गरूड़ पुराण

sn vyas
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12 days ago
#गरूड़ पुराण #गरूड़ पुराण✍ गरुड़ पुराण ज्ञान 〰〰🌼〰〰 गरुण पुराण, वेदव्यास जी द्वारा रचित 18 पुराणो में से एक है। गरुड़ पुराण में 279 अध्याय तथा 18000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में मृत्यु पश्चात की घटनाओं, प्रेत लोक, यम लोक, नरक तथा 84 लाख योनियों के नरक स्वरुपी जीवन आदि के बारे में विस्तार से बताया गया है। इसके अलावा भी इस ग्रन्थ में कई मानव उपयोगी बातें लिखी है जिनमे से एक है की किस तरह के लोगों के घर भोजन नहीं करना चाहिए। क्योंकि एक पुरानी कहावत है, जैसा खाएंगे अन्न, वैसा बनेगा मन। यानी हम जैसा भोजन करते हैं, ठीक वैसी ही सोच और विचार बनते हैं। इसका सबसे सशक्त उदाहरण महाभारत में मिलता है जब तीरों की शैय्या पर पड़े भीष्म पितामह से द्रोपदी पूंछती है- "आखिर क्यों उन्होंने भरी सभा में मेरे चीरहरण का विरोध नहीं किया जबकि वो सबसे बड़े और सबसे सशक्त थे।" तब भीष्म पितामह कहते है की मनुष्य जैसा अन्न खता है वैसा ही उसका मन हो जाता है। उस वक़्त में कौरवों का अधर्मी अन्न खा रहा था इसलिए मेरा दिमाग भी वैसा ही हो गया और मुझे उस कृत्य में कुछ गलत नज़र नहीं आया। हमारे समाज में एक परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है कि लोग एक-दूसरे के घर पर भोजन करने जाते हैं। कई बार दूसरे लोग हमें खाने की चीजें देते हैं। वैसे तो यह एक सामान्य सी बात है, लेकिन इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि किन लोगों के यहां हमें भोजन नहीं करना चाहिए। गरुड़ पुराण के आचार कांड में बताया गया है कि हमें किन 10 लोगों के यहां भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए। यदि हम इन लोगों के द्वारा दी गई खाने की चीज खाते हैं या इनके घर भोजन करते हैं तो इससे हमारे पापों में वृद्धि होती है। यहां जानिए ये 10 लोग कौन-कौन हैं और इनके घर पर भोजन क्यों नहीं करना चाहिए... 1. कोई चोर या अपराधी 〰〰〰〰〰〰〰 कोई व्यक्ति चोर है, न्यायालय में उसका अपराधी सिद्ध हो गया हो तो उसके घर का भोजन नहीं करना चाहिए। गरुड़ पुराण के अनुसार चोर के यहां का भोजन करने पर उसके पापों का असर हमारे जीवन पर भी हो सकता है। 2. चरित्रहीन स्त्री 〰〰〰〰〰 इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि चरित्रहीन स्त्री के हाथ से बना हुआ या उसके घर पर भोजन नहीं करना चाहिए। यहां चरित्रहीन स्त्री का अर्थ यह है कि जो स्त्री स्वेच्छा से पूरी तरह अधार्मिक आचरण करती है। गरुड़ पुराण में लिखा है कि जो व्यक्ति ऐसी स्त्री के यहां भोजन करता है, वह भी उसके पापों का फल प्राप्त करता है। 3. सूदखोर 〰〰〰〰 वैसे तो आज के समय में काफी लोग ब्याज पर दूसरों को पैसा देते हैं, लेकिन जो लोग दूसरों की मजबूरी का फायदा उठाते हुए अनुचित रूप से अत्यधिक ब्याज प्राप्त करते हैं, गरुड़ पुराण के अनुसार उनके घर पर भी भोजन नहीं करना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में दूसरों की मजबूरी का अनुचित लाभ उठाना पाप माना गया है। गलत ढंग से कमाया गया धन, अशुभ फल ही देता है। 4. रोगी व्यक्ति 〰〰〰〰 यदि कोई व्यक्ति किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित है, कोई व्यक्ति छूत के रोग का मरीज है तो उसके घर भी भोजन नहीं करना चाहिए। ऐसे व्यक्ति के यहां भोजन करने पर हम भी उस बीमारी की गिरफ्त में आ सकते हैं। लंबे समय से रोगी इंसान के घर के वातावरण में भी बीमारियों के कीटाणु हो सकते हैं जो कि हमारे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं। 5. अत्यधिक क्रोधी व्यक्ति 〰〰〰〰〰〰〰〰 क्रोध इंसान का सबसे बड़ा शत्रु होता है। अक्सर क्रोध के आवेश में व्यक्ति अच्छे और बुरे का फर्क भूल जाता है। इसी कारण व्यक्ति को हानि भी उठानी पड़ती है। जो लोग हमेशा ही क्रोधित रहते हैं, उनके यहां भी भोजन नहीं करना चाहिए। यदि हम उनके यहां भोजन करेंगे तो उनके क्रोध के गुण हमारे अंदर भी प्रवेश कर सकते हैं। 6. नपुंसक या किन्नर 〰〰〰〰〰〰 किन्नरों को दान देने का विशेष विधान बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि इन्हें दान देने पर हमें अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि इन्हें दान देना चाहिए, लेकिन इनके यहां भोजन नहीं करना चाहिए। किन्नर कई प्रकार के लोगों से दान में धन प्राप्त करते हैं। इन्हें दान देने वालों में अच्छे-बुरे, दोनों प्रकार के लोग होते हैं। 7. निर्दयी व्यक्ति 〰〰〰〰〰 यदि कोई व्यक्ति निर्दयी है, दूसरों के प्रति मानवीय भाव नहीं रखता है, सभी को कष्ट देते रहता है तो उसके घर का भी भोजन नहीं खाना चाहिए। ऐसे लोगों द्वारा अर्जित किए गए धन से बना खाना हमारा स्वभाव भी वैसा ही बना सकता है। हम भी निर्दयी बन सकते हैं। जैसा खाना हम खाते हैं, हमारी सोच और विचार भी वैसे ही बनते हैं। 8. निर्दयी राजा 〰〰〰〰〰 यदि कोई राजा निर्दयी है और अपनी प्रजा का ध्यान न रखते हुए सभी को कष्ट देता है तो उसके यहां का भोजन नहीं करना चाहिए। राजा का कर्तव्य है कि प्रजा का ध्यान रखें और अपने अधीन रहने वाले लोगों की आवश्यकताओं को पूरी करें। जो राजा इस बात का ध्यान न रखते हुए सभी को सताता है, उसके यहां का भोजन नहीं खाना चाहिए। 9. चुगलखोर व्यक्ति 〰〰〰〰〰〰 जिन लोगों की आदत दूसरों की चुगली करने की होती है, उनके यहां या उनके द्वारा दिए गए खाने को भी ग्रहण नहीं करना चाहिए। चुगली करना बुरी आदत है। चुगली करने वाले लोग दूसरों को परेशानियों फंसा देते हैं और स्वयं आनंद उठाते हैं। इस काम को भी पाप की श्रेणी में रखा गया है। अत: ऐसे लोगों के यहां भोजन करने से बचना चाहिए। 10. नशीली चीजें बेचने वाले 〰〰〰〰〰〰〰〰〰 नशा करना भी पाप की श्रेणी में ही आता है और जो लोग नशीली चीजों का व्यापार करते हैं, गरुड़ पुराण में उनका यहां भोजन करना वर्जित किया गया है। नशे के कारण कई लोगों के घर बर्बाद हो जाते हैं। इसका दोष नशा बेचने वालों को भी लगता है। ऐसे लोगों के यहां भोजन करने पर उनके पाप का असर हमारे जीवन पर भी होता है। साभार~ पं देव शर्मा💐 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰
sn vyas
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14 days ago
#गरूड़ पुराण #गरूड़ पुराण✍ 🌸श्रीगरुड़ पुराण सारोद्धार”🌸 त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।। गरुड़ जी ने कहा–‘हे केशव ! यमलोक का मार्ग किस प्रकार दु:खदायी होता है। पापी लोग वहाँ किस प्रकार जाते हैं, वह मुझे बताइये। श्री भगवान बोले–‘हे गरुड़ ! महान दुख प्रदान करने वाले यममार्ग के विषय में मैं तुमसे कहता हूँ, मेरा भक्त होने पर भी तुम उसे सुनकर काँप उठोगे। यममार्ग में वृक्ष की छाया नहीं है, जहाँ प्राणी विश्राम कर सके। उस यममार्ग में अन्न आदि भी नहीं हैं, जिनसे कि वह अपने प्राणों की रक्षा कर सके ? हे खग ! वहाँ कहीं जल भी नहीं दिखता, जिसे अत्यन्त तृषातुर वह जीव पी सके। वहाँ प्रलयकाल की भाँति बारहों सूर्य तपते रहते हैं। उस मार्ग में जाता हुआ पापी कभी बर्फीली हवा से पीड़ित होता है तथा कभी काँटे चुभते हैं और कभी महाविषधर सर्पों के द्वारा डसा जाता है। वह पापी कहीं सिंहों, व्याघ्रों और भयंकर कुत्तों द्वारा खाया जाता है, कहीं बिच्छुओं द्वारा डसा जाता है और कहीं उसे आग से जलाया जाता है। तब कहीं अति भयंकर महान असिपत्रवन नामक नरक में वह पहुँचता है, जो दो हजार योजन विस्तारवाला कहा गया है। वह वन कौओं, उल्लुओं, वटों (पक्षी विशेषों), गीधों, सरघों तथा डाँसों से व्याप्त है। उसमें चारों ओर दावाग्नि व्याप्त है, असिपत्र के पत्तों से वह जीव उस वन में छिन्न-भिन्न हो जाता है। कहीं अंधे कुएँ में गिरता है, कहीं विकट पर्वत से गिरता है, कहीं छुरे की धार पर चलता है तो कहीं कीलों के ऊपर चलता है। कहीं घने अन्धकार में गिरता है, कहीं उग्र (भय उत्पन्न करने वाले) जल में गिरता है, कहीं जोंको से भरे हुए कीचड़ में गिरता है तो कहीं जलते हुए पंक में गिरता है। कहीं तपी हुई बालुका से व्याप्त और कहीं धधकते हुए ताम्रमय मार्ग, कहीं अंगार की राशि और कहीं अत्यधिक धुएँ से भरे हुए मार्ग पर उसे चलना पड़ता है। कहीं अंगार की वृष्टि होती है, कहीं बिजली गिरने के साथ शिलावृष्टि होती है, कहीं रक्त की, कहीं शस्त्र की और कहीं गर्म जल की वृष्टि होती है। कहीं खारे कीचड़ की वृष्टि होती है, मार्ग में कहीं गहरी खाई है, कहीं पर्वत-शिखरों की चढ़ाई है, और कहीं कन्दराओं में प्रवेश करना पड़ता है। वहाँ मार्ग में कहीं घना अंधकार है तो कहीं दु:ख से चढ़ी जाने योग्य शिलाएँ हैं, कहीं मवाद, रक्त तथा विष्ठा से भरे हुए तालाब हैं। यम मार्ग के बीचोबीच अत्यन्त उग्र और घोर वैतरणी नदी बहती है। वह देखने पर दु:खदायिनी हो तो क्या आश्चर्य ? उसकी वार्ता ही भय पैदा करने वाली है। वह सौ योजन चौड़ी है, उसमें पूय (पीब-मवाद) और शोणित (रक्त) बहते रहते हैं। हड्डियों के समूह से तट बने हैं अर्थात उसके तट पर हड्डियों का ढेर लगा रहता है। माँस और रक्त के कीचड़ वाली वह नदी दु:ख से पार की जाने वाली है। अथाह गहरी और पापियों द्वारा दु:ख पूर्वक पार की जाने वाली यह नदी केशरूपी सेवार से भरी होने के कारण दुर्गम है। वह विशालकाय ग्राहों (घड़ियालों) से व्याप्त है और सैकड़ो प्रकार के घोर पक्षियों से आवृत है। हे गरुड़ ! आये हुए पापी को देखकर वह नदी ज्वाला और धूम से भरकर कड़ाह में रखे घृत की भाँति खौलने लगती है। वह नदी सूई के समान मुख वाले भयानक कीड़ो से चारों ओर व्याप्त है। वज्र के समान चोंच वाले बड़े-बड़े गीध एवं कौओं से घिरी हुई है। वह नदी शिशुमार, मगर, जोंक, मछली, कछुए तथा अन्य मांसभक्षी जलचर-जीवों से भरी पड़ी है। उसके प्रवाह में गिरे हुए बहुत से पापी रोते-चिल्लाते हैं और 'हे भाई! हा पुत्र! हा तात!’–इस प्रकार कहते हुए बार-बार विलाप करते हैं। भूख और प्यास से व्याकुल होकर पापी जीव रक्त का पान करते हैं। वह नदी झागपूर्ण रक्त के प्रवाह से व्याप्त, महाघोर, अत्यन्त गर्जना करने वाली, देखने में दु:ख पैदा करने वाली तथा भयावह है। उसके दर्शन मात्र से पापी चेतनाशून्य हो जाते हैं। बहुत से बिच्छू तथा काले सर्पों से व्याप्त उस नदी के बीच में गिरे हुए पापियों की रक्षा करने वाला कोई नहीं है। उसके सैकड़ों, हजारों भँवरों में पड़कर पापी पाताल में चले जाते हैं। क्षण भर पाताल में रहते हैं और एक क्षण में ही ऊपर चले आते हैं। हे खग! वह नदी पापियों के गिरने के लिए ही बनाई गई है। उसका पार नहीं दिखता। वह अत्यन्त दु:खपूर्वक तरने योग्य तथा बहुत दु:ख देने वाली है। इस प्रकार बहुत प्रकार के क्लेशों से व्याप्त अत्यन्त दु:खप्रद यममार्ग में रोते-चिल्लाते हुए दु:खी पापी जाते हैं। कुछ पापी पाश से बँधे होते हैं और कुछ अंकुश में फंसाकर खींचे जाते हैं, और कुछ शस्त्र के अग्र भाग से पीठ में छेदते हुए ले जाये जाते हैं। कुछ नाक के अग्रभाग में लगे हुए पाश से और कुछ कान में लगे हुए पाश से खीचे जाते हैं। कुछ काल पाश से खींचे जाते हैं और कुछ कौओं से खींचे जाते हैं। वे पापी गरदन, हाथ तथा पैर में जंजीर से बँधे हुए तथा अपनी पीठ पर लोहे के भार को ढोते हुए मार्ग पर चलते हैं। अत्यन्त घोर यमदूतों के द्वारा मुद्गरों से पीटे जाते हुए वे मुख से रक्त वमन करते हुए तथा वमन किये हुए रक्त को पुन: पीते हुए जाते हैं। उस समय अपने दुष्कर्मों को सोचते हुए प्राणी अत्यन्त ग्लानि का अनुभव करते हैं और अतीव दु:खित होकर यमलोक को जाते हैं। इस प्रकार यममार्ग में जाता हुआ वह मन्दबुद्धि प्राणी ‘हा पुत्र !, हा पौत्र !’ इस प्रकार पुत्र और पौत्रों को पुकारते हुए, हाय-हाय इस प्रकार विलाप करते हुए पश्चाताप की ज्वाला से जलता रहता है। वह विचार करता है कि महान पुण्य के संबंध से मनुष्य-जन्म प्राप्त होता है, उसे प्राप्त कर भी मैंने धर्माचरण नहीं किया, यह मैंने क्या किया। मैंने दान दिया नहीं, अग्नि में हवन किया नहीं, तपस्या की नहीं, देवताओं की भी पूजा की नहीं, विधि-विधान से तीर्थ सेवा की नहीं, अत: हे जीव! जो तुमने किया है, उसी का फल भोगों। हे देही ! तुमने ब्राह्मणों की पूजा की नहीं, देव नदी गंगा का सहारा लिया नहीं, सत्पुरुषों की सेवा की नहीं, कभी भी दूसरे का उपकार किया नहीं, इसलिए हे जीव ! जो तुमने किया है, अब उसी का फल भोगों। मनुष्यों और पशु-पक्षियों के लिए जलहीन प्रदेश में जलाशय का निर्माण किया नहीं। गौओं और ब्राह्मणों की आजीविका के लिए थोड़ा भी प्रयास किया नहीं, इसलिए हे देही! तुमने जो किया है, उसी से अपना निर्वाह करो। तुमने नित्य-दान किया नहीं, गौओं के दैनिक भरण-पोषण की व्यवस्था की नहीं, वेदों और शास्त्रों के वचनों को प्रमाण माना नहीं, पुराणों को सुना नहीं, विद्वानों की पूजा की नहीं, इसलिए हे देही ! जो तुमने किया है, उन्हीं दुष्कर्मों के फल को अब भोगों। नारी-जीव भी पश्चाताप करते हुए कहता है मैंने पति की हितकर आज्ञा का पालन किया नहीं, पातिव्रत्य धर्म का कभी पालन किया नहीं और गुरुजनों को गौरवोचित सम्मान कभी दिया नहीं, इसलिए हे देहिन्! जो तुमने किया, उसी का अब फल भोगों। धर्म की बुद्धि से एकमात्र पति की सेवा की नहीं और पति की मृत्यु हो जाने पर वह्निप्रवेश करके उनका अनुगमन किया नहीं, वैधव्य प्राप्त करके त्यागमय जीवन व्यतीत किया नहीं, इसलिए हे देहिन्! जैसा किया, उसका फल अब भोगों। मास पर्यन्त किए जाने वाले उपवासों से तथा चान्द्रायण-व्रतों आदि सुविस्तीर्ण नियमों के पालन से शरीर को सुखाया नहीं। पूर्वजन्म में किये हुए दुष्कर्मों से बहुत प्रकार के दु:खों को प्राप्त करने के लिए नारी-शरीर प्राप्त किया था। इस तरह बहुत प्रकार से विलाप करके पूर्व देह का स्मरण करते हुए ‘मेरा मानव-जन्म शरीर कहाँ चला गया’ इस प्रकार चिल्लाता हुआ वह यमममार्ग में चलता है। हे तार्क्ष्य ! इस प्रकार सत्रह दिन तक अकेले वायु वेग से चलते हुए अठारहवें दिन वह प्रेत सौम्यपुर में जाता है। उस रमणीय श्रेष्ठ सौम्यपुर में प्रेतों का महान गण रहता है। वहांँ पुष्पभद्रा नदी और अत्यन्त प्रिय दिखने वाला वटवृक्ष है। उस पुर में यमदूतों के द्वारा उसे विश्राम कराया जाता है। वहाँ दुखी होकर वह स्त्री-पुत्रों के द्वारा प्राप्त सुखों का स्मरण करता है। वह अपने धन, भृत्य और पौत्र आदि के विषय में जब सोचने लगता है तो वहाँ रहने वाले यम के किंकर उससे इस प्रकार कहते हैं–‘धन कहाँ है? पुत्र कहाँ है ? पत्नी कहाँ हैक्ष? मित्र कहाँ है ? बन्धु-बान्धव कहाँ है ?’ हे मूढ़ ! जीव अपने कर्मोपार्जित फल को ही भोगता है इसलिए सुदीर्घ काल तक इस यम मार्ग पर चलो। हे परलोक के राही! तू यह जानता है कि राहगीरों का बल और संबल पाथेय ही होता है, जिसके लिए तूने प्रयास तो किया नहीं। तू यह भी नहीं जानता था कि तुम्हें निश्चित ही उस मार्ग पर चलना है और उस रास्ते पर कोई भी लेन-देन हो नहीं सकता। यह मार्ग के बालकों को भी विदित रहता है। हे मनुष्य ! क्या तुमने इसे सुना नहीं था ? क्या तुमने ब्राह्मणों के मुख से पुराणों के वचन सुने नहीं थे। इस प्रकार कहकर मुद्गरों से पीटा जाता हुआ वह जीव गिरते-पड़ते-दौड़ते हुए बलपूर्वक पाशों से खींचा जाता है। यहाँ स्नेह अथवा कृपा के कारण पुत्र-पौत्रों द्वारा दिये हुए मासिक पिण्ड को खाता है। उसके बाद वह जीव सौरिपुर को प्रस्थान करता है। उस सौरिपुर में काल के रूप को धारण करने वाला जंगम नामक राजा रहता है। उसे देखकर वह जीव भयभीत होकर विश्राम करना चाहता है। उस पुर में गया हुआ वह जीव अपने स्वजनों के द्वारा दिये हुए त्रैपाक्षिक अन्न-जल को खाकर उस पुर को पार करता है। उसके बाद शीघ्रतापूर्वक वह प्रेत नगेन्द्र-भवन की ओर जाता है और वहाँ भयंकर वनों को देखकर दु:खी होकर रोता है। दयारहित दूतों के द्वारा खींचे जाने पर वह बार-बार रोता है और दो मासों के अन्त में वह दुखी होकर वहाँ जाता है। बान्धवों द्वारा दिये गये पिण्ड, जल, वस्त्र का उपभोग करके यमकिंकरों के द्वारा पाश से बार-बार खींचकर पुन: आगे ले जाया जाता है। तीसरे मास में वह गन्धर्वनगर को प्राप्त होता है और वहाँ त्रैमासिक पिण्ड खाकर आगे चलता है। चौथे मास में वह शैलागमपुर में पहुँचता है और वहाँ प्रेत के ऊपर बहुत अधिक पत्थरों की वर्षा होती है। वहाँ चौथे मासिक पिण्ड को खाकर वह कुछ सुखी होता है। उसके बाद पाँचवें महीने में वह प्रेत क्रौंचपुर पहुँचता है। क्रौंचपुर में स्थित वह प्रेत वहाँ बान्धवों द्वारा हाथ से दिये गये पाँचवें मासिक पिण्ड को खाकर आगे क्रूरपुर की ओर चलता है। साढ़े पाँच मास के बाद बान्धवों द्वारा प्रदत्त ऊनषाण्मासिक पिण्ड और घटदान से तृप्त होकर वह वहाँ आधे मुहूर्त तक विश्राम कर के यमदूतों के द्वारा डराये जाने पर दु:ख से काँपता हुआ उस पुर को छोड़कर चित्रभवन नामक पुर को जाता है, जहाँ यम का छोटा भाई विचित्र नाम वाला राजा राज्य करता है। उस विशाल शरीर वाले राजा को देखकर जब वह जीव डर से भागता है, तब सामने आकर कैवर्त धीवर उससे यह कहते हैं–‘हम इस महावैतरणी नदी को पार करने वालों के लिए नाव लेकर आये हैं, यदि तुम्हारा इस प्रकार का पुण्य हो तो इसमें बैठ सकते हो।’ तत्त्वदर्शी मुनियों ने दान को ही वितरण (देना या बाँटना) कहा है। यह वैतरणी नदी वितरण के द्वारा ही पार की जा सकती है, इसलिए इसको वैतरणी कहा जाता है। यदि तुमने वैतरणी गौ का दान किया हो तो नौका तुम्हारे पास आएगी अन्यथा नहीं। उनके ऐसे वचन सुनकर प्रेत ‘हा देव’ ! ऐसा कहता है। उस प्रेत को देखकर वह नदी खौलने लगती है और उसे देखकर प्रेत अत्यन्त क्रन्दन (विलाप) करने लगता है। जिसने अपने जीवन में कभी दान दिया ही नहीं, ऐसा पापात्मा उसी वैतरणी में डूबता है। तब आकाश मार्ग से चलने वाले दूत उसके मुख में काँटा लगाकर बंसी से मछली की भाँति उसे खींचते हुए पार ले जाते हैं। वहाँ षाण्मासिक पिण्ड खाकर वह अत्यधिक भूख से पीड़ित होकर विलाप करता हुआ आगे के रास्ते पर चलता है। सातवें मास में वह बह्वापदपुर को जाता है और वहाँ अपने पुत्रों द्वारा दिये हुए सप्तम मासिक पिण्ड को खाता है। हे पक्षिराज गरुड़ ! उस पुर को पारकर वह दु:खद नामक पुर को जाता है। आकाश मार्ग से जाता हुआ वह महान दु:ख प्राप्त करता है। वहाँ आठवें मास में दिये हुए पिण्ड को खाकर आगे बढ़ता है और नवाँ मास पूर्ण होने पर नानाक्रन्दपुर को प्राप्त होता है। वहाँ क्रन्दन करते हुए अनेक भयावह क्रन्दगणों को देखकर स्वयं शून्य हृदयवाला वह जीव दु:खी होकर आक्रन्दन करने लगता है। उस पुर को छोड़कर वह यमदूतों के द्वारा भयभीत किया जाता हुआ दसवें महीने में अत्यन्त कठिनाई से सुतप्तभवन नामक नगर में पहुँचता है। वहाँ पुत्रादि से पिण्डदान और जलांजलि प्राप्त करके भी सुखी नहीं होता। ग्यारहवाँ मास पूरा होने पर वह रौद्रपुर को जाता है। और पुत्रादि के द्वारा दिये हुए एकादश मासिक पिण्ड को वहाँ खाता है। साढ़े ग्यारह मास बीतने पर वह जीव पयोवर्षण नामक नगर में पहुँचता है। वहाँ प्रेतों को दु:ख देने वाले मेघ घनघोर वर्षा करते हैं, वहाँ पर दु:खी वह प्रेत ऊनाब्दिक श्राद्ध के पिण्ड को खाता है। इसके बाद वर्ष पूरा होने पर वह जीव शीताढ्य नामक नगर को प्राप्त होता है, वहाँ हिम से भी सौ गुनी अधिक महान ठण्ड पड़ती है। शीत से दु:खी तथा क्षुधित वह जीव इस आशा से दसों दिशाओं में देखता है कि शायद कहीं कोई हमारा बान्धव हो, जो मेरे दु:ख को दूर कर सके। तब यम के दूत कहते हैं–‘तुम्हारा ऐसा पुण्य कहाँ है? फिर वार्षिक पिण्ड को खाकर वह धैर्य धारण करता है। उसके बाद वर्ष के अन्त में यमपुर के निकट पहुँचने पर वह प्रेत बहुभीतिपुर में जाकर हाथ भर माप के अपने शरीर को छोड़ देता है। 'हे पक्षी! पुन: कर्म भोग के लिए अंगुष्ठ मात्र के वायुस्वरुप यातना देह को प्राप्त करके वह यमदूतों के साथ जाता है। हे कश्यपात्मज ! जिन्होंने और्ध्वदैहिक मरणकालिक दान नहीं दिए हैं, वे यमदूतों के द्वारा दृढ़ बन्धनों से बँधे हुए अत्यन्त कष्ट से यमपुर को जाते हैं। 'हे आकाशगामी ! धर्मराजपुर में चार द्वार है, जिनमें से दक्षिण द्वार के मार्ग का तुमसे वर्णन कर दिया। इस महान भयंकर मार्ग में भूख-प्यास और श्रम से दु:खी जीव जिस प्रकार जाते हैं, वह सब मैंने बतला दिया। श्री गरुड़ पुराण अन्तर्गत सारोद्वार में “यममार्गनिरुपण” 🔥⚔️🔥जय श्री राम🔥⚔️
sn vyas
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15 days ago
#गरूड़ पुराण #गरूड़ पुराण✍ गरुड़-पुराण की विशेषता 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ विद्या कीर्ति प्रभा लक्ष्मीजयारोग्यादिकारकम् । यः पठेच्छृणुयद्रुद सर्ववित् स दिवं व्रजेत ।। भगवान् हरि ने कहा- हे रुद्र! यह गरुड़ महापुराण विद्या, यश, सौन्दर्य, लक्ष्मी, विजय और आरोग्यादिका कारक है। जो मनुष्य इसका पाठ करता है या सुनता है, वह सब कुछ जान लेता है और अन्त में उसको स्वर्ग की प्राप्ति होती है। यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा समाहितः । संलिखेल्लेखयेद्वापि धारयेत् पुस्तकं ननु । धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ।। जो मनुष्य एकाग्रचित होकर इस महापुराण का पाठ करता है, सुनता है अथवा सुनाता है, जो इसको लिखता है, लिखाता है या पुस्तक के ही रूप में इसे अपने पास रखता है, वह यदि धर्मार्थी है, तो उसे धर्म की प्राप्ति होती है, यदि अर्थ का अभिलाषी है तो अर्थ प्राप्त होता है। गारुडं यस्य हस्ते तु तस्य हस्तगतो नयः । यः पठेच्छृणुयादेतद्भुक्तिं मुक्तिं समाप्नुयात् ।। जिस मनुष्य के हाथ में यह गरुड़ महापुराण विद्यमान है उसके हाथ में ही नीतियों का कोष है। जो प्राणी इस पुराण का पाठ करता है या इसको सुनाता है, वह भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त कर लेता है। धर्मार्थ काममोक्षांश्च प्राप्नुयाच्छ्रवणादितः । पुत्रार्थी लभते पुत्रान् कामार्थी काममाप्नुयात् ।। इस महापुराण को पढ़ने या सुनने से मनुष्य के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थों की सिद्धि हो जाती है। इस महापुराण का पाठ करके या इसको सुनकर के पुत्र चाहने वाला पुत्र प्राप्त करता है तथा कामना का इच्छुक अपनी कामना प्राप्ति में सफलता प्राप्त कर लेता है। विद्यार्थी लभते विद्यां जयार्थी लभते जयम्। ब्रह्महत्यादिना पापी पापशुद्धिमवाप्नुयात् ।। विद्यार्थी को विद्या, विजिगीषु को विजय, ब्रह्महत्यादि से युक्त पापी, पाप से विशुद्धि को प्राप्त करता है। वन्ध्यापि लभते पुत्रं कन्या विन्दति सत्पतिम् । क्षेमार्थी लभते क्षेमं भोगार्थी भोगमाप्नुयात् ।। बन्ध्या स्त्री पुत्र, कन्या सज्जनपति, क्षेमार्थी क्षेम तथा भोग चाहने वाला भोग प्राप्त करता है। मङ्गलार्थी मङ्गलानि गुणार्थी गुणमाप्नुयात् । काव्यार्थी च कवित्वं च सारार्थी सारमाप्नुयात् ।। मंगल की कामना वाला व्यक्ति अपना मंगल, गुणों का इच्छुक व्यक्ति गुण, काव्य करने का अभिलाषी मनुष्य कवित्वशक्ति और जीवन का सारतत्व चाहने वाला व्यक्ति सारतत्व प्राप्त करता है। ज्ञानार्थी लभते ज्ञानं सर्वसंसारमर्दनम् । इदं स्वस्त्ययनं धन्यं गारुडं गरुडेरितम् ।। ज्ञानार्थी सम्पूर्ण संसार का मर्दन करने वाला ज्ञान प्राप्त करता है "हे रुद्र!" पक्षिश्रेष्ठ गरुड़ के द्वारा कहा गया यह गारुड़महापुराण धन्य है। यह तो सबका कल्याण करने वाला है। नाकाले मरणं तस्य श्लोकमेकं तु यः पठेत्। श्लोकार्धपठनादस्य दुष्टशत्रुक्षयो धुवम् ।। जो मनुष्य इस महापुराण के एक भी श्लोक का पाठ करता है उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती। इसके मात्र आधे श्लोक का पाठ करने से निश्चित ही दुष्ट शत्रु का क्षय हो जाता है। अतो हि गारुड़ मुख्यं पुराणं शास्त्रसम्मतम्। गारुडेन समं नास्ति विष्णुधर्मप्रदर्शने ।। इसलिए यह गरुड़पुराण मुख्य और शास्त्र सम्मत पुराण है विष्णु धर्म के प्रदर्शन में गरुड़पुराण के समान दूसरा कोई भी पुराण नहीं है। यथा सुराणां प्रचरो जनार्दनो यथायुधानां प्रवरः सुदर्शनम् । तथा पुराणेषु च गारुडं च मुख्यं तदाहुर्हरितत्व दर्शनं ।। ग जैसे देवों में जनार्दन श्रेष्ठ है और आयुधों में सुर्दशन श्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणों में यह गरुडपुराण हरि के तत्वनिरुपण में मुख्य कहा गया है। पुराणं गारुडं पुण्यं पवित्रं पापनाशम् । श्रृण्वतां कामनापूर्ण श्रोतव्यं सर्वदैव हि ।। यश्चेदं श्रृणुयान्मर्त्यो यश्चापि परिकीर्तयेत् । विहाय यातानां घोरां धूतपापो दिवं व्रजेत् ।। यह गरुड़ महापुराण बड़ा ही पवित्र एवं पुण्यदायक है। यह सभी पापों का विनाशक एवं सुनने वालों की समस्त कामनाओं का पूरक है। इसका सदैव श्रवण करना चाहिए। जो मनुष्य इस महापुराण को सुनता या पाठ करता है, वह निष्पाप होकर यमराज की भंयकर यातनाओं को तोड़कर स्वर्ग को प्राप्त करता है। साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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17 days ago
गरूड़ पुराण अध्याय १६ का शेष भाग वह धीर पुरुष घर से निकलकर पवित्र तीर्थ के जल में स्नान करके पवित्र और एकान्त देश में विधिवत आसन लगाकर बैठ जाए और शुद्ध परम त्रिवृत ब्रह्माक्षर अर्थात ओंकार का मन से अभ्यास करे तथा ब्रह्मबीज स्वरुप ओंकार का निरन्तर स्मरण करके श्वास को जीतकर मन को नियंत्रित करे। बुद्धि रूपी सारथी की सहायता से मन रूपी लगाम के द्वारा इन्द्रियों को विषयों से निगृहीत कर ले और कर्मों के द्वारा आक्षिप्त मन को बुद्धि की सहायता से शुभ अर्थ में अर्थात परब्रह्म के चिन्तन में लगा दे। मैं ब्रह्म हूँ, मैं परम धाम हूँ और परम पदरूपी ब्रह्म मैं हूँ – ऎसी समीक्षा करके अपनी आत्मा को निष्कल परमात्मा में लगा दे और ‘ओम्’ इस एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ तथा मेरा स्मरण करता हुआ जो मनुष्य देह-त्याग करता है, वह इस संसार से तर जाता है और परम गति प्राप्त करता है। मान और मोह से रहित तथा आसक्ति से उत्पन्न होने वाले दोषों को जीत लेने वाले, सुख-दु:खादि द्वंद्वों से मुक्त ज्ञानी पुरुष उस शाश्वत अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं। जो व्यक्ति राग और द्वेष रूपी मलों का अपहरण करने वाले ज्ञानरूप जलाशय और सत्यस्वरुप जलवाले मानसतीर्थ में स्नान करता है, वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। जो प्रौढ़ वैराग्य को धारण करके अन्य भावों का परित्याग कर केवल मद्विषयक भावना के द्वारा मेरा भजन करता है, ऎसा पूर्ण दृष्टि रखने वाला अमलान्तरात्मा संत ही मोक्ष को प्राप्त होता है। “तीर्थ में मृत्यु हो जाय” – इस उत्कण्ठा से उत्सुक होकर जो अपने घर का परित्याग करके तीर्थ में निवास करता है और मुक्तिक्षेत्र में मरता है, वही मोक्ष प्राप्त करता है। अयोध्या, मथुरा, कनखल-हरिद्वार, काशी, कांची, अवन्तिका और द्वारावतीपुरी – ये सात पुरियाँ मोक्ष देने वाली हैं। हे तार्क्ष्य ! मैंने सनातन मोक्ष धर्म को तुम्हें बता दिया, ज्ञान और वैराग्य के सहित इसे सुनकर पुरुष मोक्ष प्राप्त करता है। तत्त्वज्ञ पुरुष मोक्ष प्राप्त करते हैं, धार्मिक पुरुष स्वर्ग को प्राप्त होते हैं। पापियों की दुर्गति होती है और पशु-पक्षी आदि पुन:-पुन: जन्म-मरण रूपी संसार में भ्रमण करते हैं। इस प्रकार सभी शास्त्रों का सारोद्धार मैंने सोलह अध्यायों में कह दिया, अब और क्या सुनना चाहते हो? सूत उवाच सूत जी ने कहा – हे राजन ! गरुड़ जी ने भगवान के मुख से ऎसा वचन सुनकर उन्हें बार-बार प्रणाम करके अंजलि बाँधकर इस प्रकार कहा – गरुड़ जी ने कहा – हे देवाधिदेव भगवन ! हे नाथ ! हे प्रभो ! अपने अमृतमय वचनों को सुनाकर आपने मुझे भवसागर से तार दिया है। अब मेरा संदेह समाप्त हो गया और मैं कृतार्थ हो गया हूँ, इसमें संशय नहीं – ऎसा कहकर गरुड़ जी ने मौन होकर भगवद्ध्यानपरायण हो गए। स्मरण करने से जो दुर्गति का हरण कर लेते हैं, पूजन और यज्ञ के द्वारा जो सद्गति प्रदान करते हैं और अपनी परम भक्ति के द्वारा जो मुक्ति प्रदान करते हैं, वे हति मेरी रक्षा करें। ।।इस प्रकार गरुड़पुराण के अन्तर्गत सारोद्धार में भगवान विष्णु ओर गरुड़ के संवाद में “मोक्षधर्मनिरूपण” नामक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ।। गरुड़ पुराण-श्रवण (सुनने का) का फल 〰️ श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान ने कहा – हे तार्क्ष्य ! इस प्रकार मैंने और्ध्वदैहिक कृत्यों के विषय में सब कुछ कह दिया। मरणाशौच में दस दिन के अंदर इसे सुनकर व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो जाता है। यह परलोक संबंदधी कर्म पितरों को मुक्ति प्रदान करने वाला है और परलोक में तथा इस लोक में भी पुत्र को वांछित फल देकर सुख प्रदान करने वाला है। जो नास्तिक अधम व्यक्ति प्रेत का यह और्ध्वदैहिक कर्म नहीं करते, उनका जल सुरा के समान अपेय है, इसमें कोई संशय नहीं। देवता और पितृगण उसके घर की ओर नहीं देखते अर्थात दोनों की ही कृपादृष्टि उन पर नहीं होती और उनके पितरों के कोप से पुत्र-पुत्रादि की भी दुर्गति होती है। प्रेतक्रिया के बिना ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और इतरजनों को भी चाण्डाल के समान जानना चाहिए। जो इस पुण्यप्रद प्रेतकल्प को सुनता और सुनाता है – वे दोनों ही पाप से मुक्त होकर दुर्गति को नहीं प्राप्त होते हैं। माता और पिता के मरण में जो पुत्र गरुण पुराण सुनता है, उसके माता-पिता की मुक्ति होती है और पुत्र को संतति की प्राप्ति होती है। जिस पुत्र ने माता-पिता की मृत्यु होने के अनन्तर गरुड़ पुराण का श्रवण नहीं किया, गया श्राद्ध नहीं किया, वृषोत्सर्ग नहीं किया, मासिक तथा वार्षिक श्राद्ध नहीं किया, वह कैसे पुत्र कहा जा सकता है और ऋणत्रय से उसे कैसे मुक्ति प्राप्त हो सकती है और वह पुत्र माता-पिता को तारने में कैसे समर्थ हो सकता है? इसलिए सभी प्रकार के प्रयत्नों को करके धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष रूप पुरुषार्थचतुष्टय को देने वाले तथा सर्वविध दु:ख का विनाश करने वाले गरुड़ पुराण को अवश्य सुनना चाहिए। यह गरुड़ पुराण पुण्यप्रद, पवित्र तथा पापनाशक है, सुनने वालों की कामनाओं को पूर्ण करने वाला है, अत: सदा ही इसे सुनना चाहिए। इस पुराण को सुनकर ब्राह्मण विद्या प्राप्त करता है, क्षत्रिय पृथिवी प्राप्त करता है, वैश्य धनाढ्य होता है और शूद्र पातकों से शुद्ध हो जाता है। इस गरुड़पुराण को सुनकर सुनाने वाले आचार्य को पूर्वोक्त शय्याददानादि संपूर्ण दान देने चाहिए अन्यथा इसका श्रवण फलदायक नहीं होता। पहले पुराण की पूजा करनी चाहिए तदनन्तर वस्त्र, अलंकार, गोदान और दक्षिणा आदि देकर आदरपूर्वक वाचक की पूजा करनी चाहिए। प्रचुर पुण्यफल की प्राप्ति के लिए प्रभूत अन्न, स्वर्ण और भूमि दान के द्वारा श्रद्धा भक्तिपूर्वक वाचक की पूजा करनी चाहिए। वाचक की पूजा से ही मेरी पूजा हो जाती है, इसमें संशय नहीं और वाचक के संतुष्ट होने पर मैं भी संतुष्ट हो जाता हूँ, इसमें भी कोई संशय नहीं। ।।इस प्रकार गरुड़पुराण के श्रवण का फल संपूर्ण हुआ।। ।।इस प्रकार गरुड़पुराण सारोद्धार संपूर्ण हुआ।। साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼 #गरूड़ पुराण #गरूड़ पुराण✍
sn vyas
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17 days ago
सम्पूर्ण गरुड़ पुराण (हिन्दी में) “मोक्षधर्मनिरूपण” नामक {सोलहवां अध्याय} 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ मनुष्य शरीर प्राप्त करने की महिमा, धर्माचरण ही मुख्य कर्तव्य, शरीर और संसार की दु:खरूपता तथा नश्वरता, मोक्ष-धर्म-निरूपण गरुड़ उवाच गरुड़ जी ने कहा – हे दयासिन्धो ! अज्ञान के कारण जीव जन्म-मरणरूपी संसार चक्र में पड़ता है, यह मैंने सुना। अब मैं मोक्ष के सनातन उपाय को सुनना चाहता हूँ। हे भगवन ! हे देवदेवेश ! हे शरणागतवत्सल ! सभी प्रकार के दु:खों से मलिन तथा साररहित इस भयावह संसार में अनेक प्रकार के शरीर धारण करके अनन्त जीवराशियाँ उत्पन्न होती हैं और मरती हैं, उनका कोई अन्त नहीं है। ये सभी सदा दु:ख से पीड़ित रहते हैं, इन्हें कहीं सुख नहीं प्राप्त होता। हे मोक्षेश ! हे प्रभो ! किस उपाय के करने से इन्हें इस संसृति-चक्र से मुक्ति प्राप्त हो सकती है, इसे आप मुझे बताएँ। श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान ने कहा – हे तार्क्ष्य ! तुम इस विषय में मुझसे जो पूछते हो, मैं बतलाता हूँ ! सुनो – जिसके सुनने मात्र से मनुष्य संसार से मुक्त हो जाता है। वह परब्रह्म परमात्मा निष्कल (कलारहित) परब्रह्मस्वरूप, शिवस्वरूप, सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, निर्मल तथा अद्वय (द्वैतभावरहित) है। वह (परमात्मा) स्वत: प्रकाश है, अनादि, अनन्त, निर्विकार, परात्पर, निर्गुण और सत्-चित्-आनन्दस्वरूप है। यह जीव उसी का अंश है। जैसे अग्नि से बहुत से स्फुलिंग अर्थात चिंगारियाँ निकलती हैं उसी प्रकार अनादिकालीन अविद्या से युक्त होने के कारण अनादि काल से किये जाने वाले कर्मों के परिणामस्वरुप देहादि उपाधि को धारण करके जीव भगवान से पृथक हो गए हैं। वे जीव प्रत्येक जन्म में पुण्य और पापरूप सुख-दु:ख प्रदान करने वाले कर्मों से नियंत्रित होकर तत्तत् जाति के योग से देह(शरीर), आयु और कर्मानुरोधी भोग प्राप्त करते हैं। हे खग ! इसके पश्चात भी पुन: वे अत्यन्त सूक्ष्म लिंग शरीर प्राप्त करते हैं और यह क्रम मोक्षपर्यन्त स्थित रहता है। ये जीव कभी स्थावर (वृक्ष-लतादि जड़) योनियों में, पुन: कृमियोनियों में तदनन्तर जलचर, पक्षी और पशुयोनियों को प्राप्त करते हुए मनुष्ययोनि प्राप्त करते हैं फिर धार्मिक मनुष्य के रूप में और पुन: देवता तथा देवयोनि के पश्चात क्रमश: मोक्ष प्राप्त करने के अधिकारी होते हैं। उद्भिज्ज, स्वेदज और पिण्डज (जरायुज) – इन चार प्रकार के शरीरों को सहस्त्रों बार धारण करके उनसे मुक्त होकर सुकृतवश (पुण्यप्रभाव से) जीव मनुष्य-शरीर प्राप्त करता है और यदि वह ज्ञानी हो जाए तो मोक्ष प्राप्त कर लेता है। जीवों की चौरासी लाख योनियों में मनुष्य योनि के अतिरिक्त अन्य किसी भी योनि में तत्वज्ञान प्राप्त नहीं होता। पूर्वोक्त विभिन्न योनियों में हजारों-हजार करोड़ों बार जन्म लेने के अनन्तर उपार्जित पुण्यपुंज के कारण कदाचित मनुष्य-योनि प्राप्त होती है। मोक्ष प्राप्ति के लिए सोपानभूत यह दुर्लभ मनुष्य-शरीर प्राप्त करके इस संसृति चक्र से जो अपने को मुक्त नहीं कर लेता, उससे अधिक पापी और कौन होगा ! उत्तम मनुष्य शरीर में जन्म प्राप्त करके और समस्त सौष्ठव संपन्न अविकल इन्द्रियों को प्राप्त करके भी जो व्यक्ति अपने हित को नहीं जानता वह ब्रह्मघातक होता है। शरीर के बिना कोई भी जीव पुरुषार्थ नहीं कर सकता इसलिए शरीर और धन की रक्षा करता हुआ इन दोनों से पुण्योपार्जन करना चाहिए। मनुष्य को सर्वदा अपने शरीर की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि शरीर सभी पुरुषार्थों का एकमात्र साधन है इसलिए उसकी रक्षा का उपाय करना चाहिए। जीवन धारण करने पर ही व्यक्ति अपने कल्याण को देख सकता है। गाँव, क्षेत्र, धन, घर और शुभाशुभ कर्म पुन:-पुन: प्राप्त हो सकते हैं किंतु मनुष्य शरीर पुन:-पुन: प्राप्त नहीं हो सकता। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति सदा शरीर की रक्षा का उपाय करते हैं। कुष्ठ आदि रोगी भी अपने शरीर को त्यागने की इच्छा नहीं करते। शरीर की रक्षा धर्माचरण के उद्देश्य से और धर्माचरण ज्ञानप्राप्ति के उद्देश्य से ज्ञान, ध्यान एवं योग की सिद्धि के लिए और फिर ध्यानयोग से मनुष्य अविलम्ब मोक्ष प्राप्त कर लेता है। यदि मनुष्य स्वयं ही अपने आत्मा का अहित से निवारण नहीं कर लेता तो आत्मा का दूसरा कौन हितैषी होगा जो आत्मा को तारेगा। जो जीव मनुष्य के शरीर में रहकर इसी जन्म में नरकरूपी व्याधि की चिकित्सा नहीं कर लेता, वह परलोक में जाने पर जहाँ औषध नहीं प्राप्त है, नरक व्याधि से पीड़ित होने पर फिर क्या कर सकेगा? वृद्धावस्था बाघिन के समान सामने खड़ी है, फूटे हुए घड़े के गिरने वाले जल की भाँति प्रतिक्षण आयु समाप्त होती जा रही है, रोग शत्रु की भाँति प्रहार कर रहे हैं, अत: श्रेय:प्राप्ति के लिए जीव को अभ्यास करना चाहिए। जब तक दु:ख प्राप्त नहीं होता, जब तक आपत्तियाँ घेर नहीं लेती और जब तक इन्द्रियों में वैकल्य (शिथिलता) नहीं आ जाता, तब तक श्रेय:प्राप्ति के लिए जीव को प्रयास करते रहना चाहिए। जब तक यह शरीर है तभी तक तत्त्वज्ञान का अभ्यास करना चाहिए। भवन में आग लग जाने पर कौन ऎसा दुर्बुद्धि मनुष्य है जो कुँआ खोदना प्रारंभ करता है। बहुविध सांसारिक कार्यप्रपंचों में व्यस्त रहने के कारण काल का ज्ञान नहीं होता। यह क्लेश की बात है कि मनुष्य अपने सुख-दु:ख और हित की बात को नहीं समझता। संसार में जीवों को उत्पन्न होते हुए, रोगादि से दु:खी होते हुए, मृत्यु प्राप्त करते हुए और आपत्तिग्रस्त तथा दु:खी देखकर भी सांसारिक मनुष्य मोहरूपी मदिरा को पीकर कभी बी भयभीत नहीं होता। भौतिक सम्पत्ति स्वप्न के समान नश्वर-क्षणभंगुर है, यौवन भी पुष्प के समान मुरझा जाने वाला है, आयु बादलों में चमकने वाली बिजली के समान चंचल है – यह सब जानते हुए भी मनुष्य को कैसे धैर्य हो सकता है। एक तो मनुष्य की सौ वर्ष की आयु ही बहुत थोड़ी है, उसमें भी निद्रा और आलस्य के वशीभूत होकर उसका आधा भाग बीत जाता है और जो शेष है वह भी बाल्यावस्था, रोग और जरा में होने वाले दु:ख से चला जाता है और जो थोड़ा बचा, वह भी निष्फल ही बीत जाता है। प्रारंभ करने वाले कार्य के विषय में जो उद्योग नहीं करता और जहाँ ब्रह्मचिन्तन आदि में जागरुक रहना चाहिए वहाँ वह सोता रहता है। इसके विपरीत जहाँ सदा-सदा भय विद्यमान है (उस संसार में), वहाँ वह विश्वस्त है, ऎसा जो मनुष्य है, वह अभागा क्यों नहीं मारा जाएगा। जल में उठने वाले फेन के समान अतीव क्षणभंगुर देह को प्राप्त करके जीवात्मा उसमें स्थित रहता है। यह शरीर ही उसको प्रियसंवास के रूप में प्रतीत होता है किंतु इस अनित्य शरीर में जीवात्मा निर्भय होकर कैसे रह सकता है? जो अहित करने वाले विषय भोगों में ही हितबुद्धि रखता है तथा अनिश्चित (पुत्र-कलत्र-देह-गेहादि) को स्थाई समझता है और भौतिक धन-संपत्ति आदि अनर्थकारी वस्तुओं में जो अर्थबुद्धि रखता है, वह अपने परमार्थ को नहीं जानता। जो “यह जगत किसी का नहीं हुआ” – ऎसा देखते हुए भी गिर रहा है और आत्मज्ञानविषयक वचनों को सुनते हुए भी जिसे बोध नहीं होता, पढ़ करके भी उसका अर्थ नहीं समझता – ऎसा इसलिए होता है कि जीव भगवान की माया से मोहित है। मृत्यु, रोग और जगरूपी ग्राहों के द्वारा गंभीर कालसागर में डूबते हुए इस जगत को कोई भी नहीं जान पाता। प्रतिक्षण क्षीण होते हुए भी इस काल की सूक्ष्म गति को जीव वैसे ही नहीं जान पाता जैसे कच्चे घड़े में स्थित जल के विगलित होने का ज्ञान नहीं हो पाता। कदाचित वायु का बाँधना संभव हो सकता है, आकाश को खण्ड-खण्ड करने की तरंगों के गुम्फन की कल्पना भी संभव हो सकती है परंतु आयु के शाश्वत होने की आस्था कथमपि संभव नहीं हो सकती। जिस काल के द्वारा जल जाती है, मेरु पर्वत भी चूर-चूर हो जाता है, सागर का जल भी सूख जाता है, उस काल से मनुष्य-शरीर की रक्षा की क्या कथा? मेरा पुत्र, मेरी पत्नी, मेरा धन, मेरे बान्धव – इस प्रकार मैं-मैं कहते हुए मनुष्य रूपी बकरे को हठपूर्वक कालरूपी भेड़िया मार डालता है। यह मैंने कर लिया, यह करना शेष है, यह दूसरा कार्य भी अभी कुछ करना बाकी है – इस प्रकार की इच्छा से युक्त मनुष्य को यमराज अपने वश में कर लेते हैं। कल किए जाने वाले कार्य को आज, अपराह्ण में किए जाने वाले कार्य को पूर्वाह्ण में ही कर लेना चाहिए क्योंकि मनुष्य ने अपना कार्य कर लिया है अथवा नहीं – इसकी प्रतीक्षा मृत्यु नहीं करती। वृद्धावस्था जिसको रास्ता दिखाने वाली है, अत्युग्र रोग ही जिसके सैनिक है, ऎसे म्रत्युरूपी शत्रु के तुम सम्मुख स्थित हो फिर उस प्रबल शत्रु से रक्षा करने वाले परमात्मा की ओर क्यों नहीं देखते अर्थात उनकी ओर उन्मुख क्यों नहीं होते? तृष्णारूपी शूल में बिंधे हुए और विषयवासनारूपी घीसे सींचे हुए तथा राग-द्वेषरूपी अग्नि में पके हुए मनुष्य को मृत्यु खा जाती है। यह जगत ऎसा है कि इसमें मृत्यु बालकों, युवकों, वृद्धों और गर्भस्थ जीवों – सभी को ग्रस लेती है। जब जीव अपनी देह को भी यहीं छोड़कर यमलोक को चला जाता है तो फिर स्त्री-माता-पिता और पुत्रादि से किस प्रयोजन से संबंध स्थापित किया जाए। यह संसार दु:ख का मूल कारण है इसलिए इस संसार से जिसका संबंध है, वही दु:खी है और जिसने इस जगत का त्याग किया, वही मनुष्य सुखी है। दूसरा कोई भी, कहीं भी सुखी नहीं है। यह संसार सभी प्रकार के दु:खों का उत्पत्ति स्थान है, सभी आपत्तियों का घर है और सभी पापों का आश्रय-स्थान है इसलिए ऎसे संसार को क्षणमात्र में त्याग देना चाहिए। लौह एवं लकड़ी के पाशों से बँधा हुआ मनुष्य मुक्त हो सकता है किंतु पुत्र और पत्नीरुपी पाशों से बँधा हुआ मनुष्य कभी भी मुक्त नहीं हो सकता। मनुष्य अपने मन को प्रिय लगने वाले इस जगत में जितने पदार्थों से संबंध बनाता जाता है, उतनी ही अधिक शोक की कीले उसके ह्रदय में गड़ती जाती हैं। यह बड़े खेद की बात है कि मनुष्य की देह में स्थित शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध, विषयों का आहार करने वाले इन्द्रियरूपी चोरों ने इस लोक के समस्त धन को अपहृत करके इसे नष्ट कर दिया है अर्थात परलोक के लिए हितकारी धर्मरूपी जो धन है, उसका इन्द्रियों ने हरण कर लिया है। माँसलोभी मत्स्य जैसे बंसी में लगे हुए लोहे के अंकुश को नहीं जान पाता, उसी प्रकार विषयों से प्राप्त होने वाले सुख के लोभ से जीव यमयातना की परवाह नहीं करता। हे गरुड़ ! जो अपने हित औत अहित को नहीं जानते, सदा कुमार्ग पर चलने वाले हैं और मात्र पेट भरने में ही जिनका सारा अध्यवसाय रहता है, वे मनुष्य नरकगामी हैं। निद्रा, मैथुन और आहार आदि की स्वाभाविक प्रवृति सभी प्राणियों में समान रूप से विद्यमान रहती है। उनमें जो वास्तविक हित-अहित को जानने वाला ज्ञानवान है, वह मनुष्य कहा जाता है और उस ज्ञान से जो शून्य है, वह पशु कहलाता है। मूर्ख मनुष्य प्रात:काल मल-मूत्रों के वेग से, मध्य दिन में क्षुधा और तृषा से तथा रात्रि में काम क्रीड़ा और निद्रा से बाधित रहते हैं। हाय ! यह खेद की बात है कि अज्ञान से मोहित होकर सभी जीव अपनी देह, धन, पत्नी आदि में आसक्त होकर बार-बार पैदा होते हैं और मर जाते हैं इसलिए सदा आसक्ति का त्याग कर देना चाहिए और यदि उसका सर्वथा त्याग न हो सके तो महापुरुषों के साथ संबंध बनाना चाहिए क्योंकि संत पुरुष संसारासक्तिरूपी रोग के भेषज हैं। सत्संग और विवेक – ये दोनों ही व्यक्ति के दो निर्मल नेत्र हैं। जिस व्यक्ति के पास ये नहीं है, वह अंधा है, अंधा मनुष्य कुमार्गगामी क्यों नहीं होगा? अपने-अपने वर्ण और आश्रम के लिए शास्त्रबोधित आचारों का पालन करने में संलग्न रहने वाले सभी मनुष्य यदि परम धर्म को नहीं जानते तो वे दम्भाचारी व्यर्थ में नष्ट हो जाते हैं। कुछ लोग अनेक प्रकार की क्रियाओं को करने का प्रयत्न करते हैं और कुछ अन्य व्रत, उपवास आदि में संलग्न रहते हैं, अज्ञान से आवृत आत्मा वाले कुछ लोग ढ़ोंगी बनकर विचरण करते हैं। कर्मकाण्ड में आस्था रखने वाले मनुष्य शास्त्रबोधित नाममात्र की फलश्रुतियों से संतुष्ट हो करके मन्त्रोच्चारण ओर होमादि कृत्यों से तथा यज्ञ से विस्तृत विधानों से भ्रान्त रहते हैं, उन्हीं में उलझे रहते हैं। मेरी माया से विमोहित होकर शरीर को सुखाने वाले मूर्ख लोग एकभुक्त, उपवास आदि व्रतों का आचरण करके परोक्ष (परमगति) को प्राप्त करना चाहते हैं। शरीर को दण्ड देने मात्र से क्या अविवेकी पुरुषों को मुक्ति प्राप्त हो सकती है? वल्मीक (साँप की बाँबी) को ताड़न करने मात्र से क्या कहीं भी महासर्प की मृत्यु होती है? बड़ी लंबी जटाओं के भार को ढोने वाले और मृगचर्म आदि से युक्त दाम्भिक पुरुष वेष धारण करके ज्ञानी की भाँति ही लोक में भ्रमण करते हैं और लोगों को भी भ्रमित करते हैं। सांसारिक सुख में आसक्त जो व्यक्ति “मैं ब्रह्मज्ञानी हूँ” ऎसा कहता है वह कर्ममार्ग तथा ब्रह्मज्ञानमार्ग – दोनों मार्गों से भ्रष्ट हो जाता है, उसे चाण्डाल की भाँति छोड़ देना चाहिए। संसार में, घर में और अरण्य में लज्जा त्यागकर समान रुप से नग्न होकर गर्दभ आदि पशु भी विचरण करते हैं तो क्या इस आचरण से वे संसार से विरक्त हो जाते हैं? यदि मिट्टी और भस्म के धारण करने मात्र से मनुष्य मुक्त हो जाए तो मिट्टी और भस्म में शयन करने वाला वह कुत्ता भी क्या मुक्ति प्राप्त कर लेगा? घास-पात और जल का आहार करने वाले तथा निरन्तर जंगल में निवास करने वाले श्रृंगाल, चूहे तथा मृग आदि पशु भी क्या तपस्वी – योगी हो जाते हैं अर्थात अन्न छोड़ देने, ग्राम या नगर में निवास छोड़कर वन में रहने मात्र से कोई सन्यासी नहीं हो जाता। मण्डूक अर्थात मेढ़क और मत्स्य आदि जलचर जीव जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त गंगा आदि नदियों में निवास करते हैं तो क्या वे योगी हो जाते हैं? कबूतर शिलवृत्ति (कंकड़) का आहार करने वाले हैं तथा चातक कभी भी भूमि पर स्थित जल को नहीं पीते तो क्या इससे वे व्रती हो जाते हैं? इसलिए हे खगेश्वर ! पूर्वोक्त संपूर्ण कर्मानुष्ठान केवल लोकरंजनमात्र के लिए हैं। मोक्ष का अकरण तो साक्षात तत्त्वज्ञान ही है। हे खग ! षड्दर्शनरूपी महाकूप में पड़े हुए मनुष्यरूपी पशु परमार्थ को नहीं जानते हैं क्योंकि वे पशुपाश से नियंत्रित रहते हैं। वेद और शास्त्ररूपी घोर समुद्र में इधर-उधर ले जाए जाते हुए कुतार्किक व्यक्ति षडूर्मियों (क्षुधा-पिपासा, शोक-मोह और जन्म-मृत्यु को “षडूर्मि” कहा जाता है) से ग्रस्त होकर स्थित रहते हैं। वेद-शास्त्र और पुराणों को जानने वाला भी जो मनुष्य परमार्थ को नहीं जानता, विडंबनाग्रस्त उसका पूर्वोक्त संपूर्ण ज्ञान कौए के काँव-काँव करने जैसा है। परम तत्व से पराड्मुख जीव यह ज्ञान है, यह ज्ञेय है, इसी चिन्ता से व्याकुल होकर रात-दिन शास्त्रों का अध्ययन करते हैं\ काव्योचित अलंकारों से सुशोभित गद्य वाक्य-रचना या छन्दोबद्ध कविता की रचान करने पर भी विषयोपभोग के प्रति लालायित इन्द्रियों वाले तत्त्वज्ञानरहित मूढ व्यक्ति नाना चिन्ताओं के कारण दु:खी रहते हैं। परम तत्व की प्राप्ति तो अन्य प्रकार से होती है, किंतु लोग अन्य प्रकार के उपाय करके क्लेश प्राप्त करते हैं। शास्त्र का भाव तो कुछ और होता है परंतु वे उसकी व्याख्या कुछ दूसरे प्रकार से करते हैं। कुछ अहंकारी व्यक्ति गुरूपदेश आदि को प्राप्त न करके भी उन्मनीभाव के विषय में कहते हैं, पर वे स्वयं उसका अनुभव नहीं करते। बहुत से लोग वेद और शास्त्र का अध्ययन तो करते हैं और परस्पर एक-दूसरे को बोध भी कराते हैं, तात्पर्य समझाते हैं, पर वे परम तत्त्वों के विषय में उसी प्रकार कुछ नहीं जानते जिस प्रकार कलछी पाकरस को नहीं जानती। पुष्प को धारण तो सिर करता है किंतु उस पुष्प की गन्ध को नासिका ही जानती है, ठीक इसी प्रकार वेद और शास्त्र का अध्ययन में उसी प्रकार भटकता फिरता रह जाता है, जैसे कोई मूर्ख ग्वाला अपनी कोख में बकरे को पकड़े रखने पर भी उसको खोजने के लिए कुएँ में देखता है। संसार के मोह का नाश करने के लिए शास्त्र के शब्दों के अअर्थ को जानना मात्र पर्याप्त नहीं है। दीपक की बात से कभी अंधकार की निवृत्ति नहीं हो सकती। बुद्धिहीन मनुष्य का पढ़ना अंधे व्यक्ति के दर्पण देखने के समान व्यर्थ है। अत: बुद्धिमान व्यक्ति को ही शास्त्रीय तत्त्वज्ञान का लक्षण हो सकता है अर्थात बुद्धिमान को ही तत्त्वज्ञान लक्षित हो सकता है। जो यह ज्ञान यहाँ है, इसे जानना चाहिए – इस प्रकार बुद्धि करके शास्त्र में प्रतिपाद्य सब कुछ सुनना चाहता है, वह हजार दिव्य वर्षों की आयु प्राप्त करके भी शास्त्रों का अन्त पप्राप्त नहीं कर सकता। अनेक शास्त्र हैं, आयु अत्यल्प है, जिसमें करोड़ों विघ्न हैं इसलिए जैसे हंस जल के मध्य से दूध को ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति को भी शास्त्र के सारतत्त्व का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। वेदशास्त्रों का अभ्यास कर वहाँ से तत्त्वज्ञान प्राप्त करके बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि जैसे धान चाहने वाला व्यक्ति धान ग्रहण करके पलाल अर्थात पुआल को छोड़ देता हैम उसी तरह उसे भी अन्य सभी शास्त्रों को छोड़ देना चाहिए। जैसे अमृत से तृप्त व्यक्ति के लिए भोजन की कोई आवश्यकता नहीं होती, उसी प्रकार हे तार्क्ष्य ! तत्त्वज्ञ को शास्त्र से कोई प्रयोजन नहीं होता। हे विनतात्मज ! न वेदाध्ययन से मुक्ति प्राप्त होती है और न शास्त्रों के अध्ययन से ही। मोक्ष की प्राप्ति ज्ञान से ही होती है, किसी दूसरे उपाय से नहीं। जिस प्रकार मुक्ति के लिए न तो आश्रम धर्म का अनुष्ठान कारण है, न दर्शनों का अध्ययन कारण है, उसी प्रकार श्रौत-स्मार्त कर्म भी कारण नहीं है। मात्र ज्ञान ही मोक्ष का उपाय है। गुरु का वचन ही मोक्ष देने वाला है, अन्य सब विद्याएँ विडम्बना मात्र है। लकड़ी के हजारों भारों की अपेक्षा एक संजीवनी ही श्रेष्ठ है। कर्मकाण्ड और वेद-शास्त्रादि के अध्ययन रूपी परिश्रम से रहित केवल गुरु मुख से प्राप्त अद्वैतज्ञान ही कल्याणकारी कहा गया है, अन्य करोड़ों शास्त्रों को पढ़ने से कोई लाभ नहीं। वेदादि आगम शास्त्रों का अध्ययन तथा विवेक – इन दो साधनों से ज्ञान की प्राप्ति होती है। आगम से शब्द ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त होता है और विवेक से परब्रह्म का ज्ञान प्राप्त होता है। कई विद्वान अद्वैत को वास्तविक परमतत्त्व स्वीकार करते हैं और कुछ अन्य विद्वज्जन द्वैततत्त्व की ही प्रतिष्ठा चाहते हैं किंतु द्वैत और अद्वैत से पृथक सभी के लिये समान रूप से स्वीकार्य परम तत्त्व को कोई नहीं जानता। “न मम” (मेरा नहीं है) और “मम” (मेरा है) – ये दो पद (भावनाएँ) ही बन्धन और मोक्ष के कारण हैं। मम – बुद्धि करने से प्राणी बन्धन को प्राप्त होता है और ‘मेरा नहीं है’ इस प्रकार की भावना करने से मुक्त होता है। कर्म वही है, जो बन्धन का हेतु नहीं होता तथा विद्या वही है, जो मोक्ष प्रदान करा दे और इससे अतिरिक्त कर्म केवल श्रममात्र के हेतु हैं जो शरीर के लिए क्लेशप्रद हैं तथा अन्य प्रकार की विद्या शिल्पचातुर्यमात्र है। जब तक कर्म किये जाते हैं, जब तक संसार में आसक्ति रहती है, जब तक इन्द्रियों का चांचल्य बना रहता है, तब तक तत्त्वज्ञान की बात ही कहाँ हो सकती है? जब तक देहाभिमान (देह को अपना स्वरुप मानना) है, जब तक ममता रहती है, जब तक प्रयत्नों का वेग रहता है, जब तक संकल्प की कल्पना होती रहती है, जब तक मन स्थिर नहीं हो जाता, जब तक शास्त्र का चिन्तन नहीं किया जाता तथा जब तक गुरु की कृपा नहीं प्राप्त होती, तब तक तत्त्वज्ञान की चर्चा ही कहाँ होती है? तप, व्रत, तीर्थ, जप, होम तथा पूजा आदि सत्कर्मों का अनुष्ठान तथा वेद, शास्त्र और आगम की कथा तभी तक उपयोगी है, जब तक जीव को तत्त्वज्ञान प्राप्त नहीं हो जाता। इसलिए हे तार्क्ष्य ! यदि अपने मोक्ष की इच्छा हो तो सर्वदा संपूर्ण प्रयत्नों का सभी अवस्थाओं में निरन्तर अनुष्ठान करके तत्त्वज्ञान की प्राप्ति में संलग्न रहना चाहिए। जो प्राणी (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) ताप त्रय से सदा संतप्त रहता है, उसे मोक्ष वृक्ष की छाया का आश्रयण करना चाहिए। जिस मोक्षवृक्ष का पुष्प धर्म और ज्ञानस्वरुप है तथा फल स्वर्ग एवं मोक्ष है। इसलिए श्रीगुरु मुख से आत्मतत्त्वविषयक ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। ज्ञान हो जाने पर प्राणी इस घोर संसार बंधन से सुखपूर्वक मुक्त हो जाता अहि। हे तार्क्ष्य ! मैं तत्त्वज्ञानी पुरुष के द्वारा किए जाने वाले अन्तिम कृत्य के विषय में तुम्हें बताता हूँ, सुनो ! जिस उपाय को करके जीव को ब्रह्मनिर्वाणसंज्ञक मोक्ष की प्राप्ति होती है। अन्तकाल के आ जाने पर पुरुष भय छोड़कर अनासक्तिरूपी शस्त्र से देह-गेहादि विषयक ममत्व को काट डाले। #गरूड़ पुराण #गरूड़ पुराण✍ शेष भाग अगली पोस्ट में 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
sn vyas
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18 days ago
#गरूड़ पुराण #गरूड़ पुराण✍ सम्पूर्ण गरुड़ पुराण (हिन्दी में) “सुकृतिजनजन्माचरणनिरुपण” नामक {पंद्रहवां अध्याय} 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ धर्मात्मा जन का दिव्यलोकों का सुख भोगकर उत्तम कुल में जन्म लेना, शरीर के व्यावहारिक तथा पारमार्थिक दो रूपों का वर्णन, अजपाजप की विधि, भगवत्प्राप्ति के साधनों में भक्ति योग की प्रधानता गरुड़ उवाच गरुड़ जी ने कहा – धर्मात्मा व्यक्ति स्वर्ग के भोगों को भोगकर पुन: निर्मल कुल में उत्पन्न होता है इसलिए माता के गर्भ में उसकी उत्पत्ति कैसे होती है, इस विषय में बताइए। हे करुणानिधे ! पुण्यात्मा पुरुष इस देह के विषय में जिस प्रकार विचार करता है, वह मैं सुनना चाहता हूँ, मुझे बताइए। श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान ने कहा – हे तार्क्ष्य ! तुमने ठीक पूछा है, मैं तुम्हें परम गोपनीय बात बताता हूँ जिसे जान लेने मात्र से मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है। पहले मैं तुम्हें शरीर के पारमार्थिक स्वरूप के विषय में बतलाता हूँ, जो ब्रह्माण्ड के गुणों से संपन्न है और योगियों के द्वारा करने योग्य है। इस पारमार्थिक शरीर में जिस प्रकार योगी लोग षट्चक्र का चिन्तन करते हैं, वह सब मुझसे सुनो। पुण्यात्मा जीव पवित्र आचरण करने वाले लक्ष्मी संपन्न गृहस्थों के घर में जैसे उत्पन्न होता है और उसके पिता तथा माता के विधान एवं नियम जिस प्रकार के होते हैं, उनके विषय में तुमसे कहता हूँ। स्त्रियों के ऋतुकाल में चार दिन तक उनका त्याग कर देना चाहिए अर्थात उनसे दूर रहना चाहिए। उतने समय तक उनका मुख भी नहीं देखना चाहिए, क्योंकि उस समय उनके शरीर में पाप का निवास रहता है। चौथे दिन वस्त्रों सहित स्नान करने के अनन्तर वह नारी शुद्ध होती है तथा एक सप्ताह के बाद पितरों एवं देवताओं के पूजन, अर्चन तथा व्रत करने के योग्य होती है। एक सप्ताह के मध्य में जो गर्भ धारण होता है, उससे, मलिन वृत्तिवाली संतान का जन्म होता है। प्राय: ऋतुकाल के आठवें दिन गर्भाधान से पुत्र की उत्पत्ति होती है। ऋतुकाल के अनन्तर युग्म (सम) रात्रियों में गर्भाधान होने से पुत्र और अयुग्म (विषम) रात्रियों में गर्भाधान से कन्या की उत्पत्ति होती है, इसलिए पूर्व की सात रात्रियों को छोड़कर युग्म की रात्रियों में ही समागम करना चाहिए। स्त्रियों के रजोदर्शन से सामान्यत: सोलह रात्रियों तक ऋतुकाल बताया गया है। चौदहवीं रात्रि को गर्भाधान होने पर गुणवान, भाग्यवान और धार्मिक पुत्र की उत्पत्ति होती है। प्राकृत जीवों (सामान्य मनुष्यों) को गर्भाधान के निमित्त उस रात्रि में गर्भाधान का अवसर प्राप्त नहीं होता। पाँचवें दिन स्त्री को मधुर भोजन करना चाहिए। कड़ुआ, खारा, तीखा तथा उष्ण भोजन से दूर रहना चाहिए तब स्त्री का वह क्षेत्र (गर्भाशय) औषधि का पात्र हो जाता है और उसमें संस्थापित बीज अमृत की तरह सुरक्षित रहता है। उस औषधि क्षेत्र में बीजवपन (गर्भाधान) करने वाला स्वामी अच्छे फल को प्राप्त करता है। ताम्बूल खाकर, पुष्प और श्रीखण्ड से युक्त होकर तथा पवित्र वस्त्र धारण करके मन में धार्मिक भावों को रखकर पुरुष को सुन्दर शय्या पर संवास करना चाहिए। गर्भाधान के समय पुरुष की मनोवृत्ति जिस प्रकार की होती है, उसी प्रकार के स्वभाव वाला जीव गर्भ में प्रविष्ट होता है। बीज का स्वरूप धारण करके चैतन्यांश पुरुष के शुक्र में स्थित रहता है। पुरुष की काम वासना, चित्तवृत्ति तथा शुक्र जब एकत्व को प्राप्र होते हैं, तब स्त्री के गर्भाशय में पुरुष द्रवित होता है। स्त्री के गर्भाशय में शुक्र और शोणित के संयोग से पिण्ड की उत्पत्ति होती है। गर्भ में आने वाला सुकृती पुत्र पिता-माता को परम आनन्द देने वाला होता है और उसके पुंसवन आदि समस्त संस्कार किये जाते हैं। पुण्यात्मा पुरुष ग्रहों की उच्च स्थिति में जन्म प्राप्त करता है। ऎसे पुत्र की उत्पत्ति के समय ब्राह्मण बहुत सारा धन प्राप्त करते हैं। वह पुत्र विद्या और विनय से संपन्न होकर पिता के घर में बढ़ता है और सत्पुरुषों के संसर्ग में सभी शास्त्रों में पाण्डित्य-संपन्न हो जाता है। वह तरुणावस्था में दिव्य अंगना आदि का योग प्राप्त करता है और दानशील तथा धनी होता है। पूर्व में किये हुए तपस्या, तीर्थ सेवन आदि महापुण्यों के फल का उदय होने पर वह नित्य आत्मा और अनात्मा अर्थात परमात्मा और उससे भिन्न पदार्थों – के विषय में विचार करने लगता है। जिससे उसे यह बोध होता है कि सांसारिक मनुष्य भ्रमवश रस्सी में सर्प के आरोप की भाँति वस्तु अर्थात सच्चिदानन्द ब्रह्म में अवस्तु अर्थात अज्ञानादि जगत-प्रपंच का अध्यारोप करता है तब अपवाद अर्थात मिथ्याज्ञान या भ्रमज्ञान के निराकरण – से रस्सी में सर्प की भ्रान्ति के निराकरणपूर्वक रस्सी की वास्तविकता के ज्ञान के समान ब्रह्मरूपी सत्य वस्तु में अज्ञानादि जगत-प्रपंच की मिथ्या प्रतीति के दूर हो जाने पर और ब्रह्मरूप सत्य वस्तु का सम्यक ज्ञान हो जाने पर वह उसी सच्चिदानन्द ब्रह्म का चिन्तन करने लगता है। सांसारिक पदार्थ रूप असत् या अनात्म पदार्थों से अन्वित या सम्बद्ध होने वाले इस ब्रह्म के संगरहित शुद्ध स्वरुप के सम्यक् बोध के लिए मैं तुम्हें इसके साथ अन्वित या सम्बद्ध प्रतीत होने वाली पृथिवी आदि अनात्मवर्ग के अर्थात पंचभूतों आदि के गुणों को बतलाता हूँ। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश – ये पाँच स्थूलभूत कहे जाते हैं। यह शरीर इन्हीँ पाँच भूतों से बनता है इसलिए पाँचभौतिक कहलाता है। हे खगेश्वर ! त्वचा, हड्डियाँ, नाड़ियाँ, रोम तथा माँस – ये पाँच भूमि के गुण हैं, यह मैंने तुम्हें बतलाया है। लार, मूत्र, वीर्य, मज्जा तथा पाँचवां रक्त – ये पाँच जल के गुण कहे गये हैं। अब तेज के गुणों को सुनो। हे तार्क्ष्य ! योगियों के द्वारा सर्वत्र क्षुधा, तृषा, आलस्य, निद्रा और कान्ति – ये पाँच गुण तेज के कहे गए हैं। सिकुड़ना, दौड़ना, लाँघना, फैलाना तथा चेष्टा करना – ये पाँच गुण वायु के कहे गए हैं। घोष(शब्द) छिद्र, गाम्भीर्य, श्रवण और सर्वसंश्रय(समस्त तत्त्वों को आश्रय प्रदान करना) – ये पाँच गुण तुम्हें प्रयत्नपूर्वक आकाश के जानने चाहिए। पूर्व जन्म के कर्मों से अधिवासित मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त – यह अन्त:करणचतुष्टय कहा जाता है। श्रोत्र (कान), त्वक, जिह्वा, चक्षु (नेत्र), नासिका – ये ज्ञानेन्द्रियाँ हैं तथा वाक, हाथ, पैर, गुदा और उपस्थ – ये कर्मेन्द्रियाँ हैं। दिशा, वायु, सूर्य, प्रचेता और अश्विनीकुमार – ये ज्ञानेन्द्रियों के तथा वह्नि, इन्द्र, विष्णु, मित्र तथा प्रजापति – ये कर्मेन्द्रियों के देवता कहे गए हैं। देह के मध्य में इडा, पिंगला, सुषुम्णा, गान्धारी, गजजिह्वा, पूषा, यशस्विनी, अलम्बुषा, कुहू और शंखिनी – ये दस प्रधान नाडियाँ स्थित हैं। प्राण, अपान, समान, उदान तथा व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय – ये दस वायु हैं। हृदय में प्राणु वायु, गुदा में अपानवायु, नाभिमण्डल में समानवायु, कण्ठदेश में उदानवायु और संपूर्ण शरीर में व्यानवायु व्याप्त रहती है। उद्गार (डकार या वमन) नागवायु हेतु है, जिसके द्वारा उन्मीलन होता है, वह कूर्मवायु कहा जाता है। कृकल नामक वायु क्षुधा(भूख) को उद्दीप्त करता है। देवदत्त नामक वायु जंभाई कराता है। सर्वव्यापी धनंजय वायु मृत्यु के पश्चात भी मृत शरीर को नहीं छोड़ता। ग्रास के रुप में खाया गया अन्न सभी प्राणियों के शरीर को पुष्ट करता है। उस पुष्टिकारक अन्न के सारांशभूत रस को व्यान नाम का वायु शरीर की सभी नाड़ियों में पहुंचाता है। उस वायु के द्वारा भुक्त आहार दो भागों में विभक्त कर दिया जाता है। गुदाभाग में प्रविष्ट होकर सम्यक रुप से अन्न और जल को पृथक-पृथक कर के अग्नि के ऊपर जल और जल के ऊपर अन्न को करके अग्नि के नीचे वह प्राण वायु स्वत: स्थित होकर उस अग्नि को धीरे-धीरे धौंकता है। उसके द्वारा धौंके जाने पर अग्नि किट्ट(मल) और रस को पृथक-पृथक कर देता है तब वह व्यानवायु उस रस को संपूर्ण शरीर में पहुंचाता है। शरीर से पृथक किया गया किट्ट (मल) शरीर के कर्ण, नासिका आदि बारह चिद्रों से बाहर निकलता है। कान, आँख, नासिका, जिह्वा, नख, गुदा, गुप्तांग तथा शिराएँ और समस्त शरीर में स्थित छिद्र एवं लोम – ये बारह मल के निवास स्थान हैं। जैसे सूर्य से प्रकाश प्राप्त कर के प्राणी अपने-अपने कर्मों में प्रवृत होते हैं, उसी प्रकार चैतन्यांश से सत्ता प्राप्त करके ये सभी वायु अपने-अपने कर्म में प्रवृत होते हैं। हे खग ! अब नर देह के दो रुपों के विषय में सुनो – एक व्यवहारिक तथा दूसरा पारमार्थिक है। हे विनतासुत ! व्यवहारिक शरीर में साढ़े तीन करोड़ रोम, सात लाख केश, बीस नख तथा बत्तीस दाँत सामान्यत: बताए गए हैं। इस शरीर में एक हजार पल मांस, सौ पल रक्त, दस पल मेदा, सत्तर पल त्वचा, बारह पल मज्जा और तीन पल महारक्त होता है। पुरुष के शरीर में दो कुड़व शुक्र और स्त्री के शरीर में एक कुड़व शोणित (रज) होता है। संपूर्ण शरीर में तीन सौ साठ हड्डियाँ कही गई हैं। शरीर में स्थूल और सूक्ष्मरूप से करोड़ों नाड़ियाँ हैं। इसमें पचास पल पित्त और उसका आधा अर्थात पच्चीस पल श्लेष्मा (कफ) बताया गया है। सदा होने वाले विष्ठा और मूत्र का प्रमाण निश्चित नहीं किया गया है। व्यवहारिक शरीर इन उपर्युक्त गुणों से युक्त है। पारमार्थिक शरीर में सभी चौदहों भुवन, सभी पर्वत, सभी द्वीप एवं सभी सागर तथा सूर्य आदि ग्रह सूक्ष्म रूप से विद्यमान रहते हैं। पारमार्थिक शरीर में मूलाधार आदि छ: चक्र होते हैँ। ब्रह्माण्ड में जो गुण कहे गए हैं, वे सभी इस शरीर में स्थित हैं योगियों के धारणास्पद उन गुणों को मैं बताता हूँ, जिनकी भावना करने से जीव विराट स्वरुप का भागी हो जाता है। पैर के तलवे में तल लोक तथा पैर के ऊपर वितल लोक जानना चाहिए। इसी प्रकार जानु में सुतल लोक और जाँघों में महा तल लोक जानना चाहिए। सक्थि के मूल में तलातल, गुह्यस्थान में रसातल, कटिप्रदेश में पाताल – इस प्रकार पैरों के तलवों से लेकर कटिपर्यन्त सात अधोलोक कहे गए हैं। नाभि के मध्य में भूर्लोक, नाभि के ऊपर भुवर्लोक, हृदय में स्वर्लोक, कण्ठ में महर्लोक, मुख में जनलोक, ललाट में तपोलोक और ब्रह्मरन्ध्र में सत्यलोक स्थित है। इस प्रकार चौदह लोक पारमार्थिक शरीर में स्थित हैं। त्रिकोण के मध्य में मेरु, अध:कोण में मन्दर, दाहिने कोण में कैलास, वामकोण में हिमाचल, ऊर्ध्वरेखा में निषध, दाहिनी ओर की रेखा में गन्धमादन तथा बायीं ओर की रेखा में रमणाचल नामक पर्वत स्थित है। ये सात कुलपर्वत इस पारमार्थिक शरीर में है। अस्थि में जम्बूद्वीप, मज्जा में शाकद्वीप, मांस में कुशद्वीप, शिराओं में क्रौंचद्वीप, त्वचा में शाल्मलीद्वीप, रोमसमूह में गोमेदद्वीप और नख में पुष्करद्वीप की स्थिति जाननी चाहिए। तत्पश्चात सागरों की स्थिति इस प्रकार है – हे विनतासुत ! क्षारसमुद्र मूत्र में, क्षीरसागर दूध में, सुरा का सागर श्लेष्म (कफ) में, घृत का सागर मज्जा में, रस का सागर शरीरस्थ रस में और दधिसागर रक्त में स्थित समझना चाहिए। स्वादूदक सागर को लम्बिका स्थान (कण्ठ के लटकते हुए भाग अथवा उपजिह्वा या काकल) में समझना चाहिए। नादचक्र में सूर्य, बिन्दु चक्र में चन्द्रमा, नेत्रों में मंगल और हृदय में बुध को स्थित समझना चाहिए। विष्णुस्थान अर्थात नाभि में स्थित मणिपूरक चक्र में बृहस्पति तथा शुक्र में शुक्र स्थित हैं, नाभिस्थान नाभि (गोलक) में शनैश्चर स्थित है और मुख में राहु स्थित कहा गया है। वायु स्थान में केतु स्थित है, इस प्रकार समस्त ग्रहमण्डल इस पारमार्थिक शरीर में विद्यमान है। इस प्रकार अपने इस शरीर में समस्त ब्रहमाण्ड का चिन्तन करना चाहिए। प्रभातकाल में सदा पद्मासन में स्थित होकर षटचक्रों का चिन्तन करें और यथोक्त क्रम से अजपा-जप करें। अजपा नाम की गायत्री मुनियों को मोक्ष देने वाली है। इसके संकल्पमात्र से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है। हे तार्क्ष्य ! सुनो, मैं तुम्हें अजपा-जप का उत्तम क्रम बताता हूँ – जिसको सर्वदा करने से जीव जीव भाव से मुक्त हो जाता है। 1- मूलाधार चक्र, 2- स्वाधिष्ठान चक्र 3- मणीपुर चक्र, 4- अनाहत चक्र, 5- विशुद्धि चक्र तथा 6- आज्ञा चक्र – इन्हें षटचक्र कहा जाता है। इन चक्रों का क्रमश: मूलाधार (गुदा प्रदेश के ऊपर) – में, लिंग देश में, नाभि में, हृदय में, कण्ठ में, भौंहों के मध्य में तथा ब्रह्मरन्ध्र (सहस्रार चक्र) में चिन्तन करना चाहिए। मूलाधार चक्र चतुर्दलाकार, अग्नि के समान और ‘व’ से ‘स’ पर्यन्त वर्णों (व, श, ष, स) का आश्रयस्थान है। स्वाधिष्ठानचक्र सूर्य के समान दीप्तिमान ‘ब’से लेकर ‘ल‘ पर्यन्त वर्णों (ब, भ, म, य, र, ल) का आश्रयस्थान और षडदलाकार है। मणिपूरकचक्र रक्तिम आभावाला, दशदलाकार और ‘ड’ से लेकर ‘फ’ पर्यन्त वर्णों (ड, ढ़, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ) का आधार है। अनाहतचक्र द्वादशदलाकार, स्वर्णिम आभा वाला तथा ‘क’ से ‘ठ’ पर्यन्त वर्णों (क, ख, ग, घ, ड़, च, च, ज, झ, ण, ट, ठ) से युक्त है। विशुद्धचक्र षोडशदलाकार, सोलह स्वरों (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऋ, लृ, लृृ, ए, ऎ, ओ, औ, अं, अ:) – से युक्त कमल और चन्द्रमा के समान कान्तिवाला होता है, आज्ञाचक्र “हं स:” इन दो अक्षरों से युक्त, द्विदलाकार और रक्तिम वर्ण का है। उसके ऊपर ब्रह्मरन्ध्र में देदीप्यमान सहस्रदलकमला चक्र हैं, जो कि सदा सत्यमय, आनन्दमय, शिवमय, ज्योतिर्मय और शाश्वत है। इन चक्रों में क्रमश: गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, जीवात्मा, गुरु तथा व्यापक परब्रह्म का चिन्तन करना चाहिए अर्थात मूलाधार चक्र में गणेश का, स्वाधिष्ठान चक्र में ब्रह्माजी का, मणिपूरक चक्र में विष्णु का, अनाहत चक्र में शिव का, विशुद्ध चक्र में जीवात्मा का, आज्ञा चक्र में गुरु का और सहस्रार चक्र में सर्वव्यापी परब्रह्म परम शिवा का चिन्तन करना चाहिए। विद्वानों ने एक दिन-रात में 21,600 श्वासों की सूक्ष्मगति कही है। “हं” का उच्चारण करते हुए श्वास बाहर निकलता है और ‘स:’ की ध्वनि करते हुए अंदर प्रविष्ट होता है। इस प्रकार तात्विक रुप से जीव “हंस:, हंस:” इस मन्त्र से परमात्मा का निरन्तर जप करता रहता है। जीव के द्वारा अहोरात्र में किये जाने वाले इस अजपा-जप के छ: सौ मन्त्र गणेश के लिए, छ: हजार ब्रह्मा के लिये, छ: हजार विष्णु के लिए, छ: हजार शिव के लिए, एक हजार जीवात्मा के लिए, एक हजार गुरु के लिए और एक हजार मन्त्र जप चिदात्मा के लिए निवेदित करने चाहिए। श्रेष्ठ सम्प्रदायवेत्ता अरुण आदि मुनि इन षटचक्रों में ब्रह्ममयूख (किरण) के रूप में स्थित गणेश आदि देवताओं का चिन्तन करते हैं। शुक्र आदि मुनि भी अपने शिष्यों को इनका उपदेश देते हैं। अत: महापुरुषों की प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर विद्वानों को सदा इन चक्रों में देवताओं का ध्यान करना चाहिए। सभी चक्रों में अनन्यभाव से उन देवताओं की मानस पूजा करके गुरु के उपदेश के अनुसार अजपा गायत्री का जप करना चाहिए। इसके बाद ब्रह्मरन्ध्र में अधोमुख रूप में स्थित सहस्रदलकमल में हंस पर विराजमान, वर तथा अभयमुद्रायुक्त दोनों हस्तकमलों की स्थिति वाले श्रीगुरु का ध्यान करना चाहिए। गुरु चरणों से निकली हुई अमृतमयी धारा से अपने शरीर को प्रलाक्षित होता हुआ सा चिन्तन करे फिर पंचोपचार से पूजा करके स्तुतिपूर्वक प्रणाम करना चाहिए। तदनन्तर कुण्डली का ध्यान करना चाहिए। जो षट्चक्रों में साढ़े तीन वलय में स्थित है और आरोह तथा अवरोह के रूप में षट्चक्र में संचरण करती है। तदनन्तर ब्रह्मरन्ध्र से बहिर्गत सुषुम्णा नामक धाम(प्रकाशमार्ग) का ध्यान करना चाहिए। उस मार्ग से जाने वाले पुरुष विष्णु के परम पद को प्राप्त करते हैं। इसके अनन्तर ब्रह्म मुहूर्त में मेरे द्वारा चिन्तित आनन्दस्वरुप स्वप्रकाश, सनातनरूप का सदा ध्यान करना चाहिए। इस प्रकार गुरु के उपदेश से मन को निश्चल बनाएँ, अपने प्रयत्न से ऎसा नहीं करें क्योंकि गुरु के उपदेश के बिना साधक का पतन हो सकता है। इस प्रकार अन्तर्याग संपन्न करके बहिर्याग का अनुष्ठान करना चाहिए। स्नान तथा संध्या आदि कर्मों को करके विष्णु और शिव की पूजा करनी चाहिए। देह का अभिमान रखने वाले अर्थात पांचभौतिक शरीर को ही अपना शरीर समझने वाले व्यक्तियों की वृत्ति अन्तर्मुखी नहीं हो सकती। इसलिए उनके लिए सरलतापूर्वक की जा सकने वाली मेरी भक्ति ही मोक्षसाधिका हो सकती है। यद्यपि तपस्या और योगसाधना आदि भी मोक्ष के मार्ग हैं तो भी इस संसारचक्र में फँसे हुए व्यक्तियों के उद्धार के लिए मेरा भक्ति मार्ग ही समीचीन उपाय है। ब्रह्मा आदि देवों ने वेद और शास्त्र का पुन: पुन: विचार करके तीन बार यही सिद्धांत सुनिश्चित किया है। यज्ञादि सद्धर्म भी अन्त:करण की शुद्धि के हेतु हैं और इस शुद्धि के फलस्वरुप मेरी भक्ति प्राप्त होती है। जिसे प्राप्त करके व्यक्ति पुन: जन्म-मरणादि दु:खों से पीड़ित नहीं होता। हे तार्क्ष्य ! जो सुकृती मनुष्य इस प्रकार का आचरण करता है, वह मेरी भक्ति के योग से सनातन मो़क्ष पद प्राप्त करता है। ।।इस प्रकार गरुड़पुराण के अन्तर्गत सारोद्धार में “सुकृतिजनजन्माचरणनिरुपण” नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ।। क्रमश... अगले लेख में श्री गरुड़ पुराण का सोलहवाँ अध्याय साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️