स्वामी विवेकानंद को दी, विवेकानंद की आध्यात्मिक ऊर्जा प्रेरणा के रूप में सुभाष चंद्र बोस के पास पहुंची क्योंकि नेताजी स्वामी जी को मानते थे, और फिर आजाद हिंद फौज ने नेताजी बोस के साथ मिलकर अंग्रेजों को भगाया।