कांवड़ यात्रा

sn vyas
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4 days ago
#🪔सावन का पवित्र महीना 🙏 #🔱हर हर महादेव #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #कांवड़ यात्रा #🔱 कांवड़ यात्रा 🚩 काँवड यात्रा की कथा 〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️ सावन शुरू होते ही जब हर तरफ़ “बोल बम” की गूंज सुनाई देने लगती है, तो लाखों-करोड़ों भक्त अपने घरों से निकल पड़ते हैं। किसी के कंधे पर सजी हुई कांवड़ होती है, किसी के हाथ में गंगाजल से भरा पात्र, और किसी के पैरों में लंबी यात्रा की थकान। कोई सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर गंगाजल लाता है, तो कोई पूरी यात्रा के दौरान अपनी कांवड़ को जमीन पर नहीं रखता। रास्ता चाहे कितना भी लंबा हो, मौसम चाहे कितना भी कठिन हो, चेहरे पर थकान हो या पैरों में दर्द, उनके होंठों से एक ही आवाज़ निकलती रहती है—बोल बम। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर एक साधारण-सा जल लेकर इतनी लंबी यात्रा करने के पीछे इतना गहरा विश्वास क्यों है? आखिर क्यों सावन आते ही इंसान अपने आराम, अपनी नींद और अपनी सुविधाओं को छोड़कर महादेव के दरबार तक जल लेकर पहुंचना चाहता है? कहते हैं इस परंपरा का संबंध उस समय से है, जब स्वयं महादेव ने पूरी सृष्टि को बचाने के लिए ऐसा विष अपने कंठ में धारण किया था, जिसे कोई और छूने की हिम्मत तक नहीं कर सकता था। कथा के अनुसार एक बार माता पार्वती ने महादेव से पूछा, “प्रभु, सावन आते ही धरती पर इतनी भीड़ क्यों उमड़ पड़ती है? कोई दूर-दूर से गंगाजल लेकर आता है, कोई पैदल चलता है, कोई कांवड़ को अपने कंधे से नीचे नहीं रखता। आखिर इस यात्रा में ऐसा क्या रहस्य छिपा है, जिसके लिए आपके भक्त इतनी कठिन यात्रा करने को तैयार हो जाते हैं?” महादेव मंद-मंद मुस्कुराए और बोले, “देवी, इस रहस्य की शुरुआत उस समय से होती है, जब अमृत की तलाश में देवताओं और असुरों ने समुद्र का मंथन शुरू किया था। उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि अमृत से पहले समुद्र अपने भीतर से ऐसा भयानक विष बाहर निकालेगा, जिसकी एक बूंद भी सृष्टि के लिए विनाश का कारण बन सकती है।” समुद्र मंथन चलता रहा। मंदराचल पर्वत को मथनी बनाया गया और नागराज वासुकि को रस्सी की तरह इस्तेमाल किया गया। देवता एक तरफ खड़े थे और असुर दूसरी तरफ। सबकी नजर उस अमृत पर थी, जिसके लिए इतना बड़ा प्रयास किया जा रहा था। लेकिन समुद्र ने सबसे पहले अमृत नहीं दिया। अचानक उसके भीतर से हलाहल विष प्रकट हुआ। विष इतना भयंकर था कि उसकी गर्मी से तीनों लोकों में भय फैल गया। वातावरण विषैला होने लगा। देवता घबरा गए, असुर पीछे हट गए और सभी जीव-जंतु अपनी जान बचाने का रास्ता खोजने लगे। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि इस विष को कौन रोकेगा। क्योंकि अगर वह विष संसार में फैल जाता, तो न देवता बचते, न असुर, न मनुष्य और न ही कोई दूसरा जीव। तब सबकी नजर महादेव पर गई। देवता कैलाश पहुंचे और महादेव से प्रार्थना करने लगे। महादेव ने सृष्टि की ओर देखा और समझ गए कि अब किसी को आगे आना ही होगा। उन्होंने उस हलाहल विष को अपने हाथों में उठाया और बिना किसी भय के उसे अपने कंठ में धारण कर लिया। विष उनके भीतर जाने लगा और उसी क्षण उनकी देह में भयंकर ताप फैल गया। माता पार्वती ने महादेव का कंठ पकड़ लिया, ताकि विष उनके शरीर के भीतर आगे न जा सके। विष वहीं रुक गया और महादेव का कंठ नीला पड़ गया। तभी से संसार उन्हें नीलकंठ के नाम से पुकारने लगा। लेकिन देवी पार्वती ने फिर पूछा, “प्रभु, आपकी यह कथा तो मैं जानती हूं। लेकिन आपके कंठ में रुका हुआ वह विष और सावन में भक्तों द्वारा चढ़ाया जाने वाला जल आपस में कैसे जुड़े?” महादेव ने कहा, “देवी, विष को कंठ में रोक लेना आसान नहीं था। उस हलाहल की गर्मी इतनी तीव्र थी कि उसका ताप मेरे भीतर लगातार जल रहा था। तब देवताओं और भक्तों ने मेरे कंठ को शीतल करने के लिए पवित्र नदियों का जल अर्पित किया। जल की हर बूंद उस ताप को शांत करने लगी। धीरे-धीरे लोगों ने समझा कि महादेव के कंठ को शीतल करने वाला यह जल केवल पानी नहीं, बल्कि श्रद्धा का प्रतीक है। समय बीतता गया और भक्त दूर-दूर से पवित्र नदियों का जल लेकर मेरे शिवलिंग पर चढ़ाने लगे। इसी भक्ति और परंपरा ने आगे चलकर कांवड़ यात्रा का रूप लिया।” माता पार्वती कुछ देर तक शांत रहीं। फिर उन्होंने पूछा, “तो क्या प्रभु, जो भक्त आपके ऊपर अधिक जल चढ़ाएगा, उसे आपकी कृपा भी अधिक मिलेगी?” महादेव हंस पड़े और बोले, “नहीं देवी। मैं जल की मात्रा नहीं देखता। मैं उस जल को उठाने वाले भक्त का संकल्प देखता हूं। मेरे लिए यह मायने नहीं रखता कि किसी ने कितना गंगाजल लाया। मेरे लिए यह मायने रखता है कि वह उसे लेकर कितनी श्रद्धा से चला। जिसने अपने कंधे पर कांवड़ रखी और रास्ते की कठिनाइयों के बावजूद उसे सम्मान से उठाए रखा, उसने केवल जल नहीं उठाया। उसने अपने भीतर के अहंकार, आलस्य और स्वार्थ को भी धीरे-धीरे पीछे छोड़ दिया।” महादेव की बात सुनकर माता पार्वती ने कहा, “लेकिन प्रभु, रास्ते में तो भक्तों को बहुत कठिनाइयां होती होंगी। तेज धूप, बारिश, लंबी दूरी, थकान और शरीर का दर्द। फिर भी वे रुकते क्यों नहीं?” महादेव बोले, “क्योंकि जब किसी मनुष्य के भीतर विश्वास जाग जाता है, तब रास्ते की दूरी छोटी लगने लगती है। जिस कांवड़ को वह अपने कंधे पर रखता है, वह उसके लिए केवल एक लकड़ी का ढांचा नहीं रह जाती। उसमें उसका संकल्प जुड़ जाता है। हर कदम के साथ वह मेरे नाम का स्मरण करता है और हर कदम पर अपने मन को समझाता है कि अभी यात्रा पूरी नहीं हुई। जब शरीर कहता है रुक जाओ, तब श्रद्धा कहती है थोड़ा और चलो। जब मन कहता है अब नहीं होगा, तब भीतर से आवाज़ आती है—बोल बम।” कथा यहीं एक और गहरा अर्थ ले लेती है। महादेव ने माता पार्वती से कहा, “देवी, मनुष्य अक्सर समझता है कि वह मेरे लिए जल लेकर चल रहा है। लेकिन असल में वह यात्रा उसके अपने भीतर की होती है। वह घर से जल लेकर निकलता है और रास्ते में धीरे-धीरे अपने भीतर की अशांति को पीछे छोड़ता जाता है। शुरुआत में उसके मन में कई इच्छाएं होती हैं। कोई मनोकामना लेकर चलता है, कोई किसी परेशानी से मुक्ति चाहता है, कोई अपने परिवार के लिए प्रार्थना करता है। लेकिन जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ती है, उसकी इच्छाएं छोटी होने लगती हैं और उसका विश्वास बड़ा होता जाता है।” माता पार्वती ने मुस्कुराकर पूछा, “और जब वह भक्त आखिरकार आपके मंदिर तक पहुंच जाता है तो उस समय क्या होता है?” महादेव बोले, “जब वह मेरे सामने पहुंचता है, तब उसके हाथ में वही जल होता है जो वह रास्ते भर संभालकर लाया था। लेकिन उस समय वह जल केवल नदी का जल नहीं रहता। उसमें उसके रास्ते की थकान होती है, उसकी प्रार्थना होती है, उसके आंसू होते हैं, उसकी उम्मीद होती है और उसके हर कदम का संकल्प होता है। जब वह उस जल को मेरे शिवलिंग पर अर्पित करता है, तो वास्तव में वह केवल मुझे जल नहीं चढ़ाता। वह अपने भीतर का बोझ भी मेरे चरणों में रख देता है।” इसीलिए सावन के महीने में जब कांवड़िए दूर-दूर से गंगाजल लेकर निकलते हैं, तो उनके चारों तरफ़ एक अलग ही वातावरण दिखाई देता है। रास्ते में हर तरफ़ भगवा रंग नजर आता है। कहीं “हर हर महादेव” की आवाज़ सुनाई देती है, तो कहीं “बोल बम” का जयघोष। कोई पैदल चल रहा है, कोई विश्राम कर रहा है, कोई अपने साथी की मदद कर रहा है। कई जगह लोग कांवड़ियों के लिए भोजन और पानी की व्यवस्था करते हैं। किसी के लिए यह धार्मिक यात्रा है, किसी के लिए मनोकामना की यात्रा और किसी के लिए अपने आराध्य के प्रति प्रेम व्यक्त करने का तरीका। लेकिन इन सभी यात्राओं के बीच एक भावना समान होती है—महादेव के प्रति अटूट विश्वास। कहा जाता है कि कांवड़ को जमीन पर न रखने की परंपरा भी इसी संकल्प और सम्मान से जुड़ी हुई मानी जाती है। भक्त अपनी कांवड़ को एक पवित्र जिम्मेदारी की तरह संभालते हैं। उन्हें पता होता है कि यह यात्रा केवल मंजिल तक पहुंचने की नहीं, बल्कि अपने संकल्प को अंत तक निभाने की यात्रा है। रास्ते में कई बार शरीर थकता है, मन विचलित होता है, लेकिन तभी किसी साथी की आवाज़ सुनाई देती है—बोल बम। और जैसे उस एक आवाज़ में फिर से ऊर्जा भर जाती है। कुछ पल पहले जो कदम रुकने वाले थे, वही कदम फिर आगे बढ़ने लगते हैं। महादेव ने माता पार्वती से कहा, “देवी, यही कारण है कि मुझे अपने भक्तों के कंधे पर रखी कांवड़ दिखाई देती है तो उसमें केवल जल नहीं दिखाई देता। मुझे उसमें उनका विश्वास दिखाई देता है। कोई अपने पिता के लिए जल लेकर चल रहा होता है, कोई अपनी मां के लिए, कोई अपने परिवार के लिए और कोई अपने जीवन की किसी कठिनाई से बाहर निकलने की प्रार्थना लेकर चलता है। लेकिन जो व्यक्ति सच्चे मन से मेरा नाम लेकर आगे बढ़ता है, वह कभी अकेला नहीं होता। उसके साथ उसकी श्रद्धा चलती है।” माता पार्वती ने धीरे से कहा, “तो प्रभु, क्या यह कहना सही होगा कि कांवड़ यात्रा केवल गंगाजल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने की यात्रा नहीं है?” महादेव बोले, “बिल्कुल देवी। यह मनुष्य के भीतर से अहंकार को बाहर निकालने और विश्वास को भीतर जगाने की यात्रा है। वह जल बाहर से गंगा का होता है, लेकिन यात्रा के बाद वही जल उसके लिए श्रद्धा का प्रतीक बन जाता है। वह कंधे पर कांवड़ रखकर चलता है, लेकिन वास्तव में वह अपने मन को अनुशासन सिखा रहा होता है। वह रास्ते की कठिनाई सहता है, लेकिन वास्तव में वह अपने भीतर धैर्य पैदा कर रहा होता है। वह बार-बार मेरा नाम लेता है, लेकिन धीरे-धीरे वही नाम उसके भीतर की बेचैनी को शांत करने लगता है।” और शायद यही वजह है कि सावन आते ही करोड़ों भक्त महादेव के दरबार की ओर खिंचे चले आते हैं। कोई हरिद्वार से जल उठाता है, कोई गंगोत्री से, कोई किसी पवित्र नदी के तट से। कोई छोटी यात्रा करता है और कोई कई दिनों तक पैदल चलता है। लेकिन मंजिल एक ही होती है—महादेव। जब वह भक्त अंत में शिवलिंग के सामने खड़ा होकर अपने हाथों से वह जल अर्पित करता है, तो शायद उसके मन में केवल एक ही भावना होती है—“महादेव, मैं आपके लिए कुछ लेकर आया था, लेकिन रास्ते में मुझे समझ आया कि देने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है। जो कुछ है, वह भी आपका ही दिया हुआ है।” महादेव ने अंत में माता पार्वती की ओर देखकर कहा, “देवी, इसलिए जब सावन में कोई भक्त कांवड़ उठाकर चलता है, तो उसके कदमों को केवल उसकी शक्ति मत समझना। उनमें उसकी श्रद्धा भी होती है। उसके कंधे पर केवल कांवड़ नहीं होती, उसके भीतर एक संकल्प होता है। और जब वह मेरे ऊपर जल चढ़ाता है, तो मैं उसके पात्र में भरे जल को नहीं, उसके हृदय में भरे विश्वास को स्वीकार करता हूं। यही कांवड़ यात्रा का सबसे बड़ा रहस्य है।” तो अगली बार जब सावन में आपको भगवा वस्त्र पहने कोई कांवड़िया सड़क पर दिखाई दे और उसके कंधे पर पवित्र जल से भरी कांवड़ नजर आए, तो उसे केवल एक यात्री मत समझिएगा। वह अपने विश्वास को कंधे पर उठाकर चल रहा होता है। उसके हर कदम में एक प्रार्थना होती है, हर “बोल बम” में एक पुकार होती है और हर बूंद में महादेव के प्रति समर्पण की भावना होती है। क्योंकि कांवड़ में भरा जल जितना पवित्र माना जाता है, उससे कहीं अधिक पवित्र उस भक्त का संकल्प है, जो उसे लेकर इतनी दूर तक चलता है। और शायद इसी भावना के कारण सावन आते ही हर दिशा से एक ही आवाज़ सुनाई देती है—हर हर महादेव। अगर आपके हृदय में भी महादेव के लिए अटूट श्रद्धा है, तो मन से एक बार बोलिए—हर हर महादेव। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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12 days ago
#🪔सावन का पवित्र महीना 🙏 #हरिद्वार कांवड़ यात्रा 🙏🙏 #कांवड़ यात्रा काँवड यात्रा से जुड़े रोचक रहस्य 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ किसने किया था सबसे पहले शिव लिंग का जल अभिषेक? श्रावण का महीना आते ही हर कोई शिव की भक्ति में झूमने लगता है. इस पावन त्यौहार में पुरे उत्तर भारत और अन्य राज्यो से कावड़िये शिव के पवित्र धामो में जाते है तथा वहां से गंगाजल लाकर शिव का जलाभिषेक करते है. कावड़ियो को नंगे पैर बहुत दूर चलकर गंगा जल लाना होता है तथा शर्त यह होती है की कावड़ी, शिव कावड़ को जमीन में नही रखता. इस प्रकार शिव भक्त अनेक कठिनाइयों का समाना करके गंगा जल लाते है तथा उससे शिव का जलाभिषेक करते है. परन्तु क्या आपने कभी यह सोचा है की आखिर वह कौन पहला व्यक्ति होगा जो सबसे पहला कावड़ी था तथा जिसने सबसे पहले भगवान शिव का जलाभिषेक कर उनकी कृपा प्राप्त करी व इस परम्परा का आरम्भ हुआ.ऋषि जमदग्नि ने उनका बहुत अच्छी तरह से आदर सत्कार किया उनकी सेवा में किसी भी तरह की कमी नहीं आने दी . सहस्त्रबाहु ऋषि के आदर सत्कार से बहुत ही प्रसन्न हुआ परन्तु उसे यह बात समझ में नहीं आ रही थी की आखिर एक साधारण एवम गरीब ऋषि उसके और उसकी सेना के लिए इतना सारा खाना कैसे जुटा पाया . तब उसे अपने सेनिको से यह पता लगा की रसिहि जमदग्नि के पास एक कामधेनु नाम की दिव्य गाय है. जिससे कुछ भी मांगो वह सब कुछ प्रदान करती है. जब राजा को यह ज्ञात हुआ की इसी कामधेनु गाय के कारण ऋषि जमदग्नि संसाधन जुटाने में कामयाब हो पाया तो उस गाय को प्राप्त करने के लिए सहस्त्रबाहु के मन में लालच उतपन्न हुआ. उसने ऋषि से कामधेनु गाय मांगी परन्तु ऋषि जमदग्नि ने कामधेनु गाय को देने से मना कर दिया. इस पर सह्त्रबाहु अत्यंत कोर्धित हो गया तथा उसने कामधेनु गाय को प्राप्त करने के लिए ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दी. जब यह खबर परशुराम को पता लगी की सहस्त्रबाहु ने उनके पिता की हत्या कर दी है तथा वह कामधेनु गाय को अपने साथ ले गया है तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए. उन्होंने सहस्त्रबाहु के सभी भुजाओ को काट कर उसकी हत्या कर डाली.बाद में परशुराम ने अपने तपस्या प्रभाव से अपने पिता जमदग्नि को पुनः जीवनदान दिया. जब ऋषि को यह बात पता चला की परशुराम ने सहस्त्रबाहु की हत्या कर दी तो उन्होंने इसके पश्चाताप के लिए परशुराम जी से भगवान शिव का जलाभिषेक करने को कहा. तब परशुराम अपने पिता के आज्ञा से अनेको मिल दूर चलकर गंगा जल लेकर आये तथा आश्रम के पास ही शिवलिंग की स्थापना कर शिव का महाभिषेक किया व उनकी स्तुति करी . जिस क्षेत्र में परशुराम ने शिवलिंग स्थापित किया था उस क्षेत्र का प्रमाण आज भी मौजूद है. वह क्षेत्र उत्तरप्रदेश में आता है तथा पूरा महादेव के नाम से प्रसिद्ध है। काँवड यात्रा के मुहूर्त 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ वर्ष 2026 मे कांवड़ यात्रा की शुरुआत 30 जुलाई से हो चुकी है और यह 11 अगस्त तक चलेगी। सावन माह शिवरात्रि में जलाभिषेक 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार मासिक शिवरात्रि हर महीने की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को पड़ती है। लेकिन सावन की शिवरात्रि का अलग महत्व है। इस दिन भगवान आशुतोष की विशेष पूजा अर्चना के साथ शिवालयों में जलाभिषेक तथा कावंडियो द्वारा लाये गये गंगाजल से अभिषेक करके अपनी कांवड यात्रा को पूर्ण करने की परंपरा है। पंचांग के अनुसार साल 2026 में सावन का महीना 30 जुलाई से शुरू होकर 28 अगस्त को पूर्ण होगा। कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से आरंभ होगी तथा सावन शिवरात्रि 11 अगस्त को समाप्त हो जाएगी। चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ 👉 11 अगस्त को प्रातः 04:54 बजे से। चतुर्दशी तिथि समाप्त 👉 12 अगस्त को रात्री 01:52 बजे तक। मंदिरों में त्रयोदशी व चतुर्दशी के दिन शिवभक्त भगवान आशुतोष का जलाभिषेक करेंगे। 10 जुलाई को प्रदोष काल, एवं 11 जुलाई को शिवलिङ्ग पर जलाभिषेक हेतु प्रातःकाल सूर्योदय के पश्चात् 2 घण्टे 24 मिनट का समय श्रेष्ठ रहेगा। श्रावण शिवरात्रि जलाभिषेक मुहूर्त 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ रात्रि प्रथम प्रहर पूजा समय - 19:04 से 21:45 रात्रि द्वितीय प्रहर पूजा समय - 21:45 से 00:26, अगस्त 12 रात्रि तृतीय प्रहर पूजा समय - 00:26 से 03:07, अगस्त 12 रात्रि चतुर्थ प्रहर पूजा समय - 03:07 से 05:49, अगस्त 12 निशिता काल पूजा समय 12:05 से 12:48 11 अगस्त श्रीगंगादि तीथों से 'जल लाने' एवं भगवान् शिव का पूजन एवं शिवलिङ्ग को 'जलांजली अभिषेक' करने हेतु अगस्त माह के शुभ पुण्य मुहूर्त〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ अगर आप शुभ मुहूर्त में कांवड़ धारण करना चाहते हैं, तो आपके लिए 3, 10 11, 17, 18, 21 और 24 अगस्त है, अच्छे दिन है। महादेव खुद कालों के काल है, इसलिए कांवड़ में राहुकाल और पंचक काल को नहीं माना जाता। विशेष:👉 कुछ विद्वान मुख्य मुहूर्त्त यानि श्रावण शिवरात्रि, वाले दिन सारा दिन ही अभिषेक करते हैं, तथा कुछ प्रदोषकाल व निशीथकाल (10/11 जुलाई मध्यरात्रि में भी जलाभिषेक करते हैं। विशेष:👉 भक्तगण इन मुहूत्तों में से कांवड़ जलाभिषेक हेतु जल को लाने एवं जलांजली अभिषेक हेतु कोई भी मुहूर्त्त ग्रहण कर सकते हैं। काँवड यात्रा से जुड़े अन्य रहस्य 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हिन्दू धर्म मे श्रावण माह में शिव की भक्ति के महत्व का वर्णन वेद तथा पुराणो में किया गया है। सावन का यह माह शिवभक्ति और आस्था का प्रतीक माना जाता है। कांवड़ियों द्वारा जल लाने की यात्रा के आरंभ की कुछ तिथियाँ होती हैं। इन्ही तिथियों पर कांवड़ियों को यात्रा करना शुभ रहता है। श्रावण के पावन मास में शिव भक्तों के द्वारा काँवर यात्रा का आयोजन किया जाता है। इस दौरान लाखों शिव भक्त दूरस्थ तथा दुर्गम स्थानों जैसे गोमुख, श्री अमरनाथ, श्री हरिद्वार, नीलकण्ठ एवं गंगा आदि तीर्थो से पवित्र गंगाजल के कलश से भरी काँवड़ को अपने कंधों रखकर पैदल लाते हैं और उस गंगा जल से भगवान् शिव के प्रतिष्ठित मन्दिरों, ज्योतिर्लिङ्गों, विग्रहों, स्वरूपों तथा क्षेत्रीय मन्दिरों में शिवभक्त कांवड़ियों द्वारा श्रद्धारूपी श्रीगङ्गाजल का अभिषेक किया जाता है। स्कन्दपुराणानुसार श्रावण मास में नियमपूर्वक नक्त व्रत करना चाहिए, और महीने भर प्रतिदिन रुद्राभिषेक करना अत्यंत पुण्यदायी होता है। कुर्यात् नक्त व्रतं योगिन् श्रावणे नियतो नरः। रुद्राभिषेकं कुर्वीत् मासमात्रं दिने दिने ।। कुछ लोगों का भ्रम है कि श्रावण भाद्रपद मास में नदियां रजस्वलारूप हो जाने से उनका जल पवित्र नहीं होता। परन्तु स्कन्दपुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि सिन्धु, सूती, चन्द्रभागा, गंगा, सरयू, नर्मदा, यमुना, प्लक्षजाला, सरस्वती- ये सभी नंदसंज्ञा वाली नदियां रजोदोष से युक्त नहीं होती है। ये सभी अवस्थाओं में निर्मल रहती हैं। प्रतिवर्ष होने वाली इस यात्रा में भाग लेने वाले श्रद्धालुओं को काँवरिया अथवा काँवड़िया कहा जाता है। भगवान् शिव की प्रसन्नता हेतु आषाढ़ पूर्णिमा से लेकर सम्पूर्ण श्रावण मास, शिवभक्त कांवड़िये तीर्थ स्थलों तथा अन्य तीर्थ स्थलो से गंगा जल लाकर इसी प्रकार से भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। कांवड लाने तथा जलाभिषेक करने का पौराणिक महत्व 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हिन्दू धर्म शास्त्रों मे प्रतिवर्ष सावन मास में कांवड लाने तथा भगवान शिव का जलाभिषेक करने के कई कारणों का उल्लेख किया गया है, जिसमें से दो मुख्य कारण इस प्रकार से है- 1. प्रथम कारण:👉 सतयुग मे देवासुर संग्राम के समय समुद्र मंथन से जो 14 रत्न प्राप्त हुए थे, उनमे "अमृतकलश" से पहले "कालकूट" नामक हलाहल यानि विष भी प्राप्त हुआ था। सृष्टि की रक्षा तथा सर्वकल्याण हेतु उस भयंकर विष को स्थान देने के लिए भगवान शिव ने उस विष का पान कर लिया, उस विष को कण्ठ मे धारण करने से विष के घातक प्रभाव से भगवान शिव का बदन भयानक गरमी से झुलसने लगा, तब इस भीषण जलन से मुक्ति प्रदान करने के लिए देवी-देवताओ, ऋषियों-मुनियों तथा शिवगणों ने गंगाजल, तथा अन्य पवित्र नदियों के जल से भगवान शिव का अभिषेक करके, विष की तीव्र ज्वाला को शान्त किया। तभी से श्रावण मास मे शिवकृपा पाने हेतु सावनमास की पूजा, अभिषेक तथा कांवड़ यात्रा की परंपरा शुरू हुई, और तभी से ही विष के कण्ठ मे धारण विष के प्रभाव से भगवान शिव को नीलकंठ भी क्हा जाने लगा । शिवपुराण' में उल्लेख है कि भगवान शिव स्वयं ही जल हैं। इसलिए जल से उनकी अभिषेक के रूप में आराधना का उत्तमोत्तम फल है, जिसमें कोई संशय नहीं है। 2. द्वितीय कारण:👉 भगवान शिव को सावन का महीना अत्यंत प्रिय है, क्योंकि भगवान शिव सावन के महीने में पृथ्वी पर अवतरित होकर अपनी ससुराल गए थे, और वहां उनका स्वागत अर्घ्य और जलाभिषेक से किया गया था। माना जाता है कि प्रत्येक वर्ष सावन माह में भगवान शिव अपनी ससुराल आते हैं। भू-लोक वासियों के लिए शिव कृपा पाने का यह उत्तम समय होता है। अतः शिवभक्तो ने भगवान शिव की प्रसन्नता पाने हेतु सावन मास में भगवान का जलाभिषेक करना प्रारम्भ कर दिया। 3.👉 एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान परशुराम ने सबसे पहले कांवड़ यात्रा की शुरुआत की थी। परशुराम गढ़मुक्तेश्वर धाम से गंगाजल लेकर आए थे और यूपी के बागपत के पास स्थित "पुरा महादेव" का गंगाजल से अभिषेक किया था। सावन मे शिव जलाभिषेक का फल: 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ श्रावण मास भगवान शिव का जलाभिषेक करने से व्यक्ति को समस्त सुखों की प्राप्ति होती है। इस विषय में प्रसिद्ध एक पौराणिक मान्यता के अनुसार श्रावण मास में जो भी मनुष्य कांवड लाता अथवा शिव का जलाभिषेक करता है, उसकी समस्त इच्छाएं पूर्ण होती है। इन दिनों किया गया जलाभिषेक, दान-पुण्य एवं पूजन समस्त ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के समान फल देने वाला होता है। इस जलाभिषेक के फलस्वरूप अनेक कामनाएं तथा उद्देश्यों की पूर्ति हो सकती है, इससे सुखी वैवाहिक जीवन, संतान सुख, सुख-समृद्धि प्राप्ति, मनोवांछित जीवनसाथी की प्राप्ति, तथा संतान सुख अर्थात कुल वृद्धि कारक होता है। इससे लक्ष्मी प्राप्ति और यश-कीर्ति भी प्राप्त होती है। कुछ लोगों का भ्रम है कि श्रावण भाद्रपद मास में नदियां रजस्वलारूप हो जाने से उनका जल पवित्र नहीं होता। परन्तु स्कन्दपुराण में स्पष्ट लिखा है कि सिन्धु, सूती, चन्द्रभागा, गंगा, सरयू, नर्मदा, यमुना, प्लक्षजाला, सरस्वती- ये सभी नंदसंज्ञा वाली नदियां रजोदोष से युक्त नहीं होती है। ये सभी अवस्थाओं में निर्मल रहती है। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
MINTU KUMAR THAKUR
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13 days ago
#🙏रोजाना भक्ति स्टेट्स ## सावन का महीना #जय भोलेनाथ हैप्पी सावन #कांवड़ यात्रा #🕉 शिव भजन🙏 हरिद्वार हर की पैड़ी 📿😄✨ : : : प्रेम से बोलो जय भोले की🙏🚩🔱 : :#kawaryatra🔱🔱🔱🕉️🕉️🕉️ : : #haridwar : : #mahadevstatus : : #instagramer #reelsviral