पौराणिक तथ्य

Satyanand Shanmukham Mudaliar.
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7 दिन पहले
अचलेश्वर महादेव मंदिर, माऊंट अबू......... #पौराणिक कथा
sn vyas
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1 महीने पहले
#पौराणिक कथा #🙏🏻सीता राम #🙏रामायण🕉 #🎶जय श्री राम🚩 ॥ श्रीहरिः ॥ *सीता-शुकी-संवाद* एक दिन परम सुन्दरी सीताजी सखियोंके साथ उद्यानमें खेल रही थीं। वहाँ उन्हें शुक पक्षीका एक जोड़ा दिखायी दिया जो बड़ा मनोरम था। वे दोनों पक्षी एक डालीपर बैठकर इस प्रकार बोल रहे थे- 'पृथ्वीपर श्रीराम नामसे प्रसिद्ध एक बड़े सुन्दर राजा होंगे। उनकी महारानी सीताके नामसे विख्यात होंगी। श्रीरामजी बड़े बुद्धिमान् और बलवान् होंगे। वे समस्त राजाओंको अपने वशमें रखते हुए सीताके साथ ग्यारह हजार वर्षों तक राज्य करेंगे। धन्य हैं वे जानकीदेवी और धन्य हैं श्रीराम, जो एक-दूसरेको प्राप्त होकर इस पृथ्वीपर आनन्दपूर्वक विहार करेंगे।' उनको ऐसी बातें करते देख सीताजीने सोचा- 'ये दोनों मेरे ही जीवनकी मनोरम कथा कह रहे हैं। इन्हें पकड़कर सभी बातें पूछूँ।' ऐसा विचारकर उन्होंने अपनी सखियोंके द्वारा उन दोनोंको पकड़वाकर मँगवाया और उनसे कहा- 'तुम दोनों बहुत सुन्दर हो, डरना नहीं। बताओ, तुम कौन हो और कहाँसे आये हो ? राम कौन हैं ? और सीता कौन हैं ? तुम्हें उनकी जानकारी कैसे हुई ? इन सारी बातोंको शीघ्रातिशीघ्र बताओ। मेरी ओरसे तुम्हें कोई भय नहीं होना चाहिये।' सीताजीके इस प्रकार पूछनेपर उन पक्षियोंने कहा- 'देवि !वाल्मीकि-नामसे प्रसिद्ध एक बहुत बड़े महर्षि हैं, जो धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ माने जाते हैं। हम दोनों उन्हींके आश्रममें रहते हैं। महर्षिने रामायण नामक एक महाकाव्यकी रचना की है, जो सदा ही मनको प्रिय जान पड़ता है। उन्होंने शिष्योंको उसका अध्ययन कराया है तथा प्रतिदिन वे सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें संलग्न रहकर उसके पद्योंका चिन्तन किया करते हैं। उसका कलेवर बहुत बड़ा है। हमलोगोंने उसे पूरा-पूरा सुना है। बारम्बार उसका गान तथा पाठ सुननेसे हमें भी उसका अभ्यास हो गया है। राम और सीता कौन हैं- यह हम बताते हैं तथा इसकी भी सूचना देते हैं कि श्रीरामके साथ क्रीड़ा करनेवाली जानकीके विषयमें क्या-क्या बातें होनेवाली हैं, तुम ध्यान देकर सुनो। महर्षि ऋष्यश्रृंगके द्वारा कराये हुए पुत्रेष्टि-यज्ञके प्रभावसे भगवान् विष्णु राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न-ये चार शरीर धारण करके प्रकट होंगे। देवांगनाएँ भी उनकी उत्तम कथाका गान करेंगी। श्रीराम महर्षि विश्वामित्रके साथ भाई लक्ष्मणसहित हाथमें धनुष लिये मिथिला पधारेंगे। वहाँ वे एक ऐसे धनुषको (जिसे दूसरा कोई उठा भी नहीं सकेगा) तोड़ डालेंगे और अत्यन्त मनोहर रूपवाली जनककिशोरी सीताको अपनी धर्मपत्नीके रूपमें ग्रहण करेंगे। फिर उन्हींके साथ श्रीरामजी अपने विशाल साम्राज्यका पालन करेंगे। ये तथा और भी बहुत-सी बातें जो वहाँ रहते समय हमारे सुननेमें आयी हैं, संक्षेपमें मैंने तुम्हें बता दीं। अब हम जाना चाहते हैं, हमें छोड़ दो।' कानोंको अत्यन्त मधुर प्रतीत होनेवाली पक्षियोंकी ये बातें सुनकर सीताजीने उन्हें मनमें धारण कर लिया और पुनः उनसे इस प्रकार पूछा- 'राम कहाँ होंगे ? किसके पुत्र हैं और कैसे वे दूल्हा-वेशमें आकर जानकीको ग्रहण करेंगे तथा मनुष्यावतारमें उनका श्रीविग्रह कैसा होगा ? उनके प्रश्नको सुनकर शुकी मन-ही-मन जान गयी कि ये ही सीता हैं। उन्हें पहचानकर वह सामने आकर उनके चरणोंमें गिरकर बोली - ' श्रीरामका मुख कमलकी कलीके समान सुन्दर होगा। नेत्र बड़े-बड़े और खिले हुए पंकजकी शोभाको धारण करनेवाले होंगे। नासिका ऊँची, पतली तथा मनोहारिणी होगी। दोनों भौहें सुन्दर ढंगसे मिली होनेके कारण मनोहर प्रतीत होंगी। गला शंखके समान सुशोभित और छोटा होगा। वक्षःस्थल उत्तम, चौड़ा और शोभासम्पन्न होगा, उसमें श्रीवत्सका चिह्न होगा। सुन्दर जाँघों और कटिभागकी शोभासे युक्त दोनों घुटने अत्यन्त निर्मल होंगे, जिनकी भक्तजन आराधना करेंगे। श्रीरामजीके चरणारविन्द भी परम शोभायुक्त होंगे और सभी भक्तजन उनकी सेवामें सदा संलग्न रहेंगे। श्रीरामजी ऐसा ही मनोहर रूप धारण करनेवाले हैं। जिसके सौ मुख हैं, वह भी उनके गुणोंका बखान नहीं कर सकता, फिर हमारे-जैसे पक्षीकी क्या बिसात है। परम सुन्दर रूप धारण करनेवाली लावण्यमयी लक्ष्मी भी जिनकी झाँकी करके मोहित हो गयीं, उन्हें देखकर पृथ्वीपर दूसरी कौन स्त्री है, जो मोहित न होगी। उनका बल और पराक्रम महान् है। वे अत्यन्त मोहक रूप धारण करनेवाले हैं। मैं श्रीरामका कहाँतक वर्णन करूँ, वे सब प्रकारके ऐश्वर्यमय गुणोंसे युक्त हैं। परम मनोहर रूप धारण करनेवाली वे जानकीदेवी धन्य हैं, जो श्रीरामजीके साथ हजारों वर्षोंतक प्रसन्नतापूर्वक विहार करेंगी, परंतु सुन्दरि ! तुम कौन हो ? तुम्हारा नाम क्या है, जो इतनी चतुरता और आदरके साथ श्रीरामके गुणोंका कीर्तन सुननेके लिये प्रश्न कर रही हो ?' शुकीकी ये बातें सुनकर जनककुमारी सीता अपने जन्मकी ललित एवं मनोहर चर्चा करती हुई बोलीं- 'जिसे तुमलोग जानकी कह रहे हो, वह जनककी पुत्री मैं ही हूँ। मेरे मनको लुभानेवाले श्रीराम जब यहाँ आकर मुझे स्वीकार करेंगे, तभी मैं तुम्हें छोड़ेंगी, अन्यथा नहीं; क्योंकि तुमने अपने वचनोंसे मेरे मनमें लोभ उत्पन्न कर दिया है। अब तुम इच्छानुसार खेल करते हुए मेरे घरमें सुखसे रहो और मीठे-मीठे पदार्थ भोजन करो।' यह सुनकर शुकीने जानकीजीसे कहा- 'साध्वि ! हम वनके पक्षी हैं, पेड़ोंपर रहते हैं और सर्वत्र विचरा करते हैं। हमें तुम्हारे घरमें सुख नहीं मिलेगा। मैं गर्भिणी हूँ, अपने स्थानपर जाकर बच्चे पैदा करूँगी। उसके बाद फिर तुम्हारे यहाँ आ जाऊँगी।' उसके ऐसा कहनेपर भी सीताजीने उसे नहीं छोड़ा। तब उसके पति शुकने विनीत वाणीमें उत्कण्ठित होकर कहा - 'सीता ! मेरी सुन्दरी भार्याको छोड़ दो। इसे क्यों रख रही हो ? शोभने ! यह गर्भिणी है। सदा मेरे मनमें बसी रहती है। जब यह बच्चोंको जन्म दे लेगी, तब मैं इसे लेकर तुम्हारे पास आ जाऊँगा।' शुकके ऐसा कहनेपर जानकीजीने कहा- 'महामते ! तुम आरामसे जा सकते हो, किंतु तुम्हारी यह भार्या मेरा प्रिय करनेवाली है। मैं इसे अपने पास बड़े सुखसे अपनी सखी बनाकर रखूँगी।' यह सुनकर पक्षी दुःखी हो गया। उसने करुणायुक्त वाणीमें कहा- *'योगीलोग जो बातें कहते हैं वह सत्य ही है-किसीसे कुछ न कहे, मौन होकर रहे, नहीं तो उन्मत्त प्राणी अपने वचनरूपी दोषके कारण ही बन्धनमें पड़ता है। यदि हम इस पेड़पर बैठकर वार्तालाप न करते होते तो हमारे लिये यह बन्धन कैसे प्राप्त होता ? इसलिये मौन ही रहना चाहिये था।'* इतना कहकर पक्षी पुनः बोला- 'सुन्दरि ! मैं अपनी इस भार्याके बिना जीवित नहीं रह सकता, इसलिये इसे छोड़ दो। सीता ! तुम बड़ी अच्छी हो। मेरी प्रार्थना मान लो।' इस तरह नाना प्रकारकी बातें कहकर उसने समझाया, परंतु सीताजीने शुकीको नहीं छोड़ा। तब शुकीने पुनः कहा- 'सीते ! मुझे छोड़ दो, अन्यथा शाप दे दूँगी।' सीताजीने कहा- 'तुम मुझे डराती-धमकाती हो ! मैं इससे तुम्हें नहीं छोड़ेंगी।' तब शुकीने क्रोध और दुःखमें आकुल होकर जानकीजीको शाप दिया- 'अरी ! जिस प्रकार तू मुझे इस समय अपने पतिसे विलग कर रही है, वैसे ही तुझे स्वयं भी गर्भिणी-अवस्थामें श्रीरामसे अलग होना पड़ेगा।' यों कहकर पतिवियोगके शोकमें उसके प्राण निकल गये। उसने श्रीरामका स्मरण तथा पुनः पुनः राम-नामका उच्चारण करते हुए प्राण त्याग किया था, इसलिये उसे ले जानेके लिये सुन्दर विमान आया और वह शुकी उसपर बैठकर भगवान्के धामको चली गयी। भार्याकी मृत्यु हो जानेपर शुक शोकसे आतुर होकर बोला - 'मैं मनुष्योंसे भरी हुई श्रीरामकी नगरी अयोध्यामें जन्म लूँगा और इसका बदला चुकाऊँगा। मेरे ही वाक्यसे उद्वेगमें पड़कर तुम्हें पतिवियोगका भारी दुःख उठाना पड़ेगा।' यह कहकर उसने भी अपना प्राण छोड़ दिया। *पद्मपुराण* श्रीमन्नारायण नारायण नारायण .. – ‘पौराणिक कथाएँ’ गीताप्रेस गोरखपुर की पुस्तकसे साभार
sn vyas
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1 महीने पहले
#पौराणिक कथा पौराणिक कथाए। ब्रम्हाजी कि पुत्री अहिल्या कि कहानि आइए जाने ब्रह्मा जी की पुत्री #अहिल्या को यह वरदान प्राप्त था कि वह सदा ही 16 वर्ष की आयु के सदृश ही रहेंगी। ब्रह्मा जी ने एक स्पर्धा करवाई, जिसे गौतम ऋषि ने जीता और अहिल्या को पत्नी रूप में प्राप्त किया। अहिल्या के रूप की चर्चा तीनों लोकों में थी। अपने रूप, गुण, सौन्दर्य और पतिव्रत धर्म के पालन के कारण ही वह भक्तों के मन में बसी हुई हैं। देवराज इन्द्र ने जब अहिल्या के बारे में सुना तो उन्होंने सूर्य से उसकी सुन्दरता के बारे में पूछा। सूर्यदेव ने इन्द्र देव की भावना भांप कर अपनी असमर्थता जताई। तब इंद्र ने चंद्रमा से पूछा तो उसने कहा कि अहल्या से अधिक रूपवती, गुणवान और पतिव्रता स्त्री सारी सृष्टि में कोई और नहीं है। ऐसा सुनकर इन्द्र ने छल रूप से अहिल्या को पाने का प्रयास करते हुए चंद्रमा की सहायता ली। योजना बनाई कि जब ऋषि गौतम प्रात: ब्रह्ममुहूर्त में गंगा स्नान को जाते हैं वही समय अहिल्या को पाने के लिए सही है। इंद्र ने चन्द्रमा को अपने काम में साथ देने के लिए उन्हें ऋषि के आश्रम के ऊपर ही टिके रहने के लिए कहा ताकि जब वह किसी को आश्रम की ओर आता देखे तो वह आश्रम के ऊपर से हट जाए क्योंकि चंद्रमा के हटने पर किसी को शक भी नहीं होगा तथा इन्द्र को ऋषि के आने की सूचना भी चंद्रमा के इस संकेत से मिल जाएगी। अहिल्या को पाने की लालसा से आधी रात को ही इंद्र ने मुर्गा बन कर बांग लगाई और ऋषि गौतम प्रात: हो गई सोचकर गंगा स्नान के लिए आश्रम से निकल गए। तब इंद्र ने झट से ऋषि गौतम का वेश बनाया और आश्रम में जाने लगे तो अहिल्या ने अपने तपोबल के प्रभाव से इंद्र को पहचान लिया और कहा कि ‘यदि मेरे पति हो तो आश्रम में आ जाओ’। इंद्र के छल की लालसा को देखकर अहिल्या ने उसे श्राप दिया कि तुम्हें कोढ़ हो जाए। दूसरी तरफ जब ऋषि गौतम ने गंगा स्नान करने के लिए कमंडल में जल भरा तो गंगा मां ने कहा कि अभी तो आधी रात हुई है, तो ऋषि आश्रम की ओर वापस चल पड़े। आश्रम के बाहर उन्होंने अपने वेश में ही इन्द्र को अपने साथ टकरा कर जाते हुए देखा और छत पर चन्द्रमा को पहरेदारी करते देखकर सारी स्थिति को भांप लिया। ऋषि पत्नी अहिल्या उनके जल्दी आश्रम में लौट आने की चिंता में जैसे ही बाहर आई तो ऋषि गौतम ने अहिल्या को शिला होने और चन्द्रमा को इन्द्र का साथ देने के लिए उसमें दाग होने और ग्रहण लगने का तत्काल श्राप दे दिया। जिसके प्रभाव से अहिल्या आश्रम के बाहर एक पत्थर की शिला बन गई। देवर्षि नारद ने तब ऋषि गौतम को अहिल्या के बेकसूर होने के बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि श्राप तो नहीं मिटाया जा सकता परन्तु उन्होंने अहिल्या को एक वरदान भी दिया कि सूर्यवंशी भगवान श्री राम जब उस शिला के साथ अपने चरणों का स्पर्श करेंगे तो वह पूर्ववत हो जाएगी। धर्मग्रंथों में चंद्रमा के कलंक लगने और ग्रहण लगने के बारे में भी अनेक कथाएं मिलती हैं, परंतु ऋषि गौतम का श्राप भी उनमें से एक है। मिथिला में राजा जनक के धनुष यज्ञ को दिखाने के लिए गुरु विश्वामित्र उन्हें साथ लेकर जा रहे थे तो ‘आश्रम एक दीख मग माहीं, खग, मृग, जीव जन्तु तंह नाहीं, पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी, सकल कथा मुनि कहा बिसेषी’। गुरु विश्वामित्र ने बताया ‘गौतम नारी श्राप बस उपल देह धरि धीर, चरण कमल रज चाहति, कृपा करो रघुबीर’। श्री राम जी के पवित्र एवं शोक का नाश करने वाले चरणों का स्पर्श पाते ही वह तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हो गई और भक्तों को सुख देने वाले प्रभु को सामने देखकर वह प्रभु चरणों से लिपट गई। *परसत पद पावन सोकनसावन प्रगट भई तपपुंज सही। देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही॥ अति प्रेम अधीरा पुलक शरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही। अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही॥ भावार्थ:-श्री रामजी के पवित्र और शोक को नाश करने वाले चरणों का स्पर्श पाते ही सचमुच वह तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हो गई। भक्तों को सुख देने वाले श्री रघुनाथजी को देखकर वह हाथ जोड़कर सामने खड़ी रह गई। अत्यन्त प्रेम के कारण वह अधीर हो गई। उसका शरीर पुलकित हो उठा, मुख से वचन कहने में नहीं आते थे। वह अत्यन्त बड़भागिनी अहल्या प्रभु के चरणों से लिपट गई और उसके दोनों नेत्रों से जल (प्रेम और आनंद के आँसुओं) की धारा बहने लगी॥ *धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई। अति निर्मल बानी अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई॥ मैं नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई। राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई॥ भावार्थ:-फिर उसने मन में धीरज धरकर प्रभु को पहचाना और श्री रघुनाथजी की कृपा से भक्ति प्राप्त की। तब अत्यन्त निर्मल वाणी से उसने (इस प्रकार) स्तुति प्रारंभ की- हे ज्ञान से जानने योग्य श्री रघुनाथजी! आपकी जय हो! मैं (सहज ही) अपवित्र स्त्री हूँ, और हे प्रभो! आप जगत को पवित्र करने वाले, भक्तों को सुख देने वाले और रावण के शत्रु हैं। हे कमलनयन! हे संसार (जन्म-मृत्यु) के भय से छुड़ाने वाले! मैं आपकी शरण आई हूँ, (मेरी) रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए॥ *मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना। देखेउँ भरि लोचन हरि भव मोचन इहइ लाभ संकर जाना॥ बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना। पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना॥ भावार्थ:-मुनि ने जो मुझे शाप दिया, सो बहुत ही अच्छा किया। मैं उसे अत्यन्त अनुग्रह (करके) मानती हूँ कि जिसके कारण मैंने संसार से छुड़ाने वाले श्री हरि (आप) को नेत्र भरकर देखा। इसी (आपके दर्शन) को शंकरजी सबसे बड़ा लाभ समझते हैं। हे प्रभो! मैं बुद्धि की बड़ी भोली हूँ, मेरी एक विनती है। हे नाथ ! मैं और कोई वर नहीं माँगती, केवल यही चाहती हूँ कि मेरा मन रूपी भौंरा आपके चरण-कमल की रज के प्रेमरूपी रस का सदा पान करता रहे॥ *जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी। सोई पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी॥ एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी। जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पति लोक अनंद भरी॥ भावार्थ:-जिन चरणों से परमपवित्र देवनदी गंगाजी प्रकट हुईं, जिन्हें शिवजी ने सिर पर धारण किया और जिन चरणकमलों को ब्रह्माजी पूजते हैं, कृपालु हरि (आप) ने उन्हीं को मेरे सिर पर रखा। इस प्रकार (स्तुति करती हुई) बार-बार भगवान के चरणों में गिरकर, जो मन को बहुत ही अच्छा लगा, उस वर को पाकर गौतम की स्त्री अहल्या आनंद में भरी हुई पतिलोक को चली गई॥ *अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल। तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल॥ भावार्थ:-प्रभु श्री रामचन्द्रजी ऐसे दीनबंधु और बिना ही कारण दया करने वाले हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, हे शठ (मन)! तू कपट-जंजाल छोड़कर उन्हीं का भजन कर॥ !!राम राम सब कोई कहे,ठग ठाकुर और चोर!! !! जिस राम से मीरा तले,वह राम कोई और!!
Zuvo.official
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2 महीने पहले
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sn vyas
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2 महीने पहले
#पौराणिक कथा एक बार की बात है, राजा बलि समय बिताने के लिए एकान्त स्थान पर गधे के रूप में छिपे हुए थे। देवराज इन्द्र उनसे मिलने के लिए उन्हें ढूँढ रहे थे। एक दिन इन्द्र ने उन्हें खोज निकाला और उनके छिपने का कारण जानकर उन्हें काल का महत्व बताया। साथ ही उन्हें तत्वज्ञान का बोध कराया। तभी राजा बलि के शरीर से एक दिव्य रूपात्मा स्त्री निकली। उसे देखकर इन्द्र ने पूछा-“दैत्यराज! यह स्त्री कौन है? देवी, मानुषी अथवा आसुरी शक्ति में से कौन-सी शक्ति है?” राजा बलि बोले-“देवराज! ये देवी तीनों शक्तियों में से कोई नहीं हैं। आप स्वयं पूछ लें।” इन्द्र के पूछने पर वे शक्ति बोलीं-“देवेन्द्र! मुझे न तो दैत्यराज बलि जानते हैं और न ही तुम या कोई अन्य देवगण। पृथ्वी लोक पर लोग मुझे अनेक नामों से पुकारते हैं। जैसे-श्री, लक्ष्मी आदि।” इन्द्र बोले-“देवी! आप इतने समय से राजा बलि के पास हैं लेकिन ऐसा क्या कारण है कि आप इन्हें छोड़कर मेरी ओर आ रही हैं?” लक्ष्मी बोलीं-“देवेन्द्र! मुझे मेरे स्थान से कोई भी हटा या डिगा नहीं सकता है। मैं सभी के पास काल के अनुसार आती-जाती रहती हूँ। जैसा काल का प्रभाव होता है मैं उतने ही समय तक उसके पास रहती हूँ। अर्थात मैं समयानुसार एक को छोड़कर दूसरे के पास निवास करती हूँ।” इन्द्र बोले-“देवी! आप असुरों के यहाँ निवास क्यों नहीं करतीं?” लक्ष्मी बोलीं-“देवेन्द्र! मेरा निवास वहीं होता है जहाँ सत्य हो, धर्म के अनुसार कार्य होते हों, व्रत और दान देने के कार्य होते हों। लेकिन असुर भ्रष्ट हो रहे हैं। ये पहले इन्द्रियों को वश में कर सकते थे, सत्यवादी थे, ब्राह्मणों की रक्षा करते थे, पर अब इनके ये गुण नष्ट होते जा रहे हैं।ये तप-उपवास नहीं करते; यज्ञ, हवन, दान आदि से इनका कोई संबंध शेष नहीं है। पहले ये रोगी, स्त्रियों, वृद्धों, दुर्बलों की रक्षा करते थे, गुरुजन का आदर करते थे, लोगों को क्षमादान देते थे। लेकिन अब अहंकार, मोह, लोभ, क्रोध, आलस्य, अविवेक, काम आदि ने इनके शरीर में जगह बना ली है। ये लोग पशु तो पाल लेते हैं लेकिन उन्हें चारा नहीं खिलाते, उनका पूरा दूध निकाल लेते हैं और पशुओं के बच्चे भूख से चीत्कारते हुए मर जाते हैं। ये अपने बच्चों का लालन-पालन करना भूलते जा रहे हैं। इनमें आपसी भाईचारा समाप्त हो गया है। लूट, खसोट, हत्या, व्यभिचार, कलह, स्त्रियों की पतिव्रता नष्ट करना ही इनका धर्म हो गया है। सूर्योदय के बाद तक सोने के कारण स्नान-ध्यान से ये विमुख होते जा रहे हैं। इसलिए मेरा मन इनसे उचट गया। देवताओं का मन अब धर्म में आसक्त हो रहा है। इसलिए अब मैं इन्हें छोड़कर देवताओं के पास निवास करूँगी। मेरे साथ श्रद्धा, आशा, क्षमा, जया, शान्ति, संतति, धृति और विजति ये आठों देवियाँ भी निवास करेंगी। देवेन्द्र! अब आपको ज्ञात हो गया होगा कि मैंने इन्हें क्यों छोड़ा है। साथ ही आपको इनके अवगुणों का भी ज्ञान हो गया होगा।” तब इन्द्र ने लक्ष्मी को प्रणाम किया और उन्हें आदर सहित स्वर्ग ले गए। यह कहानी भक्ति और भगवान की शेयर जरूर करें जिससे उन लोगों को भी विश्वास हो जिन्हें भगवान पर विश्वास नहीं है और हमारा सोया हुआ हिंदू जाग सके... जय मां लक्ष्मी...जय श्री कृष्ण ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः
sn vyas
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2 महीने पहले
#पौराणिक कथा राजा चित्रकेतु और भगवान के दर्शन — संपूर्ण कथा स्रोत: भागवत पुराण, छठा स्कंध, अध्याय 16 (पौराणिक कथा – मुक्त रूप में सुनाई गई) बहुत समय पहले राजा चित्रकेतु विशाल साम्राज्य के नरेश थे। वैभव, सेना, महल—सब कुछ था, मगर एक ही अभाव उन्हें भीतर से तोड़ता था—संतान का न होना। रानी कृतद्युति भी इसी कारण उदासी में दिन बिताती थीं। दोनों के जीवन में आनंद होते हुए भी एक गहरी खाली जगह थी। ऋषि का आगमन एक दिन राजमहल में तेजस्वी ऋषि अंगिरा ऋषि पधारे। राजा ने आदरपूर्वक उनका स्वागत किया और अपनी पीड़ा प्रकट की। ऋषि ने उनकी तड़प को समझा और बोले— "राजन्, समय आ गया है। तुम पर कृपा होगी।" ऋषि ने एक विशेष यज्ञ करवाया। यज्ञ के प्रसाद को रानी कृतद्युति ने ग्रहण किया, और कुछ समय बाद एक सुन्दर पुत्र ने जन्म लिया। महल में उत्सव छा गया—संगीत, नृत्य, दान, हर्ष—सब कुछ। प्रसन्नता से शोक तक परंतु सुख का यह दीप जल्द ही हवा से बुझ गया। राजकुमार की अचानक मृत्यु हो गई। महल का आनंद पल में राख हो गया। राजा बिखर गए, रानी निराशा में डूब गईं। सबको लगा जैसे जीवन का उद्देश्य ही समाप्त हो गया हो। उसी समय दो महान संत आए— नारद मुनि और अंगिरा ऋषि (फिर से)। उन्होंने राजा से कहा— "जिसे तुम अपना मानते हो, वह कभी स्थायी नहीं होता। जीवन में मिलने-विछोह दोनों ही निश्चित हैं। दुख में डूबने से सत्य छूट जाता है।" उनके वचनों ने चित्रकेतु के भीतर सोए विवेक को जगा दिया। वे समझ गए कि संसार परिवर्तनशील है, परन्तु परमात्मा शाश्वत है। वैराग्य और भक्ति का मार्ग राजा ने राज्य की हलचलों से मन हटाकर ईश्वर-चिन्तन में मन लगाया। शोक धीरे-धीरे शांति में बदलने लगा। ध्यान, जप और भक्ति—इन सबमें उनका हृदय डूब गया। भक्ति की अग्नि इतनी प्रबल हुई कि उनका जीवन जैसे तेज से चमकने लगा। उन्होंने संसार की क्षणभंगुरता को आत्मसात कर लिया और आत्मज्ञान में स्थित हो गए। भगवान का दर्शन एक दिन, ध्यान में बैठे राजा को दिव्य प्रकाश का अनुभव हुआ। उनके सम्मुख प्रकट हुए— भगवान विष्णु, अपनी मनोहारी रूप-छवि और शांति प्रदान करने वाले तेज के साथ। उनके साथ उपस्थित थे चार महान बाल-संत— सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमार, जो सदैव भगवान के निकट रहते हैं। चित्र में दिखाया गया दृश्य इसी क्षण को दर्शाता है— राजा चित्रकेतु भगवान के सामने हाथ जोड़कर बैठे हैं, उनकी आँखों में कृतज्ञता और भक्ति है। भगवान विष्णु उन्हें वरदान, आशीर्वाद और आध्यात्मिक मार्ग का प्रकाश दे रहे हैं। कुमार शांत भाव से इस दिव्य मिलन के साक्षी बने हुए हैं। कथा का संदेश यह कथा हमें सिखाती है: सुख-दुख जीवन के स्वाभाविक प्रवाह हैं। जो मिलता है, वह कभी स्थायी नहीं होता। विरक्ति, भक्ति और ज्ञान से जीवन का सच खुलता है। सच्चा संतोष परमात्मा के स्मरण में है।