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, *शिव महापुराण में कहीं भी ऐसा नहीं लिखा है कि भगवान शिव नशा करते थे।*
शिव पुराण के अनुसार जो बात कही गई है वो ये है:
- *भांग का वर्णन ही नहीं है पूजा में।* उमा-महेश्वर संवाद में भगवान शिव स्वयं कहते हैं - जो पलाश, बेलपत्र, आक के फूल, फल, फूल, साग या जल भक्ति से देता है वो मुझे प्रिय है। इसमें भांग का नाम नहीं आता।
- संतों और विद्वानों का भी यही कहना है कि शिव महापुराण में कहीं नहीं लिखा कि भगवान शिव नशा करते थे, तस्वीरों में उन्हें भांग-गांजा पीते हुए गलत दिखाया जाता है, ये समाज में गलत संदेश दे रही हैं।
*फिर भांग-धतूरा चढ़ता क्यों है?*
इसकी कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है। जब समुद्र से हलाहल विष निकला और किसी ने ग्रहण नहीं किया, तो शिव जी ने सृष्टि की रक्षा के लिए उसे अपने गले में धारण किया और नीलकंठ कहलाए।
विष के प्रभाव से वह अचेत हो गए, तो उसके ताप को कम करने के लिए देवताओं ने उनके सिर पर भांग-धतूरा रखा और निरंतर जलाभिषेक किया।
इसीलिए भांग-धतूरा औषधि और शीतलक के रूप में शिवलिंग पर *अर्पित* किया जाता है, सेवन करने के लिए नहीं।
कुछ विद्वान इसका प्रतीकात्मक अर्थ भी बताते हैं कि भक्त अपना अहंकार, क्रोध जैसी बुराइयों रूपी नशे को भगवान के चरणों में समर्पित कर रहा है। भगवान स्वयं किसी नशे के आदी नहीं थे, वे तो संसार के विष को धारण करने वाले हैं।